# QS एशिया रैंकिंग 2027: देश के किसी भी आईआईटी या आईआईएससी को शीर्ष 50 में जगह नहीं मिली

> क्यूएस एशिया यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2027 के ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत के किसी भी शीर्ष संस्थान को टॉप 50 में स्थान नहीं मिला है जबकि देश के कुल शामिल संस्थानों की संख्या बढ़कर 325 हो गई है।

**Type:** article · **Category:** करियर · **Published:** 2026-11-05 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/career/qs-asia-ranking-2027-not-a-single-indian-iit-or-iisc-features-in-the-top-50-56937 · **Language:** Hindi
**Tags:** QS एशिया रैंकिंग, IIT दिल्ली, IISc बेंगलुरु, उच्च शिक्षा, विश्वविद्यालय रैंकिंग, शोध आउटपुट, भारतीय शिक्षा

वैश्विक उच्च शिक्षा विश्लेषक संस्था क्यूएस क्वाक्वेरेली साइमंड्स ने अपनी ताजा क्यूएस एशिया यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2027 जारी कर दी है। इस नवीनतम सूची के आंकड़ों ने देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी और भारतीय विज्ञान संस्थान जैसे परिसरों को शिक्षा और अनुसंधान के सर्वोच्च स्तंभ के रूप में देखा जाता है। इसके बावजूद एशिया स्तर की इस महत्वपूर्ण मूल्यांकन सूची के शुरुआती पचास पायदानों में देश के एक भी संस्थान का नाम शामिल नहीं हो सका है।

दिलचस्प पहलू यह है कि यह लगातार दूसरा ऐसा वर्ष है जब भारत का कोई भी उच्च शिक्षा संस्थान इस प्रतिष्ठित सूची के शीर्ष पचास स्थानों में जगह बनाने में नाकाम रहा है। देश की तरफ से इस सूची में सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाला संस्थान भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली भी इस बार फिसलकर छियासठवें पायदान पर पहुंच गया है। पिछले वर्ष इसी संस्थान को इस तालिका में उनसठवां स्थान प्राप्त हुआ था, जिसका मतलब है कि इस बार इसकी स्थिति में भी गिरावट दर्ज की गई है।

केवल आईआईटी दिल्ली ही नहीं बल्कि भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु समेत देश के तमाम छह सबसे बड़े और अग्रणी संस्थानों के प्रदर्शन में भी गिरावट आई है। हालांकि एक तरफ जहां इन नामी संस्थानों की रैंकिंग नीचे आई है, वहीं दूसरी तरफ सूची में कुल भारतीय विश्वविद्यालयों की संख्या के मोर्चे पर एक सकारात्मक तस्वीर भी सामने आई है। इस साल इस प्रतिष्ठित रैंकिंग में शामिल होने वाले भारतीय परिसरों की कुल संख्या पिछले साल के दो सौ चौदह से बढ़कर अब तीन सौ पच्चीस तक पहुंच गई है।

इस उल्लेखनीय बढ़ोतरी के साथ ही भारत एशिया महाद्वीप में सबसे ज्यादा शिक्षण संस्थानों की मौजूदगी के मामले में दूसरे पायदान पर काबिज हो गया है। इस ताज़ा सूची में देश के चौंतीस नए संस्थान भी शामिल किए गए हैं जो यह दर्शाता है कि उच्च शिक्षा के दायरे का विस्तार तेजी से हो रहा है। इस प्रकार एक तरफ जहां देश के प्रमुख और स्थापित संस्थानों की रैंकिंग में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है, वहीं दूसरी तरफ कुल संस्थानों की संख्या में रिकॉर्ड इजाफा दर्ज किया जा रहा है।

## प्रमुख संस्थानों का गिरता हुआ पायदान
संस्थानवार विश्लेषण किया जाए तो देश के दूसरे शीर्ष उच्च शिक्षा केंद्रों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही निराशाजनक नजर आती है। भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु पिछले मूल्यांकन में चौंसठवें स्थान पर काबिज था, जो इस बार खिसककर उनासीवें नंबर पर जा पहुंचा है। इसी तरह भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे की स्थिति भी प्रभावित हुई है और इसकी रैंकिंग इकहत्तर से गिरकर तिरासी हो गई है। मद्रास स्थित संस्थान सत्तरवें से पिछड़कर पचासीवें स्थान पर आ गया है, जबकि खड़गपुर का संस्थान सतहत्तरवें से नब्बेवें नंबर पर पहुंच गया है। कानपुर के तकनीकी संस्थान को भी सतहत्तरवें स्थान से फिसलकर निन्यानवेवें पायदान पर संतोष करना पड़ा है। इस तरह देश के सभी छह अग्रणी संस्थानों के रैंकिंग स्कोर में साफ तौर पर गिरावट आई है।

देश के सबसे प्रतिष्ठित पारंपरिक विश्वविद्यालयों में शुमार दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थिति भी इस बार काफी कमजोर नजर आई है। पिछले वर्ष यह विश्वविद्यालय एशिया महाद्वीप में पचानवेवें पायदान पर था, लेकिन इस बार यह लुढ़ककर एक सौ छठे स्थान पर जा पहुंचा है। इस गिरावट के चलते दिल्ली विश्वविद्यालय अब एशिया के शीर्ष सौ संस्थानों की सूची से पूरी तरह बाहर हो चुका है। हालांकि यह भी सच है कि देश के सभी परिसरों की रैंकिंग नहीं गिरी है क्योंकि कुछ ने अच्छा प्रदर्शन भी किया है। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी और जामिया मिल्लिया इस्लामिया उन चुनिंदा संस्थानों में शामिल हैं जिन्होंने इस बार अपनी रैंकिंग में सुधार दर्ज किया है।

## एशियाई सूची में भारतीय संस्थानों की संख्या में भारी उछाल
संस्था की ओर से जारी रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान इस एशियाई रैंकिंग में जगह पाने वाले भारतीय संस्थानों की तादाद में जबरदस्त तेजी आई है। साल 2016 के दौर की बात करें तो इस विशेष सूची में भारत के मात्र चौबीस संस्थान ही अपनी जगह बना पाए थे। अब यह आंकड़ा बढ़कर सीधे तीन सौ पच्चीस तक पहुंच चुका है, जिसका मतलब है कि लगभग दस वर्षों के भीतर भारतीय परिसरों की संख्या में तेरह गुना से अधिक की भारी बढ़ोतरी हुई है।

वर्ष 2016 से लेकर अब तक इस संख्या में बारह सौ पचास प्रतिशत से भी ज्यादा का अभूतपूर्व उछाल देखा गया है। आंकड़ों के हिसाब से आकलन किया जाए तो औसतन हर साल करीब सत्ताईस प्रतिशत की तेज दर से भारतीय संस्थानों की मौजूदगी इस सूची में बढ़ी है। इस मोर्चे पर भारत ने एशिया महाद्वीप के अन्य बड़े उच्च शिक्षा तंत्रों को पीछे छोड़ दिया है। इसी समान अवधि के दौरान अगर तुलना करें तो चीन के संस्थानों की संख्या में लगभग तीन सौ पंद्रह प्रतिशत, इंडोनेशिया में एक सौ चौसठ प्रतिशत, जापान में चौंतालीस प्रतिशत और दक्षिण कोरिया में केवल तीस प्रतिशत की ही वृद्धि दर्ज की गई है।

## शोध के मोर्चे पर भारत की मजबूत स्थिति
भले ही प्रमुख परिसरों की रैंकिंग में गिरावट आई हो लेकिन रिपोर्ट के कुछ दूसरे पहलू देश के लिए काफी उत्साहजनक हैं। शोध उत्पादन यानी प्रति फैकल्टी सदस्य की दर से प्रकाशित होने वाले शोध पत्रों के मामले में भारत पूरे एशिया महाद्वीप में सबसे आगे खड़ा है। इस पैमाने के आधार पर देश के सत्ताईस विश्वविद्यालय इस श्रेणी के एशिया के शीर्ष पचास संस्थानों में अपना स्थान बनाने में सफल रहे हैं। इनमें से पांच विश्वविद्यालय ऐसे हैं जो सीधे शीर्ष दस में शामिल हैं और दो ने तो शीर्ष पांच संस्थानों के भीतर अपनी मजबूत जगह बनाई है।

इसके अलावा अकादमिक और शोध से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण पैमाने पर भी भारत की स्थिति काफी सुदृढ़ नजर आती है। पीएचडी की योग्यता रखने वाले शिक्षकों यानी ऐसे प्राध्यापकों जिनके पास डॉक्टरेट की आधिकारिक उपाधि है, के अनुपात के मामले में भारत के पंद्रह विश्वविद्यालय एशिया भर में संयुक्त रूप से पहले पायदान पर हैं। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में उच्च योग्यताधारी और शोध कार्यों में माहिर फैकल्टी सदस्यों की एक अच्छी खासी तादाद मौजूद है, जो आने वाले समय में शिक्षण की गुणवत्ता को और बेहतर कर सकती है।

## इसका आप पर असर
QS एशिया यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2027 के इन ताजा आंकड़ों का देश के अकादमिक और रोजगार के माहौल पर गहरा असर पड़ता है।

- **भारत में:** देश के शीर्ष तकनीकी और अनुसंधान संस्थानों की रैंकिंग गिरने से वैश्विक स्तर पर इनकी साख प्रभावित हो सकती है, जिसका असर विदेशी छात्र दाखिलों और अंतरराष्ट्रीय शोध साझेदारियों पर पड़ सकता है।
- **छात्रों के लिए:** प्रतिष्ठित परिसरों की गिरती रैंकिंग के बावजूद कुल संस्थानों की संख्या बढ़ने से छात्रों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अधिक विकल्प मिल रहे हैं, हालांकि शीर्ष संस्थानों में प्रवेश की प्रतिस्पर्धा और अधिक तीव्र हो गई है।
- **शोधकर्ताओं के लिए:** प्रति फैकल्टी शोध पत्र प्रकाशन के मामले में भारत के शीर्ष पर रहने से देश के शोधकर्ताओं और डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त शिक्षकों के लिए वैश्विक स्तर पर अकादमिक सहयोग के नए रास्ते खुल सकते हैं।
- **संस्थानों की फंडिंग:** गिरती हुई रैंकिंग के कारण भविष्य में देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों को मिलने वाली सरकारी व निजी फंडिंग या अनुदान नीतियों पर भी पुनर्विचार किया जा सकता है।
- **भविष्य की नीतियां:** उच्च शिक्षा नियामकों को शिक्षण की गुणवत्ता और वैश्विक मानकों पर खरा उतरने के लिए अपनी नीतियों में बड़े बदलाव करने की आवश्यकता महसूस हो सकती है।

## ऐसा क्यों हुआ
क्यूएस एशिया यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2027 में भारतीय संस्थानों के प्रदर्शन में आए इस बड़े बदलाव के पीछे कई भौगोलिक, संस्थागत और प्रशासनिक कारण जिम्मेदार रहे हैं।

- **रैंकिंग के कड़े पैमाने:** इस सूची को तैयार करने के लिए अकादमिक प्रतिष्ठा, नियोक्ता प्रतिष्ठा, फैकल्टी-छात्र अनुपात और अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान नेटवर्क जैसे कड़े संकेतकों का उपयोग किया जाता है जिन पर भारतीय संस्थान पिछड़ गए हैं।
- **संख्या बनाम गुणवत्ता:** पिछले एक दशक में भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या में तेरह गुना की भारी वृद्धि हुई है, लेकिन इस तीव्र विस्तार के मुकाबले प्रमुख संस्थानों में आधारभूत ढांचे और गुणवत्ता का स्तर उसी अनुपात में नहीं बढ़ पाया है।
- **बढ़ता अकादमिक दबाव:** एशिया के अन्य पड़ोसी देशों जैसे चीन और दक्षिण कोरिया की सरकारों ने अपने विश्वविद्यालयों के वैश्विक स्तर को सुधारने के लिए भारी निवेश किया है जिससे उनका प्रदर्शन बेहतर हुआ है।
- **शोध का असमान वितरण:** हालांकि प्रति फैकल्टी शोध प्रकाशन के मामले में भारत शीर्ष पर है, लेकिन यह क्षमता कुछ चुनिंदा संस्थानों तक ही सीमित है, जिससे बड़े परिसरों की औसत रैंकिंग प्रभावित हुई है।

## सवाल-जवाब

### 1. QS एशिया यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2027 में भारत का कौन सा संस्थान सबसे बेहतर स्थिति में है?
आईआईटी दिल्ली इस सूची में भारत का सबसे बेहतर रैंक वाला संस्थान है जो इस बार 66वें स्थान पर है।

### 2. QS एशिया रैंकिंग 2027 में IIT दिल्ली की पिछले साल की तुलना में क्या स्थिति रही है?
पिछले साल IIT दिल्ली 59वें स्थान पर था, जो इस बार फिसलकर 66वें स्थान पर आ गया है।

### 3. इस साल QS एशिया रैंकिंग में कुल कितने भारतीय संस्थान शामिल हुए हैं?
इस बार रैंकिंग में कुल 325 भारतीय संस्थान शामिल हैं, जिसमें 34 नए संस्थान भी जुड़े हैं।

### 4. क्या दिल्ली यूनिवर्सिटी इस बार टॉप 100 की सूची में शामिल है?
नहीं, दिल्ली यूनिवर्सिटी पिछले साल 95वें स्थान पर थी लेकिन इस बार 106वें नंबर पर पहुंचने के कारण टॉप 100 से बाहर हो गई है।

### 5. शोध आउटपुट के मामले में भारत की स्थिति एशिया में कैसी है?
प्रति फैकल्टी सदस्य प्रकाशित होने वाले शोध पत्रों के मामले में भारत एशिया में सबसे आगे है और इसके 27 विश्वविद्यालय टॉप 50 में हैं।

### 6. पीएचडी योग्य शिक्षकों के अनुपात में भारत के कितने विश्वविद्यालय शीर्ष पर हैं?
डॉक्टरेट की डिग्री रखने वाले शिक्षकों के अनुपात के मामले में भारत के 15 विश्वविद्यालय एशिया में संयुक्त रूप से पहले स्थान पर हैं।

### 7. वर्ष 2016 से लेकर अब तक एशिया रैंकिंग में भारतीय संस्थानों की संख्या में कितनी वृद्धि हुई है?
साल 2016 में भारत के केवल 24 संस्थान सूची में थे जो अब बढ़कर 325 हो गए हैं यानी इसमें 13 गुना से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है।

### 8. किन भारतीय संस्थानों ने इस बार अपनी रैंकिंग में सुधार किया है?
चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी और जामिया मिल्लिया इस्लामिया ने इस बार अपनी रैंकिंग में सुधार किया है।

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