सरगुजा के मैनपाट में खरीफ के बाद शीतकालीन आलू की बुवाई से किसान सिकंदर कमा रहे मोटा मुनाफा छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में धान और मक्के की कटाई के बाद किसान सिकंदर ठंड के मौसम में आलू की खेती कर कम लागत में बढ़िया उपज ले रहे हैं। सही जल निकासी और गोबर की खाद के इस्तेमाल से वे दो एकड़ में पच्चीस हजार रुपये लगाकर करीब एक लाख रुपये की आय की उम्मीद कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ राज्य के सरगुजा अंचल में जैसे ही मॉनसून की विदाई होती है और अक्टूबर महीने में गुलाबी ठंडक दस्तक देती है, खेतों में नई फसलों की हलचल तेज हो जाती है। यहां के मैनपाट क्षेत्र में किसान सिकंदर अपने पुरखों से मिली पारंपरिक कृषि पद्धतियों को अपनाकर आलू की बंपर पैदावार हासिल कर रहे हैं। उनके परिवार में दादा और परदादा के जमाने से ही सर्दी के दिनों में कंद वर्गीय फसलों को लगाने की परंपरा रही है। बरसात के बाद शुरू होने वाली यह खेती न केवल कम लागत में तैयार हो जाती है, बल्कि किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का एक मजबूत साधन बनकर उभर रही है। फसल चक्र और खेत की दोहरी जुताई की तैयारी मैनपाट के किसान सिकंदर के मुताबिक, खेतों में आलू की बुवाई का सिलसिला अक्टूबर के शुरुआती हफ्ते में शुरू हो जाता है। इससे पहले किसान अपने खेतों से मक्का निकाल लेते हैं और धान की कटाई संपन्न होते ही खाली हुई जमीन को रबी सीजन के लिए तैयार करने में जुट जाते हैं। अच्छी पैदावार की पहली बुनियाद मिट्टी की बनावट पर टिकी होती है। इसके लिए सबसे पहले ट्रैक्टर की मदद से खेत की दो बार गहरी जुताई की जाती है, ताकि मिट्टी के बड़े ढेले टूटकर पूरी तरह भुरभुरे हो जाएं। जब मिट्टी पर्याप्त रूप से भुरभुरी और हवादार बन जाती है, तब उसमें क्यारियां और ऊंची मेड़ें बनाई जाती हैं। मेड़ों पर आलू लगाने से कंदों को जमीन के भीतर फैलने के लिए पर्याप्त खुली जगह मिलती है। जितनी बेहतर तरीके से मिट्टी तैयार होगी, पौधों की जड़ें उतनी ही गहराई तक जाकर पोषक तत्व सोख पाएंगी, जिससे आलू का आकार और गुणवत्ता दोनों शानदार रहते हैं। बीज की लागत और उत्पादन का गणित आलू की बुवाई के लिए बीजों की खरीद को लेकर सिकंदर ने जमीनी आंकड़े साझा किए हैं। उनके अनुसार, बाजार में बीज के तौर पर इस्तेमाल होने वाले आलू की एक बोरी फिलहाल तकरीबन 700 रुपये में उपलब्ध हो जाती है। यदि मौसम अनुकूल रहे और फसल की देखभाल सही ढंग से की जाए, तो एक बोरी बीज की बुवाई से 10 से 15 बोरी तक तैयार आलू की पैदावार मिल सकती है। हालांकि, कुल उत्पादन केवल बीज पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि आलू की किस्म, मौसम के उतार-चढ़ाव, मिट्टी की उर्वरता और समय पर की गई सिंचाई व कीट प्रबंधन पर भी काफी कुछ टिका होता है। सड़न से बचाव के लिए उचित जल निकासी की जरूरत आलू की फसल में सबसे बड़ा जोखिम पानी के भराव से पैदा होता है। सिकंदर बताते हैं कि खेत में अतिरिक्त पानी जमा होने से कंद बहुत तेजी से सड़ने लगते हैं, जिससे पूरी मेहनत पर पानी फिर सकता है। चूंकि मैनपाट का इलाका प्राकृतिक रूप से ढलान वाला और पहाड़ी भूगोल लिए हुए है, इसलिए यहां मेड़ों की बनावट और पानी के निकास का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। बारिश का पानी हो या सिंचाई के बाद बचा हुआ जल, उसे खेत से बाहर निकालने के लिए नालियों की सटीक व्यवस्था होनी चाहिए ताकि पौधे स्वस्थ रहें और जड़ों के पास नमी का संतुलन बना रहे। गोबर की खाद और संतुलित पोषण प्रबंधन फसल को पोषण देने के लिए पारंपरिक गोबर की सड़ी खाद का उपयोग बेहद फायदेमंद साबित होता है। सिकंदर के अनुसार, जैविक खाद के अलावा आवश्यकता पड़ने पर रासायनिक उर्वरक जैसे यूरिया का भी इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि कृषि के जानकारों का मानना है कि रासायनिक खादों का प्रयोग हमेशा मिट्टी परीक्षण की रिपोर्ट और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर ही करना चाहिए। सही मात्रा में पोषक तत्व देने से न केवल फसल की लागत नियंत्रित रहती है, बल्कि मिट्टी का स्वास्थ्य भी लंबे समय तक सुरक्षित बना रहता है। ठंड के आलू और बरसाती आलू के टिकाऊपन में अंतर सरगुजा के किसानों के अनुभव के अनुसार, ठंड के मौसम में उगाए गए आलू और बरसात के दिनों में तैयार होने वाले आलू के भंडारण जीवन में जमीन-आसमान का फर्क होता है। सिकंदर का कहना है कि सर्दी की ऋतु में तैयार होने वाली उपज काफी टिकाऊ होती है और सही तापमान व हवादार जगह पर रखने से यह कई महीनों तक सुरक्षित बनी रहती है। इसके विपरीत, बरसात के मौसम में पैदा होने वाले आलू में नमी की अधिकता के कारण सड़न का खतरा बना रहता है, जिसे सामान्य हालात में महज एक से डेढ़ महीने तक ही रोका जा सकता है। लागत का आकलन और बड़े शहरों तक आपूर्ति की योजना इस चालू मौसम में किसान सिकंदर ने लगभग दो एकड़ भूभाग में आलू लगाया है। इस पूरे रकबे में बीज, जुताई और शुरुआती प्रबंधन को मिलाकर करीब 25 हजार रुपये का खर्च आया है। यदि फसल का विकास सामान्य रहा और बाजार में वाजिब भाव मिले, तो उन्हें इससे लगभग एक लाख रुपये तक की सकल आय होने की उम्मीद है। हालांकि वास्तविक शुद्ध मुनाफा बाजार की मांग, मजदूरी, माल ढुलाई और उस समय मिलने वाले थोक भाव पर निर्भर करेगा। तैयार फसल को केवल स्थानीय हाट-बाजारों तक सीमित न रखकर अंबिकापुर, बिलासपुर, रायपुर और बनारस की मंडियों तक भेजने की योजना है, जिससे ग्रामीण अंचल के किसानों को उनकी मेहनत का पूरा मूल्य मिल सके। इसका आप पर असर अक्टूबर में धान की कटाई के तुरंत बाद आलू लगाने से छोटे और सीमांत किसानों को कम खर्च में नकदी फसल उगाने का व्यावहारिक जरिया मिलता है। • किसानों की आय में सुधार: धान और मक्के के बाद जमीन खाली रखने के बजाय शीतकालीन आलू लगाने से दो एकड़ में करीब 25 हजार रुपये लगाकर लगभग एक लाख रुपये तक की संभावित आय पाई जा सकती है। इससे ग्रामीण किसानों को कम समय में नकदी हासिल करने में मदद मिलती है। • मौसम और भंडारण का लाभ: ठंड में उगाया गया आलू बरसात की उपज की तुलना में महीनों तक सुरक्षित रहता है, जिससे किसान बाजार में मंदी के दौरान फसल रोकने का फैसला ले सकते हैं। बरसाती आलू सामान्य तौर पर केवल एक से डेढ़ महीने ही टिक पाता है। • जल निकासी से जोखिम घटाना: ढलान वाले खेतों में मेड़ बनाकर पानी निकालने की व्यवस्था करने से कंद सड़ने का खतरा घट जाता है। इससे असमय वर्षा या अधिक सिंचाई होने पर भी फसल का नुकसान न्यूनतम रहता है। • बाजार पहुंच और बिक्री: स्थानीय बाजारों के अलावा रायपुर, बिलासपुर, अंबिकापुर और बनारस की बड़ी मंडियों तक माल पहुंचाने से उत्पादकों को बिचौलियों के बजाय बेहतर थोक मूल्य मिल सकते हैं। इसके लिए परिवहन लागत और मांग की सही निगरानी जरूरी है। ऐसा क्यों हुआ धान और मक्के की कटाई के बाद जमीन की नमी और अक्टूबर की हल्की ठंडक आलू की बुवाई के लिए प्राकृतिक रूप से मुफीद माहौल तैयार करती है। सरगुजा के मैनपाट क्षेत्र में इस पारंपरिक फसल चक्र को अपनाने के पीछे मजबूत कृषि और आर्थिक कारण मौजूद हैं। • मौसम और तापमान की अनुकूलता: अक्टूबर की शुरुआत से तापमान में गिरावट होने लगती है, जो आलू के अंकुरण और कंद के विकास के लिए सबसे बेहतर मानी जाती है। अधिक गर्मी या अत्यधिक नमी न होने से पौधे मजबूत जड़ें बना लेते हैं। • मिट्टी की तैयारी और ढलान का लाभ: मक्के और धान के बाद दो बार जुताई करने से मिट्टी भुरभुरी हो जाती है, जिससे कंद तेजी से फूलते हैं। इसके अलावा मैनपाट का ढलान वाला भूगोल अतिरिक्त पानी को स्वाभाविक रूप से बहने में मदद करता है। • पैतृक कृषि अनुभव का सहारा: किसान अपने पूर्वजों के आजमाए तरीकों का अनुसरण करते हुए ठंड के आलू को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि इसका भंडारण जीवन लंबा होता है। अनुभव बताता है कि बरसाती आलू के मुकाबले शीतकालीन आलू में घाटे की संभावना बेहद कम होती है। सवाल-जवाब 1. सरगुजा के मैनपाट में आलू की बुवाई किस महीने शुरू की जाती है? यहां आलू की बुवाई अक्टूबर के पहले सप्ताह में ठंड की शुरुआत के साथ की जाती है। 2. आलू लगाने से पहले खेत में कौन सी फसलें काटी जाती हैं? किसान पहले खेत से मक्के की फसल निकालते हैं और धान की कटाई के बाद जमीन तैयार करते हैं। 3. आलू के खेत की मिट्टी तैयार करने के लिए क्या तरीका अपनाया जाता है? मिट्टी को भुरभुरा बनाने के लिए ट्रैक्टर से दो बार जुताई की जाती है और फिर मेड़ बनाई जाती है। 4. एक बोरी बीज से कितना आलू पैदा होने का दावा किया गया है? करीब 700 रुपये की एक बोरी बीज लगाने पर अनुकूल परिस्थितियों में 10 से 15 बोरी तक उत्पादन मिल सकता है। 5. आलू को सड़ने से बचाने के लिए किस बात का ध्यान रखना जरूरी है? खेत में पानी भरने से रोकने के लिए उचित जल निकासी और मेड़ों का सही प्रबंध करना जरूरी है। 6. ठंड के आलू और बरसाती आलू के भंडारण में क्या अंतर है? ठंड का आलू कई महीनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है, जबकि बरसाती आलू सामान्यतः एक से डेढ़ महीने ही टिकता है। 7. किसान सिकंदर ने कितने रकबे में खेती की और कितनी आमदनी की उम्मीद है? उन्होंने दो एकड़ में 25 हजार रुपये की लागत से खेती की है और करीब एक लाख रुपये की आमदनी की उम्मीद है। 8. मैनपाट के आलू को किन शहरों की मंडियों में भेजने की योजना है? स्थानीय बाजार के अलावा इसे अंबिकापुर, बिलासपुर, रायपुर और बनारस जैसे शहरों में भेजने की संभावना है। https://trendkia.com/chhattisgarh/surguja-ke-mainpat-men-kharipha-ke-bada-shitakalina-alu-ki-buvai-se-kisana-sikandar-kama-rahe-mota-munapha-46356 TrendKia — Har trend, sabse pehle.