# छत्तीसगढ़ के सरगुजा में बाजरे की महक: कार्तिक और भादो की दोहरी फसल से सजी ग्रामीण रसोई की पुरानी थाली

> सरगुजा के बंदना गांव में कार्तिक बाजरे की बालियां लहलहाने के साथ ही पारंपरिक रोटी, पेज, पीठा और हड़िया बनाने की सदियों पुरानी ग्रामीण परंपराएं फिर से जीवंत हो गई हैं।

**Type:** article · **Category:** छत्तीसगढ़ · **Published:** 2026-10-12 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/chhattisgarh/chhattisgarh-ke-surguja-men-bajare-ki-mahaka-kartik-aura-bhado-ki-dohari-phasala-se-saji-gramina-rasoi-ki-purani-thali-46643 · **Language:** Hindi
**Tags:** सरगुजा बाजरा, बाजरे की खेती, कार्तिक बाजरा, पारंपरिक खानपान, छत्तीसगढ़ कृषि, मोटा अनाज

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्थित बंदना इलाके के खेतों में इन दिनों बाजरे की हरी भरी फसल पर बालियां निकल आई हैं और दाने पूरी तरह पकने के करीब पहुंच चुके हैं। खेतों में खड़ी इस फसल के तैयार होते ही ग्रामीण किसान इसकी कटाई कर दानों को धूप में सुखाने की तैयारी में जुट जाते हैं, ताकि साल भर के लिए पारंपरिक खानपान का इंतजाम हो सके। ग्रामीण रसोई में इस पारंपरिक मोटे अनाज का उपयोग केवल पेट भरने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे बनने वाली रोटियों में प्राकृतिक रूप से चाशनी और दूध जैसी अनोखी मिठास महसूस होती है। इसके अलावा दानों से कुरकुरी लई, पौष्टिक पेज और पीठा जैसे कई घरेलू व्यंजन तैयार किए जाते हैं, जो शरीर को ताकत और तंदुरुस्ती देते हैं। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों के उत्सवों और रिवाजों से जुड़ा पारंपरिक पेय हड़िया तैयार करने में भी बाजरे का विशेष महत्व रहा है। इलाके में बाजरे की पैदावार एक नहीं बल्कि दो अलग-अलग चक्रों में की जाती है, जिसमें से एक फसल का दौर बीत चुका है और दूसरा चक्र खेतों में लहलहा रहा है।

## रसोई में बाजरे का स्वाद: स्वादिष्ट रोटियां, पीठा और सेहतमंद पेज
गांव की महिला फूल कुंवर के अनुसार बाजरे का इस्तेमाल कई तरह के पारंपरिक घरेलू पकवान बनाने में किया जाता है। खेतों से कटाई के बाद जब बाजरे के दानों को अच्छी तरह सुखा लिया जाता है, तब उन्हें चक्की में पीसकर आटा बनाया जाता है। इस ताजे आटे से बनने वाली रोटियों का स्वाद बहुत ही लाजवाब होता है और ग्रामीण बताते हैं कि इसका स्वाद मुंह में दूध और चाशनी जैसी हल्की मिठास छोड़ जाता है। रोटियों के साथ-साथ दानों से हल्की और कुरकुरी लई भी बनाई जाती है। वहीं दोपहर और सुबह के भोजन में बाजरे से तैयार दलियानुमा पेय यानी पेज बनाकर पीने की पुरानी परंपरा है, जो शरीर को मजबूत और तंदुरुस्त बनाए रखने में मदद करता है। इसके अतिरिक्त मीठे और नमकीन पीठा जैसे पारंपरिक पकवान भी इसी आटे से तैयार किए जाते हैं। यही वजह है कि आज भी ग्रामीण परिवारों की रसोई में बाजार के अनाज के बजाय खेत के ताजे बाजरे से बने व्यंजनों को पहली प्राथमिकता दी जाती है।

## कार्तिक और भादो के दो अलग मौसमों में होती है बाजरे की खेती
क्षेत्र के ग्रामीण मनसाय ने बताया कि इलाके में बाजरे की बुवाई और कटाई दो अलग-अलग मौसमों में की जाती है। इसमें एक फसल चक्र कार्तिक वाला बाजरा कहलाता है, जबकि दूसरे चक्र को भादो वाला बाजरा कहा जाता है। दोनों मौसमों में बुवाई और कटाई का समय एक-दूसरे से पूरी तरह अलग होता है। वर्तमान में खेतों में जो फसल बालियों के साथ लहलहा रही है, वह कार्तिक वाला बाजरा है और इसके दाने तेजी से पकने की ओर बढ़ रहे हैं। इसके बाद भादो वाले बाजरे की खेती का दूसरा चक्र आता है। जैसे ही खेतों में बाजरे के पौधों पर बालियां फूटती हैं और उनमें दाने भरने लगते हैं, वैसे ही ग्रामीण किसान फसल की कटाई, उसे खलिहान में लाने और अलग-अलग व्यंजनों के लिए सुरक्षित रखने के इंतजामों में लग जाते हैं।

## खेतों से थाली तक: कटाई और दानों को सहेजने का पारंपरिक तरीका
गांव के एक बुजुर्ग ग्रामीण के अनुसार इस समय खेतों में दिख रहा बाजरा पूरी तरह से कार्तिक का बाजरा है। इसके हरे-भरे पौधों के ऊपरी हिस्से में बड़ी बालियां आती हैं, जिनमें दाने विकसित होते हैं। जब ये दाने धूप में अच्छी तरह पककर कड़े हो जाते हैं, तब हंसिए से बालियों को काटकर इकट्ठा किया जाता है। इसके बाद खलिहानों में दानों को अलग कर धूप में सुखाया जाता है ताकि नमी खत्म हो सके और अनाज लंबे समय तक खराब न हो। इसके बाद जरूरत के अनुसार थोड़े-थोड़े दाने निकालकर रोजमर्रा के भोजन के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। बुजुर्गों का कहना है कि यह पारंपरिक अनाज सदियों से स्थानीय समुदाय के आहार का अहम हिस्सा रहा है और आधुनिक दौर में भी इसकी पोषण और उपयोगिता जरा भी कम नहीं हुई है।

## पारंपरिक पेय हड़िया बनाने में बाजरे की खास भूमिका
बाजरे की उपयोगिता केवल साधारण खाने-पीने के पकवानों तक सीमित नहीं है। फूल कुंवर ने बताया कि स्थानीय संस्कृति में रचे-बसे पारंपरिक पेय हड़िया को तैयार करने में भी बाजरे के दानों का अहम इस्तेमाल किया जाता है। बाजरे से तैयार की गई हड़िया का स्वाद और महक अन्य अनाजों से बनी हड़िया की तुलना में काफी अलग और विशिष्ट होती है। पीढ़ियों से चले आ रहे ग्रामीण रीति-रिवाजों, सामाजिक आयोजनों और पारिवारिक उत्सवों में इस खास पेय को तैयार करने के लिए बाजरे को प्रमुखता से शामिल किया जाता रहा है, जिससे यह अनाज सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक बन चुका है।

## पूर्वजों के समय होती थी बड़े पैमाने पर खेती, अब सिमट रहा रकबा
मनसाय का कहना है कि उनके पूर्वजों के दौर में पूरे इलाके में बड़े पैमाने पर बाजरे की बुवाई की जाती थी। उस दौर में लगभग हर ग्रामीण परिवार अपने खेत में पूरे साल की जरूरत भर का बाजरा उगाता था और घर पर ही आटा तैयार कर शुद्ध रोटियां बनाता था। हालांकि समय बदलने के साथ अब बाजरे की खेती का दायरा पहले की तुलना में काफी घट गया है। रकबा कम होने के बावजूद कई ग्रामीण परिवार आज भी इस पारंपरिक खेती को पूरी निष्ठा से आगे बढ़ा रहे हैं। बाजार से पैकेटबंद आटा खरीदने के बजाय अपनी ही जमीन पर उगे बाजरे से रोटी और पारंपरिक व्यंजन बनाना इन परिवारों के लिए अपनी पुरानी विरासत और संस्कृति को जिंदा रखने का एक मजबूत माध्यम है।

## ग्रामीण संस्कृति और लोक जीवन का अभिन्न अंग है यह पारंपरिक अनाज
सरगुजा के वनांचल और ग्रामीण परिवेश में बाजरा केवल एक सामान्य कृषि उपज नहीं है, बल्कि यह वहां की लोक संस्कृति और जीवनशैली का जीवंत हिस्सा है। पीढ़ियों से लई, रोटी, पीठा, पेज और हड़िया जैसे व्यंजन लोगों की थाली की शोभा बढ़ाते रहे हैं। भले ही आधुनिक कृषि प्रणालियों और खानपान में आए बदलाव के कारण इसका रकबा घटा हो, लेकिन ग्रामीणों द्वारा इस परंपरा को सहेजना यह साबित करता है कि स्थानीय खानपान की जड़ें कितनी गहरी हैं। बदलते दौर में इस पौष्टिक मोटे अनाज की खेती को संरक्षण देना और पारंपरिक व्यंजनों को नई पहचान दिलाना ग्रामीण विरासत को संजोए रखने के लिए एक जरूरी कदम है।

## इसका आप पर असर
पारंपरिक बाजरे की यह खेती ग्रामीण खानपान, स्थानीय स्वास्थ्य और घरेलू पोषण को सीधे प्रभावित करती है।

- **भारत में:** मोटे अनाजों और पारंपरिक खानपान को बढ़ावा मिलने से पौष्टिक आहार के प्रति देश भर में जागरूकता बढ़ रही है। इससे बाजार में बाजरे जैसे पौष्टिक अनाजों की मांग और किसानों को मिलने वाली कीमत पर सकारात्मक असर पड़ता है।
- **सरगुजा में:** स्थानीय ग्रामीणों को बाजार से महंगा पैकेटबंद आटा खरीदने के बजाय अपने ही खेत से शुद्ध और मीठे बाजरे की रोटी मिल रही है। इससे परिवारों के रसोई खर्च में बचत होने के साथ-साथ पारंपरिक व्यंजनों की विरासत भी सुरक्षित रहती है।
- **स्वास्थ्य और पोषण:** बाजरे से बने पेज और रोटियों के नियमित सेवन से शारीरिक कमजोरी दूर होती है और काम करने की क्षमता बढ़ती है। दैनिक आहार में इसे शामिल करने से मौसमी बीमारियों से बचाव और पाचन में लाभ मिलता है।
- **खेती और रकबा:** कम रकबे के बावजूद किसानों द्वारा बाजरे को बचाए रखने से स्थानीय बीजों की प्रजातियां विलुप्त होने से बच रही हैं। यदि अधिक किसान इसकी बुवाई दोबारा शुरू करें तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।

## ऐसा क्यों हुआ
सरगुजा के बंदना में बाजरे की यह फसल अपनी खास जलवायु अनुकूलता, दोहरे मौसम चक्र और पीढ़ियों पुरानी खानपान परंपराओं के कारण उगाई जाती है।

- **दोहरा फसल चक्र:** इस क्षेत्र में बाजरे की खेती भादो और कार्तिक के दो अलग-अलग चक्रों में की जाती है। अनुकूल मौसमी परिस्थितियों के कारण फसल में बालियां सही समय पर फूटती हैं और दानों की गुणवत्ता बेहतर होती है।
- **पारंपरिक स्वावलंबन:** ग्रामीण पीढ़ियों से अपने खेत का अनाज खाकर आत्मनिर्भर रहने की परंपरा का पालन करते आ रहे हैं। बाजार के आटे पर निर्भर रहने के बजाय वे अपने खेत के स्वादिष्ट और मीठे बाजरे को तरजीह देते हैं।
- **सांस्कृतिक आवश्यकताएं:** घरेलू पकवानों के अलावा पारंपरिक हड़िया जैसे सांस्कृतिक पेयों के लिए विशेष रूप से बाजरे की जरूरत होती है। रीति-रिवाजों और उत्सवों में इसकी अनिवार्य भूमिका ने इस अनाज की खेती को आज भी बनाए रखा है।
- **रकबे में गिरावट की वजह:** बदलते समय और आधुनिक फसलों के प्रसार के चलते इसका रकबा पूर्वजों के समय की तुलना में घटा है। हालांकि पारिवारिक परंपरा और बेहतर स्वाद के कारण कुछ किसान इसे लगातार बो रहे हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. सरगुजा के बंदना में इन दिनों बाजरे की कौन सी फसल तैयार हो रही है?
इस समय खेतों में कार्तिक वाले बाजरे की फसल तैयार हो रही है, जिसकी बालियों में दाने पकने के कगार पर हैं।

### 2. बाजरे की खेती किन दो अलग-अलग मौसमों में की जाती है?
स्थानीय किसान बाजरे की खेती दो अलग चक्रों में करते हैं, जिन्हें कार्तिक वाला बाजरा और भादो वाला बाजरा कहा जाता है।

### 3. बाजरे से कौन-कौन से पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं?
बाजरे के आटे से स्वादिष्ट रोटियां, पीठा, पौष्टिक पेज और कुरकुरी लई बनाई जाती है।

### 4. बाजरे की रोटी का स्वाद कैसा होता है?
ग्रामीणों के अनुसार बाजरे की ताजी रोटी खाने में बेहद स्वादिष्ट होती है और इसमें दूध व चाशनी जैसी कुदरती मिठास महसूस होती है।

### 5. पेय पदार्थों में बाजरे का क्या उपयोग होता है?
बाजरे से शरीर को ताकत देने वाला पेज बनाया जाता है और पारंपरिक पेय हड़िया तैयार करने में भी इसका इस्तेमाल होता है।

### 6. क्या पहले की तुलना में बाजरे की खेती में कोई बदलाव आया है?
हां, पूर्वजों के समय बाजरा बड़े पैमाने पर उगाया जाता था, लेकिन अब इसका रकबा पहले की तुलना में कम हो गया है।

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