# जगदलपुर में दुर्गा पूजा की धूम, डेढ़ लाख रुपये तक पहुंची प्रतिमाओं की मांग

> बस्तर दशहरा और त्योहारी सीजन के मद्देनजर जगदलपुर में भव्य दुर्गा पंडालों की तैयारी तेज हो गई है, जहां मूर्तियों के निर्माण और बिक्री में जोरदार तेजी देखी जा रही है।

**Type:** article · **Category:** छत्तीसगढ़ · **Published:** 2026-10-10 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/chhattisgarh/jagdalpur-men-durga-puja-ki-dhuma-derha-lakha-rupaye-taka-pahunchi-pratimaon-ki-manga-46072 · **Language:** Hindi
**Tags:** बस्तर दशहरा, जगदलपुर, दुर्गा प्रतिमा, जुरखान लाल प्रजापति, दुर्गा पूजा, मूर्तिकार

बस्तर अंचल के जगदलपुर में ऐतिहासिक बस्तर दशहरा और आगामी त्योहारों के आगमन से पहले उत्सव का माहौल पूरी तरह तैयार हो चुका है। शहर भर में आकर्षक दुर्गा पूजा पंडाल तेजी से खड़े किए जा रहे हैं, जिसके साथ ही दुर्गा प्रतिमाओं की मांग भी जबरदस्त उछाल पर है। अलग-अलग इलाकों में समितियां 80 हजार रुपये से लेकर डेढ़ लाख रुपये तक की भव्य और नक्काशीदार प्रतिमाएं स्थापित करने के लिए ऑर्डर दे रही हैं, जिससे स्थानीय मूर्तिकारों की कार्यशालाओं में दिन-रात हलचल मची हुई है।

## बारीक कारीगरी और आंखों को तराशने में लगता है सबसे ज्यादा वक्त
दुर्गा प्रतिमाओं को गढ़ना केवल शारीरिक श्रम नहीं, बल्कि अत्यधिक धैर्य और एकाग्रता की परीक्षा माना जाता है। मूर्तिकार प्रतिमा के शुरुआती ढांचे से लेकर उसके अंतिम साज-श्रृंगार तक कई कठिन चरणों से गुजरते हैं। सामान्य तौर पर एक प्रतिमा को पूरी तरह तैयार करने में 5 से 6 दिन का समय लगता है। निर्माण प्रक्रिया में सबसे नाजुक और समय लेने वाला काम रंग-रोगन के दौरान माता की आंखों को जीवंत स्वरूप देना होता है, जहां जरा सी चूक पूरे चेहरे के भाव को बदल सकती है।

## 12 साल की उम्र से मिट्टी को रूप दे रहे 64 वर्षीय जुरखान लाल
जगदलपुर के वरिष्ठ मूर्तिकार जुरखान लाल प्रजापति पिछले 52 वर्षों से लगातार इस पारंपरिक शिल्प को जीवंत रखे हुए हैं। उन्होंने महज 12 वर्ष की अल्पायु में मिट्टी की मूर्तियां गढ़ना आरंभ किया था और अब 64 वर्ष की उम्र में भी पूरी ऊर्जा के साथ नई प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं। वे प्रतिवर्ष गणेश उत्सव से लेकर दुर्गा पूजा तक अनवरत काम करते हैं। वर्तमान समय में भक्त और पूजा समितियां अपनी पसंद की तस्वीरें लाकर भी विशेष प्रतिमाएं तैयार करवाती हैं, जिन्हें वे हूबहू रूप देते हैं।

## सितंबर से ही बुक हो गईं 36 मूर्तियां, आकार के हिसाब से तय होती है कीमत
त्योहारी सीजन के लिए जुरखान लाल प्रजापति को सितंबर के महीने से ही मूर्तियों की बुकिंग मिलनी शुरू हो गई थी। इस बार उनके पास कुल 35 से 36 प्रतिमाओं के अग्रिम ऑर्डर आ चुके हैं। इन प्रतिमाओं का मूल्य उनके आकार, ऊंचाई और सजावट की जटिलता को देखकर तय किया जाता है। उन्हें इस सत्र में 13 फीट ऊंची एक विशाल प्रतिमा तैयार करने का काम 80 हजार रुपये में मिला है, जबकि 12 फीट ऊंची एक अन्य भव्य प्रतिमा का ऑर्डर भी वे पूरा कर रहे हैं।

## इसका आप पर असर
बस्तर दशहरा और दुर्गा पूजा के आयोजन से स्थानीय कारीगरों की आजीविका और सांस्कृतिक गतिविधियों में जोरदार उछाल आया है।

- **भारत में:** त्योहारी सीजन शुरू होने से पारंपरिक हस्तशिल्प और धार्मिक उत्सवों से जुड़ी स्थानीय अर्थव्यवस्था को सीधा संबल मिलता है। पूजा समितियों के बजट से हजारों पारंपरिक कारीगरों और सहायक कामगारों को सीजनल आय हासिल होती है।
- **जगदलपुर में:** शहर भर में 80 हजार से डेढ़ लाख रुपये की प्रतिमाओं और विशाल पंडालों की स्थापना से स्थानीय बाजारों में चहल-पहल बढ़ गई है। श्रद्धालुओं और आयोजकों को तय समय पर मूर्तियां पाने के लिए अग्रिम बुकिंग और समय प्रबंधन का सहारा लेना पड़ रहा है।
- **कारीगरों के लिए:** सितंबर से ही 35 से 36 मूर्तियों के अग्रिम ऑर्डर मिलने से स्थानीय मूर्तिकारों को कई महीनों का ठोस रोजगार मिला है। एक-एक मूर्ति पर 5 से 6 दिन की गहन मेहनत से कारीगरों के हुनर को सही पारिश्रमिक और पहचान मिल रही है।
- **पूजा समितियों के लिए:** 12 से 13 फीट ऊंची प्रतिमाओं की योजना बना रही समितियों को मूर्तियों के आकार और सजावट के आधार पर अपना खर्च तय करना पड़ रहा है। अपनी पसंद की तस्वीर के अनुसार प्रतिमा बनवाने के लिए समितियों को कारीगरों के साथ पहले से समन्वय बैठाना आवश्यक हो गया है।

## ऐसा क्यों हुआ
जगदलपुर में दुर्गा प्रतिमाओं की जोरदार मांग और कार्यशालाओं में बढ़ी सक्रियता के पीछे आगामी बस्तर दशहरा और पारंपरिक उत्सवों का व्यापक आयोजन मुख्य वजह है।

- **बस्तर दशहरा और त्योहारी कार्यक्रम:** विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के समानांतर दुर्गा पूजा की भव्य तैयारियों के कारण शहर में जगह-जगह पंडाल खड़े किए जा रहे हैं। भव्य सार्वजनिक आयोजनों की परंपरा के चलते समितियों द्वारा बड़े आकार और विशिष्ट सजावट वाली प्रतिमाओं को प्राथमिकता दी जा रही है।
- **गणेश उत्सव से दुर्गा पूजा तक का सिलसिला:** गणेश उत्सव के तुरंत बाद दुर्गा पूजा का आयोजन होने से मूर्तिकारों का कार्य चक्र सितंबर से ही चरम पर पहुंच जाता है। आयोजक समय रहते मूर्तियां तैयार कराने के लिए हफ्तों पहले से बुकिंग पूरी कर लेते हैं।
- **कस्टमाइज्ड मूर्तियों की बढ़ती मांग:** पूजा आयोजक अब सामान्य मॉडलों के बजाय अपनी पसंदीदा तस्वीरों के अनुरूप प्रतिमाएं बनवाना पसंद कर रहे हैं। इस व्यक्तिगत पसंद और 12 से 13 फीट तक के भव्य आकारों के कारण कारीगरों को अतिरिक्त समय और मेहनत लगानी पड़ रही है।

## सवाल-जवाब

### 1. जगदलपुर में दुर्गा प्रतिमाओं की कीमतें किस दायरे में हैं?
जगदलपुर में दुर्गा प्रतिमाओं की मांग 80 हजार रुपये से लेकर डेढ़ लाख रुपये तक की कीमत में देखी जा रही है।

### 2. एक दुर्गा प्रतिमा को तैयार करने में कितना समय लगता है?
एक प्रतिमा के निर्माण और अंतिम सजावट को पूरा करने में लगभग 5 से 6 दिन का समय लगता है।

### 3. प्रतिमा निर्माण के दौरान सबसे अधिक समय और बारीकी किस हिस्से में लगती है?
मूर्ति के रंग-रोगन और विशेष रूप से देवी की आंखें बनाने में सबसे ज्यादा बारीकी और समय की आवश्यकता होती है।

### 4. मूर्तिकार जुरखान लाल प्रजापति कितने वर्षों से मूर्तियां बना रहे हैं?
जुरखान लाल प्रजापति करीब 52 वर्षों से मूर्ति निर्माण का काम कर रहे हैं, जिसकी शुरुआत उन्होंने 12 वर्ष की उम्र में की थी।

### 5. इस त्योहारी सीजन में जुरखान लाल प्रजापति को कुल कितने ऑर्डर मिले हैं?
उन्हें सितंबर महीने से ही ऑर्डर मिलने शुरू हो गए थे और उनके पास कुल 35 से 36 प्रतिमाओं के ऑर्डर आए हैं।

### 6. जुरखान लाल प्रजापति को 13 फीट की प्रतिमा के लिए क्या राशि मिली है?
उन्हें 13 फीट ऊंची एक प्रतिमा तैयार करने का ऑर्डर 80 हजार रुपये में मिला है।

## प्रेरणा और सबक
पांच दशकों से अधिक समय से मिट्टी की पारंपरिक कला को सहेज रहे जुरखान लाल प्रजापति की यात्रा से समर्पण और निरंतरता की महत्वपूर्ण सीख मिलती है।

- **कम उम्र से कला के प्रति अटूट निष्ठा:** महज 12 साल की उम्र में शुरू किया गया हुनर 64 साल की उम्र में भी उतनी ही लगन से जारी है। अपने चुने हुए काम में निरंतरता बनाए रखने से ही व्यक्ति अपने क्षेत्र में पहचान और कुशलता हासिल करता है।
- **बदलाव और नई पसंद को अपनाना:** ग्राहकों द्वारा लाई गई तस्वीरों और आधुनिक प्राथमिकताओं के आधार पर मूर्तियां गढ़ना शिल्पकार के खुलेपन को दर्शाता है। समय के साथ नए बदलावों और ग्राहकों की मांग को स्वीकार करना ही काम को प्रासंगिक बनाए रखता है।
- **बारीकियों और धैर्य का महत्व:** एक मूर्ति में 5 से 6 दिन लगाकर खासतौर पर आंखों को जीवंत बनाना धैर्य की शक्ति सिखाता है। किसी भी काम में उत्कृष्टता जल्दबाजी से नहीं, बल्कि बारीकियों पर ध्यान देने से ही संभव होती है।

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