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  "title": "जेईई रैंक का जुनून: क्या चालीस की उम्र में भी मायने रखती है किशोरावस्था की परीक्षा?",
  "summary": "जर्मनी में रहने वाले मयूख पंजा के एक वायरल सोशल मीडिया पोस्ट ने भारतीय कॉर्पोरेट जगत में बहस छेड़ दी है कि क्या चालीस साल की उम्र में भी जेईई रैंक और कॉलेज के टैग की चर्चा करना सही है।",
  "content": "भारत में इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा यानी जेईई को केवल एक इम्तिहान नहीं बल्कि जीवन का सबसे बड़ा मील का पत्थर माना जाता है। सत्रह या अठारह साल की कच्ची उम्र में हासिल की गई रैंक किसी भी छात्र और उसके पूरे परिवार के लिए गर्व का विषय बन जाती है। लेकिन एक गंभीर सवाल यह उठता है कि जब इंसान चालीस साल की उम्र में पहुंच जाए और उसका करियर पूरी तरह से स्थापित हो चुका हो, तब भी क्या उस पुरानी रैंक की कोई अहमियत होनी चाहिए? मयूख पंजा नाम के एक प्रोफेशनल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इसी विषय को लेकर एक विचार साझा किया है जिसने खासी चर्चा बटोरी है।\n\n \n\nजर्मनी में काम और रिसर्च को मिलती है प्राथमिकता\n अपनी मास्टर की पढ़ाई पूरी करने के बाद इंजीनियरिंग के क्षेत्र को छोड़कर प्योर साइंस की राह चुनने वाले मयूख पंजा पिछले करीब दस सालों से जर्मनी में रह रहे हैं। हाल ही में जब वे पेशेवर सिलसिले से बेंगलुरु आए तो उन्हें यह देखकर भारी आश्चर्य हुआ कि चालीस की उम्र पार कर चुके सफल पेशेवर भी अपनी पुरानी जेईई रैंक और कॉलेज के नाम पर चर्चा कर रहे थे। उन्होंने सवाल उठाया कि भारतीय समाज को आखिर किशोरावस्था के एक एग्जाम से इतने लंबे समय तक मोह क्यों रहता है।\n\n \n मयूख पंजा ने अपने संस्मरण साझा करते हुए लिखा कि जर्मनी में रहने के दौरान उनके लिए अंडरग्रेजुएट कॉलेज का अस्तित्व लगभग समाप्त सा हो गया था। यूरोपीय देशों में लोगों को आईआईटी, एनआईटी या गोवा यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों के बीच के अंतर की कोई जानकारी नहीं होती है। वहां किसी भी पेशेवर की पहचान उसके ग्रेजुएट स्कूल, शोध पत्रों, प्रकाशनों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में दिए गए भाषणों से तय होती है, न कि इस बात से कि उसने सत्रह साल की उम्र में कौन सी परीक्षा पास की थी। इस बारे में मयूख पंजा ने सोशल मीडिया पर अपनी बात रखी है।\n\n \n\nबेंगलुरु की यात्रा और चालीस साल की उम्र के पुराने सवाल\n जब मयूख पंजा बेंगलुरु पहुंचे तो उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि पेशेवर सफलता की ऊंचाई पर पहुंचने के बावजूद लोग पुराने दौर को याद कर रहे थे। उनका मानना है कि करियर के शुरुआती पांच वर्षों तक कॉलेज या जेईई रैंक की बात करना पूरी तरह स्वाभाविक और समझ में आने योग्य है। परंतु जब व्यक्ति चालीस की अवस्था में पहुंच जाता है और अपने कार्यक्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल कर चुका होता है, तब भी दो दशक पुरानी परीक्षा की रैंक का बार-बार जिक्र करना समझ से परे हो जाता है। उनका उद्देश्य किसी की आलोचना करना नहीं है, बल्कि इतने योग्य लोगों द्वारा पुरानी परीक्षा को बार-बार भुनाने की प्रवृत्ति उन्हें अचंभित करती है।\n\n \n\nबचपन के अधूरे सपनों का मलाल या मानसिक दबाव\n अपने सोशल मीडिया संदेश के अंत में मयूख पंजा ने एक बेहद गंभीर और आत्मविश्लेषण वाला सवाल खड़ा किया। उन्होंने लिखा कि क्या यह किशोरावस्था के दौरान पीछे छूट गए बचपन का कोई ऐसा मलाल है जो आज भी लोगों का पीछा नहीं छोड़ता है? भारत में प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के दौरान बच्चों के कोमल मन पर जो भारी मानसिक दबाव डाला जाता है, उसकी वजह से लोग उस दौर की उपलब्धियों को उम्रभर अपने दिल से चिपकाए रखते हैं और उनसे आगे नहीं निकल पाते हैं।\n\n \n\nशुरुआती दरवाजे खोलती है रैंक लेकिन टिके रहना क्षमता पर निर्भर है\n मयूख पंजा के इस वायरल पोस्ट पर कई इंटरनेट उपयोगकर्ताओं ने अपनी सहमति व्यक्त की है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि एक शानदार जेईई रैंक और आईआईटी का प्रतिष्ठित टैग करियर के शुरुआती दौर में पहला इंटरव्यू पाने में मददगार साबित होता है। हालांकि दस या बीस साल लंबे पेशेवर सफर में आपकी असली सफलता इस बात से आंकी जाती है कि आप वर्तमान में कैसा प्रदर्शन कर रहे हैं और आपकी समस्याओं को सुलझाने की क्षमता यानी प्रॉब्लम-सॉल्विंग एबिलिटी कितनी बेहतरीन है।\n\n \n\nबदलती हुई सोच और स्किल्स को मिलता महत्व\n मयूख पंजा की इस टिप्पणी ने कॉर्पोरेट जगत को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि अब आधुनिक तकनीक आधारित कंपनियों और स्टार्टअप्स की मानसिकता में बदलाव आ रहा है। अब पुरानी रैंकिंग या डिग्री के मुकाबले व्यावहारिक ज्ञान, नेतृत्व क्षमता और कार्य अनुभव को अधिक प्राथमिकता दी जाने लगी है। यही कारण है कि आज की युवा पीढ़ी केवल कागजी डिग्री के बजाय अपने कौशल को निखारने पर ज्यादा जोर दे रही है।\n\nइसका आप पर असर\nजेईई रैंक और कॉलेज के टैग को लेकर छिड़ी इस बहस का असर कामकाजी लोगों और छात्रों की मानसिकता पर पड़ता है।\n\n• भारत में: पेशेवरों को यह सीख मिलती है कि शुरुआती डिग्री के बजाय दीर्घकालिक कौशल और निरंतर प्रदर्शन ही करियर में असली तरक्की दिलाते हैं।\n\n• छात्रों के लिए: यह परीक्षा के अत्यधिक मानसिक दबाव से बाहर निकलकर व्यावहारिक ज्ञान और वास्तविक क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित करने की प्रेरणा देता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. मयूख पंजा कौन हैं और वे कहाँ रहते हैं?\nमयूख पंजा एक प्रोफेशनल हैं जिन्होंने मास्टर्स के बाद इंजीनियरिंग छोड़कर प्योर साइंस को चुना और वे पिछले लगभग दस सालों से जर्मनी में रह रहे हैं।\n\n2. मयूख पंजा को बेंगलुरु में क्या देखकर हैरानी हुई?\nउन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि चालीस की उम्र पार कर चुके सफल पेशेवर भी अपनी पुरानी जेईई रैंक और कॉलेज के टैग की बातें कर रहे थे।\n\n3. जर्मनी में पेशेवर पहचान किस आधार पर तय होती है?\nवहाँ किसी प्रोफेशनल की पहचान उसके ग्रेजुएट स्कूल, रिसर्च पेपर्स, पब्लिकेशन और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में दिए गए भाषणों से होती है।\n\n4. करियर में कौन सी चीज सबसे ज्यादा मायने रखती है?\nदस या बीस साल लंबे करियर में असली तरक्की इस बात पर निर्भर करती है कि आप वर्तमान में कैसा परफॉर्म कर रहे हैं और आपकी प्रॉब्लम-सॉल्विंग एबिलिटी कैसी है।",
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  "category": "करियर",
  "publishedAt": "2026-08-30",
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