छत्तीसगढ़ के सरगुजा में 60 साल के रामचंद्र यादव आज भी संजोए हुए हैं बिरहा और कजरी लोकगीतों की अमूल्य धरोहर छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में यादव समाज की पारंपरिक गायकी को 60 वर्षीय रामचंद्र यादव बिना किसी किताब की मदद के केवल सुनकर याद रखते हुए पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के सरगुजा क्षेत्र में लोक कला और सांस्कृतिक गायन की परंपरा को जीवित रखने की एक मिसाल देखने को मिलती है। यहाँ के यादव समाज ने अपने पारंपरिक गीत संगीत की अनूठी धरोहर को आज भी पूरी आत्मीयता से सहेजा हुआ है। इस सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में 60 साल के बुजुर्ग रामचंद्र यादव की महत्वपूर्ण भूमिका है। वे पिछले कई दशकों से बिना किसी लिखित पुस्तक या औपचारिक शिक्षा के केवल लोकगीतों को सुनकर कंठस्थ करने की पुरानी परिपाटी पर कायम हैं। अपने दादा और गाँव के वरिष्ठ लोगों से सीखी गई यह कला आज भी उनकी दिनचर्या और सामाजिक उत्सवों का अटूट हिस्सा बनी हुई है। मौखिक परंपरा और बिना किताब के लोकगीत सीखने का सफर रामचंद्र यादव के अनुसार लोकगीतों की यह विधा पूर्णतः मौखिक शिक्षण पर आधारित रही है। जब वे लगभग 15 वर्ष की आयु के थे, तभी से उन्होंने अपने गाँव के बुजुर्गों और अपने दादाजी को विभिन्न अवसरों पर गाते हुए ध्यान से सुनना शुरू कर दिया था। उस समय न तो कोई अभ्यास पुस्तिका थी और न ही कोई लिखित संग्रह। उन्होंने इन गीतों की लयात्मक धुन और शब्दों को सुनकर अपने मन में बिठा लिया और लगातार अभ्यास के जरिए इसमें निपुणता हासिल की। इस तरह वे बिना किसी किताब का सहारा लिए ही इस पारंपरिक विधा के कुशल गायक बन गए। विभिन्न ऋतुओं और अवसरों पर गाए जाने वाले लोकगीत सरगुजा की लोक संस्कृति में अलग-अलग अवसरों और समय के अनुसार गीतों की अपनी विशिष्ट शैलियाँ हैं। रामचंद्र यादव बिरहा, कजरी, चहका और लचका जैसी विविध पारंपरिक विधाओं के जानकार हैं। इनमें से बिरहा एक ऐसा लोकगीत है जिसे साल के किसी भी मौसम या महीने में गाया जा सकता है। यह गीत दैनिक जीवन की गतिविधियों से गहराई से जुड़ा होता है। इसके विपरीत कजरी गीत का एक विशेष समय चक्र होता है। कजरी मुख्य रूप से सितंबर के महीने के दौरान और भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव से जुड़ी लोक परंपराओं के पावन अवसरों पर गाई जाती है। इसके अलावा चहका और लचका जैसी शैलियों का उपयोग भी विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दौरान माहौल को संगीतमय बनाने के लिए किया जाता है। वैवाहिक समारोह और समधी मिलन की पुरानी परंपरा पुराने दौर में शादी-विवाह के मौकों पर लोकगीतों का अपना एक अलग ही सामाजिक महत्व हुआ करता था। रामचंद्र यादव याद करते हैं कि जब विवाह समारोह के दौरान दोनों पक्षों के समधी आपस में मिलते थे, तब मनोरंजन के प्रमुख साधन के रूप में बिरहा गाने की खास परंपरा निभाई जाती थी। उस समय वर पक्ष और वधू पक्ष दोनों ओर के लोग एक-दूसरे से बिरहा सुनाने का आग्रह करते थे। गीतों की इस सुरीली जुगलबंदी से विवाह स्थल का पूरा वातावरण उल्लास और आत्मीयता से भर जाता था। पशुचारण के दौरान मनोरंजन और संवाद का साधन लोकगीतों का जुड़ाव केवल उत्सवों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह चरवाहों के दैनिक काम-काज का भी मुख्य सहारा था। गाँव के खेतों और जंगलों में गाय तथा भैंस चराते समय रामचंद्र यादव और उनके साथी चरवाहे नियमित रूप से बिरहा गाया करते थे। वे बताते हैं कि जब वे सुरीली आवाज में बिरहा गाते थे, तब आसपास चरने वाले मवेशी भी शांत होकर चरते रहते थे और इधर-उधर नहीं भटकते थे। उस जमाने में जब मनोरंजन के आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे, तब ये पारंपरिक लोकगीत ही उनके लिए समय बिताने और आपस में जुड़ने का सबसे बड़ा जरिया बनते थे। पुरखों की विरासत को सहेजने का अटूट संकल्प उम्र के 60वें पड़ाव पर पहुँचने के बाद भी रामचंद्र यादव के मन में अपने समाज की इस समृद्ध लोक कला के प्रति वही पुराना उत्साह कायम है। उनका दृढ़ विश्वास है कि बिरहा और कजरी केवल गीत भर नहीं हैं, बल्कि यह उनके समाज और पूर्वजों की अमूल्य धरोहर है। इसी सोच के साथ वे आज भी पूरी निष्ठा से इन गीतों को गाते हैं और अपनी आने वाली पीढ़ियों के सामने अपनी माटी की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए हैं। इसका आप पर असर सरगुजा के पारंपरिक लोकगीतों का संरक्षण स्थानीय संस्कृति और सामुदायिक पहचान के संरक्षण की दिशा में एक बड़ा योगदान है। • भारत में: विलुप्त हो रही मौखिक लोक कलाओं के प्रति जागरूकता बढ़ने से देश भर में क्षेत्रीय सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने की प्रेरणा मिलती है। इससे नई पीढ़ी अपने पारंपरिक संगीत और लोक जीवन से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित होती है। • छत्तीसगढ़ में: सरगुजा क्षेत्र में बिरहा और कजरी जैसी गायन विधाओं का जीवंत रहना स्थानीय सांस्कृतिक पर्यटन और लोक कलाकारों के सम्मान को बढ़ावा देता है। राज्य के युवाओं को अपनी माटी से जुड़े लोकगीतों को सीखने और मंच प्रदान करने में मदद मिलेगी। ऐसा क्यों हुआ सरगुजा के यादव समाज में पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से लोकगीत सिखाने और दैनिक जीवन में उनका अभ्यास जारी रखने के कारण यह परंपरा बची हुई है। • मौखिक शिक्षण और कंठस्थ करने की परिपाटी: बुजुर्गों द्वारा गीतों को सुनाकर याद कराने की पुरानी पद्धति ने बिना किताबों के भी इस कला को अक्षुण्ण रखा। युवा अवस्था से ही निरंतर सुनने और अभ्यास करने से लोकगीत कंठस्थ हो जाते हैं। • दैनिक कामकाज से गीतों का जुड़ाव: मवेशी चराने के दौरान और खेतों में काम करते हुए लोकगीत गाना मनोरंजन और पशुओं को नियंत्रित रखने का मुख्य साधन था। इस व्यावहारिक उपयोग ने संगीत को दैनिक दिनचर्या में जीवित रखा। • सामाजिक और वैवाहिक समारोहों में जगह: विवाह के दौरान समधी मिलन जैसे अवसरों पर बिरहा गाने की परंपरा ने लोककला को सामाजिक सम्मान और निरंतरता प्रदान की। सवाल-जवाब 1. रामचंद्र यादव ने लोकगीत गाना किस उम्र में और किससे सीखा था? रामचंद्र यादव ने लगभग 15 साल की उम्र में अपने दादा और गाँव के बुजुर्गों से सुनकर लोकगीत सीखना शुरू किया था। 2. क्या रामचंद्र यादव ने लोकगीत सीखने के लिए किताबों का इस्तेमाल किया? नहीं, उन्होंने किसी किताब का सहारा नहीं लिया बल्कि बुजुर्गों को गाते सुनकर गीतों को कंठस्थ किया और अभ्यास से निपुण बने। 3. सरगुजा में बिरहा और कजरी लोकगीत कब और किस अवसर पर गाए जाते हैं? बिरहा किसी भी मौसम में गाया जा सकता है, जबकि कजरी मुख्य रूप से सितंबर के महीने और कृष्ण जन्म की परंपराओं के अवसर पर गाई जाती है। 4. शादी-विवाह के दौरान बिरहा गाने का क्या महत्व था? शादी में समधी मिलन के दौरान दोनों पक्षों के लोग माहौल को खुशनुमा और मनोरंजक बनाने के लिए एक-दूसरे से बिरहा गाने को कहते थे। 5. गाय-भैंस चराते समय लोकगीत गाने का क्या फायदा होता था? मवेशी चराते समय बिरहा गाने से चरवाहों का मनोरंजन होता था और संगीत की आवाज से पशु आसपास शांत होकर चरते रहते थे, जिससे वे भटकते नहीं थे। प्रेरणा और सबक रामचंद्र यादव का जीवन और कला के प्रति समर्पण यह सिखाता है कि संसाधनों की कमी भी सांस्कृतिक निष्ठा को डिगा नहीं सकती। • साधनों की कमी को बाधा न बनने देना: बिना लिखित किताबों या औपचारिक प्रशिक्षण के भी केवल लगन और ध्यान से सुनकर कठिन से कठिन कला सीखी जा सकती है। • अपनी जड़ों और पूर्वजों की विरासत पर गर्व: आधुनिकता के दौर में भी अपनी पारंपरिक पहचान और सांस्कृतिक जड़ों को सहेज कर रखना जीवन को सार्थकता देता है। • निरंतर अभ्यास और निष्ठा: 15 वर्ष की आयु से शुरू हुआ गायन 60 वर्ष की उम्र में भी उसी उत्साह के साथ जारी रहना कला के प्रति सच्चे समर्पण को दर्शाता है। https://trendkia.com/chhattisgarh/chhattisgarh-ke-surguja-men-60-sala-ke-ramchandra-yadav-aja-bhi-snjoe-hue-hain-biraha-aura-kajari-lokagiton-ki-amulya-dharohara-30060 TrendKia — Har trend, sabse pehle.