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  "title": "छत्तीसगढ़ में राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहलाने वाले पहाड़ी कोरवा परिवार का संघर्ष, आज भी जुगाड़ के घर में कट रही जिंदगी",
  "summary": "छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले पहाड़ी कोरवा परिवार को आज भी मूलभूत सुविधाओं का इंतजार है। बिफन कोरवा का परिवार तीन दशकों से अधिक समय से लकड़ी और मिट्टी के जुगाड़ वाले मकान में रहने को मजबूर है।",
  "content": "छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर से 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गंझेर बस्ती में एक ऐसा परिवार रहता है, जो अपनी पहचान और हक के लिए संघर्ष कर रहा है। राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले पहाड़ी कोरवा समुदाय से ताल्लुक रखने वाला यह परिवार इक्कीसवीं सदी में भी एक अस्थायी जुगाड़ के घर में जीवन गुजारने को मजबूर है। शिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण इस परिवार की आवाज अक्सर अनसुनी रह जाती है और जनमन योजना का पूरा लाभ इन्हें अब तक नहीं मिल पाया है। सरकार की ओर से आदिवासी इलाकों में सड़क, बिजली, पानी और मकान जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन बिफन कोरवा का परिवार आज भी पक्के आवास की उम्मीद लगाए बैठा है।\n\nजुगाड़ के सहारे खड़ी दीवारें और छत\nइस परिवार का आशियाना लकड़ी के छोटे-बड़े टुकड़ों और मिट्टी से लीपने के बाद तैयार किया गया था। इस अस्थाई निर्माण को बने हुए करीब 30 से 35 साल बीत चुके हैं, लेकिन इतने लंबे अंतराल के बाद भी इस परिवार को कोई पक्का मकान नसीब नहीं हुआ है। घर की दीवारों और छप्पर में कई जगह छेद हो चुके हैं, जिन्हें बमुश्किल ढककर काम चलाया जा रहा है। जंगली इलाके के करीब होने के कारण इस कच्चे आशियाने में हमेशा सांप, बिच्छू और जंगली जानवरों का खतरा मंडराता रहता है। परिवार के सदस्य इसी जोखिम भरी छत के नीचे अपनी जिंदगी काटने को मजबूर हैं, जबकि आसपास के अन्य लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिल चुका है।\n\nबरसात के मौसम में बढ़ती हैं मुश्किलें\nबारिश के दिनों में इस परिवार का जीवन और भी अधिक कठिन हो जाता है। बिजली की लगातार समस्या के चलते बरसात की रातों में उजाला करने के लिए उन्हें लकड़ी जलानी पड़ती है, ताकि किसी तरह रात काटी जा सके। सरकारी कोटे से राशन तो इस परिवार को मिल जाता है, लेकिन आज तक इन्हें गैस चूल्हा और सिलेंडर नसीब नहीं हुआ है। यही वजह है कि परिवार की महिलाएं आज भी पारंपरिक मिट्टी के चूल्हे पर ही खाना पकाने को विवश हैं। आधुनिक सुविधाओं से दूर इस घर के लोग बुनियादी जरूरतों के लिए भी रोज संघर्ष करते हैं।\n\nशिक्षा से दूर रहने को मजबूर बच्चे\nबिफन कोरवा के पांच बच्चे हैं, जिनमें से एक बेटी का विवाह हो चुका है और बाकी चार बच्चे उनके साथ रहते हैं। ये चारों बच्चे फिलहाल किसी भी स्कूल में नहीं पढ़ पा रहे हैं, जिसकी मुख्य वजह घर से स्कूल की अधिक दूरी और रास्ते की कठिनाइयां हैं। बारिश के मौसम में धुंध और खराब रास्तों के कारण बच्चों को स्कूल भेजना जोखिम भरा साबित होता है, जिससे डर के मारे बच्चों को घर पर ही रोक लिया जाता है। बिफान का मानना है कि भले ही बच्चों को नौकरी न मिले, लेकिन पढ़ाई-लिखाई से वे जागरूक जरूर बन सकते हैं। शिक्षा के अभाव के चलते उनके बच्चों का भविष्य अधर में लटका हुआ है, जिसे लेकर माता-पिता हमेशा चिंतित रहते हैं।\n\nसरकार से पक्के मकान और गैस की गुहार\nपरिवार की मुख्य मांग है कि उन्हें जल्द से जल्द जनमन आवास योजना के तहत पक्का मकान दिया जाए, ताकि वे सुरक्षित माहौल में रह सकें। इसके अलावा चूल्हा जलाने की परेशानी से निजात पाने के लिए गैस कनेक्शन और बच्चों की पढ़ाई के लिए सुलभ व्यवस्था की मांग भी की गई है। बिफन कोरवा चाहते हैं कि उनके बच्चे शिक्षा प्राप्त कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ें और उन तमाम कठिनाइयों का सामना न करें, जो उन्होंने खुद अपनी जिंदगी में झेली हैं।\n\nइसका आप पर असर\nइस खबर का सीधा असर ग्रामीण विकास योजनाओं और प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर पड़ता है, जिससे आदिवासी क्षेत्रों में कल्याणकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत सामने आती है।\n\n• छत्तीसगढ़ में: सरगुजा और आसपास के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले अन्य वंचित परिवारों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने की उम्मीद बढ़ सकती है। प्रशासन ऐसे मामलों की नए सिरे से जांच कर सकता है।\n• राष्ट्रीय स्तर पर: देश के अन्य हिस्सों में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) के लिए चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की समीक्षा तेज हो सकती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह स्थिति प्रशासनिक सुस्ती, जागरूकता की कमी और दूरदराज के इलाकों में बुनियादी ढांचे के आभाव के कारण पैदा हुई है।\n\n• जागरूकता का अभाव: परिवार के पढ़े-लिखे न होने और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जानकारी न होने के कारण उनकी आवाज समय पर जिम्मेदार अधिकारियों तक नहीं पहुंच पाती है।\n• भौगोलिक बाधाएं: गंझेर बस्ती जैसी दूरदराज की बस्तियों में सड़क और परिवहन की खराब स्थिति के कारण सरकारी अमला आसानी से नहीं पहुंच पाता है।\n• योजनाओं का अधूरा क्रियान्वयन: जनमन जैसी योजनाएं कागजों पर होने के बावजूद कई बार धरातल पर पात्र अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाती हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. पहाड़ी कोरवा परिवार छत्तीसगढ़ में कहां रहता है?\nयह परिवार सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर से 35 किलोमीटर दूर गंझेर बस्ती में रहता है।\n\n2. बिफन कोरवा का घर किस चीज से बना है?\nउनका घर लकड़ी के टुकड़ों को काटकर और मिट्टी से छबाई करके बनाया गया है, जिसे बने 30 से 35 साल हो चुके हैं।\n\n3. परिवार को किस सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला है?\nइस परिवार को अब तक जनमन आवास योजना के तहत पक्का मकान नहीं मिला है।\n\n4. बिफन कोरवा के कितने बच्चे हैं?\nबिफन कोरवा के पांच बच्चे हैं, जिनमें एक बेटी की शादी हो चुकी है और चार बच्चे उनके साथ रहते हैं।\n\n5. बरसात के दिनों में परिवार को क्या परेशानी होती है?\nबरसात में बिजली न होने के कारण उन्हें रोशनी के लिए लकड़ी जलानी पड़ती है और पारंपरिक चूल्हे पर खाना बनाना पड़ता है।",
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  "category": "छत्तीसगढ़",
  "publishedAt": "2026-10-23",
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    "पहाड़ी कोरवा",
    "सरगुजा न्यूज़",
    "छत्तीसगढ़ ट्राइबल",
    "जनमन आवास योजना",
    "अंबिकापुर समाचार",
    "आदिवासी विकास"
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