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  "type": "article",
  "title": "जितिया पर सरगुजा में महकी पारंपरिक गुजिया, दो दशक से मिठास घोल रहा गुप्ता परिवार",
  "summary": "छत्तीसगढ़ के सरगुजा में जितिया पर्व के मौके पर पारंपरिक गुजिया की मांग काफी बढ़ गई है, जहां यश गुप्ता का परिवार बीते 20 से 25 वर्षों से घर पर ही इसे तैयार कर थोक व्यापारियों तक पहुंचा रहा है।",
  "content": "छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में जितिया पर्व की दस्तक के साथ ही स्थानीय बाजारों में पारंपरिक मिठास की हलचल तेज हो चुकी है। इस लोकपर्व पर पारंपरिक पकवान गुजिया की भारी मांग निकलती है, जिसे पूरा करने के लिए एक स्थानीय परिवार बीते दो से ढाई दशकों से पूरी निष्ठा के साथ जुटा हुआ है। यश गुप्ता का परिवार पिछले 20 से 25 सालों से जितिया के आगमन पर अपने घर में ही पारंपरिक देशी विधि से गुजिया तैयार करने का काम कर रहा है। घरेलू स्तर पर तैयार होने वाली इस पारंपरिक मिठाई की मांग इतनी रहती है कि इसे इलाके के बड़े थोक व्यापारियों तक को आपूर्ति किया जाता है, जिससे पर्व के इस दौर में परिवार को एक बेहतर आय भी मिल जाती है।\n\nपारंपरिक विधि और खास भरावन का तरीका\nइस मिठाई को बनाने के पूरे हुनर और प्रक्रिया पर बात करते हुए यश गुप्ता ने बताया कि गुजिया तैयार करने की शुरुआत सबसे पहले पानी को हल्का गर्म करने से होती है। इसके बाद मैदे में डालडा और अन्य जरूरी सामग्री को सही अनुपात में मिलाकर उसे बहुत सलीके से गूंथा जाता है। जब मैदा पूरी तरह तैयार हो जाता है, तब उसकी छोटी-छोटी लोइयां काटी जाती हैं और उन्हें बेलकर पतली पूरियां बनाई जाती हैं। इसके बाद इन पूरियों के बीच में खोवा भरकर उन्हें पारंपरिक गुजिया का सुंदर आकार दिया जाता है।\n\nगुजिया के भीतर भरी जाने वाली मुख्य सामग्री विशुद्ध खोवा ही होती है। हालांकि, यश गुप्ता के अनुसार यदि किसी खरीदार को मेवे पसंद होते हैं, तो उसकी मांग पर भरावन में काजू भी मिलाया जाता है। इस पारंपरिक मिठास में क्या सामग्री शामिल की जाएगी, यह काफी हद तक ग्राहकों की व्यक्तिगत पसंद और उनके स्वाद पर निर्भर करता है।\n\nत्योहारी सीजन में तैयारी और अच्छी आमदनी\nमिठाई तैयार करने में लगने वाली मेहनत और समय को लेकर यश गुप्ता ने स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया तैयार की जाने वाली मात्रा पर टिकी होती है। यदि कम मात्रा में गुजिया बनानी हो तो यह काम करीब एक घंटे के भीतर पूरा हो जाता है, लेकिन जब ऑर्डर बड़े हों और थोक में तैयारी करनी हो, तो पूरा दिन भी लग जाता है। सबसे अधिक मांग तीज और जितिया पर्व के समय देखने को मिलती है, क्योंकि जितिया में गुजिया को अनिवार्य रूप से प्रसाद के तौर पर अर्पित किया जाता है। मांग के इसी दबाव को देखते हुए पर्व शुरू होने से लगभग 5 से 10 दिन पहले से ही गुजिया बनाने की तैयारी शुरू कर दी जाती है।\n\nबीते 20 से 25 वर्षों से निरंतर यह कार्य कर रहे यश गुप्ता का एक खास व्यापारिक नियम भी है। उनका कहना है कि वे ग्राहकों को पहले गुजिया चखाते हैं, और जब उसका स्वाद खरीदार को भा जाता है, तभी बिक्री की जाती है। इस पर्व के पूरे सीजन में गुजिया की सफल बिक्री के जरिए परिवार 20 हजार रुपये तक की शुद्ध कमाई आसानी से कर लेता है।\n\nइसका आप पर असर\nत्योहारी सीजन में पारंपरिक मिठाई बनाने वाले कारीगरों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए यह एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और आर्थिक अवसर होता है।\n\n• छत्तीसगढ़ में: सरगुजा और आसपास के जिलों में जितिया पर्व पर पूजन और प्रसाद के लिए स्थानीय स्तर पर शुद्ध देशी गुजिया सुलभ हो जाती है। खरीदारों को पहले स्वाद चखने की सुविधा मिलने से गुणवत्ता की पूरी तसल्ली मिलती है।\n• घरेलू अर्थव्यवस्था पर: त्योहारों के दौरान पारंपरिक पकवान तैयार करने वाले छोटे कारीगर महज 5 से 10 दिनों की मेहनत में 20 हजार रुपये तक की अतिरिक्त आय जुटा लेते हैं। यह मौसमी काम ग्रामीण और अर्ध-शहरी परिवारों की आर्थिक स्थिति को मजबूती देता है।\n• थोक एवं खुदरा बाजार: घर में बनी पारंपरिक गुजिया बड़े थोक व्यापारियों तक पहुंचने से बाजार में स्थानीय उत्पादों की आपूर्ति मजबूत होती है। इससे स्थानीय व्यापारिक शृंखला को बढ़ावा मिलता है और त्योहारों पर शुद्ध मिठाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित होती है।\n• ग्राहकों की पसंद: साधारण खोवा भरावन के साथ-साथ काजू जैसे सूखे मेवों के विकल्प मिलने से लोगों को अपनी पसंद के अनुसार पूजन सामग्री मिल जाती है। इससे पारंपरिक पर्वों पर अपनी पसंद के अनुसार मिठाई बनवाने की सुविधा बनी रहती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nजितिया पर्व पर पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं और पूजा विधान के कारण गुजिया की मांग में यह बड़ा उछाल दर्ज किया जाता है।\n\n• धार्मिक परंपरा: जितिया के लोकपर्व में गुजिया को मुख्य प्रसाद के रूप में पूजा के दौरान देवी-देवताओं को अर्पित किया जाता है। इसी धार्मिक आवश्यकता के चलते घर-घर में इसकी खपत अचानक कई गुना बढ़ जाती है।\n• मौसमी मांग की पूर्ति: त्योहारी भीड़ और थोक बाजार की मांग को समय पर पूरा करने के लिए कारीगर पर्व से 5 से 10 दिन पहले से ही तैयारी शुरू कर देते हैं। पहले से काम शुरू किए बिना त्योहार के दिन भारी मांग पूरी करना संभव नहीं होता।\n• पारंपरिक स्वाद का भरोसा: यश गुप्ता का परिवार 20 से 25 वर्षों से लगातार देशी अंदाज में गुणवत्तापूर्ण गुजिया बना रहा है। दो दशकों के इसी भरोसे और चखाकर बेचने की नीति के कारण थोक विक्रेता भी उन्हीं से आपूर्ति लेना पसंद करते हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सरगुजा में जितिया पर्व पर किस पारंपरिक पकवान की मांग सबसे ज्यादा रहती है?\nसरगुजा में जितिया पर्व के मौके पर पारंपरिक मिठाई गुजिया की सबसे अधिक मांग रहती है।\n\n2. यश गुप्ता का परिवार कितने समय से गुजिया बनाने का काम कर रहा है?\nयश गुप्ता का परिवार पिछले 20 से 25 वर्षों से लगातार जितिया के सीजन में गुजिया तैयार कर रहा है।\n\n3. गुजिया के भरावन में कौन-सी मुख्य सामग्री इस्तेमाल की जाती है?\nगुजिया के भरावन में मुख्य रूप से खोवा इस्तेमाल होता है, और ग्राहक की मांग पर काजू भी डाला जाता है।\n\n4. गुजिया बनाने का काम पर्व से कितने दिन पहले शुरू कर दिया जाता है?\nभारी मांग को देखते हुए जितिया पर्व से लगभग 5 से 10 दिन पहले ही गुजिया बनाने की तैयारी शुरू कर दी जाती है।\n\n5. गुजिया बनाने में कितना समय लगता है?\nकम मात्रा में गुजिया करीब एक घंटे में बन जाती है, जबकि ज्यादा मात्रा होने पर पूरा दिन भी लग सकता है।\n\n6. इस सीजन में गुजिया बेचकर परिवार कितनी कमाई कर लेता है?\nसीजन के दौरान बिक्री के बाद परिवार 20 हजार रुपये तक की कमाई कर लेता है।\n\nप्रेरणा और सबक\nयश गुप्ता के परिवार की यात्रा दिखाती है कि कैसे पारंपरिक हुनर और ईमानदारी से मौसमी काम में भी सम्मानजनक आय अर्जित की जा सकती है।\n\n• हुनर और निरंतरता: बीते 20 से 25 वर्षों से लगातार अपने पारंपरिक काम को जारी रखना यह सिखाता है कि निरंतरता ही साख बनाती है। किसी भी हुनर को लंबे समय तक साधना बाजार में स्थायी पहचान दिलाता है।\n• ग्राहकों का विश्वास: बिक्री से पहले ग्राहकों को स्वाद चखाने की नीति दर्शाती है कि उत्पाद की गुणवत्ता पर पूरा भरोसा होना कितना जरूरी है। खरीदार को संतुष्ट करने की यह नीति स्थायी ग्राहक आधार तैयार करती है।\n• सीमित समय में आजीविका: त्योहारी सीजन के महज कुछ दिनों में 20 हजार रुपये तक की कमाई यह साबित करती है कि मौसमी मांग को पहचानकर सही समय पर काम शुरू करना आर्थिक मजबूती दे सकता है।",
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  "category": "छत्तीसगढ़",
  "publishedAt": "2026-10-04",
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