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  "type": "article",
  "title": "छत्तीसगढ़ में धान की बालियों पर झुलसा रोग का खतरा, कृषि वैज्ञानिकों ने दी फफूंदनाशक छिड़काव की सलाह",
  "summary": "छत्तीसगढ़ में बाली निकलने के नाजुक दौर में धान की फसल नेक ब्लास्ट रोग की चपेट में आ रही है, जिससे उत्पादन में 50 फीसदी तक गिरावट का अंदेशा है। कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को तुरंत निगरानी और फफूंदनाशक के छिड़काव की सलाह दी है।",
  "content": "छत्तीसगढ़ में धान की खेती इस समय एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच चुकी है। खेतों में कई किस्मों के पौधों से बालियां निकल रही हैं और उनके विकसित होने का दौर जारी है। इसी नाजुक समय में राज्य के खेतों में नेक ब्लास्ट, जिसे बोलचाल में धान के गले का झुलसा रोग भी कहा जाता है, तेजी से पैर पसार रहा है। यह बीमारी सीधे पौधे के उस हिस्से पर वार करती है जहां से बाली बाहर आती है, जिससे उत्पादन को भारी आघात पहुंच सकता है। यदि समय पर इस बीमारी की रोकथाम के उपाय नहीं किए गए, तो किसानों की महीनों की मेहनत और उपज को 50 प्रतिशत तक का नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसी खतरे को देखते हुए कृषि विशेषज्ञों ने किसानों से नियमित निगरानी बरतने और तत्काल सही कदम उठाने की अपील की है।\n\nपौधों में नेक ब्लास्ट के प्रमुख लक्षण और पहचान\nइस बीमारी की पहचान करना बहुत आसान है, बशर्ते किसान अपने खेतों का लगातार मुआयना करते रहें। कृषि विज्ञान केंद्र बालोद के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ केआर साहू ने बताया कि नेक ब्लास्ट रोग होने पर धान की बाली जिस जोड़ या स्थान से तने से बाहर निकलती है, वहां भूरे रंग के धब्बे उभरने लगते हैं। वक्त बीतने के साथ यह प्रभावित हिस्सा धीरे-धीरे कमजोर और सड़ांध जैसा हो जाता है। तने के ऊपरी हिस्से में कमजोरी आ जाने के कारण कई बार धान की बालियां वजन नहीं संभाल पातीं और बीच से ही झुक जाती हैं। इसी विकृति और कमजोरी को कृषि विज्ञान में नेक ब्लास्ट अथवा गले का झुलसा कहा जाता है।\n\nफसल सुरक्षा के लिए फफूंदनाशक का सही छिड़काव\nइस फफूंद जनित रोग पर काबू पाने के लिए रासायनिक नियंत्रण के तौर-तरीके भी साझा किए गए हैं। डॉ केआर साहू के अनुसार, इस रोग की समय रहते रोकथाम करने के लिए किसान टेबुकोनाजोल अथवा हेक्साकोनाजोल जैसे असरदार फफूंदनाशकों का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके प्रयोग की विधि बताते हुए उन्होंने एक ग्राम दवा को प्रति लीटर पानी के अनुपात में घोलकर छिड़कने का परामर्श दिया है। खेत में सही तरीके से दवा पहुंचाने के लिए एक एकड़ रकबे में कम से कम 150 लीटर पानी के घोल का इस्तेमाल करना जरूरी है, ताकि हर पौधे पर दवा का समुचित और समान छिड़काव सुनिश्चित हो सके। हालांकि दवा के चयन, उसकी सटीक मात्रा और छिड़काव की प्रक्रिया को अंतिम रूप देने से पहले किसानों को उत्पाद के पैकेट पर दर्ज लेबल निर्देशों को ध्यान से पढ़ना चाहिए और स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से मार्गदर्शन अवश्य लेना चाहिए।\n\nलापरवाही पड़ सकती है भारी, नियमित निगरानी जरूरी\nछत्तीसगढ़ के कृषि परिदृश्य में यह समय इसलिए भी अत्यंत अहम माना जा रहा है क्योंकि विभिन्न किस्मों के खेतों में अभी भी बाली निकलने और परिपक्व होने का क्रम चल रहा है। इस दौरान पौधों को पोषण और सुरक्षा दोनों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। यदि किसान इस गंभीर अवस्था में बीमारी के शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं, तो बालियों में दाने नहीं भर पाएंगे और फसल आधी बर्बाद हो सकती है। किसानों को सलाह दी गई है कि वे सुबह और शाम अपने खेतों का नियमित निरीक्षण करें। जैसे ही बाली के ठीक नीचे भूरे चकत्ते, तने के ऊपरी हिस्से में कमजोरी या बालियों का असमय झुकना नजर आए, बिना देरी किए विशेषज्ञ से सलाह लेकर सही उपचार शुरू कर दें, जिससे बड़े आर्थिक नुकसान से बचा जा सके।\n\nइसका आप पर असर\nधान की फसल में नेक ब्लास्ट के संक्रमण से उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है, जिससे किसानों की आय सीधे तौर पर प्रभावित होगी।\n\n• भारत में: धान उत्पादक क्षेत्रों में इस फफूंद रोग का प्रसार राष्ट्रीय स्तर पर चावल के कुल उत्पादन और आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है। समय पर दवा छिड़काव की लागत बढ़ने से किसानों का प्रति एकड़ उत्पादन खर्च भी थोड़ा बढ़ जाता है।\n• छत्तीसगढ़ में: राज्य के कई जिलों में विभिन्न किस्मों में बाली निकलने का दौर चल रहा है, जहां लापरवाही से 50 प्रतिशत तक फसल बर्बाद हो सकती है। किसानों को प्रति एकड़ कम से कम 150 लीटर पानी में टेबुकोनाजोल या हेक्साकोनाजोल मिलाकर तुरंत सुरक्षात्मक कदम उठाने होंगे।\n• उपज और गुणवत्ता: समय पर उपचार न मिलने पर बालियों में दाने पूरी तरह नहीं भर पाते और फसल कमजोर होकर झुक जाती है। इसके चलते मंडियों में धान की गुणवत्ता गिरने से किसानों को उचित समर्थन मूल्य मिलने में कठिनाई हो सकती है।\n• लागत और प्रबंधन: एक ग्राम प्रति लीटर की दर से फफूंदनाशक का सही छिड़काव बीमारी को आगे फैलने से रोक देता है। समय रहते कदम उठाने से किसान अपनी महीनों की लागत और संभावित भारी नुकसान को पूरी तरह बचा सकते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nछत्तीसगढ़ में धान की बालियां निकलने के समय अनुकूल नमी और तापमान के चलते फफूंद जनित नेक ब्लास्ट रोग पनप रहा है। समय रहते कवक के प्रसार को न रोके जाने से यह बालियों के आधार को संक्रमित कर देता है।\n\n• रोग का प्रत्यक्ष कारण: यह बीमारी फफूंद के संक्रमण से पैदा होती है जो सीधे तने और बाली के जोड़ पर हमला करती है। वहां भूरे धब्बे बनने से रस का संचार रुक जाता है और प्रभावित हिस्सा सड़कर कमजोर हो जाता है।\n• संवेदनशील फसल अवस्था: राज्य में कई धान की किस्मों में अभी बाली निकलने और दानों के विकास की नाजुक प्रक्रिया चल रही है। इस अवस्था में पौधों के ऊतक अत्यंत कोमल होते हैं, जिससे रोगजनक कवक आसानी से भीतर प्रवेश कर जाता है।\n• मौसम और प्रसार की स्थितियां: खेतों में जरूरत से ज्यादा नमी या फफूंद के अनुकूल मौसम बनने पर यह रोग तेजी से फैलता है। नियमित निगरानी के अभाव में लक्षण तब दिखाई देते हैं जब बालियां झुकने लगती हैं और नुकसान आधा हो चुका होता है।\n• रोकथाम की आवश्यकता: यदि इस अवस्था में टेबुकोनाजोल या हेक्साकोनाजोल जैसे फफूंदनाशक का सही अनुपात में छिड़काव नहीं किया गया, तो कवक पूरे खेत में फैलकर फसल को 50 फीसदी तक नष्ट कर सकता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. धान में नेक ब्लास्ट या गले का झुलसा रोग क्या है?\nयह एक फफूंद जनित बीमारी है, जिसमें धान की बाली जिस जोड़ से निकलती है वहां भूरे धब्बे पड़ जाते हैं और तना कमजोर होकर झुक जाता है।\n\n2. नेक ब्लास्ट से धान की फसल को कितना नुकसान हो सकता है?\nयदि समय पर इस रोग की पहचान और रोकथाम न की जाए, तो फसल के उत्पादन में 50 प्रतिशत तक का भारी नुकसान हो सकता है।\n\n3. इस रोग के नियंत्रण के लिए कौन से फफूंदनाशक सुझाए गए हैं?\nकृषि विशेषज्ञों ने इसकी रोकथाम के लिए टेबुकोनाजोल और हेक्साकोनाजोल जैसे फफूंदनाशकों के उपयोग की सलाह दी है।\n\n4. दवा का छिड़काव किस अनुपात और मात्रा में करना चाहिए?\nएक ग्राम दवा को प्रति लीटर पानी में मिलाकर घोल तैयार करना चाहिए और प्रति एकड़ कम से कम 150 लीटर पानी का छिड़काव करना चाहिए।\n\n5. खेत में नेक ब्लास्ट के क्या शुरुआती लक्षण दिखाई देते हैं?\nबाली के निचले जोड़ पर भूरे रंग के धब्बे दिखते हैं, तने का ऊपरी हिस्सा कमजोर हो जाता है और कई बार बालियां नीचे की ओर झुक जाती हैं।",
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