उच्च शिक्षा और रोजगार में गहरा अंतर, नीति आयोग के अनुसार केवल 8.25 प्रतिशत स्नातकों को मिली योग्यता के अनुरूप नौकरी नीति आयोग की नई रिपोर्ट 'रिइमेजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत' के अनुसार देश में उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं और उद्योग जगत की जरूरतों के बीच भारी अंतर बना हुआ है, जिसके कारण 90 प्रतिशत से अधिक स्नातक अपनी पढ़ाई से अलग क्षेत्रों में काम करने को मजबूर हैं। भारत के उच्च शिक्षा तंत्र और रोजगार बाजार के बीच का बढ़ता अंतर एक बार फिर गंभीर चर्चा के केंद्र में आ गया है। नीति आयोग द्वारा जारी की गई नई रिपोर्ट 'रिइमेजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत' में देश के कौशल विकास और शैक्षणिक ढांचे की वास्तविक स्थिति का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। इस रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि भारत में डिग्री हासिल करने वाले युवाओं की संख्या भले ही करोड़ों में हो, लेकिन उनमें से एक बहुत छोटा हिस्सा ही अपनी योग्यता और पढ़ाई के अनुसार रोजगार प्राप्त कर पा रहा है। सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि देश में केवल 8.25 प्रतिशत स्नातक ही ऐसी नौकरियों में कार्यरत हैं जो उनके द्वारा पढ़े गए विषयों और शैक्षणिक योग्यता से सीधे तौर पर मेल खाती हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि 90 प्रतिशत से भी अधिक स्नातक अपनी शिक्षा से बिल्कुल अलग या कम योग्यता वाली नौकरियों में काम करने के लिए विवश हैं। उच्च शिक्षा और उद्योग जगत की जरूरतों के बीच बुनियादी असंतुलन नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर गहरा दखल जताया है कि देश के अधिकांश उच्च और तकनीकी शिक्षण संस्थानों में पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम आधुनिक उद्योग की आवश्यकताओं से तालमेल नहीं बिठा पा रहा है। समय के साथ बदलाव न होने के कारण शैक्षणिक पाठ्यक्रम पुराना पड़ चुका है, जबकि बाजार में आधुनिक तकनीकी और व्यावहारिक कौशल की मांग तेजी से बढ़ी है। रिपोर्ट में आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के महत्वपूर्ण आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए बताया गया है कि डिग्री, डिप्लोमा या व्यावसायिक प्रमाण पत्र प्राप्त करने के बाद भी युवाओं के लिए सम्मानजनक और प्रासंगिक रोजगार हासिल करना एक अत्यंत कठिन चुनौती बना हुआ है। जब 90 प्रतिशत से ज्यादा स्नातक अपनी पढ़ाई के इतर रोजगार ढूंढने पर मजबूर होते हैं, तो यह न केवल युवाओं के बहुमूल्य वर्षों और संसाधनों की बर्बादी को दर्शाता है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ा नीतिगत संकट खड़ा करता है। शिक्षित युवाओं और महिलाओं में बेरोजगारी का भयावह आंकड़ा रिपोर्ट में शिक्षित युवाओं के बीच फैली बेरोजगारी की दर को लेकर भी चिंताजनक तथ्य सामने रखे गए हैं। आंकड़े दर्शाते हैं कि जहां देश की कुल सामान्य बेरोजगारी दर 3.2 प्रतिशत दर्ज की गई है, वहीं उच्च शिक्षा प्राप्त स्नातकों के बीच बेरोजगारी का आंकड़ा 13 प्रतिशत के आसपास बना हुआ है। यह अंतर दिखाता है कि जैसे-जैसे शिक्षा का स्तर बढ़ता है, रोजगार न मिलने की समस्या और अधिक विकराल रूप ले लेती है। इससे भी अधिक गंभीर स्थिति महिला स्नातकों की है, जिनमें बेरोजगारी की दर 20.4 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। राष्ट्रीय औसत की तुलना में स्नातकों और विशेष रूप से महिलाओं में बेरोजगारी का यह उच्च स्तर यह साबित करता है कि पारंपरिक डिग्री धारकों के लिए कार्यबल में शामिल होना कितना दुष्कर कार्य बन चुका है। सामान्य डिग्रियों का बोझ और 3.4 करोड़ स्नातकों का भविष्य भारत में पारंपरिक और सामान्य स्नातक डिग्रियों का बोलबाला आज भी बना हुआ है। नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, देश के विभिन्न अंडरग्रेजुएट कार्यक्रमों में इस समय लगभग 3.4 करोड़ छात्र नामांकित हैं। इस विशाल छात्र संख्या में से 2 करोड़ से भी अधिक युवा केवल तीन पारंपरिक सामान्य पाठ्यक्रमों यानी BA, BSc और BCom में अध्ययनरत हैं। अकेले BA पाठ्यक्रम की बात करें तो इसमें 1.13 करोड़ छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन सामान्य डिग्री कोर्सों का सीधा संबंध उद्योग जगत की व्यावहारिक आवश्यकताओं से बेहद कमजोर है। इन विषयों में थ्योरी आधारित शिक्षा तो दी जाती है, परंतु कार्यक्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले आधुनिक कौशलों का सर्वथा अभाव रहता है। नतीजतन, तीन से चार साल का समय और धन खर्च करने के बाद भी छात्रों को नौकरी पाने योग्य बनने के लिए अलग से अतिरिक्त ट्रेनिंग या कौशल विकास कार्यक्रमों का सहारा लेना पड़ता है। पाठ्यक्रमों के पुनर्गठन और स्पेशलाइजेशन की आवश्यकता इस संकट से निपटने के लिए नीति आयोग ने सिफारिश की है कि पारंपरिक शैक्षणिक पाठ्यक्रमों को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रखकर उन्हें रोजगारोन्मुखी बनाया जाए। आयोग का सुझाव है कि पारंपरिक BA, BSc और BCom को आधुनिक उद्योग की मांग के अनुसार नए सिरे से तैयार किया जाना चाहिए। रिपोर्ट में उदाहरण देते हुए बताया गया है कि सामान्य BA के स्थान पर 'B.A. Hospitality', सामान्य BSc के स्थान पर 'B.Sc. Applied Technology' और पारंपरिक BCom की जगह 'B.Com. Analytics' जैसे स्पेशलाइज्ड और रोजगार से जुड़े पाठ्यक्रम विकसित किए जाने चाहिए। इस प्रकार का व्यावहारिक पुनर्गठन छात्रों की शैक्षणिक डिग्री को सीधे तौर पर उपलब्ध नौकरियों और व्यावसायिक अवसरों से जोड़ने में मदद करेगा, जिससे पढ़ाई पूरी होते ही युवाओं को कार्यबल में शामिल होने का अवसर मिल सकेगा। व्यावसायिक शिक्षा के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण और पूर्वाग्रह नीति आयोग की रिपोर्ट केवल शैक्षणिक कमियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कौशल विकास को लेकर भारतीय समाज में व्याप्त संकुचित मानसिकता पर भी करारा प्रहार करती है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वोकेशनल ट्रेनिंग, ITI और डिप्लोमा जैसे कौशल-आधारित विकल्पों को आज भी अधिकतर परिवारों, अभिभावकों और स्वयं छात्रों द्वारा 'दूसरे दर्जे' या कमतर विकल्प के रूप में देखा जाता है। समाज में पारंपरिक कॉलेज डिग्री को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाता है, जबकि तकनीकी और व्यावहारिक प्रशिक्षण को उससे नीचा दर्जा दिया जाता है। इस सामाजिक दबाव के कारण युवा अपनी व्यक्तिगत रुचि, आंतरिक क्षमता और भविष्य के वास्तविक रोजगार अवसरों का आकलन करने के बजाय परीक्षा के अंकों, माता-पिता की इच्छा और अतिरिक्त स्किल सीखने में आने वाले खर्च के आधार पर अपने करियर के फैसले लेते हैं। इसके अतिरिक्त, समान सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले उन युवाओं की सफलता की कहानियां भी सामने नहीं आ पातीं जिन्होंने वोकेशनल ट्रेनिंग के बल पर बेहतर मुकाम हासिल किया है, जिससे यह पूर्वाग्रह लगातार बना रहता है। कौशल कार्यक्रमों के प्रति जागरूकता का अभाव कौशल विकास में एक बड़ी बाधा सही समय पर उचित जानकारी का न मिल पाना भी है। नीति आयोग के विश्लेषण से पता चलता है कि विभिन्न वर्गों में कौशल विकास कार्यक्रमों से दूरी का एक मुख्य कारण जागरूकता की भारी कमी है। आंकड़ों के अनुसार, देश की 47 प्रतिशत महिलाएं, 43 प्रतिशत युवा, उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे 36 प्रतिशत छात्र, औपचारिक क्षेत्र के 52 प्रतिशत कर्मचारी और अनौपचारिक क्षेत्र के 55 प्रतिशत कर्मचारी किसी भी प्रकार की स्किलिंग या ट्रेनिंग में भाग नहीं लेते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि अधिकांश युवाओं को यह पता ही नहीं होता कि उनके करियर, विषय और क्षमता के हिसाब से कौन सा शॉर्ट टर्म कोर्स, ट्रेनिंग प्रोग्राम या स्किलिंग सर्टिफिकेट उनके लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। जानकारी का यह अभाव युवाओं को रोजगार बाजार में पिछाड़ देता है। स्किलिंग का आर्थिक लाभ: 10 वर्षों में 9.7 लाख रुपये का अंतर कौशल विकास के आर्थिक फायदों को रेखांकित करने के लिए नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) के हायर एजुकेशन सर्वे के आंकड़ों को शामिल किया है। यह सर्वे स्पष्ट करता है कि बिना किसी अतिरिक्त कौशल विकास के केवल सामान्य अंडरग्रेजुएट डिग्री पूरी करने वाले युवाओं का शुरुआती औसतन वेतन लगभग 22 हजार रुपये प्रति माह होता है। इसके विपरीत, जो छात्र अपनी सामान्य डिग्री के साथ-साथ किसी प्रासंगिक विषय में स्किलिंग या व्यावहारिक प्रशिक्षण हासिल करते हैं, उनका शुरुआती औसतन वेतन 29 हजार रुपये प्रति माह रहता है। यानी करियर की शुरुआत में ही कुशल और अकुशल स्नातक के बीच प्रति माह 7 हजार रुपये का सीधा वित्तीय अंतर पैदा हो जाता है। दोनों ही मामलों में यदि वार्षिक वेतन वृद्धि की दर को 3.2 प्रतिशत मान लिया जाए, तो 10 वर्षों की अवधि में यह अंतर बढ़कर कुल 9.7 लाख रुपये की भारी धनराशि के बराबर हो जाता है। नीति आयोग का मानना है कि करियर चुनते समय छात्रों और उनके अभिभावकों तक इस प्रकार के वित्तीय आंकड़ों और स्पष्ट आर्थिक लाभों की जानकारी नहीं पहुंच पाती, जिसके कारण वे समय पर सही फैसला नहीं ले पाते। महिला स्नातकों के सामने उत्पन्न विशेष चुनौतियां रिपोर्ट का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू महिला कार्यबल और उनकी स्किलिंग से जुड़ा हुआ है। जहां एक ओर स्नातक महिलाओं में बेरोजगारी की दर 20.4 प्रतिशत के उच्च स्तर पर है, वहीं दूसरी ओर 47 प्रतिशत महिलाएं किसी भी प्रकार की स्किलिंग प्रक्रिया से बाहर बनी हुई हैं। पारिवारिक उत्तरदायित्व, सामाजिक बंदिशें और सही करियर मार्गदर्शन की कमी महिलाओं के लिए स्थिति को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना देती है। नीति आयोग का मानना है कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए महिला कार्यबल की भागीदारी बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है, और इसके लिए महिलाओं को उद्योग की मांग के अनुसार आधुनिक कौशलों से लैस करना अनिवार्य होगा। इसका आप पर असर भारत में: कॉलेज में पढ़ रहे छात्रों और स्नातकों को केवल पारंपरिक डिग्रियों पर निर्भर रहने के बजाय शुरुआत से ही जॉब ओरिएंटेड स्किल्स और व्यावहारिक प्रशिक्षण पर ध्यान देना होगा। अभिभावकों के लिए: परिवारों को व्यावसायिक शिक्षा और आईटीआई जैसे पाठ्यक्रमों को कमतर आंकने की मानसिकता बदलकर बच्चों को उनकी रुचि और बाजार की मांग के अनुसार करियर चुनने में मदद करने की आवश्यकता है। सवाल-जवाब 1. नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार कितने प्रतिशत स्नातकों को उनकी पढ़ाई के अनुसार नौकरी मिलती है? रिपोर्ट के अनुसार भारत में सिर्फ 8.25 प्रतिशत स्नातकों को ही ऐसी नौकरियां मिल पाती हैं जो उनकी शैक्षणिक योग्यता और पढ़ाई से सीधे तौर पर जुड़ी होती हैं। 2. शिक्षित युवाओं और महिला स्नातकों में बेरोजगारी की दर क्या है? देश में सभी स्नातकों के बीच बेरोजगारी की दर करीब 13 प्रतिशत है, जबकि महिला स्नातकों में यह दर 20.4 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। 3. भारत में कितने छात्र BA, BSc और BCom जैसे सामान्य डिग्री पाठ्यक्रमों में पढ़ रहे हैं? भारत के अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम्स में कुल 3.4 करोड़ छात्र हैं, जिनमें से 2 करोड़ से ज्यादा छात्र केवल BA, BSc और BCom में अध्ययनरत हैं। 4. सामान्य डिग्री के साथ स्किलिंग करने से शुरुआती वेतन में कितना अंतर आता है? बिना स्किलिंग के सामान्य स्नातक का औसतन शुरुआती वेतन 22 हजार रुपये प्रति माह होता है, जबकि स्किलिंग करने वालों का वेतन 29 हजार रुपये प्रति माह रहता है, जिससे 7 हजार रुपये का शुरुआती अंतर बनता है। 5. नीति आयोग ने सामान्य डिग्री पाठ्यक्रमों में सुधार के लिए क्या सुझाव दिए हैं? नीति आयोग ने सुझाव दिया है कि सामान्य कोर्स चलाने के बजाय उद्योग की जरूरतों से जुड़े B.A. Hospitality, B.Sc. Applied Technology और B.Com. Analytics जैसे स्पेशलाइज्ड कोर्स विकसित किए जाएं। https://trendkia.com/career/uchcha-shiksha-aura-rojagara-men-bhari-antara-niti-aayog-ke-anusara-kevala-8-25-pratishata-snatakon-ko-hi-mila-pa-rahi-hai-yogyata-22254 TrendKia — Har trend, sabse pehle.