# सरगुजा के दरिमा में सिलबट्टे पर दाल पीसकर तैयार हो रही कोहड़ा और उड़द की पारंपरिक बड़ी

> छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के दरिमा गांव की महिलाएं ठंड के मौसम में हाथ से कोहड़े और उड़द दाल की खास बड़ी तैयार कर रही हैं। दो दिन की कड़ी मेहनत और सिलबट्टे की पिसाई से बनने वाली यह देसी रेसिपी दशकों से स्थानीय खानपान का अटूट हिस्सा बनी हुई है।

**Type:** article · **Category:** छत्तीसगढ़ · **Published:** 2026-11-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/chhattisgarh/surguja-ke-darima-men-silabatte-para-dala-pisakara-taiyara-ho-rahi-kohda-aura-urad-ki-parnparika-bari-55421 · **Language:** Hindi
**Tags:** सरगुजा, कोहड़ा बड़ी, उड़द दाल, छत्तीसगढ़ खानपान, देसी रेसिपी, पारंपरिक व्यंजन

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के ग्रामीण अंचलों में आज भी सदियों पुरानी पाक परंपराएं पूरी शिद्दत से जीवित हैं। यहां के दरिमा क्षेत्र में रहने वाली महिलाएं सर्दियों का मौसम शुरू होते ही अपनी रसोई में एक बेहद खास व्यंजन तैयार करने में जुट जाती हैं। यह पारंपरिक व्यंजन है कोहड़ा और उड़द की दाल से बनने वाली देसी बड़ी। ग्रामीण परिवेश में बिना किसी आधुनिक ग्राइंडर या इलेक्ट्रॉनिक मशीन के तैयार होने वाली यह बड़ी स्थानीय थाली की नियमित पहचान है। गांव के लोग हर दो से चार दिनों में इस पौष्टिक और स्वादिष्ट बड़ी की सब्जी बनाकर बड़े चाव से खाते हैं। इस रेसिपी की सबसे बड़ी खासियत इसकी पारंपरिक तैयारी है, जहां उड़द की दाल को पत्थर के सिलबट्टे पर हाथ से पीसा जाता है, जिससे इसका मूल स्वाद और भी गहरा हो जाता है।

## खेत से कोहड़ा चुनने और फल को कोरने का पहला चरण
इस पारंपरिक बड़ी को बनाने की शुरुआत खेतों और घर की बाड़ियों में लगे ताजे कोहड़े के चुनाव से होती है। स्थानीय निवासी बुजुर्ग पावारो ने इस प्रक्रिया की बारीकियों को साझा करते हुए बताया कि सबसे पहले तैयार कोहड़े के फल को तोड़ा जाता है। घर लाने के बाद फल को बीच से दो बराबर टुकड़ों में काटा जाता है। इसके बाद एक पारंपरिक औजार कोरनी की मदद से कोहड़े के भीतरी गूदे को बारीक कोरा जाता है। कोरने की इस प्रक्रिया में काफी समय और धैर्य लगता है, क्योंकि गूदे की बनावट ही बड़ी के अंतिम रूप और बनावट को तय करती है। जब कोहड़ा पूरी तरह से कद्दूकस या कोर लिया जाता है, तब इसे अगले चरण के लिए अलग रख दिया जाता है।

## सिलबट्टे की पिसाई और उड़द दाल का मिश्रण
कोहड़े की तैयारी के साथ ही उड़द की दाल का काम शुरू होता है। दाल को पहले पर्याप्त पानी में भिगोकर कई घंटों के लिए छोड़ दिया जाता है ताकि वह अच्छी तरह फूल जाए। दाल के पूरी तरह भीग जाने के बाद उसे आधुनिक मिक्सी के बजाय पारंपरिक पत्थर के सिलबट्टे पर पीसा जाता है। हाथ से सिलबट्टे पर पीसने के कारण दाल का पेस्ट बिल्कुल सही गाढ़ेपन में तैयार होता है। इसके बाद इस पिसी हुई उड़द दाल को पहले से कोरे गए कोहड़े के टुकड़ों के साथ अच्छी तरह मिलाया जाता है। दोनों सामग्रियों के एकसार होने पर हाथों की मदद से छोटे-छोटे लड्डू के आकार की गोल बड़ियां तैयार की जाती हैं। बिना किसी कृत्रिम सामग्री या मशीन के यह शुद्ध घरेलू व्यंजन तैयार होता है।

## दो दिन का परिश्रम और दो अलग किस्मों का निर्माण
बुजुर्ग पावारो के अनुसार, बड़ी बनाने की यह पूरी प्रक्रिया महज कुछ घंटों का काम नहीं है, बल्कि इसमें लगभग दो दिन का समय और कड़ी मेहनत लगती है। पहले दिन पूरा ध्यान कोहड़े को तोड़ने, उसे काटने और कोरनी से कोरने पर केंद्रित रहता है। इसके बाद दूसरे दिन भीगी हुई उड़द की दाल को सिल पर पीसने और फिर मिश्रण से गोल बड़ियां ढालने का काम किया जाता है। इस तैयारी में दो अलग-अलग प्रकार की बड़ियां तैयार की जाती हैं। कोहड़े के बीजों की मदद से सफेद रंग की बड़ियां बनाई जाती हैं, जबकि मुख्य सब्जी बनाने के लिए काले रंग की बड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। दोनों ही किस्मों की अपनी विशिष्ट बनावट और उपयोगिता होती है।

## आलू की तरह पकती है सुरगुजिया शैली की सब्जी
गांवों में कोहड़े की बड़ी को पकाने का अंदाज भी बेहद सरल और घरेलू है। इसे पकाने की विधि बहुत हद तक सामान्य आलू की सब्जी जैसी ही होती है। सरगुजा की स्थानीय खानपान शैली में इसे पारंपरिक मसालों के साथ धीमी आंच पर पकाया जाता है। जब गांव के पारंपरिक तरीकों से कूटे और भुने हुए मसालों का इसमें छौंक लगता है, तो बड़ी का स्वाद अत्यंत लाजवाब हो जाता है। यही कारण है कि यह सब्जी न केवल पोषण से भरपूर मानी जाती है बल्कि अपने अनूठे तीखे और सौंधे स्वाद के लिए भी जानी जाती है।

## पीढ़ियों से सर्दियों की थाली में सजा स्वाद
बुजुर्ग पावारो बताती हैं कि उनके परिवार में यह पारंपरिक बड़ी उनके बचपन के दिनों से ही लगातार बनाई जा रही है। घर के बुजुर्गों और पूर्वजों द्वारा शुरू की गई यह पाक परंपरा आज भी उसी आत्मीयता से निभाई जा रही है। वैसे तो कोहड़े की बड़ी किसी भी मौसम में बनाई जा सकती है, लेकिन ठंड के महीनों में इसका स्वाद सबसे बेहतरीन लगता है। सर्दियों के समय कोहड़े का फल आसानी से और बहुतायत में उपलब्ध होता है, जिससे इसे बनाना काफी सुगम हो जाता है। पावारो के परिवार में जब भी हरी सब्जियों के अलावा कुछ खास पकाने का मन होता है, तो हर दो दिन में कोहड़े की इस पारंपरिक बड़ी की सब्जी थाली में जरूर परोसी जाती है।

## इसका आप पर असर
हाथ से बनी पारंपरिक बड़ी ग्रामीण खानपान को संरक्षित करने के साथ-साथ पोषण और स्थानीय परंपराओं को जीवित रखती है।

- **शुद्ध पोषण:** बिना किसी प्रिजर्वेटिव और मशीन के हाथ से तैयार की गई उड़द और कोहड़े की बड़ी सेहत के लिए फायदेमंद मानी जाती है। इसमें दाल की प्रचुर मात्रा होने से भोजन में प्रोटीन की कमी पूरी होती है।
- **पारंपरिक स्वाद:** आधुनिक मिक्सी के मुकाबले पत्थर के सिलबट्टे पर पिसी दाल का प्राकृतिक स्वाद बरकरार रहता है। घरेलू मसालों के साथ पकाने पर यह व्यंजन शहरी खानपान के मुकाबले अधिक पौष्टिक और सुपाच्य रहता है।
- **छत्तीसगढ़ में:** सरगुजा और आसपास के ग्रामीण अंचलों में यह मौसमी व्यंजन ठंड के दिनों में घरेलू थाली का अनिवार्य हिस्सा बन जाता है। स्थानीय स्तर पर कोहड़े की उपलब्धता के कारण परिवारों को सस्ते और ताजे खाद्य विकल्प मिलते हैं।
- **भारत में:** देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले लोग ऐसी विलुप्त होती हस्तनिर्मित पाक शैलियों को अपनाकर जैविक और पारंपरिक खानपान से दोबारा जुड़ सकते हैं। यह ग्रामीण भारत के हस्तशिल्प और पाक कौशल के महत्व को रेखांकित करता है।

## ऐसा क्यों हुआ
सरगुजा के गांवों में आधुनिक दौर में भी कोहड़ा और उड़द की बड़ी हाथ से बनाने का चलन इसलिए जारी है क्योंकि यह पीढ़ियों से चला आ रहा मौसमी और किफायती घरेलू काम है।

- **मौसमी उपलब्धता:** ठंड के महीनों में छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में कोहड़े की फसल भरपूर मात्रा में तैयार होती है। इस समय खेत और बाड़ी से ताजे फल आसानी से मिलने के कारण महिलाएं इसे बड़ी बनाने के मुख्य समय के रूप में चुनती हैं।
- **पारंपरिक स्वाद की मान्यता:** ग्रामीण परिवारों का पक्का मानना है कि इलेक्ट्रॉनिक मिक्सर दाल के प्राकृतिक स्वाद को बदल देता है। यही कारण है कि वे दो दिन का समय देकर पत्थर के सिलबट्टे पर ही दाल पीसने की पुरानी परंपरा को प्राथमिकता देते हैं।
- **किफायती भंडारण:** सर्दियों में बनाई गई बड़ी को सुखाकर लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। यह उन दिनों में एक बेहतरीन सब्जी का विकल्प बनती है जब ताजी हरी सब्जियों की उपलब्धता कम या महंगी हो जाती है।

## सवाल-जवाब

### 1. कोहड़े की बड़ी बनाने में कौन-कौन सी मुख्य सामग्रियां इस्तेमाल होती हैं?
इस पारंपरिक बड़ी को बनाने के लिए ताजा कोहड़ा (कद्दू), उड़द की दाल और पानी का इस्तेमाल किया जाता है।

### 2. कोहड़ा बड़ी बनाने की पूरी प्रक्रिया में कितना समय लगता है?
इस पूरी प्रक्रिया में लगभग दो दिन का समय लगता है, जिसमें पहले दिन कोहड़ा कोरना और दूसरे दिन दाल पीसकर बड़ी बनाना शामिल है।

### 3. कोहड़ा बड़ी में कितने प्रकार की बड़ियां तैयार की जाती हैं?
इसमें दो तरह की बड़ियां बनती हैं, जिसमें कोहड़े के बीज से सफेद रंग की बड़ी और सब्जी के लिए काले रंग की बड़ी बनाई जाती है।

### 4. दाल पीसने के लिए किस उपकरण का उपयोग किया जाता है?
उड़द दाल को बिना किसी मिक्सी या मशीन के गांव के पारंपरिक पत्थर के सिलबट्टे (शील) पर पीसा जाता है।

### 5. गांव में इस बड़ी की सब्जी किस प्रकार बनाई जाती है?
सरगुजा के गांवों में इसे लगभग आलू की सब्जी की तरह पारंपरिक मसालों के साथ पकाया जाता है।

### 6. यह बड़ी विशेष रूप से किस मौसम में बनाई जाती है?
यह बड़ी विशेष रूप से ठंड के मौसम में बनाई जाती है क्योंकि इस दौरान कोहड़े का फल आसानी से उपलब्ध रहता है।

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