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  "type": "article",
  "title": "बस्तर के जंगलों में हथियार छोड़ मुख्यधारा में लौटे सात युवाओं ने पास की एसएससी परीक्षा",
  "summary": "छत्तीसगढ़ में हिंसा छोड़कर सामान्य जीवन में लौटे सात पूर्व माओवादियों ने ओपन स्कूल की 10वीं बोर्ड परीक्षा में बाजी मारी है, जिनमें तीन प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुए हैं।",
  "content": "छत्तीसगढ़ में कभी हिंसा के रास्ते पर चलने वाले युवाओं ने अपनी जिंदगी की नई दिशा तय करते हुए शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय मिसाल पेश की है। पिछले वर्ष मुख्यधारा में शामिल होने वाले 210 पूर्व माओवादियों में से सात ने छत्तीसगढ़ राज्य ओपन स्कूल की एसएससी यानी 10वीं कक्षा की परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण कर ली है। इनमें से तीन प्रतिभागियों ने प्रथम श्रेणी में अंक प्राप्त कर अपनी प्रतिभा और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया है। यह उपलब्धि दिखाती है कि अगर सही अवसर और सहयोग मिले, तो प्रतिकूल परिस्थितियों से निकलकर भी जीवन को संवारा जा सकता है।\n\nहिंसा का साया छोड़ पुनर्वास और शिक्षा की नई शुरुआत\nअतीत में जंगलों के भीतर एके 47 राइफलों और बारूदी सुरंगों के तनावपूर्ण माहौल में दिन बिताने वाले इन युवाओं का जीवन अब पूरी तरह बदल चुका है। इनमें से कई लोगों ने कम उम्र में पारिवारिक त्रासदियों और गंभीर सामाजिक दबावों के चलते भटककर गलत रास्ता चुन लिया था। जब इन लोगों ने हिंसा का त्याग कर कानून के समक्ष आत्मसमर्पण किया, तब सरकार के पुनर्वास कार्यक्रमों और स्थानीय प्रशासन ने इन्हें सामान्य सामाजिक जीवन में स्थापित करने का जिम्मा संभाला।\n\nप्रशासनिक अधिकारियों और स्थानीय पुलिस ने इन युवाओं की नियमित काउंसलिंग कराई, उनके जरूरी कानूनी दस्तावेज तैयार करवाए और उन्हें अपनी छूटी हुई पढ़ाई फिर से शुरू करने के लिए प्रेरित किया। पुनर्वास केंद्रों और जेल परिसर के सुरक्षित वातावरण में रहते हुए इन प्रतिभागियों ने अपनी पुरानी कमियों को दूर करने की ठान ली और किताबों को अपना संबल बनाया।\n\nसंघर्ष से सफलता: 35 वर्ष की गीता नारोते की प्रेरणादायक यात्रा\nइस परीक्षा परिणाम में सबसे प्रेरक कहानियों में से एक गीता नारोते की है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की निवासी गीता जब मात्र 10 वर्ष की थीं, तब उनके पिता की हत्या माओवादियों ने कर दी थी। इसके बाद उपजी विषम परिस्थितियों के चलते वे संगठन के संपर्क में आईं और लंबे समय तक उसी तंत्र का हिस्सा बनी रहीं। संगठन में सक्रिय रहने के दौरान उन्हें सब ‘डॉ चंपा’ के नाम से बुलाते थे, क्योंकि वे बीमार साथियों का इलाज करने और गोली लगने से घायल हुए लोगों के घावों पर टांके लगाने का काम करती थीं।\n\nकक्षा छह में ही पढ़ाई छूट जाने के बावजूद 35 वर्ष की आयु में गीता ने हार नहीं मानी। पिछले साल आत्मसमर्पण करने के बाद उन्होंने अपनी बुनियादी शिक्षा पूरी करने का बीड़ा उठाया और अब एसएससी बोर्ड पास कर लिया। गीता का स्पष्ट लक्ष्य है कि वे आगे नर्सिंग का पेशेवर प्रशिक्षण लेंगी, ताकि वे अस्पताल में नर्स बनकर अपने परिवार को सम्मानजनक जीवन और मजबूत सहारा दे सकें।\n\nदिन में कौशल विकास और रात में परीक्षाओं की तैयारी\nपरीक्षा में सफल होने वाले अन्य साथियों में 32 वर्षीय अर्जुन ओयाम और संतोष अचला के अनुभव भी गहरे संघर्ष को दर्शाते हैं। बस्तर के घने जंगलों से निकलकर सामान्य दुनिया में कदम रखने वाले अर्जुन के लिए सब कुछ नया था। उन्होंने जीवन को पटरी पर लाने के लिए दिन के वक्त आजीविका के गुर सीखे, जिनमें मछली पालन और इलेक्ट्रीशियन के काम का व्यावहारिक प्रशिक्षण शामिल था।\n\nदिनभर कौशल विकास का कठिन काम करने के बाद अर्जुन अपनी पूरी रात किताबों के साथ बिताते थे। इसी तरह संतोष अचला ने भी गंभीर पारिवारिक संकटों और व्यक्तिगत संघर्षों से जूझते हुए अपनी निरंतर लगन के बल पर एसएससी की परीक्षा पास की। दोनों युवाओं ने यह साबित किया कि आजीविका के प्रशिक्षण के साथ-साथ औपचारिक शिक्षा को भी पूरी निष्ठा से साधा जा सकता है।\n\nडिजिटल तकनीक, टैबलेट और स्थानीय शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका\nसुदूर जंगलों और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए इन विद्यार्थियों के लिए आधुनिक पाठ्यक्रम से तालमेल बैठाना एक बड़ी चुनौती थी। इस बाधा को दूर करने में डिजिटल साधनों और अध्ययन सामग्री ने बड़ा योगदान दिया। कई पूर्व विद्रोहियों को अध्ययन के लिए टैबलेट मुहैया कराए गए, जिन पर वे ऑनलाइन पाठ्यसामग्री और पीडीएफ फाइलों के माध्यम से जरूरी अध्याय पढ़ते थे।\n\nइसके अलावा उनके मित्रों और मार्गदर्शकों ने व्हाट्सएप के जरिए नोट्स साझा किए और कठिन विषयों के प्रश्नों को सुलझाने में सहायता की। स्थानीय शिक्षकों और ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों ने भी समय निकालकर इन शिक्षार्थियों की शंकाएं दूर कीं। इस साझा समर्थन ने उनके आत्मविश्वास को निरंतर मजबूत किया और उन्हें सफलता के मुकाम तक पहुंचाया।\n\nमुख्यधारा में शामिल होने का बड़ा सामाजिक संदेश\nएसएससी परीक्षा में इन सात युवाओं की कामयाबी केवल एक शैक्षणिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के लिए भी एक सीधा संदेश है जो अभी भी हथियारों के साए में भटक रहे हैं। यह परिणाम दर्शाता है कि स्थायी शांति और व्यक्तिगत विकास का रास्ता हिंसा से नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुशासन और संविधानसम्मत मुख्यधारा से ही संभव है। प्रशासन की पुनर्वास नीतियों और युवाओं के निजी संकल्प के इस समन्वय ने समाज में सकारात्मक बदलाव की मजबूत नींव रखी है।\n\nइसका आप पर असर\nयह परिणाम साबित करता है कि शासन की पुनर्वास और ओपन स्कूलिंग नीतियां जमीनी स्तर पर सकारात्मक बदलाव ला रही हैं।\n\n• भारत में: यह घटनाक्रम देश के संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में मुख्यधारा में लौटने वाले लोगों के सामाजिक पुनर्वास और शिक्षा के महत्व को रेखांकित करता है। इससे अन्य भटके हुए नागरिकों को हथियार छोड़कर सामान्य और कानूनी जीवन अपनाने की ठोस प्रेरणा मिलती है।\n• छत्तीसगढ़ में: राज्य में आत्मसमर्पण करने वाले पूर्व उग्रवादियों के लिए ओपन स्कूलिंग और कौशल विकास योजनाएं व्यावहारिक रूप से सफल सिद्ध हो रही हैं। स्थानीय प्रशासन अब इस तरह के शैक्षिक और व्यावसायिक कार्यक्रमों को और अधिक सक्रियता से आगे बढ़ा सकता है।\n• छात्रों और युवाओं के लिए: कठिन परिस्थितियों और उम्र के फासले के बावजूद पढ़ाई पूरी करने का यह उदाहरण हर उस युवा को हौसला देता है जिसकी शिक्षा बीच में छूट गई थी। ओपन स्कूलिंग के माध्यम से कोई भी व्यक्ति किसी भी उम्र में दोबारा अपनी शैक्षिक यात्रा शुरू कर सकता है।\n• सुरक्षा और शांति पर असर: शिक्षा और रोजगार के प्रति बढ़ता रुझान ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त करता है। बंदूक के बजाय कलम और कौशल को प्राथमिकता मिलने से क्षेत्र में सामाजिक सुरक्षा सुदृढ़ होती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह शैक्षिक सफलता आत्मसमर्पण करने वाले युवाओं के व्यक्तिगत संकल्प और राज्य की व्यापक पुनर्वास नीति के आपसी समन्वय के कारण संभव हुई।\n\n• हिंसा त्यागने का निर्णय: पिछले वर्ष 210 माओवादियों ने लगातार संघर्ष और अलगाव के जीवन को छोड़कर औपचारिक रूप से कानून के सामने आत्मसमर्पण किया था। इस कदम ने उन्हें जेल और पुनर्वास केंद्रों में सुरक्षित माहौल में रहने और भविष्य के बारे में सोचने का अवसर दिया।\n• प्रशासनिक मार्गदर्शन और दस्तावेज निर्माण: स्थानीय पुलिस और नागरिक प्रशासन ने युवाओं की काउंसलिंग कराई और उनके आवश्यक पहचान पत्र एवं दस्तावेज तैयार करवाए। बिना पहचान पत्र के किसी भी मान्यता प्राप्त बोर्ड में दाखिला लेना संभव नहीं था, जिसे अधिकारियों ने तुरंत हल किया।\n• ओपन स्कूलिंग और डिजिटल माध्यमों की सुलभता: छत्तीसगढ़ राज्य ओपन स्कूल की लचीली व्यवस्था के तहत उन्हें अध्ययन सामग्री और टैबलेट जैसी सुविधाएं प्रदान की गईं। साथियों ने व्हाट्सएप के माध्यम से नोट्स पहुंचाए और स्थानीय शिक्षकों ने पाठ्यपुस्तकों के कठिन अंशों को समझने में मदद की।\n• कौशल विकास के साथ अध्ययन का तालमेल: युवाओं ने केवल कक्षा तक सीमित न रहकर दिन में इलेक्ट्रीशियन और मत्स्य पालन का प्रशिक्षण लिया तथा रात में अध्ययन किया। इस दोहरी तैयारी ने उनमें आत्मनिर्भर बनने और परीक्षा पास करने का गहरा विश्वास जगाया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. कितने पूर्व माओवादियों ने छत्तीसगढ़ ओपन स्कूल की परीक्षा पास की है?\nपिछले वर्ष आत्मसमर्पण करने वाले 210 पूर्व माओवादियों में से कुल सात लोगों ने छत्तीसगढ़ ओपन स्कूल की एसएससी यानी 10वीं परीक्षा पास की है।\n\n2. इन सात परीक्षार्थियों में से कितने लोगों ने प्रथम श्रेणी हासिल की?\nसफल होने वाले सात पूर्व माओवादियों में से तीन परीक्षार्थियों ने प्रथम श्रेणी के अंकों के साथ यह परीक्षा उत्तीर्ण की है।\n\n3. गीता नारोते कौन हैं और संगठन में उन्हें किस नाम से जाना जाता था?\nगीता नारोते महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की रहने वाली पूर्व माओवादी हैं, जिन्हें संगठन में घायलों के इलाज और सेवा के कारण 'डॉ चंपा' के नाम से जाना जाता था।\n\n4. एसएससी परीक्षा पास करने के बाद गीता का आगे क्या लक्ष्य है?\nगीता नारोते अब नर्सिंग का प्रशिक्षण लेकर अस्पताल में नर्स बनना चाहती हैं ताकि वे अपने परिवार को आर्थिक और सामाजिक सहारा दे सकें।\n\n5. अर्जुन ओयाम पढ़ाई के साथ दिन में किस तरह का प्रशिक्षण ले रहे थे?\n32 वर्षीय अर्जुन ओयाम दिन के समय आजीविका के लिए मछली पालन और इलेक्ट्रीशियन का काम सीखते थे और रात में परीक्षा की तैयारी करते थे।\n\n6. इन विद्यार्थियों को पढ़ाई में डिजिटल उपकरणों से क्या मदद मिली?\nविद्यार्थियों ने टैबलेट पर ऑनलाइन अध्ययन सामग्री और पीडीएफ फाइलें पढ़ीं, जबकि उनके दोस्तों और शिक्षकों ने व्हाट्सएप के माध्यम से नोट्स और प्रश्नों के उत्तर समझाए।\n\nप्रेरणा और सबक\nबस्तर के इन युवाओं की यात्रा जीवन के सबसे कठिन दौर से निकलकर नया मुकाम हासिल करने का अनुपम उदाहरण है।\n\n• उम्र कभी सीखने में बाधा नहीं बनती: 35 साल की उम्र में गीता नारोते द्वारा 10वीं की परीक्षा पास करना यह साबित करता है कि नए सिरे से शुरुआत करने के लिए कभी देर नहीं होती। दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो दशकों का छूटा हुआ अध्ययन भी फिर से शुरू किया जा सकता है।\n• अतीत आपकी सीमा तय नहीं करता: बारूदी सुरंगों और हिंसा की पृष्ठभूमि से निकलकर किताबों के जरिए सम्मानजनक पहचान बनाई जा सकती है। अपने गलत निर्णयों से बाहर आकर सही राह चुनना ही सच्ची बहादुरी है।\n• श्रम और शिक्षा का संतुलन संभव है: दिनभर मछली पालन और बिजली मिस्त्री का काम सीखने के बाद रातों में पढ़ाई करना अनुशासन की पराकाष्ठा है। व्यस्तताओं और शारीरिक परिश्रम के बीच भी ज्ञानार्जन के लिए समय निकाला जा सकता है।\n• तकनीक को सकारात्मक साधन बनाएं: टैबलेट और मैसेजिंग एप्स का इस्तेमाल सोशल मीडिया के बजाय पढ़ाई और नोट्स साझा करने में करके इन युवाओं ने आधुनिक उपकरणों का सर्वोत्तम उपयोग दिखाया।",
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  "category": "छत्तीसगढ़",
  "publishedAt": "2026-10-01",
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