# बस्तर दशहरा की रहस्यमयी निशा जात्रा संपन्न, 600 साल पुरानी इस परंपरा में दी जाती है 11 बकरों की बलि

> बस्तर दशहरा के दौरान निभाई जाने वाली प्राचीन और रहस्यमयी निशा जात्रा की रस्म पूरी हो गई है। माना जाता है कि इस 600 साल पुरानी तांत्रिक परंपरा का उद्देश्य राज्य को बुरी ताकतों से बचाना है।

**Type:** article · **Category:** छत्तीसगढ़ · **Published:** 2026-10-22 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/chhattisgarh/bastara-dashahara-ki-rahasyamayi-nisha-jatra-snpanna-600-sala-purani-isa-parnpara-men-di-jati-hai-11-bakaron-ki-bali-50492 · **Language:** Hindi
**Tags:** बस्तर दशहरा, निशा जात्रा, कमलचंद भंजदेव, छत्तीसगढ़ संस्कृति, गुड़ी मंदिर, महाअष्टमी

छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक बस्तर दशहरा में अपनी प्राचीन परंपराओं और अनूठी मान्यताओं के तहत निशा जात्रा की रस्म को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। इस विशेष रस्म को काले जादू से जुड़ी विधि भी कहा जाता है, जिसके बारे में इतिहासकार बताते हैं कि पुराने समय में राजा-महाराजा इसका निर्वाह अपने पूरे राज्य की बुरी प्रेत आत्माओं और नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा करने के लिए करते थे। इस पूरी धार्मिक प्रक्रिया के दौरान कुल 11 बकरों की बलि दिए जाने का विधान है, जिसे पूरी निष्ठा के साथ निभाया जाता है।

## गुड़ी मंदिर में आधी रात को हुआ अनुष्ठान
शहर के अनुपमा चौक के पास स्थित ऐतिहासिक गुड़ी मंदिर में निशा जात्रा की इस गोपनीय और महत्वपूर्ण रस्म को संपन्न किया गया। पंचांग और परंपरा के अनुसार महाअष्टमी और महानवमी की मध्य रात्रि के ठीक बाद इस पूजा की शुरुआत होती है। इस अवसर पर राजमहल से चलकर बस्तर राजपरिवार के तमाम सदस्य पारंपरिक गाजे-बाजे के साथ पैदल चलकर गुड़ी मंदिर पहुंचे थे, जहां विधिवत रूप से यह अनुष्ठान पूरा किया गया।

## 600 साल पुराना है इस तांत्रिक रस्म का इतिहास
बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव के मुताबिक इस विशिष्ट रस्म की शुरुआत आज से करीब 600 साल पहले हुई थी। इस तांत्रिक अनुष्ठान में पशु बलि चढ़ाकर देवी को प्रसन्न किया जाता है, ताकि मां दुर्गा या संबंधित देवी की कृपा से पूरे राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। प्राचीन काल में यह पूजा पूरी तरह से गुप्त रखी जाती थी और आम लोगों की पहुंच से दूर होती थी।

## लोकतांत्रिक व्यवस्था में बदल गया पूजा का स्वरूप
कमलचंद भंजदेव ने जानकारी साझा करते हुए बताया कि आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था आने के बाद इस पूजा का स्वरूप काफी हद तक बदल चुका है और अब इसमें सभी आम लोग भी बढ़-चढ़कर शामिल होते हैं। हम सब लोग वहां पहुंचकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं और बलि चढ़ाने की हमारी पारंपरिक प्रथा को निरंतर आगे बढ़ाते हैं। इस बलि प्रक्रिया के पूरा होने के बाद पूरे बस्तर अंचल में सुख, शांति और खुशहाली बनी रहे, बस यही मुख्य कामना इस परंपरा के पीछे होती है। आज के इस विशेष दिन पर पूरे क्षेत्र में अलग-अलग जगहों पर बलि चढ़ाए जाने का प्रावधान है। निशा जात्रा नाम के अर्थ के अनुसार ही यह पूरी परंपरा रात के ठीक 12 बजे के बाद आरंभ होती है।

## ऐसा क्यों हुआ
बस्तर दशहरा की निशा जात्रा एक सदियों पुरानी तांत्रिक परंपरा है जिसे रियासतकाल से निभाया जा रहा है। इस अनुष्ठान के पीछे कई ऐतिहासिक और धार्मिक कारण जुड़े हुए हैं।

- **ऐतिहासिक मान्यता:** प्राचीन काल में राजा-महाराजाओं द्वारा बुरी ताकतों और प्रेत आत्माओं से राज्य की रक्षा के लिए इस तांत्रिक पूजा को शुरू किया गया था।
- **देवी को प्रसन्न करना:** इस अनुष्ठान में 11 बकरों की बलि देकर देवी को प्रसन्न किया जाता है ताकि क्षेत्र पर दैवीय कृपा बनी रहे।
- **लोकतांत्रिक बदलाव:** पहले यह पूजा पूरी तरह गुप्त रखी जाती थी, लेकिन समय के साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था में अब इसमें आम लोग भी शामिल होने लगे हैं।
- **क्षेत्रीय खुशहाली:** परंपरा के जानकारों के अनुसार बलि की इस प्रक्रिया से पूरे बस्तर क्षेत्र में सुख और समृद्धि की कामना पूरी होती है।

## सवाल-जवाब

### 1. बस्तर दशहरा में निशा जात्रा की रस्म कहां पूरी की गई?
यह रस्म शहर के अनुपमा चौक के पास स्थित गुड़ी मंदिर में पूरी की गई।

### 2. निशा जात्रा की परंपरा कितने साल पुरानी है?
बस्तर राजपरिवार के अनुसार यह तांत्रिक परंपरा करीब 600 साल पुरानी है।

### 3. इस रस्म के दौरान कितने बकरों की बलि दी जाती है?
निशा जात्रा की इस विशेष परंपरा के दौरान कुल 11 बकरों की बलि दी जाती है।

### 4. यह रस्म किस समय और कब निभाई जाती है?
यह रस्म महाअष्टमी और महानवमी की आधी रात यानी रात 12 बजे के बाद निभाई जाती है।

### 5. इस अनुष्ठान में कौन शामिल हुआ था?
बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव और अन्य सदस्य गाजे-बाजे के साथ इस अनुष्ठान में शामिल हुए थे।

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