बस्तर में अचारी मिर्च से मुनाफा कमाने की तैयारी, आंध्र-तेलंगाना में सप्लाई का प्लान छत्तीसगढ़ के बस्तर निवासी किसान समलु कश्यप पहली बार अचारी मिर्च उगाकर करीब 3 से 4 लाख रुपये कमाई की उम्मीद कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के एक किसान समलु कश्यप ने पारंपरिक फसलों से अलग हटकर पहली बार अचारी मिर्च की पैदावार करने का फैसला किया है। सामान्य हरी मिर्च के मुकाबले आकार में काफी बड़ी दिखने वाली यह मिर्च मुख्य रूप से अचार तैयार करने और भजिया जैसे व्यंजनों में इस्तेमाल की जाती है। अन्य राज्यों में इस खास किस्म की अच्छी मांग को देखते हुए वे अपनी पूरी उपज को आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की मंडियों में भेजने की योजना बना रहे हैं, जहां इसके बेहतर दाम मिलने की पूरी संभावना है। हाइब्रिड किस्म और बंपर कमाई की उम्मीद समलु कश्यप के अनुसार, उन्होंने जिस मिर्च का चयन किया है वह एक उन्नत हाइब्रिड वैरायटी है। इस किस्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें विभिन्न कीटों और बीमारियों का असर सामान्य फसलों की तुलना में काफी कम होता है। कम नुकसान और बाजार में मिलने वाले मजबूत भाव के कारण उन्हें अपनी इस अचारी मिर्च की खेती से लगभग 3 लाख रुपये तक के शुद्ध मुनाफे का भरोसा है। खेत की जुताई से लेकर बेड बनाने की तकनीक फसल लगाने की पूरी प्रक्रिया के बारे में बताते हुए समलु कश्यप ने साझा किया कि उन्होंने सबसे पहले खेत की दो से तीन बार अच्छी तरह से गहरी जुताई करवाई। मिट्टी को पूरी तरह भुरभुरा बनाने के मकसद से रोटावेटर चलाया गया और उसके बाद व्यवस्थित क्यारियां यानी बेड तैयार किए गए। बेड से बेड की दूरी पांच फीट निर्धारित की गई, जबकि दो पौधों के बीच एक फीट का फासला रखा गया है। इस विधि के तहत सबसे पहले नर्सरी में पौध तैयार की जाती है, जिसके बाद रोपाई होती है और पौधे लगभग ढाई महीने की अवधि में फल देना शुरू कर देते हैं। लागत, पोषण और पौधों की संख्या का गणित एक एकड़ रकबे में अचारी मिर्च की खेती पर समलु कश्यप का कुल खर्च तकरीबन 70 से 80 हजार रुपये के आसपास आया है। उन्होंने खेत में लगभग 10 हजार पौधे लगाए हैं, जहां प्रत्येक पौधे की शुरुआती कीमत करीब 1.40 रुपये पड़ी। खेत में पोषक तत्वों के संतुलन के लिए उन्होंने गोबर की पारंपरिक खाद के साथ डीएपी और सुपर फॉस्फेट का प्रयोग किया है, जबकि अन्य जरूरी पोषक तत्व ड्रिप सिंचाई प्रणाली के जरिए सीधे जड़ों तक पहुंचाए जा रहे हैं। कीट प्रबंधन और तुड़ाई का लंबा चक्र फसल की सुरक्षा को लेकर वे पूरी तरह सतर्क हैं। खेत में जब भी थ्रिप्स अथवा माइट्स जैसे कीटों का हमला नजर आता है, वे तुरंत नियंत्रण के लिए अनुशंसित कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करते हैं। रोपाई के बाद पौधे लगभग 60 दिनों के भीतर मिर्च देना प्रारंभ कर देते हैं और यह पैदावार लगातार पांच से छह महीने तक चलती रहती है। चूंकि समलु कश्यप पहली बार यह प्रयोग कर रहे हैं, इसलिए उन्हें कुल वजन या उत्पादन का सटीक अनुमान तो नहीं है, लेकिन बाजार की मांग के आधार पर वे 3 से 4 लाख रुपये तक की कुल कमाई की उम्मीद बांधे हुए हैं। इसका आप पर असर व्यावसायिक स्तर पर अचारी मिर्च उगाने का यह प्रयोग छोटे किसानों के लिए कम रकबे में अधिक आय हासिल करने का सीधा रास्ता पेश करता है। • भारत में: गैर-पारंपरिक और विशिष्ट किस्मों की सब्जियों की खेती करने वाले उत्पादकों को बड़े अंतरराज्यीय खरीदार मिल सकते हैं। इसके माध्यम से सामान्य फसलों के मुकाबले कई गुना बेहतर भाव हासिल किया जा सकता है। • बस्तर में: स्थानीय किसान पारंपरिक धान और दलहन की खेती पर निर्भरता घटाकर आधुनिक बागवानी अपना सकते हैं। एक एकड़ में 70 से 80 हजार रुपये खर्च करके छह महीने तक नियमित आवक का स्रोत बनाया जा सकता है। • आंध्र और तेलंगाना में: पड़ोसी राज्यों की प्रसंस्करण इकाइयों और थोक मंडियों को बेहतर गुणवत्ता की ताजा अचारी मिर्च की आपूर्ति मिलेगी। इससे अचार और स्नैक निर्माताओं को कच्चे माल की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहेगी। • लागत प्रबंधन: ड्रिप सिंचाई और व्यवस्थित बेड तैयार करने से पानी व उर्वरक की बर्बादी रुकती है। करीब 1.40 रुपये प्रति पौधे की दर से पौध तैयार कर शुरुआती निवेश को नियंत्रित रखा जा सकता है। ऐसा क्यों हुआ संगलु कश्यप ने बाजार की विशिष्ट मांग और बेहतर मूल्य प्राप्ति को भांपते हुए इस फसल को चुना। • बाजार की खास मांग: सामान्य मिर्च के मुकाबले बड़ी अचारी मिर्च का उपयोग मुख्य रूप से नमकीन भजिया और अचार उद्योग में होता है। अंतरराज्यीय स्तर पर इसकी सतत मांग रहने से बेहतर भाव मिलने की गुंजाइश रहती है। • बीमारियों से सुरक्षा: सामान्य किस्मों की तुलना में हाइब्रिड बीजों में सामान्य पादप रोगों का प्रकोप कम देखा जाता है। इस मजबूती के कारण फसल का नुकसान घटता है और उत्पादन स्थिर रहता है। • संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग: ड्रिप प्रणाली और रोटावेटर आधारित बेड निर्माण से पौधों का पोषण सुनिश्चित हुआ। इस संरचना की मदद से एक एकड़ में 10 हजार पौधे व्यवस्थित रूप से लगाए जा सके। सवाल-जवाब 1. अचारी मिर्च की खेती किस क्षेत्र में की जा रही है? यह खेती छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में किसान समलु कश्यप द्वारा की जा रही है। 2. अचारी मिर्च सामान्य मिर्च से किस प्रकार भिन्न है? यह मिर्च आकार में सामान्य मिर्च से काफी बड़ी होती है और इसका मुख्य उपयोग अचार तथा भजिया बनाने में होता है। 3. फसल की पैदावार कितने समय में शुरू हो जाती है? पौधे लगाने के लगभग 60 दिन यानी ढाई महीने में फल देना शुरू कर देते हैं। 4. यह फसल कुल कितने महीने तक चलती है? अचारी मिर्च की यह फसल लगभग पांच से छह महीने तक चलती है। 5. एक एकड़ में खेती करने का कुल खर्च कितना आया? एक एकड़ में मिर्च की खेती पर लगभग 70 से 80 हजार रुपये की लागत आई है। 6. खेत में कितने पौधे लगाए गए हैं और उनकी दर क्या रही? खेत में करीब 10 हजार पौधे लगाए गए हैं, जिनकी कीमत लगभग 1.40 रुपये प्रति पौधा पड़ी। 7. मिर्च को किन राज्यों में बेचने की तैयारी है? उपज को बेहतर मुनाफे के लिए आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बाजारों में सप्लाई करने की योजना है। 8. किसान को इस फसल से कितनी कमाई की उम्मीद है? किसान समलु कश्यप को 3 से 4 लाख रुपये तक की कमाई और लगभग 3 लाख रुपये तक के मुनाफे की उम्मीद है। प्रेरणा और सबक बस्तर के किसान समलु कश्यप का यह जमीनी प्रयोग दिखाता है कि योजनाबद्ध तरीके से नई किस्मों को अपनाकर पारंपरिक खेती को बेहद लाभकारी बनाया जा सकता है। • नवाचार को अपनाना: लकीर का फकीर बनने के बजाय बाजार की मांग वाली नई हाइब्रिड किस्मों को आजमाना चाहिए। • चरणबद्ध प्रबंधन: गहरी जुताई, रोटावेटर से भुरभुरी मिट्टी और ड्रिप पद्धति जैसी वैज्ञानिक तकनीकों से खेत तैयार करना जरूरी है। • लागत पर नियंत्रण: सीमित बजट में गुणवत्तापूर्ण पौधे चुनकर और संतुलित उर्वरक देकर मुनाफे की संभावना बढ़ाई जा सकती है। • अंतरराज्यीय सोच: अपनी उपज को केवल स्थानीय हाट तक सीमित न रखकर बड़े राज्यों की मंडियों में बेचने की तैयारी रखनी चाहिए। https://trendkia.com/chhattisgarh/bastar-men-achari-mircha-se-munapha-kamane-ki-taiyari-andhra-telangana-men-saplai-ka-plana-45149 TrendKia — Har trend, sabse pehle.