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  "type": "article",
  "title": "बस्तर की रेखा साहू ने जैविक खेती और मुर्गी पालन से बदली किस्मत, हर हफ्ते हो रही धांसू कमाई",
  "summary": "बस्तर की रहने वाली रेखा साहू ने रासायनिक उर्वरकों के दौर में जैविक खेती और मुर्गी पालन अपनाकर आत्मनिर्भरता की अनूठी मिसाल कायम की है। वह इस देसी और आधुनिक तकनीक के मेल से हर महीने हजारों रुपये की कमाई कर रही हैं।",
  "content": "बस्तर की रहने वाली रेखा साहू आज के समय में उन तमाम लोगों के लिए एक बड़ी मिसाल बन चुकी हैं जो पारंपरिक खेती से हटकर कुछ नया करना चाहते हैं। रासायनिक खेती के इस दौर में उन्होंने जैविक खेती का रास्ता चुना और अपनी मेहनत के दम पर आत्मनिर्भरता हासिल की। उनके इस साहसिक कदम ने न केवल उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारा है बल्कि क्षेत्र के दूसरे किसानों को भी एक नया रास्ता दिखाया है। वह खेती के साथ-साथ पशुपालन से जुड़े अन्य व्यवसायों को भी बखूबी संभाल रही हैं।\n\nजैविक सब्जियों और फसलों की पैदावार\nरेखा साहू अपने खेत के दस डिसमिल हिस्से में पूरी तरह से जैविक तरीके से सब्जियां उगा रही हैं। उनके खेतों में तोरई, बरबटी और करेला जैसी पौष्टिक और हरी सब्जियां लहलहा रही हैं। इन सब्जियों की बदौलत उन्हें बाजार में अच्छी मांग मिल रही है और वह हर हफ्ते 3,000 से 4,000 रुपये तक की शुद्ध कमाई कर रही हैं। सब्जियों के अलावा उन्होंने अपने खेतों में धान और मक्का जैसी मुख्य फसलें भी उगाई हैं, जिससे उनकी आय के स्रोत और अधिक मजबूत हो गए हैं।\n\nहाईटेक मल्चिंग विधि का कमाल\nबेहतर पैदावार हासिल करने के लिए रेखा साहू ने आधुनिक तकनीकों का सहारा लिया है। वह खेतों में हाईटेक मल्चिंग विधि का उपयोग करती हैं जिससे पानी की बचत होती है और खरपतवार भी नियंत्रित रहते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को शुरू करने से पहले वह खेत की दो बार अच्छी तरह जुताई करती हैं और फिर क्यारियां या बेड तैयार करती हैं। इसके बाद मल्चिंग शीट बिछाकर उसमें उचित दूरी पर गड्ढे खोदे जाते हैं और नर्सरी में तैयार किए गए स्वस्थ पौधों की रोपाई की जाती है। इस खेती में किसी भी तरह के हानिकारक केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जाता बल्कि पूरी तरह से जैविक खाद और गोबर की खाद का ही प्रयोग होता है। खास बात यह है कि ये फसलें रोपाई के लगभग ढाई महीने बाद ही पैदावार देना शुरू कर देती हैं।\n\nमुर्गी ब्रूडिंग से अतिरिक्त आमदनी\nकेवल खेती तक ही सीमित न रहते हुए रेखा साहू ने आय बढ़ाने के लिए मुर्गी ब्रूडिंग का काम भी शुरू किया है। इस कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने स्वयं सहायता समूह से 25,000 रुपये का ऋण लिया था। मुर्गी पालन और ब्रूडिंग के इस काम से उन्हें हर महीने 10,000 रुपये की अतिरिक्त आमदनी हो जाती है। अब तक वह मुर्गी ब्रूडिंग और जैविक सब्जियों की बिक्री से कुल मिलाकर 30,000 रुपये तक की कमाई कर चुकी हैं, जिससे उनके घर की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत हुई है।\n\nलोन और प्रशिक्षण की मदद\nइस पूरे सफर की शुरुआत करने के लिए रेखा साहू ने एक स्वयं सहायता समूह से 30,000 रुपये का कर्ज लिया था, जिसकी मदद से उन्होंने अपने कृषि व्यवसाय की नींव रखी। इसके अलावा उन्हें कृषि विभाग या संबंधित समूहों की तरफ से विशेष प्रशिक्षण भी दिया गया था, जिससे उन्हें आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों को समझने में आसानी हुई। आज उनका यह प्रयास रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध इस्तेमाल के बीच टिकाऊ कृषि का एक बेहतरीन मॉडल पेश करता है।\n\nइसका आप पर असर\nयह खबर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले किसानों और महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता की नई राह दिखाती है।\n\n• भारत में: कृषि से जुड़े छोटे उद्यमियों और स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को कम लागत में जैविक खेती और पशुपालन अपनाकर अपनी आय बढ़ाने की प्रेरणा मिलती है।\n• बस्तर में: स्थानीय किसानों और महिलाओं को पारंपरिक खेती के साथ मुर्गी पालन और मल्चिंग जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाकर साप्ताहिक व मासिक आमदनी बढ़ाने का व्यावहारिक मार्ग मिलता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nरासायनिक उर्वरकों के बढ़ते दुष्प्रभावों और महंगे कृषि उत्पादों के बीच टिकाऊ आजीविका की तलाश इस बदलाव का मुख्य कारण बनी।\n\n• सीधा कारण: पारंपरिक खेती में कम लागत और बेहतर मुनाफे की तलाश ने रेखा साहू को जैविक सब्जियों की खेती और मुर्गी पालन की ओर मोड़ा।\n• सहायक स्थितियां: स्वयं सहायता समूहों से आसानी से मिले ऋण और कृषि संबंधी सरकारी प्रशिक्षण ने उन्हें कम पूंजी के साथ अपना व्यवसाय शुरू करने का अवसर दिया।\n• दीर्घकालिक प्रभाव: इस तरह के देसी और वैज्ञानिक तरीकों के मेल से ग्रामीण इलाकों में पारिवारिक आय के स्रोत बढ़ते हैं और रासायनिक खेती पर निर्भरता कम होती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. रेखा साहू किस क्षेत्र की रहने वाली हैं?\nरेखा साहू छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र की रहने वाली हैं।\n\n2. वह जैविक खेती में कौन-कौन सी सब्जियां उगा रही हैं?\nवह अपने खेत के दस डिसमिल हिस्से में तोरई, बरबटी और करेला जैसी जैविक सब्जियां उगा रही हैं।\n\n3. सब्जी की खेती से उन्हें हर हफ्ते कितनी कमाई होती है?\nवह जैविक सब्जियों की बिक्री से हर हफ्ते 3,000 से 4,000 रुपये तक की कमाई करती हैं।\n\n4. व्यवसाय शुरू करने के लिए उन्होंने कितना लोन लिया था?\nउन्होंने खेती शुरू करने के लिए 30,000 रुपये और मुर्गी पालन के लिए 25,000 रुपये का लोन स्वयं सहायता समूह से लिया था।\n\n5. मुर्गी ब्रूडिंग के काम से उन्हें हर महीने कितना फायदा होता है?\nमुर्गी ब्रूडिंग के काम से उन्हें हर महीने 10,000 रुपये की अतिरिक्त आय होती है।\n\n6. फसल तैयार होने में कितना समय लगता है?\nरोपाई के बाद फसल लगभग ढाई महीने में उपज देना शुरू कर देती है।\n\n7. खेती में कौन सी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है?\nवह खेतों में हाईटेक मल्चिंग विधि का उपयोग करती हैं।\n\nप्रेरणा और सबक\nरेखा साहू की यह सफलता ग्रामीण आजीविका और महिला उद्यमिता के क्षेत्र में मजबूत सबक देती है।\n\n• सीमित संसाधनों से शुरुआत: स्वयं सहायता समूह से छोटे कर्ज लेकर भी बड़े व्यावसायिक बदलाव की नींव रखी जा सकती है।\n• विविधीकरण अपनाएं: केवल एक फसल पर निर्भर रहने के बजाय खेती के साथ मुर्गी पालन जैसे सहायक व्यवसाय जोड़कर आय बढ़ाई जा सकती है।\n• आधुनिक और पारंपरिक का मेल: मल्चिंग जैसी आधुनिक तकनीकों और जैविक खाद का उपयोग करके कम जगह में बेहतरीन पैदावार ली जा सकती है।\n• प्रशिक्षण का महत्व: किसी भी नए काम को शुरू करने से पहले उसका विधिवत प्रशिक्षण लेना सफलता की संभावनाओं को कई गुना बढ़ा देता है।",
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  "category": "छत्तीसगढ़",
  "publishedAt": "2026-09-10",
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    "जैविक खेती",
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