# ओडिशा के जंगलों से हिमाचल की फैक्ट्रियों तक फैला खैर की लकड़ी की तस्करी का अवैध सिंडिकेट पकड़ा गया

> छत्तीसगढ़ पुलिस ने छह राज्यों में फैले 120 करोड़ रुपये के खैर की लकड़ी तस्करी गिरोह का पर्दाफाश करते हुए 50 टन से अधिक अवैध लकड़ी जब्त की और 12 लोगों को गिरफ्तार किया।

**Type:** article · **Category:** छत्तीसगढ़ · **Published:** 2026-09-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/chhattisgarh/odisha-ke-jngalon-se-himachal-ki-phaiktriyon-taka-phaila-khaira-ki-lakari-ki-taskari-ka-avaidha-sindiketa-pakara-gaya-35138 · **Language:** Hindi
**Tags:** खैर की लकड़ी, कत्था उद्योग, तस्करी गिरोह, छत्तीसगढ़ पुलिस, वन अपराध, ओडिशा वन

पान में मिलाए जाने वाले कत्थे का स्रोत खैर के पेड़ की लकड़ी का भीतरी हिस्सा होता है, लेकिन इसी बेशकीमती प्राकृतिक संपदा को लेकर एक अंतरराज्यीय संगठित सिंडिकेट सक्रिय था। छत्तीसगढ़ पुलिस की तीन महीने चली व्यापक पड़ताल के बाद छह राज्यों में फैले 120 करोड़ रुपये के अवैध खैर लकड़ी तस्करी रैकेट का खुलासा हुआ है। पश्चिमी ओडिशा और छत्तीसगढ़ के घने जंगलों से अवैध कटाई कर यह लकड़ी फर्जी दस्तावेजों के सहारे हिमाचल प्रदेश की कत्था निर्माण इकाइयों तक पहुंचाई जा रही थी। इस पूरे गोरखधंधे की परतें तब खुलीं जब पुलिस ने राज्य की सीमा पर जांच के दौरान एक संदिग्ध ट्रक को रोका।

## सीमा पर जांच से खुला फर्जीवाड़े का खेल
इस पूरे गिरोह की धरपकड़ की शुरुआत 17 जून को हुई, जब महासमुंद जिले में ओडिशा की दिशा से आ रहे एक बड़े ट्रक को तलाशी के लिए रोका गया। वाहन की सघन जांच करने पर उसमें 23,350 किलोग्राम खैर की लकड़ी लदी पाई गई, जो हिमाचल प्रदेश में स्थित कत्था प्रसंस्करण कारखानों में उतारी जानी थी। जब तैनात अधिकारियों ने ट्रक चालक और परिवहन से जुड़े कागजातों का मिलान किया, तो वे हैरान रह गए। परिवहन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा नेशनल ट्रांजिट पास सिस्टम (NTPS) का आधिकारिक क्लीयरेंस सर्टिफिकेट पूरी तरह नकली निकला। यह परमिट आंध्र प्रदेश के कुरनूल वन विभाग के नाम से फर्जी तरीके से तैयार किया गया था, जो अमूमन वन चौकियों पर वनोपज परिवहन के वैध प्रमाण के तौर पर दिखाया जाता है।

## पांच राज्यों में छापेमारी और कानूनी शिकंजा
जाली वन परमिट के आधार पर लकड़ी की इतनी बड़ी खेप मिलने के बाद अधिकारियों ने वाहन को फौरन जब्त कर अंतरराज्यीय स्तर पर नेटवर्क की कड़ियां जोड़ना शुरू किया। महासमुंद जिले के पुलिस अधीक्षक प्रभात कुमार के अनुसार, मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस टीमों ने छत्तीसगढ़, हरियाणा, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश के विभिन्न ठिकानों पर लगातार दबिश दी। पिछले दो महीनों के दौरान विभिन्न ठिकानों पर की गई सुनियोजित छापेमारी में कुल मिलाकर 50 टन से अधिक अवैध खैर की लकड़ी बरामद की जा चुकी है। अब तक इस संगठित तस्करी गिरोह से जुड़े 12 मुख्य लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

पुलिस ने इस पूरे सिंडिकेट के खिलाफ 9 जुलाई को संगठित अपराध, धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश रचने की संगीन धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की। यह कानूनी कार्रवाई भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4), 338, 336(3), 340(2), 61(2), 3(5) और 111 के साथ-साथ भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 41(2)(b)(d) और 52(1) के तहत अमल में लाई गई है।

## मास्टरमाइंड की भूमिका और जब्ती
जांच आगे बढ़ने पर इस सिंडिकेट के केंद्र में छत्तीसगढ़ के सरसीवा निवासी मनीष अग्रवाल का नाम प्रमुखता से उभरा। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 7 सितंबर को अग्रवाल के ठिकाने से 81 लाख रुपये नकद बरामद किए। हालांकि, आरोपी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए उच्च न्यायालय की शरण ली और अग्रिम जमानत हासिल कर ली। अदालत में बचाव पक्ष की ओर से दलील दी गई कि उसे केवल एक बिचौलिया दर्शाया गया है और अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) की जालसाजी या किसी को धोखा देने में उसकी सीधी संलिप्तता का कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद नहीं है। इसके बावजूद, मनीष अग्रवाल का आपराधिक इतिहास पुराना रहा है और उसका नाम पहले से कई प्राथमिकियों और वन अपराध मामलों में दर्ज है। हाल ही में छत्तीसगढ़ की रायगढ़ पुलिस ने पिछले वर्ष दर्ज खैर की लकड़ी तस्करी के एक अन्य आपराधिक मामले में उसे गिरफ्तार किया, जिसके चलते वह वर्तमान में न्यायिक हिरासत में जेल में बंद है।

## फर्जी कंपनियों का जाल और हवाला नेटवर्क
वित्तीय जांच में सामने आया कि इस गिरोह ने अवैध कमाई को खपाने के लिए एक अत्यंत संगठित आर्थिक ढांचा खड़ा कर रखा था। मनीष अग्रवाल और हिमाचल प्रदेश की कत्था कंपनियों से जुड़े कम से कम तीन अन्य व्यापारियों के गठजोड़ से 8 फर्जी कंपनियां संचालित की जा रही थीं। इन कागजी कंपनियों के जरिए दो वर्षों के भीतर कुल 120 करोड़ रुपये के फर्जी इनवॉइस और बिल तैयार किए गए। अवैध लकड़ी की बिक्री से प्राप्त भारी-भरकम राशि के लेन-देन और शोधन के लिए 10 से अधिक बेनामी अथवा 'म्यूल अकाउंट' का सहारा लिया गया, जो दूसरों के नाम पर खोले गए थे। वित्तीय जांच दल इस बात की गहराई से छानबीन कर रहे हैं कि यह काला धन किन-किन खातों में भेजा गया और इसका अंतिम लाभार्थी कौन था।

## ओडिशा से हिमाचल तक तस्करी का सुरक्षित गलियारा
सिंडिकेट की कार्यप्रणाली बेहद शातिराना थी। खैर के पेड़ों को सबसे पहले पश्चिमी ओडिशा के बलांगीर और बरगढ़ जिलों, ओडिशा के कुछ अन्य वनांचलों तथा छत्तीसगढ़ के रायगढ़ और जशपुर के वन क्षेत्रों से अवैध रूप से काटा जाता था। इसके बाद ट्रकों में लकड़ी भरकर उन्हें महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश या झारखंड के रास्तों से होते हुए हरियाणा पहुंचाया जाता था, जहां से अंतिम खेप हिमाचल प्रदेश की प्रोसेसिंग फैक्ट्रियों में दाखिल कराई जाती थी। पूरे रास्ते में पड़ने वाली विभिन्न राज्यों की वन और पुलिस चौकियों पर चकमा देने के लिए हर जगह जाली NTPS दस्तावेजों का इस्तेमाल किया जाता था, जिससे सुरक्षाकर्मियों को किसी गड़बड़ी का अंदेशा न हो सके।

## इसका आप पर असर
इस कार्रवाई से अंतरराज्यीय स्तर पर वनोपज और कत्था निर्माण के व्यापारिक नियमों तथा सुरक्षा निगरानी में कड़े बदलाव देखने को मिलेंगे।

- **भारत में:** नेशनल ट्रांजिट पास सिस्टम (NTPS) के डिजिटाइजेशन और क्यूआर सत्यापन व्यवस्था को सभी राज्यों की वन चौकियों पर अनिवार्य किया जा सकता है। इससे वनोपज का वैध परिवहन करने वाले कारोबारियों को अपनी अनुमतियों की दोबारा जांच करानी होगी ताकि फर्जीवाड़े की आशंका खत्म हो सके।
- **उद्योग जगत पर असर:** कत्था निर्माण कारखानों और संबंधित व्यापारियों के कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखला पर नियामकों का कड़ा पहरा रहेगा। फर्जी बिल और फर्जी कंपनियों के माध्यम से इनपुट टैक्स क्रेडिट या लकड़ी खरीदने वालों के खिलाफ वित्तीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई बढ़ सकती है।
- **स्थानीय वन क्षेत्रों में:** ओडिशा और छत्तीसगढ़ के संवेदनशील वन मंडलों में निगरानी और गश्ती तंत्र को आधुनिक उपकरणों के साथ मजबूत किया जा रहा है। जंगल से सटे ग्रामीण इलाकों में लकड़ी काटने वाले अनधिकृत बिचौलियों पर प्रशासनिक धरपकड़ तेज होगी।
- **परिवहन क्षेत्र में:** अंतरराज्यीय माल ढुलाई करने वाले ट्रक ऑपरेटरों को किसी भी वन उत्पाद को लोड करने से पहले अधिकृत वन विभाग की एनओसी स्वयं सत्यापित करनी होगी। बिना पूर्ण कागजी पड़ताल के लकड़ी ढोने पर वाहन जब्ती और चालकों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई का जोखिम रहेगा।

## ऐसा क्यों हुआ
यह तस्करी नेटवर्क कत्थे की भारी औद्योगिक मांग, खैर की लकड़ी के ऊंचे दामों और राज्यों के बीच निगरानी की कमियों का अनुचित लाभ उठाकर पनपा।

- **मूल कारण:** कत्था प्रसंस्करण के लिए खैर की लकड़ी की भारी मांग और सीमित वैध आपूर्ति के कारण बाजार में इसकी कीमतें काफी ऊंची रहती हैं। सिंडिकेट ने इसी मांग को पूरा करने के लिए अवैध कटाई का सहारा लेकर भारी मुनाफा कमाने का रास्ता चुना।
- **फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल:** अंतरराज्यीय परिवहन में पकड़े जाने से बचने के लिए गिरोह ने दूसरे राज्य के वन विभाग के नाम पर जाली नेशनल ट्रांजिट पास तैयार किए। इन नकली प्रमाण पत्रों के दम पर सैकड़ों किलोमीटर तक वाहनों को सामान्य माल की तरह चौकियों से निकाला गया।
- **कागजी कंपनियों का आर्थिक चक्र:** लकड़ी की अवैध खरीद-फरोख्त को कानूनी जामा पहनाने के लिए 8 फर्जी फर्में बनाकर 120 करोड़ रुपये के बोगस इनवॉइस बनाए गए। बेनामी बैंक खातों के जरिए धन को खपाकर वास्तविक लाभार्थियों तक आसानी से पहुंचाया जाता रहा।
- **जांच की वर्तमान स्थिति:** पुलिस मामले की जड़ तक पहुंचने के लिए पूरे मनी ट्रेल की पड़ताल कर रही है तथा लकड़ी खपाने वाली अन्य औद्योगिक इकाइयों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।

## सवाल-जवाब

### 1. खैर की लकड़ी की तस्करी का मामला कैसे सामने आया?
छत्तीसगढ़ के महासमुंद में पुलिस ने ओडिशा से आ रहे एक ट्रक को रोका था, जिसमें 23,350 किलोग्राम खैर की लकड़ी और आंध्र प्रदेश के कुरनूल वन विभाग का फर्जी ट्रांजिट पास मिला।

### 2. इस पूरे मामले में अब तक कितनी लकड़ी जब्त की गई है?
पांच राज्यों में की गई छापेमारी के दौरान पुलिस ने 50 टन से अधिक अवैध खैर की लकड़ी जब्त की है।

### 3. इस अवैध नेटवर्क का अनुमानित मूल्य कितना बताया गया है?
पुलिस जांच के अनुसार यह अंतरराज्यीय तस्करी नेटवर्क करीब 120 करोड़ रुपये के अवैध कारोबार और फर्जी इनवॉइस से जुड़ा है।

### 4. खैर की लकड़ी का इस्तेमाल किस चीज में किया जाता है?
खैर के पेड़ की लकड़ी के अंदरूनी हिस्से का मुख्य रूप से कत्था बनाने में उपयोग किया जाता है, जो पान में इस्तेमाल होता है।

### 5. आरोपियों के खिलाफ किन कानूनों के तहत मामला दर्ज हुआ है?
आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं और भारतीय वन अधिनियम, 1927 के तहत धोखाधड़ी, जालसाजी व संगठित अपराध का मामला दर्ज किया गया है।

### 6. तस्करी की लकड़ी कहां से लाई और कहां भेजी जा रही थी?
लकड़ी पश्चिमी ओडिशा और छत्तीसगढ़ के जंगलों से अवैध रूप से काटकर हरियाणा के रास्ते हिमाचल प्रदेश की कत्था बनाने वाली फैक्ट्रियों में भेजी जाती थी।

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