# आंगन में 40 पौधों से भरपूर पैदावार, बस्तर के चेतन सिंह ने दिखाया भिंडी उगाने का आसान तरीका

> बस्तर के चेतन सिंह ने घर की बाड़ी में महज 40 पौधे लगाकर नियमित ताजी भिंडी की उपज हासिल की है। गोबर खाद और डिब्बी विधि से तैयार यह फसल हर तीसरे दिन दो से तीन किलो तक पैदावार दे रही है।

**Type:** article · **Category:** छत्तीसगढ़ · **Published:** 2026-09-19 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/chhattisgarh/angana-men-40-paudhon-se-bharapura-paidavara-bastar-ke-chetan-singh-ne-dikhaya-bhindi-ugane-ka-asana-tarika-33474 · **Language:** Hindi
**Tags:** भिंडी की खेती, बस्तर, चेतन सिंह, किचन गार्डन, गोबर खाद, सब्जी उत्पादन

घर के खाली पड़े आंगन या बाड़ी का सही इस्तेमाल करके ताजी सब्जियां उगाना अब बेहद आसान हो गया है। बस्तर के ग्रामीण परिवेश में रहने वाले चेतन सिंह ने इस दिशा में एक बढ़िया मिसाल पेश की है। उन्होंने अपनी घरेलू बाड़ी में भिंडी की बुवाई की, जिसके बाद उन्हें हर तीसरे से चौथे दिन परिवार के लिए दो से तीन किलो एकदम ताजी भिंडी मिल रही है। बरसात के मौसम में ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक बाड़ी पद्धति से सब्जियां उगाने का चलन काफी पुराना है, लेकिन सुनियोजित तरीके से की गई यह कोशिश घर की जरूरतों को पूरा करने में काफी मददगार साबित हो रही है।

## जमीन तैयार करने और बुवाई का आसान तरीका
इस पूरी प्रक्रिया में मिट्टी की प्राथमिक तैयारी सबसे अहम चरण मानी जाती है। चेतन सिंह के अनुसार, भिंडी की रोपाई से पहले जमीन की फावड़े से अच्छी तरह गहरी खुदाई की जाती है ताकि मिट्टी भुरभुरी और हवादार हो सके। इसके बाद मिट्टी में डिब्बी का आकार बनाकर गड्ढे तैयार किए जाते हैं। इन गड्ढों में बीजों की बुवाई के साथ ही देशी गोबर की खाद डाली जाती है। पौधों के सही विकास और पोषण संतुलन को बनाए रखने के लिए बुवाई के कुछ दिनों बाद थोड़ी मात्रा में पोटाश का भी इस्तेमाल किया जाता है, जिससे पौधों को मजबूती मिलती है और पैदावार बढ़ती है।

## फसल का चक्र और नियमित पैदावार
चेतन सिंह ने अपनी बाड़ी में भिंडी के कुल 40 पौधे लगाए हैं। सामान्य तौर पर भिंडी के ये पौधे रोपाई के लगभग डेढ़ महीने बाद फल देना शुरू कर देते हैं। एक बार पैदावार शुरू होने पर यह सिलसिला करीब दो महीने तक लगातार जारी रहता है। वर्तमान में हर तीन दिन के अंतराल पर इन पौधों से दो से तीन किलोग्राम भिंडी की तुड़ाई आराम से हो जाती है। बारिश के मौसम का प्राकृतिक पानी मिलने से पौधों की सिंचाई के लिए अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ती, जिससे देखभाल का समय और खर्च दोनों बच जाते हैं।

## देखभाल और कीट प्रबंधन की सावधानियां
बरसात के दिनों में इस फसल में बीमारियां आमतौर पर काफी कम लगती हैं, जिससे इसे संभालना बेहद आसान होता है। हालांकि, कई बार पत्ता छेदक कीड़ों का खतरा बन जाता है, जिसके नियंत्रण के लिए आवश्यकता पड़ने पर कीटनाशक का हल्का छिड़काव करना पड़ता है। जगह की कमी का सामना कर रहे लोग इस तकनीक को केवल जमीन पर ही नहीं, बल्कि बड़े गमलों या छत पर भी सफलतापूर्वक अपना सकते हैं और ताजी हरी सब्जियों का नियमित लाभ उठा सकते हैं।

## इसका आप पर असर
घर के आंगन या गमलों में मौसमी सब्जियां उगाकर बाजार की महंगाई और रसायनों से बचा जा सकता है।

- **दैनिक खर्च में बचत:** घर पर 40 पौधे लगाकर हर तीन दिन में दो से तीन किलो भिंडी प्राप्त की जा सकती है। इससे परिवार के सब्जी बजट में सीधी कटौती होती है और बाजार पर निर्भरता कम होती है।
- **सीमित जगह का इस्तेमाल:** इस पद्धति को जमीन के अलावा बालकनी या छत के गमलों में भी आसानी से शुरू किया जा सकता है। शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के लोग बिना बड़े खेत के पौष्टिक सब्जियां उगा सकते हैं।
- **कम मेहनत और आसान रखरखाव:** बारिश के मौसम में अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है। केवल गोबर खाद और बुनियादी देखभाल के साथ डेढ़ महीने में पहली उपज मिलनी शुरू हो जाती है।
- **कीट नियंत्रण का ध्यान:** पत्ता छेदक कीड़ों का समय पर निरीक्षण करना जरूरी होता है। शुरुआती लक्षण दिखते ही कीटनाशक का हल्का छिड़काव करके फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू बाड़ी में मौसमी सब्जियों की बुवाई की यह पहल बुनियादी संसाधनों के सही उपयोग और अनुकूल मौसम के कारण सफल हुई है।

- **अनुकूल मानसूनी मौसम:** बरसात का पानी पौधों के त्वरित अंकुरण और विकास के लिए पर्याप्त नमी उपलब्ध कराता है। प्राकृतिक बारिश मिलने से बार-बार पानी देने का झंझट समाप्त हो जाता है।
- **पारंपरिक जैविक पोषण:** बीजों की रोपाई के समय देशी गोबर की खाद और बाद में पोटाश का संतुलित इस्तेमाल किया गया। इस पोषक संयोजन ने पौधों को मजबूत आधार और निरंतर फूल-फल देने की क्षमता दी।
- **व्यवस्थित डिब्बी रोपाई विधि:** फावड़े से मिट्टी को भुरभुरा बनाकर खांचों या गड्ढों में रोपाई की गई। इस संरचना से पौधों की जड़ों का फैलाव बेहतर हुआ और वे बीमारियों से सुरक्षित रहे।

## सवाल-जवाब

### 1. चेतन सिंह ने अपनी बाड़ी में भिंडी के कितने पौधे लगाए हैं?
चेतन सिंह ने अपनी बाड़ी में भिंडी के कुल 40 पौधे लगाए हैं।

### 2. इन पौधों से कितने दिनों में और कितनी पैदावार मिल रही है?
हर तीन से चार दिन के अंतराल में लगभग दो से तीन किलो ताजी भिंडी की तुड़ाई हो रही है।

### 3. भिंडी के पौधे कितने समय में फल देना शुरू करते हैं?
भिंडी के पौधे रोपाई के लगभग डेढ़ महीने बाद फल देना शुरू करते हैं और करीब दो महीने तक फसल देते हैं।

### 4. बुवाई के समय कौन सी खाद और विधि का उपयोग किया गया?
फावड़े से जमीन की खुदाई कर डिब्बी बनाई गई और उसमें गोबर की खाद के साथ बीज बोए गए, बाद में पोटाश भी डाला गया।

### 5. फसल में किस कीट का खतरा रहता है और बचाव कैसे होता है?
फसल में पत्ता छेदक कीड़े का खतरा हो सकता है, जिससे बचाव के लिए कीटनाशक का छिड़काव किया जा सकता है।

## प्रेरणा और सबक
सीमित जगह और घरेलू संसाधनों के जरिए स्वावलंबन हासिल करने की यह एक बेहतरीन और अनुकरणीय पहल है।

- **संसाधनों का रचनात्मक उपयोग:** खाली पड़ी बाड़ी या आंगन को केवल 40 पौधों से उत्पादक बनाया जा सकता है। उपलब्ध स्थान का सही नियोजन घर की खाद्य जरूरतों को पूरा कर सकता है।
- **जैविक खाद पर भरोसा:** रासायनिक खादों के बजाय गोबर की खाद का उपयोग करके उत्कृष्ट पैदावार पाई जा सकती है। पारंपरिक तरीके आज भी कम लागत में प्रभावी परिणाम देते हैं।
- **धैर्य और नियमित देखभाल:** लगभग 45 दिनों के संयमित रखरखाव के बाद दो महीने तक लगातार उत्पादन संभव होता है। नियमित निगरानी छोटे प्रयासों को भी बड़े लाभ में बदल देती है।

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