खेतों की मेड़ पर बांस का अनोखा जाल लगाकर मछली पकड़ रहे बस्तर के किसान, पांच साल तक चलता है यह पारंपरिक औजार छत्तीसगढ़ के बस्तर में ग्रामीण सूखे बांस से पारंपरिक जाल 'दांदर' बनाकर बरसात के दिनों में खेतों से रोजाना एक किलो तक मछली पकड़ रहे हैं. छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में मानसून की फुहारों के बीच धान के खेतों में एक अनूठी और पुरानी रिवायत देखने को मिलती है. यहां के किसान बारिश के मौसम में खेतों की मेड़ पर पानी के तेज बहाव के बीच मछली पकड़ने के लिए एक विशेष पारंपरिक उपकरण का इस्तेमाल करते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में 'दांदर' कहा जाता है. पूरी तरह से सूखे बांस से तैयार की जाने वाली यह दांदर खेतों की मेड़ों पर ऐसे मुहाने पर बिठा दी जाती है जहां से पानी का निकास होता है. जब तेज बारिश का पानी ऊपर के खेतों से नीचे की ओर बहता है, तो पानी के साथ बहकर आने वाली मछलियां इस ढांचे में सीधी फंस जाती हैं. इस बेहद सादे और कारगर तरीके से ग्रामीण हर रोज आधा किलो से लेकर एक किलो तक ताजी मछलियां बिना किसी अतिरिक्त खर्च के हासिल कर लेते हैं. कैसे बुनी जाती है गोल और लंबी दांदर बरसात की शुरुआत होते ही बस्तर के गांव-देहातों में किसान अपने हाथों से दांदर तैयार करने के काम में जुट जाते हैं. पीढ़ियों से इस इलाके के बाशिंदे मछली के शिकार के लिए इसी देसी औजार पर भरोसा करते आए हैं. आकार में यह गोल और कुछ लंबाई लिए हुए एक जालीदार टोकरी जैसी संरचना होती है. इसकी बनावट में सबसे खास बात यह होती है कि इसके बारीक छिद्रों से होकर खेत का पानी तो बड़ी आसानी से पूरा का पूरा बाहर निकल जाता है, लेकिन अंदर दाखिल हुई मछलियां वापस नहीं लौट पातीं. बस्तर के बाशिंदे मछली पकड़ने के लिए बाजार में बिकने वाले नायलॉन के महंगे जालों अथवा प्लास्टिक के उपकरणों पर बिल्कुल निर्भर नहीं रहते, बल्कि अपने आसपास मौजूद प्राकृतिक संसाधनों से खुद ही अपनी जरूरत का सामान गढ़ते हैं. सोनसाय ने साझा की दांदर बनाने की बारीकियां दांदर तैयार करने में जुटे ग्रामीण सोनसाय ने इसकी बुनाई और लागत से जुड़े अनुभव साझा किए. सोनसाय के अनुसार, इस पूरे जाल को तैयार करने के लिए अच्छी तरह सूखे हुए बांस का इस्तेमाल किया जाता है. आर्थिक नजरिए से देखा जाए तो इसे बनाने में कोई बड़ा खर्च नहीं आता, क्योंकि बांस को पतले और छोटे टुकड़ों में काटकर बड़ी कुशलता से एक-दूसरे के साथ पिरोया जाता है. यदि रोजमर्रा के खेती-बाड़ी के कामों के बीच थोड़ा-थोड़ा फुर्सत का वक्त निकालकर इसे गढ़ा जाए, तो एक मुकम्मल दांदर तैयार करने में लगभग चार से पांच दिन का समय लग जाता है. सोनसाय का कहना है कि सूखी लकड़ी और मजबूत बांस की कमचियों से बनी एक दांदर इतनी टिकाऊ होती है कि वह करीब पांच साल तक बिना टूटे-फूटे लगातार काम करती रहती है. बुजुर्गों से मिला परंपरागत हुनर और लगाने का तरीका यह पारंपरिक शिल्प और खेत में इसे लगाने की कला कोई नई नहीं है, बल्कि सोनसाय ने इसे अपने पूर्वजों और परिवार के बड़े-बुजुर्गों को देखकर सीखा है. इस बांस के जाल का पूरा उपयोग केवल वर्षाकाल में ही किया जाता है, जब खेतों में पर्याप्त जलभराव रहता है. किसान इसे खेत के ऊपरी हिस्से या मेड़ के उस कटाव पर मजबूती से जमा देते हैं, जहां से पानी सीधे बहकर निकलता है. जैसे ही पानी की धारा एक खेत की सीमा लांघकर दूसरे निचले खेत में प्रवेश करती है, धार के साथ बहने वाली मछलियां दांदर के भीतर trapped हो जाती हैं और पानी स्वच्छंद होकर आगे निकल जाता है. इसका आप पर असर बस्तर के किसानों का यह पारंपरिक औजार ग्रामीण परिवारों को मुफ्त भोजन और पर्यावरण के अनुकूल आजीविका का साधन प्रदान करता है. • भारत में: देश भर के ग्रामीण समुदाय बिना प्लास्टिक कचरा फैलाए स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों से आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा ले सकते हैं. इससे महंगे सिंथेटिक जालों पर होने वाला खर्च बचता है और स्थानीय जल प्रणालियों को नुकसान भी नहीं पहुंचता. • बस्तर में: स्थानीय ग्रामीणों को बारिश के मौसम में अपनी ही मेड़ों से रोज आधा से एक किलो ताजी मछली मिल जाती है. यह घरेलू भोजन में पोषण बढ़ाने के साथ-साथ बाजार से खाद्य सामग्री खरीदने का खर्च भी काफी कम कर देता है. • शिल्प और बचत: एक बार चार से पांच दिन की मेहनत से बनी यह दांदर पांच साल तक काम देती है. ग्रामीणों को लंबे समय तक मछली पकड़ने के किसी नए उपकरण में पैसा लगाने की जरूरत नहीं पड़ती. • टिकाऊ तकनीक: पूरी तरह बांस से बनने के कारण यह पर्यावरण को किसी भी तरह से प्रदूषित नहीं करता. इसके पुराने या खराब होने पर इसे आसानी से नष्ट किया जा सकता है. ऐसा क्यों हुआ बरसात के दिनों में खेतों में जलभराव और ऊपरी खेतों से निचले खेतों की ओर पानी का तेज बहाव ही इस पारंपरिक तकनीक के इस्तेमाल का मुख्य कारण है. • जलभराव और जल प्रवाह: भारी मानसूनी बारिश के चलते धान के खेतों में पानी भर जाता है और वह मेड़ों के रास्तों से होकर निचले खेतों में उतरता है. इस प्राकृतिक बहाव के साथ मछलियां भी एक खेत से दूसरे खेत की ओर तैरती हुई आगे बढ़ती हैं. • पारंपरिक ज्ञान की निरंतरता: बाजार के महंगे जालों की तुलना में बस्तर के आदिवासियों और ग्रामीणों के पास पीढ़ियों से बांस की चीजें बनाने का पारंपरिक हुनर मौजूद रहा है. स्थानीय स्तर पर उपलब्ध बांस से यह औजार बहुत कम खर्च में घर पर ही तैयार हो जाता है. • मौसम की अनुकूलता: यह साधन केवल मानसूनी जलभराव के दौरान ही प्रभावी रूप से काम करता है, इसलिए ग्रामीण वर्षा शुरू होते ही इसे मेड़ों पर स्थापित कर देते हैं. अन्य मौसमों में खेतों में बहाव न होने के कारण इसका उपयोग नहीं होता. सवाल-जवाब 1. दांदर क्या है और इसका उपयोग किस काम में होता है? दांदर बांस से बना एक पारंपरिक जालीदार उपकरण है, जिसका इस्तेमाल बस्तर के किसान खेतों की मेड़ पर मछली पकड़ने के लिए करते हैं. 2. दांदर बनाने में मुख्य रूप से किस सामग्री का उपयोग किया जाता है? इसे बनाने के लिए पूरी तरह सूखे बांस की पतली और मजबूत कमचियों का उपयोग किया जाता है. 3. एक दांदर को तैयार करने में कितना समय लगता है? यदि किसान थोड़ा-थोड़ा समय निकालकर काम करें, तो इसे बनाने में चार से पांच दिन का समय लगता है. 4. सूखे बांस से बनी एक दांदर कितने समय तक चलती है? ग्रामीण सोनसाय के अनुसार, सूखे बांस से बनी दांदर लगभग पांच साल तक सुरक्षित और काम करने लायक रहती है. 5. इस जाल के जरिए एक दिन में कितनी मछली पकड़ी जा सकती है? इसके माध्यम से किसान एक दिन में आधा किलो से लेकर एक किलो तक मछली आसानी से पकड़ लेते हैं. 6. दांदर को खेत में किस स्थान पर लगाया जाता है? इसे खेत के ऊपरी हिस्से और मेड़ के मुहाने पर लगाया जाता है, ताकि बहता हुआ पानी इसके बीच से होकर निकले. प्रेरणा और सबक सोनसाय और बस्तर के ग्रामीणों का यह हुनर दिखाता है कि कैसे स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक समझ से आत्मनिर्भर जीवन जिया जा सकता है. • स्थानीय संसाधनों का सम्मान: बाजार पर निर्भर रहने के बजाय अपने आसपास मौजूद बांस का उपयोग कर उपयोगी साधन बनाना आत्मनिर्भरता सिखाता है. थोड़ी सी समझ से प्रकृति से जुड़ी सामग्री उपयोगी उपकरण बन सकती है. • धैर्य और हुनर: रोज के कामकाज के बीच थोड़ा-थोड़ा समय देकर चार से पांच दिन में तैयार की गई चीज पांच साल तक सेवा देती है. सतत प्रयास से लंबे समय तक चलने वाले नतीजे हासिल किए जा सकते हैं. • परंपरा का संरक्षण: अपने बुजुर्गों से सीखी गई देसी तकनीकों को आधुनिक दौर में भी जिंदा रखना सांस्कृतिक धरोहर को बचाए रखने का बेहतरीन उदाहरण है. https://trendkia.com/chhattisgarh/kheton-ki-mera-para-bansa-ka-anokha-jala-lagakara-machhali-pakara-rahe-bastar-ke-kisana-pancha-sala-taka-chalata-hai-yaha-parnpari-40938 TrendKia — Har trend, sabse pehle.