सरगुजा के बतौली से अंतरराष्ट्रीय बास्केटबॉल कोर्ट तक बबिता तिग्गा का ऐतिहासिक सफर छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के एक किसान परिवार से निकलकर बबिता तिग्गा ने चार बार वैश्विक स्तर पर बास्केटबॉल में देश का मान बढ़ाया है और अब वह भावी खिलाड़ियों को तराशने के लिए कोचिंग की राह चुन रही हैं। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्थित बतौली इलाके के एक साधारण किसान परिवार में जन्मी बबिता तिग्गा ने वह मुकाम हासिल किया है, जो किसी भी युवा एथलीट के लिए मिसाल बन सकता है। उनका परिवार कभी राज्य की सीमाओं से बाहर नहीं गया था, लेकिन बबिता ने अपनी लगन के दम पर चार अलग-अलग देशों में अंतरराष्ट्रीय बास्केटबॉल कोर्ट पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई और स्वर्ण पदक भी अपने नाम किया। वैश्विक मंच पर देश का मान बढ़ाने के बाद अब वह भावी पीढ़ी को तराशने के लिए खुद को एक पेशेवर कोच के तौर पर तैयार कर रही हैं। फुटबॉल के मैदान से बास्केटबॉल कोर्ट तक का मोड़ बचपन के शुरुआती दिनों में बबिता तिग्गा ने कभी पेशेवर बास्केटबॉल खिलाड़ी बनने की कल्पना नहीं की थी। वह प्राथमिक तौर पर फुटबॉल खेला करती थीं और उसी में अपना वक्त बिताती थीं। इसी दौरान एक खेल चयन प्रक्रिया आयोजित हुई, जहां उनकी शारीरिक क्षमता और खेल के प्रति समर्पण ने प्रशिक्षकों का ध्यान खींचा। इसी चयन प्रक्रिया के दौरान उनका औपचारिक परिचय बास्केटबॉल से हुआ। राजेश सर ने उनके भीतर छिपी संभावनाओं को पहचाना, उन्हें बास्केटबॉल के मूलभूत नियमों से रूबरू कराया और खेल के बुनियादी कौशल सिखाने के लिए भिलाई व दुर्ग लेकर गए। भिलाई और दुर्ग में शुरुआती अनुभव हासिल करने के बाद उन्हें उन्नत खेल प्रशिक्षण की जरूरत महसूस हुई। इसी उद्देश्य से वह राजनांदगांव पहुंचीं, जो बास्केटबॉल के गढ़ के रूप में जाना जाता है। वहां अनुभवी प्रशिक्षकों की देखरेख में उन्होंने ड्रिबलिंग, शूटिंग और डिफेंस जैसी तकनीकी बारीकियों को गहराई से सीखा। जब वह छठवीं कक्षा में पढ़ती थीं, तब इस खेल की आधिकारिक यात्रा शुरू हुई थी। देखते ही देखते यह खेल उनके दैनिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया और आज उन्हें इस विधा में पसीना बहाते हुए लगभग 12 साल पूरे हो चुके हैं। सुबह चार बजे का कठिन अभ्यास और सख्त दिनचर्या एक सुदूर ग्रामीण इलाके से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धाओं तक पहुंचना किसी भी खिलाड़ी के लिए आसान नहीं होता। बबिता के सामने खेल में खुद को साबित करने के साथ-साथ अपनी स्कूली पढ़ाई को संतुलित रखने की एक बड़ी चुनौती थी। इसके लिए उन्होंने एक बेहद कड़ा अनुशासन अपनाया। वह प्रतिदिन तड़के चार बजे बिस्तर छोड़ देती थीं और अभ्यास के लिए निकल पड़ती थीं। कई बार ऐसा हुआ कि इनडोर स्टेडियम में जब बाकी खिलाड़ी सो रहे होते थे, तब बबिता पूरी लगन के साथ अकेले गेंद को बास्केट में डालने का अभ्यास कर रही होती थीं। शुरुआती दौर में कई मौकों पर अकेलेपन का अहसास होता था और लगता था कि शायद वही सबसे ज्यादा संघर्ष कर रही हैं, लेकिन उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी और खुद को लगातार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। सुबह के सत्र का अभ्यास पूरा करने के बाद वह सीधे स्कूल जाती थीं। दोपहर करीब ढाई बजे स्कूल से घर लौटने के बाद वह चंद मिनट आराम करती थीं और फिर दोपहर तीन से साढ़े तीन बजे के बीच दोबारा शाम के अभ्यास सत्र के लिए मैदान का रुख करती थीं। उनकी दिनचर्या में खेल और शिक्षा दोनों के लिए तय समय निर्धारित था। इसी निरंतर परिश्रम और आत्मसंयम ने उन्हें शीर्ष स्तर पर पहुंचाया। खेत-खलिहान से मिला माता-पिता का संबल बबिता तिग्गा का ताल्लुक विशुद्ध रूप से खेती पर निर्भर परिवार से है। उनके पिता दिन-रात खेतों में पसीना बहाकर परिवार का पेट पालते हैं, जबकि उनकी मां एक गृहिणी हैं जो घर की पूरी जिम्मेदारी संभालती हैं। परिवार की आजीविका का एकमात्र जरिया कृषि कार्य ही रहा है। सीमित आर्थिक संसाधनों और ग्रामीण पृष्ठभूमि के बीच एक बेटी का खेल जगत में इतना बड़ा मुकाम हासिल करना पूरे अंचल के लिए एक दुर्लभ उपलब्धि थी। बबिता बताती हैं कि उनके माता-पिता ने सामाजिक बंधनों या आर्थिक तंगहाली को कभी उनके सपनों के आड़े नहीं आने दिया। जब बबिता को पहली बार किसी राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए छत्तीसगढ़ की सीमा से बाहर जाना था, तब उनके परिवार के साथ-साथ पूरे गांव और बतौली ब्लॉक के लोगों के लिए वह बेहद भावुक और गौरवशाली क्षण था। जिस परिवार ने कभी अपने गृह राज्य से बाहर कदम नहीं रखा था, उसकी बेटी राज्य का प्रतिनिधित्व करने जा रही थी। बतौली ब्लॉक के निवासियों ने खुले दिल से उनकी सराहना की और परिजनों का सीना गर्व से चौड़ा हो गया कि उनकी बेटी खेल के जरिए अपने पिछड़े अंचल की पहचान राष्ट्रीय पटल पर स्थापित करने जा रही है। चार देशों में अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधित्व और वैश्विक अनुभव अपनी निरंतर उत्कृष्ट फॉर्म के चलते बबिता तिग्गा ने भारतीय दल का हिस्सा बनकर चार बार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। उनके इस अंतरराष्ट्रीय सफर में फ्रांस, थाईलैंड और क्रोएशिया जैसे प्रमुख देशों के बास्केटबॉल कोर्ट पर खेलने का अनुभव शामिल है। इन विदेशी दौरों ने उन्हें केवल खेल में परिपक्व ही नहीं बनाया, बल्कि वहां की जीवनशैली, पेशेवर खेल संस्कृति और आधुनिक व्यवस्थाओं को बहुत करीब से देखने और समझने का मौका दिया। अंतरराष्ट्रीय दौरों के दौरान बबिता ने भारतीय खेल परिवेश और विदेशों के बुनियादी ढांचे में गहरे अंतर को महसूस किया। उन्होंने पाया कि यूरोपीय और एशियाई देशों में खिलाड़ियों की व्यक्तिगत फिटनेस, वैज्ञानिक खानपान और साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है। खिलाड़ियों की दैनिक दिनचर्या और शारीरिक अनुकूलन का स्तर पूरी तरह पेशेवर होता है। हालांकि विभिन्न अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उन्हें अलग-अलग नतीजों और स्थानों से संतोष करना पड़ा, लेकिन वैश्विक खिलाड़ियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खेलना और अपने कौशल को तराशना उनके खेल करियर का सबसे मूल्यवान अध्याय साबित हुआ। पार्ट टाइम नौकरी, बीपीएड की पढ़ाई और कोचिंग का सपना वैश्विक पटल पर स्वर्ण पदक जीतने और देश का नाम रोशन करने के बाद भी बबिता के पैर जमीन पर हैं और उन्होंने अपने भविष्य का खाका बेहद स्पष्ट रखा है। वर्तमान में वह श्री साईं बाबा स्कूल में एक पार्ट टाइम कर्मचारी के तौर पर कार्य कर रही हैं, जिससे वह अपने दैनिक खर्चों को संभाल सकें। इसके साथ ही वह बीपीएड यानी बैचलर ऑफ फिजिकल एजुकेशन की नियमित पढ़ाई भी कर रही हैं। उनका अंतिम लक्ष्य एक योग्य पीटीआई बनना और बास्केटबॉल कोच के रूप में उभरते हुए खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करना है। बबिता का स्पष्ट मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों के बच्चों में असाधारण प्राकृतिक प्रतिभा होती है, लेकिन उचित मार्गदर्शन और आधुनिक खेल सुविधाओं के अभाव में वे अक्सर पीछे छूट जाते हैं। वह चाहती हैं कि आने वाली पीढ़ी को वह सब कुछ मिले जिसके लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ा था, ताकि वे उनसे भी आगे निकलकर देश और राज्य का मान बढ़ा सकें। उनका मानना है कि उनका 12 वर्षों का कड़ा संघर्ष नई पीढ़ी के लिए एक व्यावहारिक मार्गदर्शक का काम कर सकता है। सरगुजा और बतौली की माटी से निकली यह बेटी अब नई पौध तैयार करने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है। इसका आप पर असर बबिता तिग्गा की यह प्रेरक यात्रा दर्शाती है कि सीमित संसाधनों और ग्रामीण पृष्ठभूमि के बावजूद कड़े अनुशासन के बल पर वैश्विक खेल मंच पर पहचान बनाई जा सकती है। • भारत में: देश के उभरते युवा एथलीटों के लिए यह कहानी एक स्पष्ट संदेश देती है कि सुबह के कड़े अभ्यास और अनुशासन से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा जा सकता है। इससे छोटे कस्बों में खेलों को करियर के रूप में चुनने वाले छात्र-छात्राओं और उनके अभिभावकों का दृष्टिकोण सकारात्मक होगा। • छत्तीसगढ़ में: सरगुजा और बतौली जैसे ग्रामीण अंचलों की बेटियों के लिए यह यात्रा खेल अकादमियों और जमीनी प्रशिक्षण तक पहुंचने का नया हौसला देती है। स्थानीय स्तर पर बीपीएड और खेल प्रशिक्षण से जुड़कर स्थानीय प्रतिभाओं को राज्य से बाहर अपनी पहचान बनाने के अवसर बढ़ेंगे। • खेल अकादमियों और कोचों के लिए: सुदूरवर्ती इलाकों में प्रतिभा खोज और चयन प्रक्रियाओं को गंभीरता से लागू करने की आवश्यकता रेखांकित होती है। सही समय पर तकनीकी मार्गदर्शन मिलने से ग्रामीण क्षेत्रों से विश्वस्तरीय खिलाड़ी तैयार किए जा सकते हैं। • ग्रामीण परिवारों के लिए: खेती-किसानी से जुड़े माता-पिता के लिए यह उदाहरण साबित करता है कि बेटियों को खेलों में प्रोत्साहित करने से परिवार और पूरे क्षेत्र का मान बढ़ता है। यह सामाजिक धारणाओं को बदलकर लड़कियों को खेल मैदान में भेजने के लिए प्रेरित करता है। ऐसा क्यों हुआ बबिता तिग्गा की खेल यात्रा की शुरुआत किसी पूर्व नियोजित योजना का हिस्सा नहीं थी, बल्कि यह खेल चयन प्रक्रिया और स्थानीय स्तर पर मिले सही मार्गदर्शन का परिणाम थी। जब अनुभवी प्रशिक्षकों ने उनकी प्राकृतिक क्षमता को देखा, तब उन्हें फुटबॉल से बास्केटबॉल की ओर मोड़ा गया। • शुरुआती मार्गदर्शन: प्राथमिक कक्षाओं में फुटबॉल खेलने के दौरान उनकी शारीरिक चपलता को देखते हुए राजेश सर ने उन्हें बास्केटबॉल के लिए चुना। उन्होंने बबिता को बुनियादी नियमों से परिचित कराया और प्रशिक्षण के लिए बड़े केंद्रों तक ले गए। • तकनीकी प्रशिक्षण केंद्र: भिलाई, दुर्ग और विशेष रूप से राजनांदगांव जैसे प्रमुख खेल केंद्रों में जाने से उन्हें उन्नत बास्केटबॉल कौशल और पेशेवर माहौल मिला। वहां के प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन ने उनके खेल को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ढाला। • पारिवारिक समर्थन: किसान पृष्ठभूमि होने के बावजूद उनके माता-पिता ने सामाजिक या आर्थिक दबावों को खेल के रास्ते में नहीं आने दिया। परिवार का यह अटूट विश्वास ही उन्हें सुबह चार बजे से कड़ा अभ्यास जारी रखने की मानसिक मजबूती देता रहा। सवाल-जवाब 1. बबिता तिग्गा किस खेल की खिलाड़ी हैं और वे कहां की रहने वाली हैं? बबिता तिग्गा एक अंतरराष्ट्रीय बास्केटबॉल खिलाड़ी हैं और वे छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के बतौली ब्लॉक की रहने वाली हैं। 2. बबिता तिग्गा ने बास्केटबॉल खेलना कब और कैसे शुरू किया था? उन्होंने छठवीं कक्षा में बास्केटबॉल खेलना शुरू किया था। पहले वे फुटबॉल खेलती थीं, लेकिन एक खेल चयन प्रक्रिया के दौरान राजेश सर के मार्गदर्शन में वे बास्केटबॉल से जुड़ीं। 3. बबिता तिग्गा ने किन-किन देशों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया है? बबिता ने चार बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेला है, जिसमें फ्रांस, थाईलैंड और क्रोएशिया जैसे देश शामिल हैं, जहां उन्होंने स्वर्ण पदक भी हासिल किया। 4. बबिता तिग्गा का दैनिक अभ्यास शेड्यूल कैसा रहता था? वे सुबह चार बजे उठकर अभ्यास करती थीं, फिर स्कूल जाती थीं और दोपहर ढाई बजे लौटने के बाद तीन से साढ़े तीन बजे के बीच दोबारा अभ्यास के लिए निकलती थीं। 5. वर्तमान में बबिता क्या काम कर रही हैं और उनका भविष्य का लक्ष्य क्या है? फिलहाल वे श्री साईं बाबा स्कूल में पार्ट टाइम नौकरी के साथ बीपीएड की पढ़ाई कर रही हैं और भविष्य में पीटीआई व बास्केटबॉल कोच बनकर ग्रामीण बच्चों को तराशना चाहती हैं। प्रेरणा और सबक खेत-खलिहानों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतने तक बबिता तिग्गा का सफर हर उस युवा के लिए सीखने योग्य है जो कठिनाइयों से जूझ रहा है। • अकेले अभ्यास करने से न घबराएं: जब दूसरे सो रहे हों तब सुबह चार बजे उठकर अभ्यास करना यह सिखाता है कि सफलता के लिए एकांत में की गई मेहनत ही सबसे बड़ा संबल बनती है। • संसाधनों की कमी को बहाना न बनाएं: सीमित साधनों और किसान परिवार से होने के बावजूद उन्होंने अपनी लगन से अंतरराष्ट्रीय मंच पर जगह बनाई। • शिक्षा और खेल का संतुलन: खेल के उच्चतम स्तर पर खेलने के बाद भी बीपीएड की पढ़ाई और पार्ट टाइम नौकरी जारी रखकर उन्होंने करियर की स्थिरता का महत्व समझाया। • समाज और अगली पीढ़ी को वापस देना: खुद सफलता पाने के बाद ग्रामीण बच्चों के लिए कोच बनकर नई प्रतिभाएं तराशने का उनका संकल्प निःस्वार्थ सेवा की मिसाल है। https://trendkia.com/chhattisgarh/surguja-ke-batauli-se-antararashtriya-basketabola-korta-taka-babita-tigga-ka-aitihasika-saphara-45120 TrendKia — Har trend, sabse pehle.