# संतान की दीर्घायु और प्रकृति संरक्षण का अनोखा संगम है कमरछठ, जानें इस कृषि आधारित लोकपर्व की पौराणिक कथा और पूजा परंपराएं

> छत्तीसगढ़ में भाद्रपद कृष्ण षष्ठी को मनाया जाने वाला कमरछठ पर्व मातृत्व, कृषि संस्कृति और पर्यावरण चेतना का एक विशिष्ट उदाहरण है, जहां माताएं संतान के स्वास्थ्य के लिए निर्जला व्रत रखकर सगरी पूजा करती हैं।

**Type:** article · **Category:** छत्तीसगढ़ · **Published:** 2026-09-02 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/chhattisgarh/bilaspur-aur-chhattisgarh-me-kamarchhat-parv-me-balarama-aur-chhathi-devi-ki-puja-26241 · **Language:** Hindi
**Tags:** कमरछठ, हलछठ, छत्तीसगढ़ त्योहार, बिलासपुर, सगरी पूजा, डॉ विनय पाठक, कृषि लोकपर्व, छत्तीसगढ़ी संस्कृति

बिलासपुर सहित संपूर्ण छत्तीसगढ़ राज्य में कृषि और लोक-संस्कृति का अत्यंत गहरा संबंध देखने को मिलता है। धान का कटोरा कहे जाने वाले इस क्षेत्र में मनाए जाने वाले पारंपरिक त्योहारों में ग्रामीण जीवन की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला कमरछठ पर्व इसी समृद्ध परंपरा का प्रतीक है। हलछठ, हलषष्ठी तथा हरछठ के नामों से भी प्रसिद्ध यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जल संरक्षण, वानस्पतिक संवर्धन और मातृत्व की भावना का अद्भुत समावेश देखने को मिलता है। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ विनय पाठक के अनुसार यह त्योहार भारतीय कृषि परंपरा और ग्रामीण जीवन मूल्यों का सजीव दस्तावेज है।

## कृषि संस्कृति और भगवान बलराम से जुड़ा इतिहास
भारत की बहुसंख्यक आबादी का जीवन कृषि से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है, इसलिए लोकपर्वों में खेती और पशुपालन का सम्मान स्वाभाविक रूप से शामिल रहता है। छत्तीसगढ़ में हरेली और बहुला चौथ की तरह कमरछठ का भी विशेष सांस्कृतिक स्थान है। यह पर्व पौराणिक दृष्टि से भगवान श्री कृष्ण के अग्रज बलराम से संबंधित माना जाता है। बलराम जी का मुख्य अस्त्र हल था, जिन्हें हलधर भी कहा जाता है। चूंकि पारंपरिक खेती में हल का स्थान सर्वोपरि रहा है, इसलिए इस दिन हल और कृषि साधनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। इसके साथ ही षष्ठी देवी यानी छठी मैया की पूजा-अर्चना संतान की सुरक्षा और समृद्धि के आशीर्वाद के लिए की जाती है।

## ग्वालन की पौराणिक लोककथा का नैतिक संदेश
कमरछठ के अवसर पर सुनी जाने वाली लोककथाओं में ग्वालन की कथा प्रमुखता से प्रचलित है। डॉ विनय पाठक द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार एक ग्वालन अपने परिवार का पालन-पोषण दूध बेचकर करती थी। एक बार सत्य और असत्य के आचरण से जुड़ी एक भूल के कारण उसके बच्चे की असमय मृत्यु हो गई। इसके पश्चात ग्वालन को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने छठी देवी की पूर्ण निष्ठा के साथ पूजा-अर्चना की। देवी की अनुकंपा और महिला के सच्चे प्रायश्चित के फलस्वरूप उसका मृत बालक पुनः जीवित हो उठा। यह लोककथा समाज को सत्यनिष्ठा, धर्म पालन और नैतिक आचरण का संदेश देती है।

## महुआ दातून से शुरुआत और सगरी निर्माण का विधान
कमरछठ के दिन व्रत रखने वाली महिलाएं प्रातः काल शीघ्र उठकर महुआ की दातून से अपने दांत स्वच्छ करती हैं। महुआ के पेड़ का उपयोग ग्रामीण जीवन और स्थानीय वनस्पति के साथ जनसामान्य के अटूट संबंध को प्रकट करता है। इसके पश्चात महिलाएं समूह में एकत्र होकर सगरी निर्माण की प्रक्रिया आरंभ करती हैं। सगरी के अंतर्गत भूमि पर एक छोटा सा कृत्रिम तालाब या गड्ढा तैयार किया जाता है और उसमें जल भरा जाता है। इस जलाशय के चारों ओर विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक वनस्पतियां जैसे बेर, पलाश जिसे स्थानीय भाषा में परसा कहा जाता है, और कांस के फूल लगाए जाते हैं। इन पौधों और सगरी की विधिवत पूजा करके प्रकृति के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है।

## जलस्तर और मौसम का पूर्वानुमान लगाने की परंपरा
सगरी निर्माण के पीछे केवल धार्मिक मान्यता ही नहीं, बल्कि जल संरक्षण की पारंपरिक वैज्ञानिक सोच भी निहित है। ग्रामीणों का मानना है कि पूजन के दौरान सगरी में भरे गए जल का स्तर मौसम और भूजल स्थिति का संकेत देता है। यदि दिन भर सगरी का पानी स्थिर रहता है और सूखता नहीं है, तो इसे आने वाले समय में अच्छे जलस्तर और पर्याप्त वर्षा का शुभ संकेत माना जाता है। इसके विपरीत यदि पानी तेजी से घटता है, तो इसे भविष्य में संभावित जल संकट और फसलों पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव से जोड़कर देखा जाता है। यह परंपरा लोक जीवन में पर्यावरण और जल स्रोतों के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती है।

## संतान की सेहत के लिए पुतका लगाने की अनूठी रस्म
पूजा-अर्चना संपन्न होने के पश्चात माताओं द्वारा अपने बच्चों के लिए एक विशेष पारंपरिक रस्म निभाई जाती है। इस प्रक्रिया में सफेद मिट्टी जिसे ‘छुई’ कहा जाता है, को एक स्वच्छ कपड़े में लपेटा जाता है। तत्पश्चात पानी की सहायता से एक पुतका तैयार किया जाता है। महिलाएं इस पुतका को अपने बच्चों की पीठ पर लगाती हैं। मान्यता है कि छुई मिट्टी का यह पुतका बच्चों को आरोग्य प्रदान करता है, उन्हें शारीरिक रूप से बलवान बनाता है और उनकी आयु लंबी करता है। यह रस्म माताओं के अपनी संतान के प्रति अगाध प्रेम और मंगलकामना को प्रदर्शित करती है।

## आधुनिक दौर में लोक विरासत का संरक्षण
वर्तमान वैज्ञानिक और तकनीकी युग में भी कमरछठ का महत्व कम नहीं हुआ है। बिलासपुर और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में महिलाएं आज भी संपूर्ण श्रद्धा और नियम-संयम के साथ इस व्रत का पालन करती हैं। डॉ विनय पाठक का कहना है कि यह त्योहार आध्यात्मिक आस्था के साथ-साथ सांस्कृतिक धरोहर और जल-जंगल के संरक्षण का संदेश देता है। मातृत्व, कृषि, प्रकृति और पर्यावरण के इस अनूठे समन्वय के कारण कमरछठ आज भी छत्तीसगढ़ी लोक-परंपराओं को जीवंत बनाए रखने में अपनी केंद्रीय भूमिका निभा रहा है।

## इसका आप पर असर
कमरछठ पर्व स्थानीय जल निकायों के संरक्षण, पर्यावरण जागरूकता और पारंपरिक सांस्कृतिक धरोहर को बनाए रखने में सीधा प्रभाव डालता है।

- **भारत में:** यह पर्व देश भर के पाठकों को पारंपरिक जल संरक्षण और कृषि आधारित लोक जीवन के महत्व से जोड़ता है। इससे आधुनिक समय में लुप्त हो रही पर्यावरण-अनुकूल ग्रामीण परंपराओं को समझने और अपनाने की प्रेरणा मिलती है।
- **छत्तीसगढ़ में:** छत्तीसगढ़ के निवासियों के लिए यह त्योहार सामाजिक एकजुटता, मातृशक्ति के सम्मान और स्थानीय वनस्पतियों के संरक्षण का अवसर प्रदान करता है। सगरी पूजा के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में भूजल स्तर की निगरानी और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जवाबदेही बढ़ती है।

## सवाल-जवाब

### 1. कमरछठ पर्व कब मनाया जाता है?
यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है।

### 2. कमरछठ को अन्य किन नामों से जाना जाता है?
कमरछठ को हलछठ, हलषष्ठी और हरछठ के नाम से भी जाना जाता है।

### 3. इस पर्व में सगरी का क्या महत्व है?
सगरी जमीन पर बनाया गया एक छोटा कृत्रिम तालाब होता है जिसमें पानी भरकर पौधे लगाए जाते हैं और जल संरक्षण के प्रतीक के रूप में इसकी पूजा की जाती है।

### 4. कमरछठ के दिन बच्चे की पीठ पर क्या लगाया जाता है?
सफेद मिट्टी यानी छुई को कपड़े में लपेटकर पानी से बनाया गया पुतका बच्चों की पीठ पर लगाया जाता है।

### 5. यह पर्व किस देवता से जुड़ा हुआ है?
यह पर्व मुख्य रूप से भगवान कृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम (हलधर) और छठी देवी से जुड़ा हुआ है।

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