बस्तर में मुख्यधारा में लौटे सन्नू आंचला ने 10वीं कक्षा उत्तीर्ण की, अब आगे की शिक्षा पर नजर बस्तर में आत्मसमर्पण करने वाले सन्नू आंचला उर्फ संतोष ने 10वीं की बोर्ड परीक्षा पास कर ली है। कभी हथियार उठाने वाले सन्नू ने प्रशासन के सहयोग से दोबारा पढ़ाई शुरू की और अब उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में जीवन की नई शुरुआत करते हुए आत्मसमर्पण कर चुके सन्नू आंचला उर्फ संतोष ने 10वीं की परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण कर ली है। कभी नक्सली गतिविधियों में शामिल रहने वाले और हथियार उठाने वाले सन्नू ने हिंसा का मार्ग छोड़कर शिक्षा की राह चुनी है। केवल दूसरी कक्षा तक बुनियादी शिक्षा प्राप्त करने के बाद लंबे अंतराल को पार करते हुए उन्होंने यह शैक्षणिक सफलता हासिल की है। अब वे अपने अध्ययन को निरंतर जारी रखकर एक बेहतर भविष्य की नींव रखने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के प्रभाव से संगठन में हुए थे शामिल सन्नू के जीवन का शुरुआती मोड़ उनके गृह क्षेत्र में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक आयोजनों से जुड़ा था। बचपन के दिनों में वे अपने इलाके में होने वाले माओवादी सांस्कृतिक दलों के कार्यक्रमों को देखते थे। मंच पर कलाकारों को प्रस्तुति देते और गाते देखकर उनके बाल मन पर गहरा असर पड़ा। उन्हें लगा कि संगठन से जुड़कर वे भी इसी प्रकार हजारों लोगों के समक्ष गीत गा सकेंगे और अपनी कला का प्रदर्शन कर पाएंगे। इसी आकर्षण के कारण वे कम उम्र में ही माओवादी संगठन के संपर्क में आ गए और बाद में संगठन की एरिया कमेटी के सदस्य के रूप में काम करने लगे। संगठन के भीतर समझ आया शिक्षा का महत्व घर पर रहने के दौरान सन्नू केवल दूसरी कक्षा तक ही औपचारिक पढ़ाई कर पाए थे। संगठन के भीतर रहने के दौरान उन्हें यह समझाया गया कि समाज, व्यवस्था और बाहरी दुनिया को भलीभांति समझने के लिए शिक्षित होना बेहद अनिवार्य है। संगठन के सदस्यों द्वारा शिक्षा की आवश्यकता पर बल दिए जाने के बाद सन्नू का ध्यान पढ़ाई की ओर गया। हालांकि उस समय वे मुख्यधारा से पूरी तरह कटे हुए थे, लेकिन उनके मन में आगे सीखने की ललक जीवित रही। हिंसा का रास्ता छोड़ने और आत्मसमर्पण करने के बाद उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करने की इच्छा प्रकट की। अधिकारियों ने उनके इस सकारात्मक निर्णय का स्वागत किया और उन्हें शैक्षणिक मदद उपलब्ध कराई। देर रात तक अध्ययन और कठिन विषयों पर विजय किताबों से वर्षों की दूरी के बाद दोबारा नियमित पढ़ाई शुरू करना सन्नू के लिए आसान नहीं था। शुरुआत में उन्हें विशेष रूप से हिंदी भाषा और गृह विज्ञान के विषयों की अवधारणाओं को समझने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इस चुनौती से निपटने के लिए उन्होंने कड़ा अभ्यास शुरू किया और प्रतिदिन रात के करीब 11:30 बजे तक लगातार अध्ययन में जुटे रहे। नियमित मेहनत और लगन के बल पर धीरे-धीरे विषयों पर उनकी पकड़ मजबूत होती गई। इस कठिन परिश्रम का सुखद परिणाम 10वीं की परीक्षा में सफलता के रूप में सामने आया है। परीक्षा पास करने के बाद सन्नू का स्पष्ट लक्ष्य अपनी पढ़ाई को यहीं न रोककर आगे की उच्च कक्षाओं में प्रवेश लेना और ज्ञान अर्जित करना है। इसका आप पर असर बस्तर में आत्मसमर्पण के बाद शिक्षा हासिल करने का यह कदम यह साबित करता है कि पुनर्वास के जरिए व्यक्ति अपने जीवन को नई दिशा दे सकता है। • भारत में: यह घटना दर्शाती है कि पुनर्वास नीतियों और शिक्षा के समन्वय से उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों के नागरिकों को समाज की मुख्यधारा में मजबूती से जोड़ा जा सकता है। इससे अन्य युवाओं को भी हिंसा छोड़कर किताबों का रुख करने की सीख मिलती है। • बस्तर में: बस्तर क्षेत्र के स्थानीय युवाओं और पूर्व उग्रवादियों के लिए यह एक सकारात्मक नजीर पेश करता है कि औपचारिक शिक्षा की उम्र कभी खत्म नहीं होती। प्रशासन के सहयोग से इच्छुक लोग किसी भी स्तर से अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू कर सम्मानजनक जीवन जी सकते हैं। • छात्रों के लिए: दूसरी कक्षा के बाद लंबे अंतराल के बावजूद 10वीं पास करना यह सिखाता है कि नियमित अभ्यास से कठिन विषयों पर महारत हासिल की जा सकती है। रात 11:30 बजे तक पढ़ाई कर विषयों की जटिलता को सुलझाना दृढ़ संकल्प का प्रमाण है। • पुनर्वास व्यवस्था में: यह प्रशासनिक तंत्र की सहायता से जीवन बदलने का व्यावहारिक उदाहरण है। हथियार त्यागने के इच्छुक लोगों में यह भरोसा बढ़ता है कि समाज उन्हें सम्मानजनक अवसर देने के लिए तैयार है। ऐसा क्यों हुआ सन्नू आंचला ने हिंसा और हथियार का रास्ता छोड़कर शिक्षा की राह चुनी क्योंकि उन्होंने ज्ञान के महत्व को समझा और प्रशासन से मिले प्रोत्साहन का सही उपयोग किया। • बचपन का भटकाव: बचपन में स्थानीय स्तर पर आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों और गीतों के आकर्षण के कारण वे कम उम्र में संगठन में शामिल हो गए थे। उस समय उनमें व्यवस्था की गहरी समझ नहीं थी और वे केवल मंच पर प्रस्तुति देने की चाहत रखते थे। • ज्ञान की आवश्यकता का बोध: संगठन के भीतर रहने के दौरान भी सदस्यों द्वारा यह बात कही गई कि दुनिया और समाज को समझने के लिए पढ़ना जरूरी है। इस विचार ने उनके भीतर सीखने की इच्छा को निरंतर जीवित रखा। • आत्मसमर्पण और प्रशासनिक सहयोग: मुख्यधारा में लौटने के बाद जब उन्होंने आगे पढ़ने की इच्छा जाहिर की, तब प्रशासनिक अधिकारियों ने उन्हें प्रोत्साहित किया और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराईं। • सख्त मेहनत और निरंतर अभ्यास: शुरुआत में हिंदी और गृह विज्ञान जैसे विषयों में कठिनाई होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और देर रात तक अध्ययन कर पाठ्यक्रम को समझा। सवाल-जवाब 1. सन्नू आंचला उर्फ संतोष ने कौन सी परीक्षा उत्तीर्ण की है? उन्होंने बस्तर में 10वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा सफलतापूर्वक पास की है। 2. संगठन में शामिल होने से पहले उन्होंने कहां तक पढ़ाई की थी? संगठन में शामिल होने से पहले वे केवल दूसरी कक्षा तक ही पढ़ पाए थे। 3. वे बचपन में माओवादी संगठन से क्यों जुड़े थे? वे अपने इलाके में माओवादी सांस्कृतिक कार्यक्रमों और गायकों की प्रस्तुतियों को देखकर प्रभावित हुए थे और हजारों लोगों के सामने गाना चाहते थे। 4. माओवादी संगठन में वे किस पद या जिम्मेदारी पर काम करते थे? वे संगठन में एरिया कमेटी के सदस्य के रूप में कार्यरत थे। 5. आत्मसमर्पण के बाद उन्हें पढ़ाई के लिए किसने प्रेरित किया? आत्मसमर्पण के बाद प्रशासनिक अधिकारियों ने उनकी इच्छा जानकर उन्हें आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। 6. शुरुआत में सन्नू को किन विषयों को समझने में कठिनाई हुई? उन्हें शुरुआत में हिंदी और गृह विज्ञान के कुछ विषयों को समझने में परेशानी का सामना करना पड़ा। 7. परीक्षा की तैयारी के दौरान वे कितने बजे तक अध्ययन करते थे? परीक्षा की तैयारी के दौरान वे प्रतिदिन रात में लगभग 11:30 बजे तक पढ़ाई करते थे। 8. 10वीं पास करने के बाद सन्नू का अगला लक्ष्य क्या है? उनका अगला लक्ष्य अपनी पढ़ाई को निरंतर जारी रखना और उच्च शिक्षा हासिल करना है। प्रेरणा और सबक हथियारों को छोड़कर किताबों का दामन थामने की यह कहानी यह संदेश देती है कि संकल्प और मेहनत से जीवन की दिशा किसी भी पड़ाव पर बदली जा सकती है। • अतीत कभी भविष्य तय नहीं करता: पूर्व की परिस्थितियों या गलत रास्तों को पीछे छोड़कर एक नया रचनात्मक आरंभ कभी भी किया जा सकता है। • सीखने की कोई उम्र या सीमा नहीं: केवल दूसरी कक्षा तक पढ़े होने के बावजूद लंबे समय बाद 10वीं की परीक्षा पास करना यह दिखाता है कि लगन हो तो कोई भी फासला तय किया जा सकता है। • कठिनाइयों से घबराने के बजाय अभ्यास करें: नए विषयों में परेशानी आने पर पीछे हटने के बजाय रात 11:30 बजे तक पढ़ाई कर सन्नू ने साबित किया कि निरंतरता ही सफलता की कुंजी है। • सकारात्मक मदद का स्वागत करें: समाज और प्रशासन द्वारा मिलने वाले अवसरों का सही उपयोग करके व्यक्ति सम्मानजनक मुकाम हासिल कर सकता है। https://trendkia.com/chhattisgarh/bastar-men-mukhyadhara-men-laute-sannu-aanchla-ne-10vin-kaksha-uttirna-ki-aba-age-ki-shiksha-para-najara-42313 TrendKia — Har trend, sabse pehle.