मॉल में ग्राहकों से पार्किंग शुल्क वसूलना गैरकानूनी, उपभोक्ता आयोग ने ठोका 55 हजार रुपये का हर्जाना छत्तीसगढ़ राज्य उपभोक्ता आयोग ने रायपुर के एक मॉल को ग्राहकों से पार्किंग फीस वसूलने पर फटकार लगाते हुए इसे सेवा में कमी करार दिया और पीड़ित को 55 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। व्यावसायिक परिसरों और शॉपिंग परिसरों में खरीदारी के लिए पहुंचने वाले आगंतुकों से मनमाना पार्किंग शुल्क वसूलने के चलन पर न्यायपालिका ने सख्त रुख अख्तियार किया है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में स्थित एक प्रमुख मॉल प्रबंधन को ग्राहकों से वाहन खड़ा करने के बदले पैसे लेना भारी पड़ गया है। राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि जो प्रतिष्ठान पहले से ही अपने दुकानदारों से सुविधाओं के रख-रखाव का पैसा वसूलते हैं, वे परिसर में आने वाले खरीदारों या वहां काम करने वाले कर्मचारियों पर पार्किंग शुल्क का अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं डाल सकते। आयोग ने इसे अनुचित व्यापार व्यवहार और सेवा में गंभीर लापरवाही करार दिया है। सड्डू स्थित मॉल का विवाद और कानूनी लड़ाई यह विवाद रायपुर के सड्डू इलाके में संचालित एक बड़े मॉल से जुड़ा हुआ है, जहां वाहन लेकर आने वाले ग्राहकों से बाकायदा पार्किंग पर्ची काटकर रकम वसूली जा रही थी। इस मनमानी व्यवस्था से त्रस्त होकर एक जागरूक उपभोक्ता ने जिला उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया। जिला फोरम ने मामले के तमाम तथ्यों की पड़ताल के बाद शिकायतकर्ता के पक्ष में व्यवस्था दी और मॉल प्रबंधन को तुरंत प्रभाव से सशुल्क पार्किंग बंद करने तथा आगंतुकों के लिए निशुल्क पार्किंग का प्रबंध करने का कड़ा निर्देश जारी किया। जिला मंच के इस फैसले को चुनौती देते हुए मॉल संचालक ने उच्च मंच यानी राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील दायर कर दी। हालांकि प्रबंधन की यह दलील आयोग की पीठ के समक्ष टिक नहीं सकी। राज्य आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति गौतम चौड़िया और आयोग के सदस्य प्रमोद कुमार वर्मा की संयुक्त पीठ ने 24 सितंबर को दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद मॉल प्रबंधन की अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया और जिला फोरम के मूल आदेश को यथावत बरकरार रखा। आयोग की दो-टूक टिप्पणी: मेंटेनेंस लेते हैं तो पार्किंग का पैसा क्यों राज्य उपभोक्ता आयोग ने अपने फैसले में इस बात पर विशेष बल दिया कि मॉल संचालन के दौरान दुकानदारों से केंद्रीय वातानुकूलन प्रणाली, निर्बाध बिजली आपूर्ति, चौबीसों घंटे सुरक्षा व्यवस्था और स्वचालित सीढ़ियों यानी एस्केलेटर जैसी साझा सुविधाओं के नाम पर पहले से ही भारी-भरकम मेंटेनेंस शुल्क लिया जाता है। ऐसी स्थिति में खरीदारों या वहां कार्यरत कर्मचारियों से वाहन पार्क करने के लिए अलग से शुल्क वसूलना सीधे-सीधे उपभोक्ता अधिकारों का हनन है। इतना ही नहीं, सुनवाई के दौरान आयोग ने बिना अधिकृत अनुमति के वाहनों में लगे फास्टैग के माध्यम से स्वतः पार्किंग शुल्क काटे जाने को भी पूरी तरह नियम विरुद्ध माना। निरीक्षण और दस्तावेजों से यह तथ्य भी उजागर हुआ कि मॉल के मुख्य प्रवेश द्वार अथवा परिसर में 10 मिनट की निशुल्क पार्किंग या ड्रॉप-ऑफ सुविधा से जुड़ा कोई भी सूचना पट्ट नहीं लगाया गया था, जिससे आम लोगों को भ्रम में रखकर भुगतान के लिए विवश किया जाता था। 45 दिन के भीतर मुआवजा भुगतान का कड़ा फरमान उपभोक्ता को हुई असुविधा और मानसिक संताप के मद्देनजर आयोग ने मॉल प्रबंधन पर 55 हजार रुपये का कुल हर्जाना लगाया है। इसमें से 50 हजार रुपये शिकायतकर्ता को मानसिक प्रताड़ना की क्षतिपूर्ति के रूप में तथा 5 हजार रुपये अदालती खर्च और कानूनी प्रक्रिया के व्यय के तौर पर देने होंगे। पीठ ने इस राशि के भुगतान के लिए 45 दिन की समय-सीमा तय की है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि यदि तय मियाद के भीतर मॉल प्रबंधन ने पीड़ित को इस हर्जाने का भुगतान नहीं किया, तो उसे फैसले की तारीख से 7 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से साधारण ब्याज भी अदा करना पड़ेगा। यह न्यायिक व्यवस्था देश भर के व्यावसायिक मॉल प्रबंधनों के लिए स्पष्ट संदेश देती है कि व्यावसायिक मुनाफे की आड़ में ग्राहकों के बुनियादी अधिकारों से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। इसका आप पर असर यह फैसला शॉपिंग मॉल में खरीदारी करने जाने वाले आम उपभोक्ताओं को गलत वसूली से बचाता है और उनके कानूनी अधिकारों को मजबूत करता है। • भारत में: देशभर के वाणिज्यिक परिसरों में जाने वाले लोग अब अनुचित पार्किंग फीस के खिलाफ उपभोक्ता मंचों पर कानूनी शिकायत दर्ज कराने का मजबूत आधार पा सकेंगे। यदि कोई मॉल रखरखाव का खर्च दुकानदारों से लेने के बाद भी खरीदारों पर पार्किंग शुल्क थोपता है, तो इस न्यायिक नजीर के दम पर ग्राहक मनमाने भुगतान का विरोध कर सकते हैं। • रायपुर में: शहर के सड्डू और आसपास के व्यावसायिक परिसरों में जाने वाले वाहन चालकों को अवैध पार्किंग टिकट कटवाने से तत्काल राहत मिलेगी। मॉल में आने वाले लोग परिसर में 10 मिनट के ड्रॉप-ऑफ समय का मुफ्त इस्तेमाल कर सकेंगे और बिना अनुमति फास्टैग से पैसे कटने पर शिकायत दर्ज करा सकेंगे। • आर्थिक बचत: प्रति घंटे या प्रति विजिट 30 से 100 रुपये तक लगने वाले पार्किंग खर्च से परिवार सीधे तौर पर बच सकेंगे। नियमित रूप से मॉल जाने वाले ग्राहकों और वहां काम करने वाले कर्मचारियों की मासिक बचत में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिलेगा। • मनमानी वसूली पर रोक: ऑटोमैटिक फास्टैग स्कैनिंग के जरिए लोगों के खातों से बिना पूछे पार्किंग कटौती करने की तकनीक पर प्रतिबंध की राह खुलेगी। व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को अपने परिसरों के बाहर मुफ्त समय सीमा और नियमावली के सूचना बोर्ड अनिवार्य रूप से लगाने होंगे। ऐसा क्यों हुआ यह कानूनी आदेश तब सामने आया जब रायपुर के एक मॉल ने जिला उपभोक्ता मंच के मुफ्त पार्किंग आदेश के खिलाफ राज्य आयोग में अपील की थी, जिसे आयोग ने पूरी तरह खारिज कर दिया। • सीधा कारण: सड्डू इलाके के मॉल प्रबंधन ने जिला फोरम के उस आदेश को स्वीकार करने से मना कर दिया था जिसमें आगंतुकों से पार्किंग शुल्क बंद करने के निर्देश दिए गए थे। प्रबंधन ने इस फैसले को पलटने के लिए राज्य आयोग में चुनौती दी, जहां उसकी दलीलें गैरकानूनी पाई गईं। • अनुकूल परिस्थितियां: मॉल संचालकों द्वारा दुकानदारों से मेंटेनेंस शुल्क वसूलने के बाद भी ग्राहकों से अलग से फास्टैग के जरिए अनधिकृत रूप से पैसे काटना लगातार जारी था। इसके अलावा मौके पर उपभोक्ताओं को 10 मिनट की ड्रॉप-ऑफ सुविधा की जानकारी देने वाला कोई सूचना बोर्ड भी नहीं लगाया गया था। • कानूनी जांच और निष्कर्ष: आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति गौतम चौड़िया और सदस्य प्रमोद कुमार वर्मा की पीठ ने पाया कि बुनियादी सुविधाओं का दोहरा खर्च ग्राहकों पर डालना सेवा में सीधी कमी है। इसी आधार पर अपील खारिज करते हुए निचली अदालत का फैसला यथावत रखा गया। • आगे की कानूनी कार्रवाई: आयोग ने मॉल प्रशासन को 45 दिनों की सख्त मियाद देते हुए 55 हजार रुपये का हर्जाना चुकाने और विफलता पर 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लगाने का प्रावधान कर दिया। सवाल-जवाब 1. राज्य उपभोक्ता आयोग ने किस मामले में फैसला सुनाया है? आयोग ने रायपुर के सड्डू स्थित एक मॉल द्वारा ग्राहकों से वाहन पार्किंग शुल्क वसूलने को अनुचित व्यापार व्यवहार मानते हुए उस पर रोक लगाई है। 2. यह फैसला किस तारीख को और किन जजों की पीठ द्वारा सुनाया गया? यह महत्वपूर्ण फैसला 24 सितंबर को राज्य आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति गौतम चौड़िया और सदस्य प्रमोद कुमार वर्मा की पीठ ने सुनाया। 3. मॉल प्रबंधन को पीड़ित उपभोक्ता को कुल कितना मुआवजा देना होगा? मॉल को मानसिक प्रताड़ना के लिए 50 हजार रुपये और कानूनी खर्च के रूप में 5 हजार रुपये मिलाकर कुल 55 हजार रुपये का भुगतान करना होगा। 4. मुआवजा राशि चुकाने के लिए क्या समय-सीमा तय की गई है? मॉल प्रबंधन को यह राशि 45 दिन के भीतर देनी होगी, और तय समय में भुगतान न करने पर आदेश की तारीख से 7 प्रतिशत सालाना ब्याज लगेगा। 5. आयोग ने पार्किंग शुल्क को सेवा में कमी क्यों माना? आयोग ने कहा कि मॉल दुकानदारों से एसी, बिजली, सुरक्षा और एस्केलेटर के लिए मेंटेनेंस शुल्क पहले से लेता है, इसलिए ग्राहकों से अलग पार्किंग शुल्क लेना गलत है। 6. फास्टैग को लेकर इस मामले में क्या खामी पाई गई? जांच में सामने आया कि बिना किसी अधिकार पत्र के फास्टैग से पैसे काटे जा रहे थे और मौके पर 10 मिनट की मुफ्त पार्किंग का कोई बोर्ड भी नहीं लगा था। https://trendkia.com/chhattisgarh/mola-men-grahakon-se-parkinga-shulka-vasulana-gairakanuni-consumer-commission-ne-thoka-55-hajara-rupaye-ka-harjana-40443 TrendKia — Har trend, sabse pehle.