# सरगुजा के दरिमा में पारंपरिक मिट्टी कला को जिंदा रखे हुए हैं मुन्ना, जानिए चाक से आजीविका तक का सफर

> छत्तीसगढ़ के सरगुजा में कुम्हरता निवासी मुन्ना देसी चाक और चिकनी मिट्टी से दीये, गुल्लक व पारंपरिक बर्तन तैयार कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** छत्तीसगढ़ · **Published:** 2026-11-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/chhattisgarh/surguja-ke-darima-men-parnparika-mitti-kala-ko-jinda-rakhe-hue-hain-munna-janie-chaka-se-ajivika-taka-ka-saphara-55561 · **Language:** Hindi
**Tags:** सरगुजा, दरिमा, मिट्टी के बर्तन, कुम्हार, दीपावली दीये, छत्तीसगढ़, हस्तशिल्प

हाथों में गीली चिकनी मिट्टी और घूमते हुए देसी चाक की धुरी पर जब कला का संगम होता है, तो पारंपरिक बर्तन नया जीवन पा लेते हैं। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के दरिमा क्षेत्र में पड़ने वाले कुम्हरता के निवासी मुन्ना इसी प्राचीन हुनर को आज भी सहेजे हुए हैं। उन्होंने किसी औपचारिक शिक्षण संस्थान या गुरु से यह हुनर नहीं सीखा, बल्कि अपने पुरखों और बुजुर्गों को देखकर इस पारंपरिक काम की बारीकियों को आत्मसात किया। लगभग 12 से 15 वर्षों से मिट्टी के बर्तन तैयार करने के इस काम से जुड़े मुन्ना आज भी अपनी पुश्तैनी विरासत और शिल्प को जीवित रखे हुए हैं।

## बुजुर्गों को देखकर सीखी चाक और मिट्टी की कला
कुम्हरता के मुन्ना बताते हैं कि इस काम को करते हुए उन्हें 10 से 12 साल से भी अधिक का समय बीत चुका है। उनके बचपन में घर के बुजुर्ग और पूर्वज दिनभर चाक पर बैठकर मिट्टी को नए-नए रूप देते थे। मुन्ना शांत रहकर उनकी उंगलियों की हर हरकत और मिट्टी को संभालने के सलीके को ध्यान से देखा करते थे। उन्होंने कोई किताबी पढ़ाई नहीं की और न ही कहीं औपचारिक दाखिला लिया, बल्कि घर की चौखट पर बड़ों के अनुभवों से ही मिट्टी के काम का ककहरा सीखा। वही व्यावहारिक सीख आज उनकी पहचान और परिवार की रोटी का मुख्य जरिया बनी हुई है।

## दीये, गुल्लक से लेकर हांड़ी और दोहना बनाने में महारत
चाक पर गीली मिट्टी रखते ही मुन्ना की उंगलियां जादू जैसा काम करती हैं। वे केवल सामान्य दीये ही नहीं बनाते, बल्कि रोजमर्रा और तीज-त्योहारों में काम आने वाली कई वस्तुएं गढ़ते हैं। इनमें बचत के लिए गुल्लक, खानपान के लिए दोहना, तेलई, कढ़ाई, मिट्टी का बटुआ, हांड़ी और पानी के लिए पारंपरिक मटके शामिल हैं। मुन्ना के अनुसार, मिट्टी को गूंधने से लेकर उसे चाक पर चढ़ाने और फिर इस्तेमाल के लायक पकाने तक का पूरा हुनर धैर्य मांगता है। वे हर तरह के पारंपरिक पात्र तैयार करने में पूरी तरह पारंगत हो चुके हैं।

## लकड़ी के देसी चाक पर एक सप्ताह की कड़ी मेहनत
मिट्टी के बर्तनों के निर्माण में मुन्ना विशुद्ध चिकनी मिट्टी का उपयोग करते हैं। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव और जरूरत के अनुसार जुगाड़ से लकड़ी का एक देसी चाक भी तैयार किया है। इसी चाक को घुमाकर वे मिट्टी को मनचाहा आकार देते हैं। किसी भी बर्तन को तैयार करने का सफर आसान नहीं होता। खेत या खदान से चिकनी मिट्टी लाने, उसे साफ करने, भिगोने, गूंधने, चाक पर ढालने, सुखाने और पकाने की पूरी प्रक्रिया में लगभग एक सप्ताह का समय लग जाता है।

## दीपावली पर पांच रुपये में बिकता है एक दीया
त्योहारी मौसम, विशेषकर दीपावली के करीब आते ही मुन्ना के काम की रफ्तार बढ़ जाती है। इन दिनों वे पूरी तन्मयता से मिट्टी के दीये तैयार करने में जुटे हैं। मुन्ना बताते हैं कि चाक पर एक दीया ढालने में करीब दो से तीन मिनट का समय लगता है, लेकिन इसे पकाने और तैयार करने में काफी शारीरिक श्रम लगता है। वे अपने बनाए दीये और अन्य मिट्टी के सामान बेचने के लिए खुद बाजार जाते हैं। वर्तमान में वे एक दीये की कीमत लगभग पांच रुपये रखते हैं, जिससे खरीदारों को किफायती दर पर शुद्ध हस्तनिर्मित दीये मिल पाते हैं।

## बिना पढ़ाई के हुनर बना परिवार का सहारा
शिक्षा का अवसर न मिलने के बावजूद मुन्ना ने अपने हुनर को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया है। सुबह से शाम तक कड़ी मेहनत करने के बाद वे रोजाना करीब 200 से 400 रुपये तक कमा लेते हैं। जब दीपावली जैसे बड़े त्योहार आते हैं, तब दीयों और अन्य बर्तनों की मांग बढ़ने से कमाई में थोड़ी बढ़ोतरी की उम्मीद बंधती है। सीमित संसाधनों और मामूली आय के बीच भी वे इसी शिल्प के दम पर अपने पूरे परिवार का पालन-पोषण पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं।

## पारंपरिक खानपान में आज भी कायम है मिट्टी के बर्तनों का महत्व
मुन्ना का कहना है कि उनके परिवार में पीढ़ियों से चले आ रहे इस काम की अहमियत आज भी कम नहीं हुई है। आधुनिक युग में बाजार तरह-तरह के धातु और प्लास्टिक के बर्तनों से भरा पड़ा है, लेकिन पारंपरिक खानपान में मिट्टी के बर्तनों की जगह कोई नहीं ले सका है। खास तौर पर दोहना और हांड़ी जैसे बर्तनों का इस्तेमाल आज भी खीर और अन्य पकवान बनाने के लिए किया जाता है, जिसमें दूध और चावल का स्वाद मिट्टी की सौंधी खुशबू से और निखर जाता है। मुन्ना मानते हैं कि आधुनिकता के दौर में भी हस्तनिर्मित मिट्टी के बर्तनों की साख और सांस्कृतिक पहचान पूरी तरह सुरक्षित है।

## इसका आप पर असर
पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों के इस्तेमाल से स्थानीय कारीगरों को सीधी आजीविका मिलने के साथ ही स्वास्थ्य और पर्यावरण को सुरक्षा मिलती है।

- **सरगुजा और दरिमा में:** स्थानीय निवासी सीधे मुन्ना जैसे कारीगरों से पांच रुपये प्रति दीये की दर पर हस्तनिर्मित दीये खरीद सकते हैं। इससे बिचौलियों के बिना ग्रामीण कारीगरों तक उनकी पूरी मेहनत की कमाई पहुंचती है।
- **पारंपरिक खानपान के शौकीनों के लिए:** दोहना और हांड़ी जैसे बर्तनों का उपयोग करके खीर और अन्य पकवानों में पारंपरिक सौंधा स्वाद पाया जा सकता है। यह आधुनिक धातु के बर्तनों का एक सुरक्षित और प्राकृतिक विकल्प साबित होता है।
- **पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली के लिए:** प्लास्टिक या रासायनिक रंगों से सजे उत्पादों के स्थान पर प्राकृतिक चिकनी मिट्टी के उत्पादों का प्रयोग कचरा घटाता है। उत्सवों के बाद मिट्टी पानी में आसानी से घुलकर पर्यावरण को नुकसान से बचाती है।
- **हस्तशिल्प के खरीदारों के लिए:** कारीगरों से सीधे खरीदारी करने से पारंपरिक कला को प्रोत्साहन और नई पीढ़ी तक संरक्षण मिलता है। खरीदार मामूली खर्च में अपनी रसोई और पूजा घर को विशुद्ध देसी वस्तुओं से सजा सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
ग्रामीण इलाकों में पुस्तैनी हुनर को आजीविका का माध्यम बनाना और आधुनिक बाजार में पारंपरिक बर्तनों की निरंतर मांग ही इस शिल्प के बचे रहने का मुख्य कारण है।

- **पारिवारिक परंपरा का प्रभाव:** मुन्ना ने बचपन से घर के बुजुर्गों को मिट्टी के बर्तन बनाते देखा और बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के इसे स्वाभाविक रूप से सीख लिया। पूर्वजों की विरासत को जारी रखने की इसी प्रेरणा ने उन्हें इस काम से जोड़े रखा।
- **संसाधनों की सीमितता और आजीविका:** औपचारिक शिक्षा पूरी न होने के कारण मुन्ना ने अपनी घरेलू कला को ही परिवार चलाने का मुख्य आधार बना लिया। प्रतिदिन 200 से 400 रुपये की कमाई परिवार के बुनियादी खर्चों को पूरा करने में मददगार साबित होती है।
- **धार्मिक और सांस्कृतिक मांग:** दीपावली पर मिट्टी के दीयों और पारंपरिक खानपान में हांड़ी की मांग आज भी बरकरार है। इस सांस्कृतिक निरंतरता के कारण आधुनिक बर्तनों के आगमन के बाद भी मिट्टी के बर्तनों का बाजार खत्म नहीं हुआ है।

## सवाल-जवाब

### 1. मुन्ना कहां के निवासी हैं और वे कितने समय से मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं?
मुन्ना छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के दरिमा इलाके स्थित कुम्हरता के निवासी हैं और वे पिछले 12 से 15 सालों से यह काम कर रहे हैं।

### 2. मुन्ना ने मिट्टी के बर्तन बनाने की कला कहां से सीखी?
उन्होंने किसी संस्थान या गुरु से सीखने के बजाय बचपन में अपने घर के बुजुर्गों और पूर्वजों को काम करते देखकर यह कला सीखी।

### 3. मुन्ना कौन-कौन से मिट्टी के बर्तन और सामान तैयार करते हैं?
वे दीये, गुल्लक, दोहना, तेलई, कढ़ाई, मिट्टी का बटुआ, हांड़ी और मटका जैसे विभिन्न पारंपरिक बर्तन तैयार करते हैं।

### 4. एक मिट्टी का दीया बनाने में कितना समय लगता है और इसकी कीमत क्या है?
चाक पर एक दीया बनाने में करीब दो से तीन मिनट लगते हैं और बाजार में मुन्ना इसे लगभग पांच रुपये में बेचते हैं।

### 5. मिट्टी के बर्तन तैयार करने में कुल कितना समय लगता है?
चिकनी मिट्टी को तैयार करने से लेकर चाक पर ढालने और अंतिम रूप देने तक पूरी प्रक्रिया में लगभग एक सप्ताह का समय लगता है।

### 6. इस काम से मुन्ना की रोजाना कितनी कमाई हो जाती है?
दिनभर की मेहनत के बाद मुन्ना प्रतिदिन लगभग 200 से 400 रुपये तक कमा लेते हैं, जबकि त्योहारों पर बेहतर कमाई की उम्मीद रहती है।

## प्रेरणा और सबक
औपचारिक शिक्षा के अभाव में भी पुश्तैनी हुनर और अथक परिश्रम के दम पर आत्मनिर्भर बना जा सकता है, मुन्ना का जीवन इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।

- **पारंपरिक हुनर का सम्मान:** पूर्वजों के हुनर को उपेक्षित करने के बजाय उसे आजीविका और स्वाभिमान का माध्यम बनाएं।
- **सीमित संसाधनों में नवाचार:** महंगी मशीनों की प्रतीक्षा किए बिना लकड़ी के देसी चाक जैसे साधारण साधनों से भी काम शुरू किया जा सकता है।
- **धैर्य और श्रम की महत्ता:** मिट्टी तैयार करने से लेकर बर्तन पकाने तक के सप्ताह भर के धैर्यपूर्ण श्रम से ही कला में परिपक्वता आती है।
- **संस्कृति का संरक्षण:** आधुनिकता की आंधी में भी अपनी जड़ों और पारंपरिक पहचान को गर्व के साथ थामे रखना संभव है।

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