# बिलासपुर में चार दशकों से जारी है बंगाल के पाल परिवार की कला, अब एआई तस्वीरों से मूर्ति गढ़ने की नई चुनौती

> छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में बंगाल से आया पाल परिवार पिछले 41 वर्षों से मां दुर्गा की प्रतिमाएं बना रहा है, जहां इस बार तैयार 100 में से 97 मूर्तियां बुक हो चुकी हैं।

**Type:** article · **Category:** छत्तीसगढ़ · **Published:** 2026-10-09 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/chhattisgarh/bilaspur-men-chara-dashakon-se-jari-hai-bengal-ke-pal-parivara-ki-kala-aba-ai-tasviron-se-murti-garhane-ki-nai-chunauti-45045 · **Language:** Hindi
**Tags:** बिलासपुर, दुर्गा पूजा, नवरात्रि, मूर्तिकार, पाल परिवार, प्रतिमा निर्माण, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में शारदीय नवरात्रि पर्व को लेकर उत्सव का माहौल गहराने लगा है। गणेश उत्सव का समापन होते ही स्थानीय मूर्तिकार मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। इस पूरे आयोजन में बंगाल से ताल्लुक रखने वाले पाल परिवार की शिल्प कला का अहम योगदान है, जो पिछले 41 वर्षों से लगातार बिलासपुर की धरती पर अपनी पारंपरिक मूर्तिकला को संजोए हुए है। कभी महज एक से दो हजार रुपये में तैयार होने वाली ये प्रतिमाएं आज बढ़ती लागत, बेहतर नक्काशी और बाजार की भारी मांग के कारण 80 हजार रुपये तक के मूल्य वर्ग में पहुंच चुकी हैं। इस कला केंद्र से न सिर्फ एक परिवार की आजीविका चलती है, बल्कि करीब 15 कुशल कारीगरों सहित अनेक परिवारों का पालन-पोषण भी इसी काम पर निर्भर है। इस वर्ष कार्यशाला में लगभग 100 प्रतिमाएं तैयार की गई हैं, जिनमें से 97 प्रतिमाओं का अग्रिम पंजीकरण पहले ही पूरा हो चुका है।

## चार दशक पुराना सफर और मिशन हॉस्पिटल रोड का शिल्प केंद्र
मूर्तिकार शीतल पाल के अनुसार, उनके बड़े भाई राम प्रसाद पाल बीते 41 वर्षों से बिलासपुर में मूर्ति निर्माण के कार्य से जुड़े हुए हैं। बंगाल से बिलासपुर आकर मूर्ति निर्माण की नींव रखने वाले शुरुआती कारीगरों में राम प्रसाद पाल का नाम बेहद सम्मान से लिया जाता है। वहीं शीतल पाल खुद पिछले करीब 21 वर्षों से पुराना लॉ कॉलेज, मिशन हॉस्पिटल रोड स्थित अपने शिल्प केंद्र 'मां दक्षिणी स्त्री शिल्पाय' में नियमित रूप से मूर्तियां तराश रहे हैं। उन्होंने महज 16 वर्ष की अल्पायु में ही इस हुनर को अपना लिया था और अपने लंबे अनुभव में सैकड़ों प्रतिमाओं को साकार रूप दे चुके हैं।

## सीमित आयोजनों से भव्य पंडालों तक का विस्तार
शीतल पाल बताते हैं कि चार दशक पहले बिलासपुर में दुर्गा पूजा का स्वरूप बेहद सीमित हुआ करता था। उस दौर में पूरे शहर के भीतर केवल एक, दो या अधिक से अधिक तीन-चार स्थानों पर ही मां दुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित की जाती थीं। समय के साथ शहर का सांस्कृतिक परिवेश बदला और आज बिलासपुर सहित आसपास के तमाम इलाकों में जगह-जगह भव्य दुर्गा पूजा समितियों द्वारा बड़े पैमाने पर उत्सव का आयोजन किया जा रहा है। सार्वजनिक पंडालों की संख्या में हुई इस अप्रत्याशित वृद्धि ने मूर्तियों की मांग को भी कई गुना बढ़ा दिया है।

## बढ़ती महंगाई और लागत का गणित
जब पाल परिवार ने करीब 41 वर्ष पहले बिलासपुर में यह काम शुरू किया था, तब दुर्गा प्रतिमाएं लगभग 1000 रुपये से लेकर 1200 रुपये तक में आसानी से उपलब्ध हो जाती थीं। आज समय के साथ कच्ची मिट्टी, विशेष रंगों, सजावटी वस्त्रों, कृत्रिम आभूषणों और निर्माण में लगने वाली अन्य सामग्रियों के दाम आसमान छू रहे हैं। परिणामस्वरूप, मौजूदा सत्र में उनके कारखाने में मूर्तियों की शुरुआती कीमत 10 हजार रुपये से शुरू होकर लगभग 80 हजार रुपये तक पहुंच चुकी है।

## 15 कारीगरों का सामूहिक प्रयास और आजीविका
शुरुआती वर्षों में सीमित मांग के चलते कम संख्या में कारीगर मिलकर सारा काम संभाल लेते थे। अब पंडालों की विशाल संख्या को देखते हुए कार्यशाला में कार्यबल का विस्तार करना पड़ा है। वर्तमान में शीतल पाल और उनके दो भाइयों के अलावा लगभग 15 अन्य हुनरमंद कारीगर दिन-रात काम कर रहे हैं। नवरात्रि के इस मौसमी काम से सीधे तौर पर कई कामगार परिवारों का आर्थिक संबल जुड़ा हुआ है, जिससे उनके घरों का चूल्हा जलता है।

## एआई डिजाइनों से मूर्ति तराशने की नई तकनीकी चुनौती
इस वर्ष कारीगरों के सामने एक बिल्कुल अनूठी और जटिल चुनौती सामने आई है। ग्राहक अपने मोबाइल फोन और एआई टूल्स की मदद से देवी के नए चेहरे और जटिल डिजाइन तैयार करवाकर ला रहे हैं और उसी के अनुरूप प्रतिमा गढ़ने की जिद करते हैं। शीतल पाल का कहना है कि एआई से बनी डिजिटल तस्वीरों की बारीक रेखाओं और जटिल भाव-भंगिमाओं को मिट्टी में हूबहू ढालना पारंपरिक तरीकों से कहीं अधिक कठिन और श्रमसाध्य है। उनके आकलन के अनुसार, यदि किसी मानक मूर्ति का सामान्य मूल्य 80 हजार रुपये होता है, तो एआई द्वारा दिए गए पेचीदा डिजाइन के हिसाब से उसे तैयार करने में अतिरिक्त समय, हुनर और सामग्री के चलते कुल लागत 1 लाख 10 हजार रुपये तक पहुंच सकती है।

## 100 में से 97 प्रतिमाएं बुक, अच्छे कारोबार की उम्मीद
पाल परिवार ने आगामी नवरात्रि के लिए कुल 100 प्रतिमाओं का निर्माण किया है। इनमें से 97 प्रतिमाओं की बुकिंग भक्तों और पूजा समितियों द्वारा पूरी की जा चुकी है, जबकि केवल तीन प्रतिमाएं ही अभी शेष बची हैं। कारीगरों को पूरा भरोसा है कि नवरात्रि के पहले दिन तक बाकी बची प्रतिमाएं भी बिक जाएंगी। गणेश उत्सव के दौरान कुछ प्रतिमाओं के न बिक पाने के कारण कारीगरों को मामूली वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा था, लेकिन दुर्गा पूजा के मौजूदा रुझान को देखकर शिल्पकार काफी उत्साहित हैं।

## इसका आप पर असर
बिलासपुर में तैयार हो रही मूर्तियों की बढ़ती लागत और नए डिजाइन ट्रेंड्स का सीधा असर स्थानीय पूजा समितियों और उत्सव के आयोजकों पर पड़ रहा है।

- **बिलासपुर में:** शहर की पूजा समितियों को मूर्तियों के लिए 10 हजार से लेकर 80 हजार रुपये तक का बजट रखना पड़ रहा है। एआई आधारित जटिल आकृतियों की मांग करने पर यह खर्च 1 लाख 10 हजार रुपये तक जा सकता है।
- **कारीगर परिवारों के लिए:** इस कार्यशाला में काम कर रहे करीब 15 कारीगरों और उनके परिवारों को नवरात्रि के इस सीजन से सीधा रोजगार मिलता है। 97 मूर्तियों की अग्रिम बिक्री से इन कारीगरों को गणेश उत्सव में हुए घाटे से उबरने में मदद मिलेगी।
- **आयोजकों की अग्रिम तैयारी:** 100 में से 97 मूर्तियां पहले ही बुक हो जाने से साफ है कि देरी से आने वाली समितियों को मनपसंद मूर्ति मिलने में मुश्किल हो सकती है। जो समितियां अभी तक मूर्ति तय नहीं कर पाई हैं, उन्हें बची हुई 3 मूर्तियों में से ही चयन करना होगा।
- **त्योहारी बजट पर असर:** मिट्टी, रंग और आभूषणों की बढ़ी कीमतों के चलते समितियों को अपने चंदे और खर्च का प्रबंधन पहले से अधिक सतर्कता से करना होगा। इससे पूरे त्योहारी बजट में सजावट और मंच व्यवस्था पर भी पुनर्विचार करना पड़ सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
बिलासपुर में चार दशकों के भीतर दुर्गा प्रतिमाओं की मांग और उनके स्वरूप में आए व्यापक बदलाव के पीछे कई सांस्कृतिक और आर्थिक कारण मौजूद हैं।

- **पंडाल संस्कृति का विस्तार:** चार दशक पहले शहर में केवल एक से चार स्थानों पर ही दुर्गा पूजा होती थी, लेकिन अब कई नई सार्वजनिक समितियां बन चुकी हैं। इस प्रसार के कारण मूर्तियों की मांग और उत्पादन का दायरा व्यापक स्तर पर बढ़ गया है।
- **कच्चे माल की बढ़ती लागत:** मिट्टी, पेंट, परिधान और आभूषणों की कीमतों में भारी उछाल के चलते मूर्तियों का न्यूनतम मूल्य 1000 रुपये से बढ़कर 10 हजार से 80 हजार रुपये तक पहुंच गया है। इन बढ़ी हुई लागतों ने कारीगरों को अपने उत्पाद के दाम बढ़ाने पर मजबूर किया है।
- **डिजिटल तकनीक का प्रभाव:** ग्राहकों द्वारा मोबाइल और एआई से निर्मित चित्रों को मूर्ति में ढालने की मांग के कारण कारीगरों का श्रम और समय काफी बढ़ गया है। यह जटिलता परंपरागत मूर्तिकला के निर्माण समय और लागत को सीधे तौर पर बढ़ा रही है।

## सवाल-जवाब

### 1. बिलासपुर में पाल परिवार कितने वर्षों से मां दुर्गा की प्रतिमाएं बना रहा है?
पाल परिवार पिछले 41 वर्षों से बिलासपुर में मां दुर्गा की प्रतिमाएं तैयार कर रहा है।

### 2. पाल परिवार का मूर्तिकला केंद्र शहर में किस स्थान पर स्थित है?
यह केंद्र बिलासपुर के पुराना लॉ कॉलेज, मिशन हॉस्पिटल रोड पर 'मां दक्षिणी स्त्री शिल्पाय' के नाम से स्थित है।

### 3. इस वर्ष मूर्तियों की कीमत किस रेंज में तय की गई है?
इस बार मूर्तियों की शुरुआती कीमत 10 हजार रुपये है और यह बढ़कर 80 हजार रुपये तक जाती है।

### 4. इस सीजन में कितनी प्रतिमाएं तैयार की गई हैं और कितनी बुक हो चुकी हैं?
कुल 100 प्रतिमाएं तैयार की गई हैं, जिनमें से 97 प्रतिमाओं की अग्रिम बुकिंग पूरी हो चुकी है।

### 5. एआई से डिजाइन की गई मूर्तियों को बनाने में क्या अनुमानित लागत आ सकती है?
एआई के जटिल डिजाइनों के अनुसार मूर्ति तैयार करने में करीब 1 लाख 10 हजार रुपये तक की लागत और मेहनत लग सकती है।

### 6. इस कार्यशाला में कुल कितने कारीगर काम कर रहे हैं?
कार्यशाला में शीतल पाल और उनके दो भाइयों के अलावा लगभग 15 अन्य कारीगर काम में जुटे हैं।

## प्रेरणा और सबक
बंगाल से आकर बिलासपुर में अपनी पहचान बनाने वाले पाल परिवार का सफर लगन और कला के प्रति समर्पण की मिसाल पेश करता है।

- **विरासत और निरंतरता:** कठिन परिस्थितियों और महंगाई के बावजूद चार दशकों से पारंपरिक शिल्प को जीवित रखना सिखाता है कि निरंतर प्रयास से ही साख बनती है।
- **कम उम्र में हुनर साधना:** शीतल पाल ने महज 16 वर्ष की उम्र में काम शुरू कर महारत हासिल की, जो यह साबित करता है कि किसी भी कला को साधने के लिए शुरुआती समर्पण आवश्यक है।
- **सामूहिक प्रगति:** एक परिवार के काम से 15 अन्य कारीगरों को आजीविका देना यह दिखाता है कि उद्यमशीलता से पूरे समाज को सहारा मिलता है।
- **नई तकनीक का सामना:** एआई और डिजिटल चुनौतियों को नकारने के बजाय उन्हें अपनाना सिखाता है कि बदलते दौर के साथ कला को भी ढालना पड़ता है।

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