# कांकेर के पुसाझर में ग्रामीणों ने खुद काटा पहाड़, पक्की सड़क न होने से सरकारी आवास और बुनियादी सुविधाएं अटकीं

> उत्तर बस्तर कांकेर के पुसाझर गांव में 16 परिवारों ने श्रमदान कर पहाड़ी रास्ता बनाया, मगर संकरा मार्ग होने से निर्माण वाहन और बुनियादी सेवाएं अब भी दूर हैं।

**Type:** article · **Category:** छत्तीसगढ़ · **Published:** 2026-09-30 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/chhattisgarh/kanker-ke-pusajhar-men-graminon-ne-khuda-kata-pahara-pakki-saraka-na-hone-se-sarakari-avasa-aura-buniyadi-suvidhaen-atakin-40455 · **Language:** Hindi
**Tags:** कांकेर, पुसाझर, उत्तर बस्तर, मुरागांव, ग्रामीण विकास, सड़क निर्माण, सरकारी आवास, छत्तीसगढ़

उत्तर बस्तर कांकेर की मुरागांव पंचायत के तहत आने वाले पुसाझर गांव में रहने वाले लोगों की जिंदगी आज भी कड़े इम्तिहान से गुजर रही है। पहाड़ों की तलहटी में आबाद इस बस्ती में करीब 16 कच्चे मकान हैं और कुल आबादी 120 लोगों की है। यहां के बाशिंदों के पास उम्मीदें और मजबूत इरादे तो हैं, लेकिन पक्की छत और सामान्य जनजीवन के साधन आज भी नसीब नहीं हो सके हैं। बस्ती तक आने-जाने का मार्ग इतना बीहड़ और पथरीला है कि रोजमर्रा की आवाजाही भी भारी जोखिम भरी साबित होती है।

## प्रशासनिक बेरुखी के बीच ग्रामीणों ने उठाया बीड़ा
इस पूरे अंचल ने लंबे समय तक नक्सली हिंसा और अशांति का संत्रास झेला है, जिसके चलते विकास कार्य पूरी तरह ठहर गए थे। हालात में सुधार आने के बावजूद पुसाझर गांव सरकारी तंत्र की उपेक्षा का शिकार बना रहा। जब प्रशासनिक स्तर पर पक्की राह तैयार नहीं हुई, तो गांव वालों ने खुद ही मोर्चा संभाला। अपनी जमा पूंजी लगाकर और मिलकर पसीना बहाते हुए ग्रामीणों ने चट्टानों को काटा और गांव को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए एक कच्चा रास्ता निकाल लिया। हालांकि जनसहयोग से बना यह रास्ता बेहद संकरा है, जिस पर सिर्फ पैदल या छोटे साधनों से ही चला जा सकता है।

## सड़क के अभाव में थम गया पक्के मकानों का निर्माण
शासन की तरफ से गांव के कुछ परिवारों के लिए पक्के आवास की स्वीकृति तो मिल चुकी है, लेकिन मौके पर काम शुरू करना पहाड़ जैसी चुनौती बन गया है। निर्माण स्थल तक ट्रैक्टर या बड़े मालवाहक वाहन नहीं पहुंच सकते, जिसके कारण सीमेंट, सरिया, ईंट और रेत जैसी आवश्यक सामग्री बस्ती तक नहीं लाई जा सकती। नतीजतन, जिन लोगों को पक्के घर मिलने की उम्मीद जगी थी, वे अब खुद सिर पर सामान ढोने और हाथों से नींव खोदने के लिए मजबूर हैं। दुर्गम चढ़ाई के चलते निर्माण सामग्री पहुंचाने की मशक्कत ने योजना की प्रगति को रोक रखा है।

## इलाज और पढ़ाई के लिए भी बीहड़ रास्तों की मजबूरी
सड़क न होने की यह त्रासदी केवल आवास योजना तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे स्वास्थ्य और शिक्षा की बुनियादी जरूरतें भी बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। गांव में किसी के बीमार पड़ने पर उसे मुख्य मार्ग तक ले जाना बेहद जोखिम भरा काम होता है। स्कूल जाने वाले बच्चों को भी हर रोज इन्हीं पथरीले रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है। पुसाझर के निवासियों का कहना है कि उनकी मांग किसी विशेष सुविधा की नहीं, बल्कि सिर्फ एक ऐसी चौड़ी और सुरक्षित सड़क की है, जिस पर बड़े वाहन चल सकें और विकास का लाभ सीधे उनकी चौखट तक पहुंच सके।

## इसका आप पर असर
पुसाझर गांव में सड़क न होने से सरकारी आवास और जरूरी नागरिक सेवाओं का लाभ जमीनी स्तर पर नहीं पहुंच पा रहा है।

- **छत्तीसगढ़ में:** सुदूर वनांचल और पूर्व नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सड़क संपर्क न होने से सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन बुरी तरह अटक जाता है। इससे ग्रामीण आबादी को स्वीकृत आवास और कल्याण योजनाओं के लिए भी भारी मशक्कत करनी पड़ती है।
- **पुसाझर और कांकेर में:** गांव के 120 निवासियों को आपातकालीन चिकित्सा, एम्बुलेंस और बच्चों की नियमित स्कूली शिक्षा के लिए पथरीले रास्तों पर निर्भर रहना पड़ता है। सड़क चौड़ी न होने से स्वीकृत पक्के मकानों के लिए आवश्यक सीमेंट और सरिया पहुंचना नामुमकिन बना हुआ है।
- **बुनियादी ढांचे पर असर:** भारी वाहनों की आवाजाही ठप रहने से क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सार्वजनिक निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाता है। इससे निर्माण लागत बढ़ जाती है और ग्रामीणों को अपना श्रम सामग्री ढोने में लगाना पड़ता है।
- **आपातकालीन सेवाओं पर प्रभाव:** रात के समय या गंभीर बीमारी के दौरान मरीजों को मुख्य सड़क तक ले जाने में काफी समय बर्बाद होता है। इससे कई बार समय पर प्राथमिक इलाज मिलना भी मुश्किल हो जाता है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह स्थिति दशकों से बुनियादी सड़क ढांचे की उपेक्षा और क्षेत्र के भौगोलिक तथा ऐतिहासिक अवरोधों के कारण बनी है।

- **ऐतिहासिक नक्सल प्रभाव:** इस क्षेत्र ने लंबे समय तक नक्सलवादी गतिविधियों का दौर देखा है, जिसके कारण सरकारी एजेंसियां अंदरूनी इलाकों में सड़क निर्माण और विकास कार्य तेजी से नहीं कर सकीं। सुरक्षा चिंताओं ने वर्षों तक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को रोके रखा।
- **कठिन भौगोलिक बनावट:** पुसाझर गांव घने पहाड़ों और बीहड़ इलाके के बीच बसा हुआ है, जहां भारी मशीनरी ले जाना और सामान्य सड़क काटना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है। ढलानों और पथरीली जमीन की वजह से यहां पारंपरिक परिवहन संभव नहीं हो पाता।
- **प्रशासनिक उदासीनता:** सुरक्षा हालात सामान्य होने के बाद भी स्थानीय प्रशासन ने इस छोटी बस्ती को जोड़ने के लिए चौड़ी सड़क स्वीकृत नहीं की। ग्रामीणों द्वारा अपने स्तर पर बनाए गए रास्ते को मोटर योग्य संपर्क मार्ग में बदलने के लिए आधिकारिक कदम नहीं उठाए गए।

## सवाल-जवाब

### 1. पुसाझर गांव किस जिले और पंचायत के अंतर्गत आता है?
यह गांव छत्तीसगढ़ के उत्तर बस्तर कांकेर जिले की मुरागांव पंचायत के तहत एक आश्रित बस्ती के रूप में आता है।

### 2. पुसाझर गांव में कुल कितने घर और कितनी आबादी है?
इस बस्ती में लगभग 16 घर हैं और वहां करीब 120 लोग निवास करते हैं।

### 3. ग्रामीणों को खुद रास्ता क्यों बनाना पड़ा?
सरकारी स्तर पर सड़क न बनने के कारण गांव पूरी तरह कटा हुआ था, इसलिए ग्रामीणों ने अपनी जमा पूंजी और श्रमदान से पहाड़ काटकर रास्ता तैयार किया।

### 4. गांव में सरकारी आवास का काम क्यों अटका हुआ है?
ग्रामीणों द्वारा बनाया गया रास्ता बहुत संकरा है, जिससे सीमेंट, रेत और सरिया लाने वाले ट्रैक्टर और भारी वाहन गांव तक नहीं पहुंच पाते।

### 5. पुसाझर के ग्रामीणों की मुख्य मांग क्या है?
ग्रामीणों की मांग है कि गांव तक एक ऐसी चौड़ी और पक्की सड़क बनाई जाए जिससे भारी वाहन और बुनियादी सुविधाएं बस्ती तक पहुंच सकें।

## प्रेरणा और सबक
पुसाझर के निवासियों ने व्यवस्था पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय सामूहिक एकता और आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है।

- **सामूहिक श्रम का महत्व:** ग्रामीणों ने आपसी सहयोग और श्रमदान के जरिए पहाड़ों को काटकर रास्ता बनाकर यह साबित किया कि एकजुट होकर कठिन बाधाओं को भी पार किया जा सकता है।
- **संसाधनों का साझा उपयोग:** अपनी छोटी-छोटी बचतों को जोड़कर सार्वजनिक रास्ते के लिए लगाना यह सिखाता है कि सामुदायिक जरूरतों के लिए व्यक्तिगत योगदान कितना अहम होता है।
- **सकारात्मक संघर्ष का संकल्प:** बुनियादी सुविधाओं के अभाव और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद ग्रामीणों ने अपनी उम्मीद नहीं खोई और लगातार अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं।

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