बिलासपुर के मोहतरा में रमाबाई ने बांस शिल्प से संवारी गृहस्थी, हुनर से हर महीने हो रही बचत बिलासपुर के कोटा ब्लॉक में पारंपरिक बांस कला से जुड़ी रमाबाई धुलिया घरेलू जिम्मेदारियों के साथ हर महीने 2 हजार रुपये की बचत कर रही हैं, जबकि व्यापारी सीधे उनके घर आकर हस्तशिल्प खरीद रहे हैं। छत्तीसगढ़ में बिलासपुर जिले के कोटा ब्लॉक स्थित मोहतरा गांव की महिलाएं अपनी पुश्तैनी कारीगरी के दम पर स्वावलंबन का एक मजबूत रास्ता तैयार कर रही हैं। साधारण से दिखने वाले बांस को तराशकर उपयोगी और मनमोहक घरेलू वस्तुओं में बदलने का यह काम अब केवल शौक तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि कई ग्रामीण परिवारों की नियमित आमदनी का आधार बन चुका है। इसी गांव की रमाबाई धुलिया के लिए यह पुश्तैनी दस्तकारी परिवार के भरण-पोषण और आर्थिक स्वतंत्रता का सबसे बड़ा जरिया साबित हो रही है। अपने पारिवारिक दायित्वों को पूरा करने के साथ-साथ वह इस काम से हर महीने करीब 2 हजार रुपये की बचत भी कर पा रही हैं। पुश्तैनी हुनर को प्रशिक्षण से दिया नया रूप रमाबाई धुलिया के जीवन में बांस शिल्प कोई नया काम नहीं है। वह बचपन के दिनों से ही अपने परिवार के साथ मिलकर बांस से विभिन्न वस्तुएं तैयार करने का हुनर सीखती रही हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे इस कार्य को उन्होंने अपनी आजीविका का मुख्य साधन बनाया। बाद में गांव की गठन समिति की ओर से आयोजित विशेष प्रशिक्षण सत्रों में शामिल होकर उन्होंने अपनी कला को और अधिक परिपक्व किया। इस औपचारिक प्रशिक्षण के जरिए उन्हें उत्पादों में बारीक फिनिशिंग लाने और आधुनिक जरूरतों के अनुसार नई डिजाइन तैयार करने की समझ मिली, जिससे बाजार में उनके उत्पादों का आकर्षण काफी बढ़ गया। बांस को तराशकर उत्पाद बनाने की पेचीदा प्रक्रिया बांस के जरिए आकर्षक उत्पाद गढ़ने का सफर काफी श्रमसाध्य होता है। सबसे पहले जंगलों या हाट से उपयुक्त कच्चा बांस खरीदकर लाया जाता है। इसके उपरांत उसकी निर्धारित नाप के अनुसार कटाई और बाहरी परत की छिलाई की जाती है। बांस के रेशे लचीले बने रहें और मोड़ते समय टूटे नहीं, इसके लिए कटी हुई पट्टियों को पानी में भिगोकर रखा जाता है। जब बांस पर्याप्त रूप से मुलायम हो जाता है, तब कारीगर अपने हाथों की सूक्ष्म कारीगरी से उसे टोपी, कमंडल, गुलदस्ता, टोकनी, सूपा या पंखे का रूप देते हैं। हर वस्तु को तैयार करने में धैर्य और शारीरिक श्रम दोनों की बराबर आवश्यकता होती है। घर बैठे बिक्री और तय होती आमदनी रमाबाई और उनके परिवार द्वारा बनाए जाने वाले सामानों की मांग आसपास के इलाकों में बनी हुई है। उनके बनाए गुलदस्ते, सूपा और टुकनी जैसे सामानों के जोड़े बाजार में 400 से लेकर 700 रुपये तक के भाव में बिक जाते हैं। अच्छी बात यह है कि उन्हें बिक्री के लिए भटकना नहीं पड़ता, बल्कि बड़े व्यापारी सीधे उनके घर पहुंचकर तैयार हस्तशिल्प खरीद लेते हैं। घरेलू जरूरतों पर होने वाले सारे खर्च पूरे करने के बाद रमाबाई के पास हर महीने करीब 2 हजार रुपये की शुद्ध बचत बच जाती है, जो ग्रामीण परिवेश में वित्तीय सुरक्षा की दृष्टि से बेहद मददगार साबित हो रही है। घटते बाजार के बीच कला को बचाने की उम्मीद प्लास्टिक और मशीनी उत्पादों के बढ़ते प्रभाव के कारण पिछले कुछ वर्षों में पारंपरिक बांस शिल्प की मांग पर थोड़ा असर जरूर पड़ा है। इसके बावजूद रमाबाई का हौसला डिगा नहीं है। उन्हें विश्वास है कि प्रकृति के अनुकूल और टिकाऊ हस्तशिल्प की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं हो सकती। वह चाहती हैं कि आम नागरिक इन पारंपरिक सामानों का महत्व समझें और स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए गए उत्पादों को प्राथमिकता दें, ताकि ग्रामीण महिलाओं का यह रोजगार सुरक्षित रहे और सदियों पुरानी धरोहर जीवित बनी रहे। इसका आप पर असर यह समाचार दर्शाता है कि स्थानीय हस्तशिल्प उत्पादों की सीधी खरीदारी ग्रामीण कारीगर परिवारों की आजीविका को सीधे तौर पर सहारा देती है। • भारत में: पर्यावरण के अनुकूल बांस उत्पादों को अपनाने से पारंपरिक कारीगरों को प्लास्टिक के विकल्प के रूप में काम मिलता है। शहरी और कस्बाई उपभोक्ता स्थानीय दस्तकारों को बढ़ावा देकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में योगदान कर सकते हैं। • बिलासपुर में: मोहतरा और कोटा ब्लॉक के ग्रामीण कारीगरों से सीधे उत्पाद खरीदने पर बिचौलियों की निर्भरता कम होती है। स्थानीय निवासी 400 से 700 रुपये खर्च करके सीधे दस्तकार परिवारों को नियमित आय दिला सकते हैं। • खरीदारों के लिए: घर की सजावट और रसोई में बांस के बने पारंपरिक सामान टिकाऊ और गैर-प्लास्टिक विकल्प प्रदान करते हैं। आप सीधे कारीगरों के घरों से वाजिब दामों पर टिकाऊ हस्तशिल्प खरीद सकते हैं। • महिला कारीगरों के लिए: स्वयं सहायता और गठन समिति प्रशिक्षण से जुड़कर महिलाएं अपने हुनर को नियमित आय में बदल सकती हैं। इससे घरेलू खर्चे पूरे करने के बाद बचत का एक पक्का साधन तैयार होता है। ऐसा क्यों हुआ यह पहल ग्रामीण महिलाओं की आजीविका की जरूरत और स्थानीय प्रशिक्षण प्रयासों के समन्वय से विकसित हुई है। • पारंपरिक पारिवारिक विरासत: मोहतरा गांव में बांस शिल्प का कार्य पीढ़ियों से चला आ रहा है और परिवार बचपन से ही इसमें सक्रिय रहते हैं। रमाबाई जैसे कारीगरों ने इसी पुश्तैनी ज्ञान को अपनी नियमित आय का जरिया बनाया। • गठन समिति का प्रशिक्षण: गांव की गठन समिति द्वारा दिए गए कौशल प्रशिक्षण ने कारीगरों के उत्पादों की गुणवत्ता और फिनिशिंग को सुधारा। इससे तैयार माल का रूप-रंग सुधरा और थोक व्यापारियों का ध्यान उनकी तरफ आकर्षित हुआ। • थोक खरीदारों की सीधी पहुंच: व्यापारियों द्वारा सीधे घर आकर माल उठाने से कारीगरों का परिवहन और मंडी जाने का खर्च बच गया। इसी सीधी बिक्री व्यवस्था ने घरेलू खर्चे निकालने के बाद बचत सुनिश्चित की। सवाल-जवाब 1. रमाबाई धुलिया कहां की रहने वाली हैं और क्या काम करती हैं? रमाबाई धुलिया बिलासपुर जिले के कोटा ब्लॉक स्थित मोहतरा गांव की रहने वाली हैं और बांस शिल्प कला से विभिन्न घरेलू उत्पाद बनाती हैं। 2. बांस से कौन-कौन से प्रमुख उत्पाद बनाए जाते हैं? कारीगर टोपी, गुलदस्ता, टोकरी, कमंडल, सूपा, पंखा और घर सजाने के कई तरह के उपयोगी सामान तैयार करते हैं। 3. बांस के उत्पादों की बाजार में क्या कीमत मिलती है? गुलदस्ता, सूपा और टुकनी जैसे उत्पादों के जोड़े 400 से 700 रुपये तक के भाव में बिक जाते हैं। 4. रमाबाई इस काम से हर महीने कितनी बचत कर लेती हैं? परिवार का पूरा खर्च चलाने के बाद वह इस हस्तशिल्प के जरिए हर महीने करीब 2 हजार रुपये की बचत कर लेती हैं। 5. बांस के उत्पाद तैयार करने के लिए सामग्री को कैसे तैयार किया जाता है? कच्चा बांस खरीदकर उसकी कटाई और छिलाई की जाती है, फिर उसे पानी में भिगोकर मुलायम किया जाता है ताकि वह मनचाहा आकार ले सके। 6. रमाबाई ने अपनी शिल्प कला को बेहतर बनाने के लिए क्या कदम उठाया? उन्होंने गांव की गठन समिति द्वारा आयोजित प्रशिक्षण में भाग लेकर अपनी कला और तकनीकों को निखारा। प्रेरणा और सबक रमाबाई धुलिया की मेहनत साबित करती है कि पुश्तैनी कला को अगर लगन और सही प्रशिक्षण से निखारा जाए, तो वह आर्थिक मजबूती का मजबूत स्तंभ बन सकती है। • हुनर को सीखने की तत्परता: बचपन से काम जानने के बावजूद रमाबाई ने गांव की गठन समिति से प्रशिक्षण लेकर अपनी कला को और बेहतर बनाया। नई सीख अपनाने से उत्पादों की बाजार में मांग और कीमत दोनों बढ़ी। • घरेलू स्तर पर वित्तीय अनुशासन: सीमित संसाधनों में काम करते हुए भी परिवार का खर्च निकालना और हर महीने 2 हजार रुपये बचाना उनकी वित्तीय समझ को दर्शाता है। नियमित छोटी बचत भी भविष्य की सुरक्षा का बड़ा संबल बन जाती है। • कठिन हालात में सकारात्मक दृष्टिकोण: बाजार में मांग घटने के बावजूद रमाबाई ने निराशा की जगह अपनी कला पर भरोसा रखा और उपभोक्ताओं से पारंपरिक शिल्प को अपनाने का आग्रह किया। अपनी पहचान और काम पर गर्व करना ही आत्मनिर्भरता की असल नींव है। https://trendkia.com/chhattisgarh/bilaspur-ke-mohatra-men-ramabai-ne-bansa-shilpa-se-snvari-grihasthi-hunara-se-hara-mahine-ho-rahi-bachata-56422 TrendKia — Har trend, sabse pehle.