मानसून में सूअरों को जानलेवा क्लासिकल स्वाइन फीवर से बचाने के लिए डॉक्टर राम ओत्तलवार ने दिए जरूरी सुरक्षा टिप्स बरसात के दौरान पशुओं में बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है, जिससे सूअरों में क्लासिकल स्वाइन फीवर का गंभीर खतरा पैदा होता है। बिलासपुर जिला पशु चिकित्सालय के डॉक्टर राम ओत्तलवार ने पशुपालकों को नियमित टीकाकरण और बाड़े की साफ-सफाई रखने की सलाह दी है। वर्षा ऋतु का आगमन अपने साथ जहां चिलचिलाती गर्मी से राहत लाता है, वहीं इंसानों के साथ-साथ मूक पशुओं के लिए भी कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं और बीमारियों का सबब बनता है। इस मौसम में उमस और नमी के कारण बैक्टीरिया तथा वायरस का प्रकोप काफी बढ़ जाता है। विशेष रूप से सूअर पालन करने वाले किसानों और पशुपालकों को इस बरसात के दिनों में अपने जानवरों की सेहत के प्रति अत्यंत सतर्क रहने की आवश्यकता होती है। बिलासपुर जिला पशु चिकित्सालय में कार्यरत पशु चिकित्सक डॉक्टर राम ओत्तलवार ने इस संबंध में सूअर पालकों को बेहद महत्वपूर्ण सलाह दी है। उन्होंने बताया कि इस मौसम में सूअरों के भीतर क्लासिकल स्वाइन फीवर नाम की एक बेहद घातक और तेजी से फैलने वाली वायरल बीमारी का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। इस जानलेवा बीमारी से बचाव के लिए पशुपालकों को समय रहते सुरक्षात्मक उपाय अपनाने होंगे। हर उम्र के पशुओं के लिए खतरनाक है यह वायरस डॉक्टर राम ओत्तलवार के अनुसार, क्लासिकल स्वाइन फीवर एक अत्यंत संक्रामक और गंभीर वायरल बीमारी है, जो किसी भी उम्र के सूअर को अपनी चपेट में ले सकती है। यह बीमारी नवजात और छोटे बच्चों से लेकर पूरी तरह विकसित हो चुके बड़े सूअरों को भी बीमार कर सकती है। वर्तमान समय में कई किसान और व्यवसायिक पशुपालक केवल मांस उत्पादन के उद्देश्य से बहुत ही कम समय के लिए सूअर पालन का कार्य करते हैं। वे पशुओं को थोड़े समय तक पालते हैं और मुनाफा कमाने के बाद उन्हें बाजार में बेच देते हैं। डॉक्टर ओत्तलवार ने इस बात पर विशेष बल दिया है कि पशु को पालने की अवधि चाहे कितनी ही कम या सीमित क्यों न हो, पशुपालकों को उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा और टीकाकरण से जुड़े नियमों की अनदेखी बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। सुरक्षा उपायों में की गई जरा सी भी कोताही भारी नुकसान का कारण बन सकती है। टीकाकरण ही है सबसे मजबूत ढाल इस घातक वायरस के प्रकोप से अपने पशुधन को सुरक्षित रखने का एकमात्र और सबसे प्रभावी उपाय नियमित रूप से टीकाकरण कराना है। डॉक्टर राम ओत्तलवार का कहना है कि पशुपालकों को अपने सभी पशुओं का निर्धारित समय चक्र के अनुसार वैक्सीन लगवाना सुनिश्चित करना चाहिए। समय पर टीका लग जाने से सूअरों के शरीर में इस वायरस के खिलाफ लड़ने के लिए पर्याप्त प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है, जिससे बीमारी के संक्रमण की आशंका न के बराबर रह जाती है। वर्षा ऋतु के शुरुआती दौर में ही पशुओं की सघन निगरानी करना और पशु चिकित्सकों के परामर्श से उन्हें उपयुक्त टीके लगवाना एक समझदार पशुपालक की पहचान है। बिना वैक्सीन वाले पशुओं में गंभीर लक्षण और गर्भपात का खतरा यदि सूअर पालने वाले किसान समय पर अपने पशुओं का टीकाकरण नहीं करवाते हैं, तो वायरस के संपर्क में आने पर पशुओं की स्थिति बेहद नाजुक हो सकती है। संक्रमित होने के बाद पशु को बहुत तेज बुखार आता है, और उनके शरीर में कई अन्य गंभीर लक्षण दिखाई देने लगते हैं। इसके अलावा, यदि कोई मादा सूअर गर्भवती है, तो इस संक्रमण के कारण उसमें गर्भपात होने की आशंका अत्यधिक बढ़ जाती है, जिससे पशुपालक को बड़ा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। बीमारी की तीव्रता अधिक होने पर संक्रमित पशु की असमय मृत्यु भी हो सकती है। डॉक्टर ने चेतावनी दी है कि पशुपालकों को कभी भी बीमारी के लक्षण प्रकट होने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए, बल्कि लक्षण आने से पहले ही पशु चिकित्सक की सलाह लेकर वैक्सीन लगवा लेनी चाहिए। संक्रमण फैलने का तरीका और आपसी संपर्क से बचाव बीमारी के फैलने के तरीकों पर रोशनी डालते हुए डॉक्टर राम ओत्तलवार ने स्पष्ट किया कि कई संक्रामक बीमारियां एक पशु से दूसरे पशु के सीधे संपर्क में आने से बहुत तेजी से फैलती हैं। यदि पशुपालक अपने सूअरों को खुले में चरने या घूमने के लिए आवारा छोड़ देते हैं, तो उनके संक्रमित होने का जोखिम कई गुना बढ़ जाती है। जब ये खुले में घूमने वाले पशु किसी बीमार या संक्रमित जानवर के संपर्क में आते हैं, तो वे भी इस जानलेवा वायरस के वाहक बन जाते हैं। इसलिए, यह आवश्यक है कि वर्षा ऋतु के दौरान सूअरों के इधर-उधर स्वतंत्र रूप से घूमने और अन्य बाहरी पशुओं के साथ उनके संपर्क में आने पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए। बाड़े की स्वच्छता है सुरक्षा की गारंटी वायरस और बैक्टीरिया जनित बीमारियों से बचाव में स्वच्छता की भूमिका सर्वोपरि मानी जाती है। सूअरों को रखे जाने वाले बाड़े की नियमित सफाई अत्यंत अनिवार्य है। बाड़े के भीतर किसी भी प्रकार की गंदगी, कीचड़ या दूषित पानी का जमाव नहीं होना चाहिए। डॉक्टर ओत्तलवार के मुताबिक, चाहे गायों को रखने का कोठा हो या सूअरों के रहने का बाड़ा, यदि वहां साफ-सफाई का कड़ाई से पालन किया जाए, तो संक्रमण फैलाने वाले रोगाणु पनप ही नहीं पाते। इससे पशुओं को कई प्रकार की संक्रामक बीमारियों के जोखिम से आसानी से बचाया जा सकता है। चिकित्सकीय सलाह और त्वरित कदम उठाने की अपील अंत में, बिलासपुर के डॉक्टर राम ओत्तलवार ने सभी सूअर पालकों से बेहद संजीदगी के साथ अपील की है कि वे बरसात के इस संवेदनशील मौसम में क्लासिकल स्वाइन फीवर जैसी जानलेवा बीमारी से निपटने के लिए तत्पर रहें। वे अपने सभी छोटे-बड़े सूअरों को समय पर टीका जरूर लगवाएं। इसके साथ ही, अपने पशुशाला या बाड़े की स्वच्छता सुनिश्चित करें। यदि किसी भी सूअर में सुस्ती, तेज बुखार, भोजन न करना या बीमारी का कोई अन्य लक्षण दिखाई दे, तो बिना समय गंवाए तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क कर उसका इलाज शुरू करवाएं। उचित सावधानी, साफ-सफाई और समय पर किया गया उपचार ही पशुओं की जान बचा सकता है और किसानों को भारी नुकसान से उबार सकता है। इसका आप पर असर यह सलाह पशुपालकों को मानसून के दौरान अपने पशुओं को गंभीर बीमारियों से बचाने और भारी आर्थिक नुकसान से सुरक्षित रखने में मदद करेगी। • पशुपालकों के लिए: समय पर टीकाकरण कराने से सूअरों की मृत्यु दर में भारी कमी आएगी। इससे किसानों को मिलने वाला मुनाफा सुरक्षित रहेगा और अचानक होने वाले आर्थिक नुकसान से बचाव होगा। • बिलासपुर और छत्तीसगढ़ में: स्थानीय पशु चिकित्सालयों में विशेष टीकाकरण अभियान चलाए जा रहे हैं। बिलासपुर के पशुपालक तुरंत अपने नजदीकी सरकारी अस्पताल से संपर्क करके मुफ्त या रियायती दरों पर वैक्सीन लगवा सकते हैं। • मांस की गुणवत्ता पर असर: स्वस्थ पशुओं के कारण बाजार में मिलने वाले मांस की गुणवत्ता बनी रहेगी। उपभोक्ताओं को भी संक्रमण मुक्त और स्वच्छ खाद्य उत्पाद प्राप्त होंगे। • साफ-सफाई के नियम: बाड़े की स्वच्छता बनाए रखने से अन्य संक्रामक रोगों का खतरा 80 प्रतिशत तक कम हो जाएगा। इससे पशुओं के इलाज पर होने वाला खर्च बचेगा और किसानों की बचत बढ़ेगी। ऐसा क्यों हुआ मानसून के मौसम में नमी और उमस बढ़ने के कारण क्लासिकल स्वाइन फीवर जैसी वायरल बीमारियों के फैलने के लिए अनुकूल वातावरण बन जाता है। इस दौरान गंदगी और संक्रमित पशुओं के खुले में घूमने से वायरस का प्रसार तेजी से होता है। • नमी और तापमान: बरसात के दिनों में बाड़ों में सीलन और गंदगी बढ़ जाती है। यह गीलापन वायरस और बैक्टीरिया को पनपने के लिए सबसे उपयुक्त माहौल प्रदान करता है। • टीकाकरण की कमी: कई पशुपालक कम समय के लिए सूअर पालने के कारण वैक्सीन लगवाने में कोताही बरतते हैं। बिना सुरक्षा चक्र के ये पशु वायरस की चपेट में आसानी से आ जाते हैं। • संक्रमित संपर्क: सूअरों को खुले में चरने के लिए छोड़ने से वे संक्रमित जानवरों के सीधे संपर्क में आते हैं। यह संपर्क स्वस्थ पशुओं में वायरस के तेजी से फैलने का मुख्य कारण बनता है। सवाल-जवाब 1. क्लासिकल स्वाइन फीवर क्या है? यह सूअरों में होने वाली एक गंभीर और तेजी से फैलने वाली वायरल बीमारी है, जो हर उम्र के सूअर को प्रभावित कर सकती है। 2. इस बीमारी के मुख्य लक्षण क्या हैं? संक्रमित पशुओं को बहुत तेज बुखार आता है और गर्भवती मादा सूअरों में गर्भपात का खतरा बढ़ जाता है। 3. क्लासिकल स्वाइन फीवर से सूअरों को कैसे बचाया जा सकता है? इस जानलेवा बीमारी से बचाव का एकमात्र उपाय नियमित और समय पर टीकाकरण कराना तथा बाड़े को साफ रखना है। 4. क्या कम समय के लिए पाले गए सूअरों को भी टीका लगाना जरूरी है? हां, डॉक्टर के अनुसार पशु पालने की अवधि चाहे कितनी भी कम हो, सुरक्षा के लिए टीकाकरण को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। 5. यह संक्रमण एक पशु से दूसरे पशु में कैसे फैलता है? यह बीमारी संक्रमित पशुओं के सीधे संपर्क में आने और उन्हें खुले में इधर-उधर घूमने देने से फैलती है। https://trendkia.com/chhattisgarh/manasuna-men-suaron-ko-janaleva-classical-swine-fever-se-bachane-ke-lie-doctor-ram-ottalwar-ne-die-jaruri-suraksha-tipsa-31381 TrendKia — Har trend, sabse pehle.