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  "title": "बस्तर दशहरा पर्व की शुरुआत: कांटों के झूले पर देवी स्वरूप कन्या से राजपरिवार ने मांगी अनुमति",
  "summary": "जगदलपुर के भंगाराम चौक पर ऐतिहासिक काछनगादी पूजा की रस्म पूरी हुई, जहां बेल के कांटों पर लेटी कन्या से अनुमति लेकर महापर्व का शुभारंभ हुआ।",
  "content": "छत्तीसगढ़ के बस्तर में ऐतिहासिक दशहरा महापर्व की विधिवत शुरुआत काछनगादी पूजा विधान के साथ संपन्न हो गई है। सदियों पुरानी इस अनूठी परंपरा के तहत बस्तर राजपरिवार ने बेल के तीखे कांटों से तैयार किए गए झूले पर लेटी एक कुंवारी कन्या से उत्सव के आयोजन की औपचारिक अनुमति प्राप्त की। इस पारंपरिक विधान के पूरा होते ही क्षेत्र में 75 दिनों तक चलने वाले ऐतिहासिक दशहरा पर्व से जुड़े आगे के अनुष्ठानों का रास्ता साफ हो गया है।\n\nभंगाराम चौक पर संपन्न हुआ काछनगादी विधान\nयह धार्मिक अनुष्ठान बस्तर जिला मुख्यालय जगदलपुर में स्थित भंगाराम चौक पर पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार आयोजित किया गया। इस वर्ष की रस्म 12 वर्षीय बालिका पीहू दास ने निभाई, जो बेल के नुकीले कांटों से बुने गए विशेष झूले पर लेटीं। स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस विशेष पूजा के दौरान बालिका पर काछन देवी स्वयं सवार होती हैं और पूरे क्षेत्र को निर्विघ्न पर्व मनाने का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।\n\nपनका समुदाय की पारंपरिक भूमिका\nकाछनगादी की इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में पनका समुदाय का केंद्रीय योगदान रहता है। समुदाय के प्रतिनिधि प्रेम सागर पनका ने स्पष्ट किया कि परंपरा के अनुसार समाज की ही एक कुंवारी बालिका के माध्यम से देवी से संवाद स्थापित किया जाता है। जब देवी का आह्वान स्वीकार हो जाता है और झूले से अनुमति मिल जाती है, तभी इस विशाल लोकपर्व की सभी औपचारिक कड़ियां आगे बढ़ाई जाती हैं।\n\nपितृ पक्ष के अंतिम दिन रेला माता की पूजा\nबस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव ने इस पूजा के आध्यात्मिक पहलू को रेखांकित करते हुए बताया कि यह दशहरा उत्सव का एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है। पितृ पक्ष के आखिरी दिन यह अर्चना विशेष रूप से रेला माता को पितृ स्वरूप मानकर की जाती है। काछन देवी और रेला माता की दैवीय स्वीकृति मिलने के बाद अब बस्तर राजपरिवार तथा इलाके के सभी पारंपरिक जमींदार मिलकर आगे के सभी धार्मिक कार्यक्रमों को संपन्न कराएंगे।\n\nइसका आप पर असर\nकाछनगादी रस्म के संपन्न होने से बस्तर दशहरा के विशाल सांस्कृतिक आयोजनों की औपचारिक शुरुआत हो गई है।\n\n• भारत में: देश भर से बस्तर के अनूठे आदिवासी दशहरा को देखने पहुंचने वाले पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए प्रमुख अनुष्ठानों की तिथियां तय हो गई हैं। वे अब जगदलपुर में आयोजित होने वाले आगामी विशाल रथ परिचालन और पारंपरिक बैठकों के कार्यक्रम के अनुसार अपनी यात्राएं प्लान कर सकते हैं।\n• बस्तर में: जगदलपुर और आसपास के ग्रामीण अंचलों में स्थानीय कारीगरों, पुजारियों और जमींदारों की सामूहिक भागीदारी अब पूरी सक्रियता से शुरू होगी। त्योहार के दौरान शहर के बाजारों, परिवहन व्यवस्था और होटल व्यवसाय में अगले कई हफ्तों तक भारी आर्थिक और सामाजिक हलचल देखने को मिलेगी।\n• श्रद्धालुओं के लिए: देवी की अनुमति के बाद पारंपरिक पूजा स्थलों पर दर्शनार्थियों का तांता लगना शुरू होगा। विभिन्न समाजों के लोग अब बिना किसी व्यवधान के सदियों पुराने लोकनृत्यों और देव पूजाओं में शामिल हो सकेंगे।\n• प्रशासनिक स्तर पर: स्थानीय प्रशासन अब भंगाराम चौक से लेकर दंतेश्वरी मंदिर परिसर तक सुरक्षा, ट्रैफिक डायवर्जन और भीड़ नियंत्रण के व्यापक प्रबंध लागू करेगा। उत्सव के मुख्य दिनों के लिए विशेष प्रशासनिक दिशा-निर्देश और हेल्पडेस्क शुरू किए जाएंगे।\n\nऐसा क्यों हुआ\nकाछनगादी की यह प्राचीन रस्म बस्तर दशहरा शुरू करने से पहले कुलदेवी की पारंपरिक स्वीकृति हासिल करने के उद्देश्य से निभाई जाती है।\n\n• दैवीय अनुमति की अनिवार्यता: बस्तर की 600 से अधिक वर्ष पुरानी परंपरा के अनुसार, काछन देवी की औपचारिक स्वीकृति के बिना दशहरा उत्सव का कोई भी मुख्य कार्यक्रम शुरू नहीं किया जा सकता। मान्यता है कि देवी की आज्ञा मिलने के बाद ही पूरा क्षेत्र विघ्न-बाधाओं से सुरक्षित रहता है।\n• कांटों के झूले का विधान: बेल के तीखे कांटों पर बालिका का लेटना देवी के अलौकिक प्रभाव और त्याग का प्रतीक माना जाता है। इस कठोर परीक्षा के जरिए देवी अपनी उपस्थिति और आशीर्वाद का प्रमाण देती हैं।\n• पितृ विसर्जन का समय: यह पूजा विधान ठीक पितृ पक्ष के समापन पर किया जाता है ताकि पूर्वजों और कुलदेवताओं को तृप्त किया जा सके। रेला माता की पितृ रूप में वंदना कर बस्तर का समाज नई ऊर्जा के साथ नवरात्रि और दशहरा में प्रवेश करता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. काछनगादी की रस्म बस्तर में कहां आयोजित की गई?\nयह पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान बस्तर के जगदलपुर स्थित भंगाराम चौक पर संपन्न हुआ।\n\n2. इस वर्ष काछनगादी रस्म किस कन्या ने निभाई?\nइस साल यह रस्म 12 वर्षीय कुंवारी कन्या पीहू दास ने बेल के कांटों से बने झूले पर लेटकर पूरी की।\n\n3. इस विधान में किस समाज की मुख्य भूमिका रहती है?\nकाछनगादी विधान में पनका समाज की प्रमुख भूमिका होती है, जिसकी कुंवारी कन्या पर देवी सवार होने की मान्यता है।\n\n4. काछनगादी के दौरान किस देवी की पूजा की जाती है?\nइस दौरान काछन देवी के साथ-साथ पितृ स्वरूप में रेला माता की पूजा-अर्चना की जाती है।\n\n5. काछनगादी पूजा का मुख्य उद्देश्य क्या होता है?\nइसका मुख्य उद्देश्य बस्तर राजपरिवार द्वारा दशहरा महापर्व के सभी आयोजनों को शुरू करने के लिए देवी से अनुमति प्राप्त करना होता है।",
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  "category": "छत्तीसगढ़",
  "publishedAt": "2026-10-11",
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