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  "type": "article",
  "title": "बिलासपुर में कस्टोडियल डेथ पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, मजदूर महिला की लड़ाई पर दिए 25 लाख रुपये और सीबीआई जांच के निर्देश",
  "summary": "छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में पुलिस हिरासत में पति की मौत के बाद खेतों में मजदूरी करने वाली लेहरा बाई ने सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी जंग लड़ी, जहां अदालत ने 25 लाख रुपये अंतरिम राहत और सीबीआई जांच का आदेश दिया।",
  "content": "छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में रहने वाली एक दिहाड़ी मजदूर महिला ने अपने पति की पुलिस हिरासत में हुई मौत के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़कर देश की सर्वोच्च अदालत से इंसाफ हासिल किया है। बिलासपुर जिले के मोह्रा गांव की रहने वाली पैंतीस वर्षीय लेहरा बाई कभी औपचारिक शिक्षा के लिए स्कूल नहीं जा सकीं। वह अपने परिवार का पेट पालने और दो नाबालिग बेटियों की परवरिश के लिए खेतों में मजदूरी करती हैं, जहां उन्हें रोजाना करीब 300 रुपये मजदूरी मिलती है और वह भी हर दिन काम उपलब्ध नहीं होता। इसके बावजूद उन्होंने व्यवस्था के सामने घुटने टेकने के बजाय अपने पति की मौत के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा दिलाने की ठान ली और इस मामले को देश की सबसे बड़ी अदालत की चौखट तक ले गईं।\n\nशराब जब्ती का आरोप और पुलिस हिरासत की घटना\nयह पूरा मामला जनवरी 2024 में शुरू हुआ था। मोह्रा गांव में 18 जनवरी 2024 को सिपत थाने की पुलिस ने लेहरा बाई के 34 वर्षीय पति श्रवण सूर्यवंशी तामरे को उनके आवास से गिरफ्तार कर लिया था। पुलिस की ओर से उन पर छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत अवैध महुआ शराब रखने का मुकदमा दर्ज किया गया था। पुलिस के दावों के अनुसार, उनके पास से 6 लीटर महुआ शराब बरामद की गई थी, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 1200 रुपये बताई गई थी। लेहरा बाई के अनुसार पुलिस दल उनके पति को जबरन अपने वाहन में बैठाकर ले गया था। उस वक्त परिवार को लगा था कि सामान्य मामलों की तरह पूछताछ या औपचारिक कार्रवाई के बाद वह एक या दो दिन के भीतर घर लौट आएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।\n\nअस्पताल में भर्ती और पोस्टमार्टम के खुलासे\nगिरफ्तारी के तीन दिन बाद, यानी 21 जनवरी की देर रात को परिजनों को सूचना दी गई कि श्रवण की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज अस्पताल में दाखिल कराया गया है। सूचना मिलते ही परिजन तुरंत अस्पताल पहुंचे, लेकिन उनका आरोप है कि वहां तैनात पुलिसकर्मियों ने उन्हें श्रवण से मिलने नहीं दिया। कुछ ही समय बाद परिजनों को श्रवण की मौत की दुखद खबर दी गई। चिकित्सालय के औपचारिक दस्तावेजों में मौत का समय 22 जनवरी की सुबह 6 बजे दर्ज किया गया। बाद में आई पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने मामले को पूरी तरह संदिग्ध बना दिया। रिपोर्ट में साफ उल्लेख था कि सिर में लगी गंभीर चोट और उससे पैदा हुई शारीरिक जटिलताओं की वजह से कार्डियो-रेस्पिरेटरी अरेस्ट हुआ। इसके अलावा शव परीक्षण में शरीर पर कई अन्य चोटों के निशान भी दर्ज किए गए थे।\n\nहाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक की कानूनी जंग\nश्रवण की मौत के बाद अधिवक्ता राजीव कुमार दुबे ने लेहरा बाई की बेबसी को देखते हुए बिना कोई फीस लिए उनका मुकदमा लड़ने का फैसला किया। अगस्त 2024 में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में इस मामले को लेकर याचिका दायर की गई। दिसंबर 2024 में हाई कोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही स्वीकार करते हुए लेहरा बाई को एक लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। हालांकि, लेहरा बाई ने इस मामूली राशि को न्याय मानने से इनकार कर दिया और इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की।\n\nसुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट द्वारा तय किए गए मुआवजे को बेहद अपर्याप्त करार दिया। पीठ ने इस बात पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की कि हिरासत में एक नागरिक की जान चले जाने के बावजूद दोषी अधिकारियों के खिलाफ कोई प्रभावी दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई थी। सर्वोच्च अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह पीड़िता को तुरंत 25 लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा अदा करे।\n\nशीर्ष अधिकारियों की भूमिका पर अदालत की फटकार\nसुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकरण में छत्तीसगढ़ के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), महानिदेशक जेल और प्रमुख सचिव (गृह) के आचरण पर बेहद तल्ख टिप्पणियां कीं। शीर्ष अधिकारियों द्वारा न्यायिक जांच रिपोर्ट की जानकारी न होने की दलील को अदालत ने पूरी तरह अस्वीकार्य माना। अदालत ने तत्कालीन डीजीपी के बयान को झूठा और निंदनीय बताया। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में प्रशासनिक ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जा सकती। इसके साथ ही पीठ ने मामले की निष्पक्ष जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने और जिम्मेदार अधिकारियों पर आपराधिक कार्रवाई करने का आदेश दिया। 13 अक्टूबर की सुनवाई के दौरान अदालत ने सीबीआई को जांच पूरी करने के लिए तीन महीने की अतिरिक्त मोहलत दी है, और इस मामले की अगली सुनवाई 2 फरवरी 2027 के लिए निर्धारित की गई है।\n\nपरिवार के अधूरे सपने और आगे की राह\nलेहरा बाई पर अब अपनी दो बेटियों, तेरह वर्षीय संध्या और ग्यारह वर्षीय साक्षी, के लालन-पालन का पूरा जिम्मा है। लेहरा बताती हैं कि उनके पति बेटियों की पढ़ाई को लेकर बेहद गंभीर थे और उनका सपना था कि दोनों बेटियां आगे चलकर डॉक्टर या कलेक्टर बनकर परिवार का नाम रोशन करें। पति के चले जाने के बाद से घर में गंभीर आर्थिक संकट बना हुआ है। इस बीच श्रवण के पिता अमृतलाल ने भी अदालत द्वारा दिए जाने वाले मुआवजे में हिस्सेदारी की मांग उठाई है। हालांकि, लेहरा बाई का कहना है कि उनकी प्राथमिक लड़ाई पैसों के लिए नहीं बल्कि न्याय के लिए थी, और अब दोषियों को कानून के तहत क्या सजा मिलती है, यह देखना प्रशासन और न्यायपालिका का काम है।\n\nइसका आप पर असर\nयह फैसला हिरासत में हिंसा के मामलों में पुलिस जवाबदेही और पीड़ितों को मिलने वाले मुआवजे के मानकों को मजबूत करता है।\n\n• भारत में: यह आदेश देशभर में कस्टोडियल डेथ के मामलों में एक लाख जैसी मामूली मुआवजा राशि को खारिज कर पीड़ितों को सम्मानजनक अंतरिम राहत दिलाने की मिसाल पेश करता है। नागरिकों के लिए यह स्पष्ट संदेश है कि शीर्ष अधिकारियों की लापरवाही पर भी सीधे उच्चतम न्यायालय में जवाबदेही तय कराई जा सकती है।\n• बिलासपुर और छत्तीसगढ़ में: राज्य सरकार को अब पीड़िता को 25 लाख रुपये की अंतरिम राशि का भुगतान करना होगा, जिससे थाने स्तर पर आबकारी मामलों में होने वाली मनमानी पर लगाम लगेगी। स्थानीय नागरिकों और वकीलों के लिए यह मामला साबित करता है कि निष्पक्ष कानूनी सहायता से पुलिस ज्यादतियों के खिलाफ प्रभावी पैरवी संभव है।\n• सीबीआई जांच का दायरा: मामले की जांच स्थानीय पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंपे जाने से घटना में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ स्वतंत्र आपराधिक मुकदमे की राह खुली है। इससे जिले के पुलिस प्रशासन में हिरासत नियमों के सख्त पालन का दबाव बनेगा।\n• पीड़ित परिवार का भविष्य: मुआवजे के आदेश से मजदूरी पर निर्भर दोनों नाबालिग बेटियों की शिक्षा और आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी। हालांकि परिवार के भीतर मुआवजे के बंटवारे को लेकर उठे विवाद का समाधान कानूनी प्रक्रियाओं के तहत होना बाकी है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह कानूनी और प्रशासनिक हस्तक्षेप पुलिस हिरासत में एक व्यक्ति की संदिग्ध मौत, अपर्याप्त प्रारंभिक मुआवजे और शीर्ष अधिकारियों द्वारा की गई लापरवाही की वजह से हुआ।\n\n• हिरासत में मौत और चोटें: श्रवण सूर्यवंशी को 6 लीटर महुआ शराब रखने के आरोप में पकड़ा गया था, लेकिन तीन दिन बाद ही अस्पताल में उनकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम परीक्षण में सिर में गंभीर चोट और शरीर पर कई घावों का खुलासा हुआ, जिससे पुलिस प्रताड़ना की आशंका पुख्ता हुई।\n• हाई कोर्ट के आदेश पर असंतोष: दिसंबर 2024 में हाई कोर्ट ने केवल एक लाख रुपये का मुआवजा दिया, जिसे परिवार ने नाकाफी माना। इस मामूली राशि ने लेहरा बाई को सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने के लिए प्रेरित किया।\n• अधिकारियों की घोर लापरवाही: तत्कालीन डीजीपी, डीजी जेल और गृह सचिव ने न्यायिक जांच की जानकारी न होने का दावा किया, जिसे शीर्ष अदालत ने सरासर झूठा और अस्वीकार्य माना। इस प्रशासनिक लीपापोती के कारण अदालत को सीबीआई जांच का आदेश देना पड़ा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. श्रवण सूर्यवंशी तामरे को पुलिस ने किस मामले में गिरफ्तार किया था?\nउन्हें 18 जनवरी 2024 को सिपत थाना पुलिस ने छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत 6 लीटर महुआ शराब रखने के आरोप में गिरफ्तार किया था।\n\n2. श्रवण की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का क्या कारण सामने आया?\nपोस्टमार्टम रिपोर्ट में सिर पर लगी गंभीर चोट और उससे जुड़ी जटिलताओं के चलते कार्डियो-रेस्पिरेटरी अरेस्ट को मौत का कारण बताया गया, साथ ही शरीर पर अन्य चोटों का भी जिक्र था।\n\n3. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क्या अहम फैसला सुनाया?\nसुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को 25 लाख रुपये अंतरिम मुआवजा देने का आदेश दिया और मामले की निष्पक्ष जांच सीबीआई को सौंपते हुए जिम्मेदार अधिकारियों पर आपराधिक कार्रवाई करने को कहा।\n\n4. सीबीआई को जांच के लिए कितना समय दिया गया है और अगली सुनवाई कब होगी?\n13 अक्टूबर की सुनवाई में सीबीआई को जांच पूरी करने के लिए तीन महीने का अतिरिक्त समय मिला है, और मामले की अगली सुनवाई 2 फरवरी 2027 को तय की गई है।\n\nप्रेरणा और सबक\nलेहरा बाई का संघर्ष यह साबित करता है कि संसाधनों और औपचारिक शिक्षा के अभाव के बावजूद अदम्य साहस से व्यवस्था को जवाबदेह बनाया जा सकता है।\n\n• निडर संकल्प: खेतों में 300 रुपये की दिहाड़ी करने वाली महिला ने राज्य के शीर्ष पुलिस तंत्र से डरे बिना अदालत का दरवाजा खटखटाया। इससे सीख मिलती है कि न्याय की चाहत में सामाजिक या आर्थिक कमजोरी कभी बाधा नहीं बननी चाहिए।\n• गलत समझौतों को अस्वीकार करना: हाई कोर्ट द्वारा एक लाख रुपये का मुआवजा तय किए जाने के बाद भी उन्होंने इसे स्वीकार करने के बजाय सर्वोच्च अदालत तक लड़ाई जारी रखी। यह सिखाता है कि आत्मसम्मान और वास्तविक न्याय के आगे किसी भी आधे-अधूरे समझौते से बचना चाहिए।\n• निःस्वार्थ कानूनी सहयोग का महत्व: वकील द्वारा बिना किसी फीस के मुकदमा लड़ना यह दर्शाता है कि कमजोर वर्गों को सही कानूनी मार्गदर्शन मिले तो सबसे ताकतवर तंत्र से भी इंसाफ हासिल किया जा सकता है।",
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  "category": "छत्तीसगढ़",
  "publishedAt": "2026-10-26",
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