{
  "type": "article",
  "title": "सरगुजा में प्लास्टिक की बोरी से अनोखा जाल बना रहे कुंवर बड़ा, पुरखों की विरासत को रख रहे जिंदा",
  "summary": "छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में एक ग्रामीण प्लास्टिक की बोरियों से बेहद मजबूत पारंपरिक मछली पकड़ने का जाल तैयार कर रहे हैं। बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के बुजुर्गों को देखकर सीखे गए इस हुनर से एक बार में भारी मछलियां आसानी से फंस जाती हैं।",
  "content": "छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के ग्रामीण अंचलों में मानसून के दिनों में नदियों और तालाबों से मछलियां पकड़ने के लिए एक अनोखा पारंपरिक तरीका आज भी अपनाया जा रहा है। यहां के स्थानीय ग्रामीण प्लास्टिक की बोरियों का उपयोग करके विशेष प्रकार का मछली पकड़ने का जाल तैयार करते हैं। इस अनूठी तकनीक से बने जाल की खासियत यह है कि इसमें एक बार में ही भारी-भरकम और बड़ी मछलियां आसानी से फंस जाती हैं। इस आधुनिक दौर में भी ग्रामीण इलाकों के लोग अपनी पुरानी परंपराओं को सहेजे हुए हैं और इसी कड़ी में एक स्थानीय निवासी इस सदियों पुरानी विधा को पूरी तन्मयता से आगे बढ़ा रहे हैं।\n\n \n\nप्लास्टिक की बोरी की रस्सियों से ऐसे बनता है जाल\n सरगुजा जिले के रहने वाले कुंवर बड़ा ने इस कला के बारे में विस्तार से जानकारी दी है। वह प्लास्टिक के कट्टों या बोरियों से धागे और रस्सियां निकालकर इस अनूठे जाल को बुनते हैं। सबसे पहले बोरियों से धागे अलग किए जाते हैं और उन्हें आपस में बांटकर एक मजबूत रस्सी का रूप दिया जाता है। इसके बाद लकड़ी के टुकड़ों की सहायता से इन रस्सियों को करीने से व्यवस्थित किया जाता है। प्रक्रिया के आगे बढ़ने के साथ-साथ धीरे-धीरे जाल का पूरा ढांचा और आकार तैयार होता चला जाता है, जो देखने में बेहद जटिल और मजबूत नजर आता है।\n\n \n\nछह से सात महीने की कड़ी मेहनत से तैयार होती है यह कला\n इस तरह के पारंपरिक जाल को बुनने की प्रक्रिया काफी लंबी और श्रमसाध्य होती है। कुंवर बड़ा के अनुसार इस एक जाल को पूरी तरह से कंप्लीट करने में लगभग छह से सात महीने का लंबा समय लग जाता है। वह पिछले करीब छह से सात वर्षों से लगातार इस प्रकार के टिकाऊ जाल का निर्माण कर रहे हैं। बाजार में मिलने वाले रेडीमेड और मशीनों से बने नायलॉन के जालों की तुलना में हाथ से बना यह प्लास्टिक बोरी का जाल कहीं अधिक मजबूत और लंबे समय तक साथ निभाने वाला होता है, जो उबड़-खाबड़ पानी के बहाव में भी आसानी से नहीं फटता।\n\n \n\nकिताबों से नहीं बल्कि पुरखों की छांव में सीखा यह हुनर\n इस अद्भुत कौशल को हासिल करने के पीछे कुंवर बड़ा का कोई किताबी ज्ञान या किसी संस्थान का प्रशिक्षण नहीं है। उन्होंने गांव के बुजुर्गों को इस तरह के पारंपरिक जाल बनाते हुए देखकर यह कला सीखी है। उनके अनुसार पहले के समय में गांव के वरिष्ठ लोग इसी विधि से मछली पकड़ने के साधन खुद तैयार करते थे। उन्होंने बचपन से लेकर बड़े होने तक बुजुर्गों के काम करने के तरीके को बेहद बारीकी से देखा और उसी अनुभव के आधार पर इस हुनर को अपने भीतर पूरी तरह विकसित कर लिया। आज वह खुद अपने हाथों से ऐसे बेहतरीन जाल तैयार कर रहे हैं।\n\n \n\nकमर तक भरे पानी में भी आसानी से होता है शिकार\n कुंवर बड़ा बताते हैं कि इस खास पारंपरिक जाल का इस्तेमाल पानी के अंदर उतरकर मछली का शिकार करने के लिए किया जाता है। नदी या तालाब में उतरकर जाल को एक विशेष और तकनीकी तरीके से पानी के भीतर फैलाया जाता है और फिर उसे मोड़कर मछलियों को उसके दायरे में कैद किया जाता है। उनके मुताबिक यदि पानी की गहराई कमर तक भी हो, तब भी इस पारंपरिक जाल की मदद से मछलियों को सफलतापूर्वक पकड़ा जा सकता है, जिससे पानी की गहराई बाधा नहीं बनती।\n\n \n\nएक बार में डेढ़ से दो किलो तक मछलियां फंसाने की क्षमता\n इस जाल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसके आकार और बनावट के कारण इसमें विभिन्न साइज की मछलियां आसानी से उलझ जाती हैं। कुंवर बड़ा के अनुभव के अनुसार इस विधि से एक बार के प्रयास में करीब एक से डेढ़ किलो और कभी-कभी तो दो किलो तक मछलियां एक साथ पकड़ी जा सकती हैं। इसमें पानी में तैरने वाली छोटी मछलियों से लेकर लगभग डेढ़ किलो तक के वजन वाली बड़ी मछलियां भी सुगमता से फंस जाती हैं, जो परिवार की जरूरत को पूरा करती हैं।\n\n \n\nबाजार में बेचने के बजाय घरेलू उपभोग के लिए है उपयोगी\n इस पारंपरिक जाल के जरिए पकड़ी जाने वाली मछलियों का व्यावसायिक उपयोग बहुत कम किया जाता है। कुंवर बड़ा का स्पष्ट कहना है कि इन मछलियों का उपयोग मुख्य रूप से अपने घर के दैनिक भोजन के लिए ही किया जाता है। उनका मानना है कि बाजार में ले जाकर इन्हें बेचने के मुकाबले अपने परिवार के खाने के वास्ते शुद्ध और ताजी मछलियां हासिल करने के लिए यह पारंपरिक तरीका कहीं अधिक उपयोगी और संतोषजनक साबित होता है।\n\nइसका आप पर असर\nयह एक पारंपरिक और स्थानीय ग्रामीण कौशल से जुड़ी खबर है, जिसका सीधा असर आम नागरिकों की आजीविका या रोजमर्रा के खर्चों पर नहीं पड़ता है।\n\n• छत्तीसगढ़ में: सरगुजा और आसपास के ग्रामीण इलाकों के लोगों को पारंपरिक संसाधन का उपयोग करके बिना अतिरिक्त लागत के मछली पकड़ने और घरेलू जरूरतें पूरी करने की प्रेरणा मिलती है।\n\n• स्थानीय स्तर पर: सरगुजा क्षेत्र के निवासियों के लिए यह पुरखों के हुनर को बचाने और बिना महंगे उपकरणों के घरेलू खान-पान का इंतजाम करने का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. कुंवर बड़ा कहां के रहने वाले हैं?\nकुंवर बड़ा छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के ग्रामीण इलाके के रहने वाले हैं।\n\n2. यह जाल किस चीज से तैयार किया जाता है?\nयह जाल प्लास्टिक की बोरियों से निकाली गई रस्सियों और धागों की मदद से तैयार किया जाता है।\n\n3. एक जाल को बनाने में कितना समय लगता है?\nइस पारंपरिक जाल को पूरी तरह तैयार करने में करीब छह से सात महीने का समय लगता है।\n\n4. कुंवर बड़ा ने यह हुनर कहां से सीखा?\nउन्होंने यह कला किसी किताब या प्रशिक्षण से नहीं, बल्कि गांव के बुजुर्गों को जाल बनाते हुए देखकर सीखी है।\n\n5. इस जाल से एक बार में कितनी मछली पकड़ी जा सकती है?\nइस जाल की मदद से एक बार में करीब एक से डेढ़ किलो और कभी-कभी दो किलो तक मछलियां फंस जाती हैं।\n\n6. इन मछलियों का उपयोग मुख्य रूप से किस काम में लाया जाता है?\nइन मछलियों का इस्तेमाल बाजार में बेचने के बजाय मुख्य रूप से घर के खाने के लिए किया जाता है।\n\nप्रेरणा और सबक\nकुंवर बड़ा की यह कहानी दिखाती है कि बिना किसी औपचारिक शिक्षा या महंगे संसाधनों के भी हुनर और लगन के बल पर पारंपरिक कला को कैसे जीवित रखा जा सकता है।\n\n• बारीकी से सीखना: अपने आसपास के बुजुर्गों और अनुभवी लोगों के काम को ध्यान से देखकर किसी भी जटिल हुनर को बिना प्रशिक्षण के सीखा जा सकता है।\n\n• संसाधनों का सदुपयोग: बेकार समझी जाने वाली प्लास्टिक की बोरियों जैसी साधारण चीजों का सही इस्तेमाल करके टिकाऊ और उपयोगी वस्तुएं बनाई जा सकती हैं।\n\n• धैर्य और मेहनत: किसी भी पारंपरिक कला या हस्तशिल्प को पूरी गुणवत्ता के साथ तैयार करने के लिए महीनों की कड़ी मेहनत और समर्पण की आवश्यकता होती है।",
  "url": "https://trendkia.com/chhattisgarh/saraguja-men-plastika-ki-bori-se-anokha-jala-bana-rahe-kunwar-bara-purakhon-ki-virasata-ko-rakha-rahe-jinda-24950",
  "category": "छत्तीसगढ़",
  "publishedAt": "2026-08-31",
  "tags": [
    "सरगुजा समाचार",
    "छत्तीसगढ़ वायरल",
    "पारंपरिक मछली पकड़ना",
    "कुंवर बड़ा",
    "ग्रामीण तकनीक",
    "छत्तीसगढ़ न्यूज"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}