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  "type": "article",
  "title": "पहली कक्षा की किताब में 'चंदा मामा दूर के' कविता में गलत शब्द छपने पर पटना हाईकोर्ट सख्त, केंद्र से मांगा जवाब",
  "summary": "एनसीईआरटी की कक्षा 1 की हिंदी पाठ्यपुस्तक में छपी प्रसिद्ध बाल कविता में एक अमर्यादित शब्द के प्रकाशन पर पटना हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है और केंद्र सरकार से विस्तृत स्पष्टीकरण तलब किया है।",
  "content": "भारत में बच्चों को लोरी सुनाने और उनके शुरुआती पठन-पाठन के लिए 'चंदा मामा दूर के, पुए पकाएं बूर के' कविता का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। यह कविता पीढ़ियों से बच्चों के बचपन का एक अभिन्न हिस्सा रही है। लेकिन जब देश के सबसे बड़े शैक्षणिक संस्थान की पहली कक्षा की पाठ्यपुस्तक में ही इस लोकप्रिय कविता के भीतर एक अमर्यादित और आपत्तिजनक शब्द छप जाए, तो यह एक बेहद गंभीर चिंता का विषय बन जाता है। इस गंभीर लापरवाही को लेकर अब कानूनी कार्रवाई शुरू हो चुकी है और मामला सीधे न्यायिक दहलीज तक पहुंच गया है। बच्चों के पाठ्यक्रम में हुई इस बड़ी अशुद्धि का संज्ञान लेते हुए पटना हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर इस पूरे मामले पर जवाब तलब किया है।\n\n \n\nहाईकोर्ट का हस्तक्षेप और कानूनी कार्रवाई\n\nयह पूरा विवाद NCERT द्वारा प्रकाशित कक्षा-1 की हिंदी पाठ्यपुस्तक 'सारंगी भाग-1' से जुड़ा हुआ है। इस किताब में शामिल प्रसिद्ध बाल गीत की पंक्तियों में एक गंभीर छपाई की गलती सामने आई है। इस मामले को लेकर पटना के एक निवासी सोमित्र शंकर ने न्यायालय में याचिका दायर की थी। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति सुधीर सिंह की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को स्वीकार किया है। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस विषय पर अपना पक्ष रखते हुए एक जवाबी हलफनामा दायर करे। याचिकाकर्ता के वकील शोवेन्द्र कुमार ने अदालत के समक्ष दलील दी कि स्कूली बच्चों की किताबों में इस प्रकार के अमर्यादित शब्दों का प्रकाशन न केवल बच्चों के कोमल दिमाग पर बुरा असर डालता है, बल्कि यह सामाजिक मर्यादाओं का भी उल्लंघन करता है।\n\n \n\nकविता में क्या है गंभीर अशुद्धि?\n\nन्यायालय में पेश की गई जानकारी के अनुसार, कक्षा-1 की हिंदी पुस्तक 'सारंगी भाग-1' में 'चंदा मामा दूर के' कविता प्रकाशित की गई है। इस कविता की दूसरी पंक्ति में जहां मिठास और बच्चों की पसंद को दर्शाने के लिए 'गुड़' शब्द का उपयोग किया जाना चाहिए था, वहां कथित रूप से एक बेहद आपत्तिजनक और अमर्यादित शब्द छाप दिया गया। याचिकाकर्ता के वकील शोवेन्द्र कुमार का कहना है कि इस गलत शब्द के प्रयोग से कविता का मूल स्वरूप तो बिगड़ा ही है, साथ ही इससे महिलाओं और पूरे समाज की गरिमा को ठेस पहुंचती है। छोटे बच्चों की किताबों में इस तरह के शब्दों का होना प्रकाशन प्रक्रिया और निगरानी तंत्र की घोर संवेदनहीनता को दर्शाता है, क्योंकि पहली कक्षा के बच्चे अक्षरों और शब्दों को नए सिरे से सीख रहे होते हैं और उनके दिमाग पर इन शब्दों की गहरी छाप पड़ती है।\n\n \n\nढाई साल तक प्रशासनिक लापरवाही की इंतहा\n\nइस मामले का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि यह विवादास्पद पुस्तक साल 2023 में पहली बार प्रकाशित की गई थी। इसके बाद से लगातार ढाई वर्षों तक यह किताब बिना किसी सुधार के बाजार में बिकती रही और बच्चों को पढ़ाई जाती रही। याचिकाकर्ता के अनुसार, जब उन्हें इस गंभीर गड़बड़ी के बारे में पता चला, तो उन्होंने इसकी सत्यता जांचने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने 21 जुलाई 2026 को पटना के कदमकुआं इलाके में स्थित ज्ञान गंगा बुक डिपो से इस किताब की एक प्रति खरीदी। जब उन्होंने खुद पुस्तक के पन्नों को पलटा, तो पाया कि ढाई साल बीत जाने के बाद भी NCERT या इसके प्रकाशकों की तरफ से इस भयानक गलती को सुधारने की कोई कोशिश नहीं की गई थी और न ही बाजार से ऐसी प्रतियों को वापस लिया गया था। यह प्रशासनिक स्तर पर एक बहुत बड़ी अनदेखी को उजागर करता है।\n\n \n\nहाईकोर्ट की समय-सीमा और जवाबदेही तय होना बाकी\n\nपटना हाईकोर्ट ने इस मामले को ठंडे बस्ते में डालने की अनुमति नहीं दी है और केंद्र सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए एक निश्चित समय-सीमा दी है। मुख्य न्यायाधीश वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति सुधीर सिंह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई पूरी करने के बाद प्रतिवादियों को आदेश जारी किया है कि वे 13 अक्टूबर 2026 तक अदालत में अपना जवाबी हलफनामा प्रस्तुत करें। अदालत अब इस बात की विस्तृत जांच करेगी कि आखिर किस स्तर पर इतनी बड़ी लापरवाही हुई और किस अधिकारी की अनदेखी के कारण प्राथमिक स्तर की किताब में ऐसे अनुचित शब्दों को छपने दिया गया। हालांकि अदालत ने अभी इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है, लेकिन केंद्र सरकार के स्पष्टीकरण के बाद दोषियों पर कार्रवाई तय मानी जा रही है।\n\n \n\nक्वालिटी चेक और प्रूफरीडिंग की प्रक्रिया पर सवाल\n\nइस पूरे विवाद ने देशभर की पाठ्यपुस्तक निर्माण प्रक्रियाओं, विशेषकर NCERT की गुणवत्ता नियंत्रण प्रणालियों पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं। जब भी कोई शैक्षणिक पुस्तक तैयार की जाती है, तो उसे संपादकों, विषय विशेषज्ञों, भाषाविदों और प्रूफरीडर्स के कई चरणों से होकर गुजरना पड़ता है। इतने सारे सुरक्षात्मक स्तर होने के बावजूद कक्षा-1 के बच्चों की किताब में ऐसी गंभीर अशुद्धि का रह जाना यह साबित करता है कि गुणवत्ता की जांच करने वाली टीमें अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल स्पेलिंग या टाइपिंग की एक सामान्य भूल नहीं है, बल्कि बच्चों की शिक्षा की संवेदनशीलता के प्रति एक घोर लापरवाही है, जिसका समाज पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।\n\nइसका आप पर असर\nस्कूली पाठ्यपुस्तकों में गंभीर अशुद्धियों को लेकर कोर्ट की इस सख्ती से बच्चों के शैक्षणिक वातावरण और पाठ्यपुस्तकों की गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ेगा।\n\n  - राष्ट्रीय स्तर पर: पूरे देश में NCERT की किताबों में प्रूफरीडिंग मानकों को और अधिक कड़ा किया जाएगा। इसके परिणामस्वरूप आने वाले समय में बच्चों को बिना किसी अशुद्धि के साफ और मर्यादित सामग्री पढ़ने को मिलेगी।\n\n  - बिहार और पटना में: स्थानीय स्तर पर पाठ्यपुस्तकों की बिक्री और वितरण करने वाले पुस्तक विक्रेताओं को स्टॉक की दोबारा जांच करनी पड़ सकती है। यदि अदालत पुस्तक को वापस लेने का आदेश देती है, तो अभिभावकों को अपने बच्चों के लिए संशोधित पुस्तकें खरीदनी होंगी।\n\n  - अभिभावकों के लिए: अब माता-पिता को अपने छोटे बच्चों के पाठ्यक्रम को लेकर अधिक सतर्क रहने और खुद भी किताबों की जांच करने की आवश्यकता होगी। इससे वे अपने बच्चों को गलत या अमर्यादित भाषा सीखने से समय रहते बचा सकेंगे।\n\nऐसा क्यों हुआ\nपहली कक्षा की किताब में इतनी गंभीर अशुद्धि छपने के पीछे प्रशासनिक लापरवाही और गुणवत्ता जांच प्रणाली की विफलता मुख्य कारण रही है। 2023 में पुस्तक के प्रकाशन के बाद से लंबे समय तक किसी भी जिम्मेदार अधिकारी का इस ओर ध्यान नहीं गया।\n\n  - गुणवत्ता नियंत्रण की विफलता: NCERT की पुस्तक निर्माण प्रक्रिया में कई स्तरों पर होने वाली प्रूफरीडिंग और एडिटिंग की प्रक्रिया विफल रही। विषय विशेषज्ञों और संपादकों की टीम ने छपाई से पहले अंतिम प्रारूप को गंभीरता से नहीं जांचा।\n\n  - सुधार में अत्यधिक देरी: साल 2023 में किताब छपने के बाद भी लगभग ढाई साल तक इस पर कोई सुधारात्मक कार्रवाई नहीं की गई। जब तक इस मामले को लेकर अदालत में जनहित याचिका दायर नहीं की गई, तब तक अधिकारियों ने इसे नजरअंदाज किए रखा।\n\n  - स्थानीय सत्यापन की कमी: पुस्तक विक्रेताओं और स्कूलों द्वारा भी इस आपत्तिजनक शब्द पर ध्यान नहीं दिया गया। पटना के कदमकुआं में ज्ञान गंगा बुक डिपो से किताब खरीदने के बाद ही याचिकाकर्ता ने इस अशुद्धि को कोर्ट के समक्ष प्रमाणित किया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. किस पुस्तक और किस कविता को लेकर यह पूरा विवाद हुआ है?\nयह विवाद NCERT की कक्षा-1 की हिंदी पाठ्यपुस्तक 'सारंगी भाग-1' में छपी लोकप्रिय बाल कविता 'चंदा मामा दूर के' को लेकर है।\n\n2. कविता के प्रकाशन में वास्तव में क्या गलती हुई है?\nकविता की दूसरी पंक्ति में जहां 'गुड़' शब्द लिखा जाना चाहिए था, उसकी जगह कथित तौर पर एक बेहद आपत्तिजनक और अमर्यादित शब्द छाप दिया गया है।\n\n3. यह मामला किस अदालत के समक्ष पहुंचा है और वहां क्या कार्रवाई हुई है?\nयह मामला पटना हाईकोर्ट पहुंचा है, जहां मुख्य न्यायाधीश वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति सुधीर सिंह की खंडपीठ ने केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है।\n\n4. विवादित पुस्तक किस वर्ष प्रकाशित हुई थी और इस पर इतने समय तक ध्यान क्यों नहीं गया?\nयह पुस्तक साल 2023 में प्रकाशित हुई थी और बिना किसी सुधार के लगभग ढाई साल से चल रही थी, जिसे प्रशासन की बड़ी चूक माना जा रहा है।\n\n5. अदालत ने जवाब दाखिल करने के लिए केंद्र सरकार को कब तक का समय दिया है?\nपटना हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और अन्य प्रतिवादियों को इस मामले में अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए 13 अक्टूबर 2026 तक की समय-सीमा दी है।",
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  "category": "करियर",
  "publishedAt": "2026-09-17",
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