बिलासपुर में मानसून आते ही बढ़ा पशुओं पर टिक का प्रकोप, जानलेवा बीमारियों से बचाव के लिए पशु चिकित्सकों ने जारी की गाइडलाइन मानसून की शुरुआत के साथ बिलासपुर जिले में मवेशियों और पालतू जानवरों पर किलिनी तथा जूएं का हमला तेज हो गया है। पशु चिकित्सक डॉ. राम ओत्तलवार ने खून की कमी, बेबसियोसिस और थेलेरियोसिस जैसी घातक बीमारियों से बचाव के लिए महत्वपूर्ण सावधानियों की सलाह दी है। मानसून का आगमन होते ही पशुपालकों और पालतू जानवरों के मालिकों की चिंताएं बढ़ जाती हैं। बिलासपुर जिला पशु चिकित्सालय के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. राम ओत्तलवार के अनुसार, बारिश के दिनों में पशुओं के शरीर पर टिक (किलिनी या जूएं) जैसे बाह्य परजीवियों का प्रकोप काफी तेजी से फैलने लगता है। यह समस्या न केवल मवेशियों के स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचाती है, बल्कि सही समय पर इलाज न मिलने पर जानवरों के लिए जानलेवा भी साबित हो सकती है। कुत्ते, बकरी, गाय और भैंस जैसे जीव इस संक्रमण की चपेट में आसानी से आ जाते हैं। यह परजीवी एक जानवर से दूसरे जानवर में तेजी से फैलते हैं और उनका निरंतर खून चूसकर उन्हें बेहद कमजोर बना देते हैं। परजीवियों का तेजी से फैलाव और मौसम का असर मौसम में बदलाव का इन परजीवियों के जीवन चक्र पर सीधा प्रभाव पड़ता है। डॉ. राम ओत्तलवार ने स्पष्ट किया कि अत्यधिक गर्मी के महीनों में टिक और अन्य बाह्य कीटों का प्रजनन चक्र काफी तीव्र हो जाता है। इसके बाद जैसे ही बारिश की पहली फुहारें पड़ती हैं और नमी बढ़ती है, इनकी संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी दर्ज की जाती है। यह कीट सिर्फ पशुओं के शरीर पर ही नहीं रहते, बल्कि पशुशाला की दीवारों की दरारों, फर्श के नुकीले कोनों, आसपास उगी घास, झाड़ियों और पेड़-पौधों में भी बड़ी संख्या में छिपे रहते हैं। जैसे ही कोई जानवर इन जगहों के संपर्क में आता है, यह परजीवी तुरंत उनके शरीर पर चढ़ जाते हैं और खून चूसना शुरू कर देते हैं। खून की कमी से लेकर जानलेवा बीमारियों का जोखिम पशुओं के शरीर से लगातार खून चूसने के कारण उनमें कई तरह की गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो जाती हैं। शुरुआती दौर में जानवर में खून की कमी (एनेमिया) और शारीरिक सुस्ती देखी जाती है। संक्रमण लंबे समय तक बने रहने पर पशु को रुक-रुक कर या लगातार तेज बुखार आने लगता है। इतना ही नहीं, यह टिक कई खतरनाक संक्रामक बीमारियों के प्रमुख वाहक भी होते हैं। गाय और भैंस में बेबसियोसिस तथा थेलेरियोसिस जैसी गंभीर बीमारियों का मुख्य कारण यही किलिनी बनती हैं। यदि समय रहते लक्षणों की पहचान कर उचित डॉक्टरी चिकित्सा न दी जाए, तो मवेशी की जान भी जा सकती है। इसलिए पशुपालकों को बुखार, कमजोरी और भूख में कमी जैसे लक्षणों पर लगातार निगरानी रखनी चाहिए। चिकित्सकीय इलाज और बाजार में उपलब्ध विकल्प टिक नियंत्रण के लिए वर्तमान में आधुनिक चिकित्सा पद्धति के तहत कई प्रभावी साधन उपलब्ध हैं। पशु चिकित्सा विशेषज्ञ की देखरेख में विभिन्न प्रकार की गोलियां, स्प्रे, विशेष साबुन, दवाइयां और टीके इस्तेमाल किए जा सकते हैं। विशेष रूप से कुत्तों के लिए एंटी-टिक स्प्रे और सामयिक दवाएं काफी असरदार साबित होती हैं। यह दवाएं पशुओं को लंबी अवधि तक परजीवियों के हमले से सुरक्षा प्रदान करती हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि टिक का दोबारा हमला रोकने के लिए एक निश्चित समय अंतराल पर नियमित रूप से उपचार दोहराना बेहद आवश्यक होता है, ताकि नए जन्मे कीटों को भी खत्म किया जा सके। पशुशाला और आसपास के माहौल का उपचार पशु चिकित्सकों का स्पष्ट कहना है कि केवल जानवर के शरीर पर दवा लगाने से इस समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं है। जब तक पशुओं के रहने के स्थान को संक्रमण मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक यह कीट दोबारा हमला करते रहेंगे। दीवारों की दरारों, फर्श के कोनों और पशुशाला के आसपास के पेड़-पौधों पर कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करना अत्यंत जरूरी है। इसके लिए साइपरमेथ्रिन या डेल्टामेथ्रिन जैसे प्रमाणित कीट नियंत्रक रसायनों का उपयोग किया जाना चाहिए। इन रसायनों का इस्तेमाल करते समय विशेषज्ञ की सलाह और पैकेज पर लिखे निर्देशों का पूरी तरह पालन करना अनिवार्य है। रासायनिक दवाओं के उपयोग में सावधानियां और घरेलू उपाय परजीवी नाशक दवाएं मूल रूप से जहरीले रसायनों से बनी होती हैं, इसलिए इनके उपयोग के दौरान अत्यधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। डॉ. ओत्तलवार ने चेतावनी दी है कि दवा लगाने के बाद पशु को अपने शरीर या दवा लगे स्थान को चाटने न दें। यदि यह रसायन मुंह के रास्ते जानवर के पेट में चला जाता है, तो इससे विषाक्तता (पॉइजनिंग) हो सकती है, जो पशु के लिए जानलेवा बन सकती है। दवा की सटीक खुराक और लगाने का तरीका हमेशा नजदीकी पशु चिकित्सक से पूछकर ही तय करना चाहिए। इसके अलावा, कुछ पशुपालक पारंपरिक घरेलू उपाय के तौर पर नीम के पत्तों के घोल का उपयोग करते हैं। हालांकि नीम में प्राकृतिक कीट रोधी गुण होते हैं, लेकिन चिकित्सकीय दृष्टिकोण से इसका प्रभाव रासायनिक दवाओं की तुलना में काफी सीमित और धीमा होता है। इसलिए भारी संक्रमण की स्थिति में केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय वैज्ञानिक दवाओं का चयन करना बेहतर होता है। यदि किसी पशु में अत्यधिक किलिनी दिखें, या उसे लगातार बुखार और कमजोरी रहे, तो बिना देर किए जिला पशु चिकित्सालय या निकटतम पशु स्वास्थ्य केंद्र से संपर्क करना चाहिए। इसका आप पर असर मानसून में परजीवियों का प्रकोप पशुपालकों और पेट पेरेंट्स की जेब और पशुओं के स्वास्थ्य दोनों पर सीधा असर डालता है। • भारत में: बारिश के मौसम में देश भर के ग्रामीण इलाकों में पशुओं में खून की कमी और बीमारियों के मामले बढ़ जाते हैं। समय पर बचाव की दवाएं अपनाकर किसान मवेशियों की मौत और दूध उत्पादन में होने वाले नुकसान से बच सकते हैं। • बिलासपुर में: जिला पशु चिकित्सालय में पशुओं के इलाज और किलिनी रोधी दवाओं के परामर्श की विशेष सुविधा उपलब्ध कराई गई है। स्थानीय पशुपालक नजदीकी पशु स्वास्थ्य केंद्र जाकर पशु चिकित्सक से अपने मवेशियों के लिए सही दवा की खुराक जान सकते हैं। • पशुपालकों के लिए: गाय और भैंसों में बेबसियोसिस और थेलेरियोसिस बीमारी का खतरा रहता है। नियमित सफाई और साइपरमेथ्रिन के इस्तेमाल से मवेशियों का इलाज खर्च और बीमारी का जोखिम कम होता है। • पेट पेरेंट्स के लिए: कुत्तों के शरीर पर एंटी-टिक स्प्रे और विशेष साबुन का उपयोग जरूरी है। मानसून के दौरान कुत्तों को गीली घास और बाहरी दीवारों के पास ले जाते समय सावधानी बरतनी चाहिए। • सुरक्षा उपाय: रासायनिक दवाओं का छिड़काव करने के बाद पशुओं को शरीर चाटने से रोकना अनिवार्य है। लापरवाही बरतने पर जहरीली दवा पेट में जाने से जानवर की जान जोखिम में पड़ सकती है। ऐसा क्यों हुआ गर्मियों के बाद मानसून की नमी टिक और किलिनी के प्रजनन और फैलाव के लिए सबसे अनुकूल माहौल बनाती है। • प्रजनन चक्र में तेजी: भीषण गर्मी के महीनों में किलिनी का प्रजनन तेजी से होता है और पहली बारिश के साथ उनके अंडे फूटते हैं। हवा में नमी बढ़ते ही इनकी आबादी अचानक कई गुना बढ़ जाती है। • छिपे रहने के ठिकाने: टिक सिर्फ जानवरों के शरीर पर ही नहीं रहते, बल्कि पशुशाला की दरारों, फर्श के कोनों और आसपास की झाड़ियों में पनाह लेते हैं। मौका मिलते ही यह परजीवी पशुओं के शरीर से चिपक कर खून चूसना शुरू कर देते हैं। • बीमारियों के वाहक: यह परजीवी पशुओं का खून चूसकर उन्हें एनेमिक बना देते हैं। इसके अतिरिक्त, यह बेबसियोसिस और थेलेरियोसिस जैसे खतरनाक जीवाणुओं को एक पशु से दूसरे में फैलाने का काम करते हैं। • अधूरा उपचार: केवल जानवर के शरीर पर दवा लगाने से किलिनी खत्म नहीं होतीं क्योंकि आसपास के माहौल में छिपे कीट दोबारा हमला कर देते हैं। यही वजह है कि बाड़ा और पशु दोनों का एक साथ उपचार जरूरी होता है। सवाल-जवाब 1. बरसात के मौसम में पशुओं पर टिक क्यों तेजी से बढ़ते हैं? गर्मी में टिक का प्रजनन अधिक होता है और बारिश में नमी मिलते ही इनकी संख्या तेजी से बढ़ जाती है। 2. टिक से पशुओं में कौन सी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं? टिक की वजह से मवेशियों में खून की कमी, लगातार बुखार और बेबसियोसिस तथा थेलेरियोसिस जैसी जानलेवा बीमारियां हो सकती हैं। 3. पशुशाला की दीवारों और फर्श पर किलिनी मारने के लिए किस रसायन का प्रयोग करना चाहिए? विशेषज्ञ की सलाह पर साइपरमेथ्रिन या डेल्टामेथ्रिन जैसे कीटनाशकों का छिड़काव दीवारों की दरारों और फर्श पर किया जा सकता है। 4. टिक की दवा लगाते समय क्या सावधानी रखनी चाहिए? रासायनिक दवाएं जहरीली होती हैं, इसलिए दवा लगाने के बाद पशु को अपना शरीर चाटने से रोकना चाहिए ताकि विषाक्तता न हो। 5. क्या किलिनी नियंत्रण के लिए नीम का घोल पूरी तरह असरदार है? नीम के घोल का असर सीमित होता है, इसलिए गंभीर संक्रमण में पशु चिकित्सक की सलाह से प्रामाणिक दवाओं का उपयोग करना चाहिए। https://trendkia.com/chhattisgarh/bilaspur-men-manasuna-ate-hi-barha-pashuon-para-tika-ka-prakopa-janaleva-bimariyon-se-bachava-ke-lie-pashu-chikitsakon-ne-jari-ki--30252 TrendKia — Har trend, sabse pehle.