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  "type": "article",
  "title": "छत्तीसगढ़ के सरगुजा में बूढ़ा नाग धाम से जुड़ी रहस्यमयी लोककथाएं, बारिश में बाजे की आवाज और जलपरी का अनोखा रहस्य",
  "summary": "सरगुजा के परपटिया में स्थित बूढ़ा नाग स्थल पर बारिश के दौरान सुरीले बाजों की आवाजें और नथुनी वाली मछली की कहानियां प्रचलित हैं। जानिए इस पवित्र स्थान की 5 किलोमीटर लंबी गुप्त सुरंग और जलपरी से जुड़ी रहस्यमयी लोककथाओं के बारे में।",
  "content": "छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्थित परपटिया का ग्रामीण क्षेत्र अपनी अनूठी लोकमान्यताओं और पौराणिक कथाओं के लिए जाना जाता है। इस क्षेत्र में एक विशेष स्थान है जिसे पर्यटक जलपरी स्थल के रूप में पहचानते हैं, जबकि स्थानीय आदिवासी समुदाय इसे बाबा बूढ़ा नाग के नाम से पूजता है। देखने में यह स्थल एक मनमोहक छोटे झरने जैसा नजर आता है, लेकिन इसके साथ सदियों पुराना इतिहास और कई तरह के अद्भुत रहस्य जुड़े हुए हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही इन मान्यताओं ने इस स्थल को धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया है।\n\nबारिश के मौसम में गूंजती रहस्यमयी संगीत की आवाजें\nबूढ़ा नाग स्थल से जुड़ी सबसे प्रमुख मान्यताओं में से एक बारिश के मौसम से संबंधित है। गांव के निवासी नरेश पटेल के अनुसार, वर्षा काल के दौरान यहां नाग और नागिन के एकत्र होने तथा आपस में विचार-विमर्श करने की परंपरा मानी जाती है। इसी दौरान इस पूरे परिसर के आसपास विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों की ध्वनियां सुनाई देती हैं। रात के समय यहां आने वाले लोगों को कभी घसिया बाजा, कभी शहनाई तो कभी पारंपरिक बैंड-बाजे जैसी सुरीली आवाजें स्पष्ट रूप से सुनाई देती हैं। नरेश पटेल का कहना है कि यह अनुभव अत्यंत दिव्य है और इसे रात के समय स्वयं महसूस किया जा सकता है।\n\nस्थानीय जनजातीय समाज में बूढ़ा नाग की पूजा और मान्यता कई सौ वर्ष पुरानी है। बुजुर्गों से सुनी कहानियों को आज भी ग्रामीण बड़ी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। नरेश पटेल बताते हैं कि उनके पूर्वज भी इन ध्वनियों और मान्यताओं की पुष्टि करते आए हैं, जिससे इस परंपरा की जड़ें क्षेत्र में बहुत गहरी जमा चुकी हैं।\n\n5 किलोमीटर लंबी गुप्त सुरंग और बांसेन देव से जुड़ा संबंध\nइस पावन स्थल से जुड़ी एक अन्य प्रमुख लोककथा जमीन के नीचे बनी एक लंबी सुरंग से संबंधित है। मान्यताओं के अनुसार, बूढ़ा नाग स्थल से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित बांसेन देव तक एक गुप्त भूमिगत मार्ग बना हुआ है। प्राचीन काल में स्थानीय बैगा और गांव के जानकार लोग इस सुरंग से जुड़ी अनेक घटनाएं और संस्मरण सुनाया करते थे। यद्यपि इस 5 किलोमीटर लंबी सुरंग का कोई आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं है, फिर भी स्थानीय जनमानस में इस कथा की स्वीकार्यता आज भी अक्षुण्ण बनी हुई है।\n\nनथुनी वाली मछली और जलपरी की अनोखी आकृतियां\nझरने के जलप्रपात क्षेत्र से जुड़ी एक और दिलचस्प कहानी नथुनी वाली मछली और जलपरी की उपस्थिति से संबंधित है। ग्रामीणों का दावा है कि दोपहर के समय जब सूर्य का प्रकाश पानी पर पड़ता है, तब जल में एक विशिष्ट आकृति उभरती है जिसे स्थानीय लोग जलपरी की संज्ञा देते हैं। नरेश पटेल के अनुसार, गांव के कई लोगों ने दोपहर के वक्त इस जलपरी जैसी आकृति को स्वयं देखा है। इसके साथ ही, जल क्षेत्र में नथुनी पहनी हुई मछली की पौराणिक कथा भी प्रचलित है, जो पर्यटकों और श्रद्धालुओं के कौतूहल को और बढ़ा देती है।\n\nइसका आप पर असर\nपरपटिया के बूढ़ा नाग स्थल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और लोकमान्यताओं का प्रभाव स्थानीय पर्यटन और सांस्कृतिक संरक्षण दोनों पर पड़ता है।\n\n• भारत भर में: देश भर के यात्रियों के लिए यह स्थान मध्य भारत की स्वदेशी जनजातीय परंपराओं और इको-टूरिज्म का अनूठा अनुभव प्रदान करता है। इससे भारत की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक धरोहर को करीब से समझने का अवसर मिलता है।\n• सरगुजा और छत्तीसगढ़ में: स्थानीय निवासियों और पर्यटन उद्योग के लिए इस स्थल की मान्यताएं ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देती हैं। इसके साथ ही भावी पीढ़ियों के लिए पुरानी मौखिक परंपराओं और प्राकृतिक स्थलों को सहेजने की प्रेरणा मिलती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nसरगुजा के परपटिया में बूढ़ा नाग स्थल से जुड़ी कहानियां सदियों पुरानी जनजातीय मान्यताओं और प्राकृतिक संरचनाओं के संगम से उत्पन्न हुई हैं।\n\n• प्राकृतिक ध्वनियों का प्रभाव: वर्षा ऋतु के दौरान पानी के बहाव और चट्टानों की संरचना से टकराकर पैदा होने वाली ध्वनियों को स्थानीय लोगों ने पारंपरिक वाद्य यंत्रों की आवाजों के रूप में महसूस किया।\n• मौखिक जनजातीय परंपराएं: पीढ़ियों से चले आ रहे बैगा समुदाय के किस्सों और कहानियों ने इस स्थल की धार्मिक एवं पौराणिक महत्ता को सुदृढ़ किया है।\n• भौगोलिक संरचनाएं: क्षेत्र की गुफाओं और जलप्रपातों की विशिष्ट आकृतियों के कारण गुप्त सुरंग और जलपरी जैसी लोककथाओं को बल मिला।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सरगुजा का बूढ़ा नाग स्थल कहाँ स्थित है?\nयह पावन स्थल छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के अंतर्गत आने वाले परपटिया ग्रामीण क्षेत्र में स्थित है।\n\n2. बारिश के दौरान बूढ़ा नाग स्थल पर क्या मान्यता प्रचलित है?\nमान्यता है कि बारिश में नाग-नागिन एकत्र होते हैं और परिसर में घसिया बाजा, शहनाई तथा बैंड-बाजे जैसी रहस्यमयी संगीत की आवाजें सुनाई देती हैं।\n\n3. बांसेन देव और बूढ़ा नाग के बीच सुरंग की लंबाई कितनी बताई जाती है?\nस्थानीय लोककथाओं के अनुसार बूढ़ा नाग और 5 किलोमीटर दूर स्थित बांसेन देव के बीच जमीन के अंदर एक गुप्त रास्ता बना हुआ है।\n\n4. दोपहर के समय झरने के जल में ग्रामीणों को क्या दिखाई देने का दावा है?\nग्रामीणों का दावा है कि दोपहर के समय जल में एक विशिष्ट आकृति दिखाई देती है जिसे वे जलपरी की संज्ञा देते हैं।\n\n5. इन मान्यताओं की जानकारी किसने साझा की है?\nपरपटिया गांव के निवासी नरेश पटेल ने अपने बुजुर्गों से सुनी इन पौराणिक मान्यताओं और घटनाओं के बारे में जानकारी दी है।",
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  "category": "छत्तीसगढ़",
  "publishedAt": "2026-09-09",
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