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  "type": "article",
  "title": "सुरहुत्ती दिवाली पर माटी की ग्वालिन और सुहाई बंधन से सजती है छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा",
  "summary": "छत्तीसगढ़ में दीपावली को सुरहुत्ती अथवा सुहाई दिवाली के रूप में मनाया जाता है, जहां मिट्टी की ग्वालिन पूजन से लेकर गोवर्धन पूजा, राउत नाचा और सुवा नृत्य तक अनूठी सांस्कृतिक परंपराएं जीवंत होती हैं।",
  "content": "धान के कटोरे के नाम से पहचाने जाने वाले छत्तीसगढ़ में दीपावली का उत्सव दीपों की जगमगाहट और धन की देवी मां लक्ष्मी की आराधना तक ही सीमित नहीं रहता। यहां इस पर्व की जड़ें सीधे तौर पर मिट्टी, गोवंश और सदियों पुरानी लोक संस्कृति से जुड़ी हुई हैं। क्षेत्रीय मान्यताओं और आंचलिक परिवेश में इस लोकपर्व को सुरहुत्ती दिवाली अथवा सुहाई दिवाली के नाम से जाना जाता है। दो दिनों तक चलने वाले इस पारंपरिक उत्सव में गांव से लेकर शहरों तक लोक आस्था के अनोखे रंग बिखरते हैं। घर के आंगन में तुलसी चौरा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन, मिट्टी से बनी ग्वालिन की स्थापना, पारंपरिक पकवानों का अर्पण और गोवर्धन पर्वत की विधिवत पूजा इस त्योहार के मुख्य केंद्र बिंदु होते हैं।\n\nमाटी की ग्वालिन प्रतिमा की स्थापना और पूजन विधान\nसुरहुत्ती दिवाली के पहले दिन देवारी माता के पूजन का विधान निभाया जाता है। इस दिन मिट्टी की ग्वालिन प्रतिमा स्थापित कर पूरे विधि-विधान से उसका पूजन किया जाता है। स्थानीय कुम्हारों द्वारा हाथों से गढ़ी गई यह प्रतिमा ग्रामीण जीवनशैली और लोक मान्यताओं का प्रतीक मानी जाती है। महिलाएं अपने घरों में पारंपरिक पकवान बनाती हैं और ग्वालिन माता को उनका भोग अर्पित करती हैं। इसके बाद तुलसी चौरा में मिट्टी के दीपक प्रज्ज्वलित कर सुख और समृद्धि की मंगल कामना की जाती है। पूजा के पश्चात पारंपरिक पकवानों को परिवार के सदस्यों और पास-पड़ोस के लोगों में प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाता है, जो सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देता है।\n\nगोवर्धन पूजा, नए धान की खीर और मवेशियों के प्रति आभार\nपर्व के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा का आयोजन होता है, जो पूरी तरह से कृषि और पशुधन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम है। ग्रामीण क्षेत्रों में किसान गाय के ताजे गोबर से प्रतीकात्मक गोवर्धन पर्वत की रचना करते हैं और उसका विधिपूर्वक पूजन करते हैं। चूंकि छत्तीसगढ़ एक कृषि प्रधान राज्य है, इसलिए खरीफ सीजन की नई फसल के धान का इस पूजन में विशेष महत्व होता है। खेतों से आए नए धान के चावल को गुड़ के साथ पकाकर पारंपरिक खीर तैयार की जाती है। इस मीठी खीर का भोग गोवर्धन पर्वत को अर्पित करने के बाद गाय, बैल और भैंस की पूजा-अर्चना की जाती है। किसान अपने हल जोतने वाले बैलों और दूध देने वाली गायों को नमन कर कृषि संपन्नता के लिए धन्यवाद देते हैं।\n\nयादव समाज की सुहाई परंपरा और पशु कल्याण की कामना\nदीपावली के इस अवसर पर यादव समाज की सुहाई बांधने की रीति अत्यंत विशिष्ट मानी जाती है। समाज के चरवाहे और यदुवंशी बंधु घर-घर जाकर गाय, भैंस और बैलों के गले अथवा सींगों पर पलाश या विशेष रेशों से तैयार की गई सुहाई बांधते हैं। इस दौरान वे पारंपरिक लोकगीतों की धुन पर मंगल मंत्रों का उच्चारण करते हैं, जिससे मवेशियों को रोगों से मुक्ति और दीर्घायु मिलने का विश्वास व्यक्त किया जाता है। पशुपालक अपने मवेशियों की सलामती की इस कामना के सम्मान में चरवाहों को दक्षिणा, नए कपड़े, अन्न, नकदी अथवा पारंपरिक पकवान भेंट करते हैं। यह रीति न केवल पशुधन के आर्थिक और सामाजिक मूल्य को रेखांकित करती है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में परस्पर निर्भरता को भी सशक्त बनाती है।\n\nसुवा नृत्य में तोते को साक्षी मानकर उमड़ती नारी भावनाएं\nदीपावली के आगमन के साथ ही छत्तीसगढ़ की ग्रामीण बस्तियों में महिलाओं के प्रसिद्ध सुवा नृत्य की गूंज सुनाई देने लगती है। सुवा का शाब्दिक अर्थ तोता होता है, जिसे संदेशवाहक का प्रतीक मानकर महिलाएं बांस की टोकरी में स्थापित करती हैं। टोकरी के चारों ओर गोल घेरा बनाकर महिलाएं तालियों की थाप पर पारंपरिक सुवा गीत गाती हैं और भावपूर्ण नृत्य प्रस्तुत करती हैं। इन लोकगीतों में ग्रामीण महिलाओं के सुख-दुख, विरह, उल्लास और पारिवारिक जीवन की संवेदनाएं बेहद सादगी के साथ अभिव्यक्त होती हैं। दीपावली की शाम से शुरू होने वाला यह नृत्य पूरे वातावरण को लोक संगीत के सुरों से भर देता है।\n\nशौर्य और वीरता के रंगों से सराबोर राउत नाचा\nपर्व के उल्लास को चरम पर पहुंचाने का कार्य यादव समाज का प्रसिद्ध लोकनृत्य राउत नाचा करता है। पारंपरिक वेशभूषा, चमकीले कौड़ियों वाले वस्त्र और पगड़ी धारण कर यदुवंशी नर्तक हाथों में सजी हुई लाठियां लेकर समूह में थिरकते हैं। राउत नाचा मूल रूप से वीर रस और शौर्य का प्रतीक है, जिसमें दोहों और लोक धुनों के माध्यम से प्राचीन वीर गाथाओं का स्मरण किया जाता है। लाठियों की खनक और दोहों की ललकार के साथ प्रस्तुत किया जाने वाला यह नृत्य प्रदेश के गांव-गांव और कस्बों में उत्सव का एक जीवंत माहौल तैयार कर देता है।\n\nगौरा-गौरी पूजा में शिव और पार्वती का लोक आह्वान\nछत्तीसगढ़ की इस लोक दिवाली का एक और आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आयाम गौरा-गौरी पूजा है। इस परंपरा के अंतर्गत श्रद्धालु पवित्र मिट्टी से भगवान शिव यानी गौरा और माता पार्वती यानी गौरी की सुंदर प्रतिमाओं का निर्माण करते हैं। इन प्रतिमाओं को घरों अथवा गांवों के सार्वजनिक चबूतरों पर प्रतिष्ठित कर मंगल गीत गाए जाते हैं। धार्मिक विधि के अनुरूप यह पूजा एक दिन, तीन दिन अथवा पांच दिनों तक चलती है। निर्धारित अवधि की पूजा और रात्रि जागरण के बाद गाजे-बाजे के साथ प्रतिमाओं को निकटवर्ती तालाबों अथवा नदियों में विसर्जित किया जाता है। बिलासपुर के वरिष्ठ लोक साहित्यकार डॉ. सोमनाथ यादव के अनुसार, छत्तीसगढ़ की सुरहुत्ती दिवाली कोई साधारण उत्सव नहीं, बल्कि कृषि संस्कृति, गोवंश संवर्धन और लोक कलाओं का एक अनूठा संगम है, जो समाज को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का संदेश देता है।\n\nइसका आप पर असर\nछत्तीसगढ़ की सुरहुत्ती दिवाली ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पशुपालकों और लोक कलाकारों के लिए सामाजिक एवं आर्थिक संबल का माध्यम बनती है।\n\n• भारत में: देश भर के सांस्कृतिक शोधकर्ताओं और पर्यटकों को पारंपरिक कृषि समाज की मूल जीवनशैली और समृद्ध लोक कलाओं को प्रत्यक्ष रूप से जानने का अवसर मिलता है। इससे क्षेत्रीय विरासत और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण को नई प्रेरणा मिलती है।\n• छत्तीसगढ़ में: ग्रामीण पशुपालकों, चरवाहों और स्थानीय कुम्हारों को इस पर्व के दौरान सीधी आय और दक्षिणा प्राप्त होती है, जिससे ग्रामीण बाजार सक्रिय होते हैं। इसके साथ ही सुवा और राउत नाचा दलों को अपनी पारंपरिक कला प्रदर्शित करने और सांस्कृतिक मानदेय जुटाने का सुअवसर मिलता है।\n• कृषक समुदाय के लिए: नई फसल के पहले अन्न से तैयार नैवेद्य पशुओं को समर्पित कर किसान पारंपरिक पशु चिकित्सा और सुरक्षा के प्रति सजग होते हैं। यह रीत खेतों में जुताई और खाद उपलब्ध कराने वाले गोवंश के प्रति पारिवारिक सम्मान को सुदृढ़ करती है।\n• आंचलिक शिल्पकारों के लिए: मिट्टी के बर्तन बनाने वाले प्रजापति समाज को ग्वालिन और गौरा-गौरी की प्रतिमाओं के विक्रय से स्थानीय स्तर पर आजीविका हासिल होती है। इससे स्थानीय कारीगरों को प्लास्टिक या सिंथेटिक मूर्तियों के मुकाबले प्राकृतिक मिट्टी के उत्पाद तैयार करने का प्रोत्साहन मिलता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nछत्तीसगढ़ में सुरहुत्ती दिवाली का स्वरूप सदियों से चली आ रही कृषि प्रधान जीवनशैली, धान की नई कटाई और गोवंश पर निर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सीधे समन्वय से विकसित हुआ है।\n\n• कृषि फसल चक्र का प्रभाव: राज्य में खरीफ धान की फसल पकने और घर आने का समय कार्तिक मास में दीपावली के आसपास ही पड़ता है। नए चावल और गुड़ की खीर बनाकर गोवर्धन और पशुओं को अर्पित करने की प्रथा इसी नई उपज के स्वागत और आभार से उपजी है।\n• पशुधन का केंद्रीय महत्व: ग्रामीण जीवन में जुताई, परिवहन और दुग्ध उत्पादन पूरी तरह बैलों और गायों पर निर्भर रहता है। चरवाहों द्वारा सुहाई बांधने और पशुओं के कल्याण की कामना करने की परंपरा पशुधन के संरक्षण और आभार प्रदर्शन के लिए स्थापित हुई।\n• लोक कलाओं का मौसमी जुड़ाव: धान की कटाई के बाद ग्रामीणों के पास सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सवों के लिए समय उपलब्ध होता है। सुवा नृत्य और राउत नाचा इसी मौसमी बदलाव के दौरान नारी संवेदनाओं और यदुवंशी शौर्य की सामूहिक अभिव्यक्ति के रूप में शुरू हुए।\n• प्रकृति और मिट्टी की उपासना: गौरा-गौरी और ग्वालिन की मिट्टी से प्रतिमाएं गढ़ने की परिपाटी प्रकृति पूजा और पर्यावरण के प्रति सम्मान का प्रतीक है। स्थानीय मिट्टी से मूर्ति बनाकर पूजनोपरांत जलस्रोतों में विसर्जित करने की प्रथा जल-जमीन के शाश्वत चक्र का सम्मान करती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. छत्तीसगढ़ में दीपावली को किन स्थानीय नामों से पुकारा जाता है?\nछत्तीसगढ़ में दीपावली पर्व को स्थानीय लोक परंपरा के अनुसार सुरहुत्ती दिवाली अथवा सुहाई दिवाली के नाम से जाना जाता है।\n\n2. सुरहुत्ती दिवाली के पहले दिन मिट्टी की किस प्रतिमा की पूजा होती है?\nउत्सव के पहले दिन देवारी माता के पूजन के तहत कुम्हार द्वारा बनाई गई मिट्टी की ग्वालिन प्रतिमा स्थापित कर पूजी जाती है।\n\n3. गोवर्धन पूजा के दिन नए धान से क्या तैयार किया जाता है?\nगोवर्धन पूजा के दिन नई फसल के धान के चावल और गुड़ से पारंपरिक खीर बनाई जाती है, जिसका भोग लगाया जाता है।\n\n4. यादव समाज की सुहाई बांधने की परंपरा क्या है?\nयादव समाज के चरवाहे घर-घर जाकर गाय, भैंस और बैलों को सुहाई बांधते हैं और उनके सुख-कल्याण के लिए मंगल गीत गाते हैं।\n\n5. सुवा नृत्य में तोते का क्या महत्व होता है?\nसुवा नृत्य में सुवा यानी तोते को संदेशवाहक का प्रतीक मानकर बांस की टोकरी में रखा जाता है और महिलाएं उसके चारों ओर नाचती हैं।\n\n6. राउत नाचा किस रस और समाज की परंपरा से जुड़ा हुआ है?\nराउत नाचा यादव समाज की पारंपरिक कला है, जो मुख्य रूप से वीर रस, शौर्य और ऐतिहासिक लोकगीतों पर आधारित होती है।\n\n7. गौरा-गौरी पूजा कितने दिनों तक की जाती है?\nपरंपरा के अनुसार गौरा और गौरी की मिट्टी की प्रतिमाओं की पूजा एक, तीन अथवा पांच दिनों तक करने के बाद विसर्जन किया जाता है।",
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  "category": "छत्तीसगढ़",
  "publishedAt": "2026-10-31",
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    "सुरहुत्ती दिवाली",
    "छत्तीसगढ़ लोक संस्कृति",
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