छत्तीसगढ़ की अनूठी मितान परंपरा, जहां खून के रिश्तों से बढ़कर होती है दोस्ती छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में 'मितान' और 'महाप्रसाद' का रिश्ता खून के रिश्तों से भी गहरा माना जाता है। आधुनिकता की दौड़ में धुंधली पड़ रही इस परंपरा को बचाने के लिए इसे युवा पीढ़ी तक पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति में कुछ ऐसे अनूठे रिश्ते रचे-बसे हैं, जिन्हें खून के रिश्तों से भी कहीं अधिक पवित्र और मजबूत दर्जा दिया गया है। इन तमाम संबंधों में 'मितान' या 'महाप्रसाद' का नाता सबसे खास माना जाता है। यह रिश्ता महज़ दो व्यक्तियों के बीच की औपचारिक दोस्ती तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह अटूट विश्वास, आपसी सम्मान और गहरे अपनाव का एक ऐसा पवित्र बंधन है जो न केवल दो इंसानों को बल्कि उनके पूरे परिवारों को एक सूत्र में पिरो देता है। हालांकि, वक्त के साथ बदलती आधुनिक जीवनशैली और शहरी परिवेश के कारण यह प्राचीन परंपरा धीरे-धीरे लोगों की स्मृतियों से ओझल होती जा रही है। यही वजह है कि अब समाज में यह गंभीरता से महसूस किया जा रहा है कि इस सांस्कृतिक थाती को फिर से पुनर्जीवित किया जाए और नई पीढ़ी को इस लोक परंपरा से जोड़ा जाए। खून के रिश्तों से भी आगे की एक अनोखी दुनिया बिलासपुर के रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता विष्णु यादव ने इस परंपरा की गहराई को समझाते हुए बताया कि छत्तीसगढ़ में किसी को अपना मितान बनाना साधारण मित्रता से बिल्कुल अलग और बहुत बड़ा कदम माना जाता है। यह एक ऐसा बंधन है जहां जाति, धर्म और तमाम तरह के सामाजिक भेदभाव की दीवारें स्वतः गिर जाती हैं। इसमें दो लोग बिना किसी स्वार्थ के आजीवन एक-दूसरे को अपने सबसे खास और आत्मीय रिश्ते के रूप में स्वीकार करते हैं। पुरुषों के बीच बनने वाले इस पवित्र रिश्ते को मितान कहा जाता है, जबकि महिलाओं के बीच यह नाता मितानीन के नाम से जाना जाता है। इस रिश्ते की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इसमें सामाजिक दूरियां मिट जाती हैं और एक मजबूत भावनात्मक जुड़ाव पैदा होता है। महाप्रसाद और गंगाजल से जुड़ी पवित्रता इस अनूठी परंपरा में पवित्रता, निष्ठा और आदर भाव का विशेष महत्व है। पुरानी मान्यताओं के अनुसार, महाप्रसाद, गंगाजल या पवित्र तुलसीदल जैसे पावन प्रतीकों के आदान-प्रदान के साथ मितान का यह रिश्ता स्वीकार किया जाता रहा है। इसके तय हो जाने के बाद दोनों के बीच का संबंध किसी सामान्य या साधारण दोस्ती की तरह नहीं रह जाता है। इस रिश्ते की मर्यादा का पालन करते हुए एक-दूसरे को उनके साधारण नाम से पुकारने के बजाय बेहद सम्मान के साथ मितान, महाप्रसाद या गंगाजल जैसे आदरसूचक संबोधनों से पुकारे जाने की परंपरा रही है, जो इस नाते की पवित्रता को और अधिक बढ़ा देती है। सिर्फ दो इंसानों का नहीं बल्कि दो परिवारों का मिलन मितान की परंपरा का दायरा केवल दो व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका विस्तार दोनों के पूरे परिवारों तक होता है। इसके जरिए दोनों परिवारों के बीच भी एक बेहद आत्मीय, पारिवारिक और आदरपूर्ण संबंध स्थापित हो जाता है। यही मुख्य कारण है कि छत्तीसगढ़ की माटी में इस रिश्ते को उम्रभर निभाने और इसे आने वाली पीढ़ियों तक सुचारू रूप से आगे बढ़ाने की मजबूत परंपरा रही है। विष्णु यादव का मानना है कि आज के दौर में जब लोग अपने सगे संबंधियों और पारंपरिक सामाजिक ताने-बाने से दूर होते जा रहे हैं, तब मितान जैसी सांस्कृतिक परंपराएं बिखरते समाज को फिर से आपस में जोड़ने का एक बेहतरीन माध्यम साबित हो सकती हैं। भोजली पर्व से गहरा नाता छत्तीसगढ़ का पारंपरिक भोजली पर्व भी मितान, मितानीन और महाप्रसाद जैसे रिश्तों को गढ़ने और उन्हें जीवनभर निभाने की परंपरा से बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। भोजली केवल एक साधारण उत्सव मात्र नहीं है, बल्कि यह आपसी रिश्तों को और अधिक प्रगाढ़ करने का एक बड़ा अवसर है। इस दौरान लोग मितान या महाप्रसाद बदलने जैसी रीतियों के जरिए एक-दूसरे के साथ आत्मीय रिश्ता स्थापित करते थे। आज इस बात के विशेष प्रयास किए जा रहे हैं कि युवा पीढ़ी को भोजली के इसी सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व से परिचित कराया जाए, ताकि समय के साथ विलुप्त हो रही इन लोक परंपराओं को फिर से जीवंत किया जा सके और उन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके। युवाओं तक इस संस्कृति को पहुंचाने की मुहिम वर्तमान समय में नई पीढ़ी के बीच मितान और महाप्रसाद जैसी लोक परंपराओं की जानकारी तेजी से कम हो रही है। इस स्थिति को बदलने के लिए यह बेहद आवश्यक है कि इन धरोहरों को केवल किताबों के पन्नों या बुजुर्गों की यादों तक ही सीमित न रखा जाए, बल्कि विभिन्न सामाजिक आयोजनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से इसे युवाओं तक पहुंचाया जाए। समाज से यह अपील भी की जा रही है कि वे भोजली पर्व को आपसी भाईचारे, सछ्भाव और सच्ची दोस्ती के रूप में मनाएं। इसके साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर इस संस्कृति से जुड़े संदेशों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक प्रसारित किया जाए, ताकि हर कोई इससे जुड़ सके। रिश्तों की डोर को सहेजने की सामूहिक पहल पारंपरिक रिश्तों के धीरे-धीरे कमजोर पड़ने और विलुप्त होने की इस प्रक्रिया को रोकने के लिए समाज के हर वर्ग को आगे आने की सख्त जरूरत है। इसी उद्देश्य के साथ अब नदियों के किनारे भोजली पर्व से जुड़े विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें आम जनता से बढ़-चढ़कर शामिल होने और इस विरासत को आगे बढ़ाने की पुरजोर अपील की जा रही है। मितान का रिश्ता केवल एक सामान्य दोस्ती का नाम नहीं है, बल्कि यह आपसी अटूट विश्वास, सम्मान और सामाजिक एकजुटता का सबसे बड़ा प्रतीक है। इसलिए इस अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। इसका आप पर असर मितान और महाप्रसाद जैसी पारंपरिक संस्कृति के पुनर्जीवित होने से समाज में आपसी भाईचारा, सामाजिक सौहार्द और सामुदायिक एकता को बढ़ावा मिलता है। • भारत में: देश भर में आधुनिकता की दौड़ में छूट रही पारंपरिक और सांस्कृतिक जड़ों को सहेजने के प्रति जागरूकता बढ़ती है। • छत्तीसगढ़ में: स्थानीय स्तर पर भोजली पर्व और मितान जैसी लोक परंपराओं से नई पीढ़ी जुड़ती है, जिससे पारिवारिक और सामाजिक रिश्ते मजबूत होते हैं। सवाल-जवाब 1. छत्तीसगढ़ में मितान या महाप्रसाद का रिश्ता क्या है? यह खून के रिश्तों से भी बढ़कर विश्वास, सम्मान और अपनेपन का एक पवित्र बंधन है जो दो व्यक्तियों और उनके परिवारों को जोड़ता है। 2. पुरुषों और महिलाओं के बीच इस रिश्ते को क्या कहा जाता है? पुरुषों के बीच इसे मितान और महिलाओं के बीच मितानीन के रूप में जाना जाता है। 3. यह रिश्ता किस प्रकार स्वीकार किया जाता है? यह संबंध महाप्रसाद, गंगाजल या पवित्र तुलसीदल जैसे पावन प्रतीकों के आदान-प्रदान के साथ स्वीकार किया जाता है। 4. मितान परंपरा किस प्रमुख पर्व से जुड़ी हुई है? यह परंपरा छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध भोजली पर्व से गहराई से जुड़ी हुई है। 5. इस परंपरा के बारे में किसने जानकारी दी है? बिलासपुर निवासी सामाजिक कार्यकर्ता विष्णु यादव ने इस लोक परंपरा के बारे में विस्तार से बताया है। https://trendkia.com/chhattisgarh/chhattisgarh-ki-anuthi-mitana-parnpara-jahan-khuna-ke-rishton-se-barhakara-hoti-hai-dosti-25433 TrendKia — Har trend, sabse pehle.