सरगुजा के सत्तर वर्षीय चमरू मांझी का कमाल, पचास वर्षों से बांस की कलाकारी से संवार रहे हैं जीवन छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के कतकालो गांव में रहने वाले सत्तर वर्षीय चमरू मांझी पिछले पचास वर्षों से बांस से पारंपरिक वस्तुएं बना रहे हैं। उनके हुनर की मांग इतनी है कि उन्हें सामान बेचने बाजार नहीं जाना पड़ता, बल्कि ग्राहक उनके घर खुद चलकर आते हैं। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के अंतर्गत आने वाले कतकालो गांव के निवासी चमरू मांझी लगभग सत्तर साल के हो चुके हैं, लेकिन उनके हाथों की कलाकारी आज भी उतनी ही बेमिसाल है। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे अपनी मेहनत और कौशल का जादू बिखेर रहे हैं और मुर्गी पालन के लिए गरना जैसी उपयोगी वस्तुएं तैयार कर रहे हैं। इसके अलावा वे पुटी भी बनाते हैं, जिसमें मछलियां या ग्रामीण इलाकों में मिलने वाली पारंपरिक सब्जियां रखी जाती हैं, जिससे वे लंबे समय तक सुरक्षित रहती हैं और खराब नहीं होती हैं। चमरू हर मौसम की जरूरत के हिसाब से अलग-अलग सामग्रियां अपने हाथों से लगभग पचास सालों से लगातार बनाते आ रहे हैं। उनके बनाए इन सामानों को बेचने के लिए उन्हें कभी किसी बाजार या हाट जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है, बल्कि उनके हुनर का क्रेज लोगों के सिर चढ़कर बोलता है और खरीदार खुद उनके घर तक खिंचे चले आते हैं, जिससे उनका जीवनयापन सुचारू रूप से चल रहा है। पिता को देखकर सीखा था हुनर और पांच दशकों से निभा रहे हैं परंपरा बुजुर्ग कारीगर चमरू मांझी ने इस बात की जानकारी साझा करते हुए बताया कि वे करीब पचास वर्षों से गरना और अन्य पारंपरिक हस्तशिल्प वस्तुएं बनाने का काम पूरी निष्ठा से कर रहे हैं। उन्होंने यह पारंपरिक हुनर अपने पिता को देखकर सीखा था और बचपन के दिनों में वे अपने पिता को बांस के यह सामान बनाते हुए बेहद गौर से देखते थे। धीरे-धीरे अभ्यास करते हुए वे खुद भी इन वस्तुओं को गढ़ने लगे और जैसे-जैसे समय बीतता गया, यही कला उनकी मुख्य पहचान बन गई। आज जीवन के इस पड़ाव पर उम्र अधिक हो जाने के बाद भी वे अपनी इस प्राचीन संस्कृति और कला को भूले नहीं हैं, और जब भी उन्हें समय मिलता है, वे पूरी तन्मयता के साथ इन वस्तुओं को तैयार करने में जुट जाते हैं। जंगल से लाते हैं कच्चा माल और अपने हाथों से गढ़ते हैं उपयोगी सामान चमरू मांझी इन पारंपरिक वस्तुओं के निर्माण के लिए आवश्यक कच्चा माल स्वयं जंगलों से ढूंढकर लाते हैं, हालांकि कई बार उनके काम को आसान बनाने के लिए अन्य लोग भी उनके पास सामग्री पहुंचा देते हैं। इसके बाद वे अपने लंबे अनुभव और अद्वितीय हुनर के बल पर अत्यंत उपयोगी और टिकाऊ वस्तुएं तैयार करते हैं। उनका पूरा कामकाज पारंपरिक और हस्तनिर्मित तरीकों पर टिका हुआ है, जिसमें उनकी कड़ी मेहनत के साथ-साथ दशकों का अमूल्य अनुभव भी पूरी तरह शामिल होता है। मुर्गियों को ढकने से लेकर मछली पकड़ने और सब्जी रखने तक है गरना का उपयोग चमरू मांझी के बेटे दिलीप ने लोकल अट्ठारह को बातचीत के दौरान बताया कि मुर्गियों को सुरक्षित ढंग से ढकने के लिए उपयोग में लाई जाने वाली इस विशेष वस्तु को स्थानीय ग्रामीण भाषा में गरना कहा जाता है। इसके अलावा वे मोरा, फूटी और कई अन्य प्रकार की छोटी तथा बड़ी पारंपरिक वस्तुएं भी अपनी कला से बनाते हैं। ग्रामीण अंचलों में इन वस्तुओं का इस्तेमाल अलग-अलग और विविध कार्यों के लिए बहुतायत में किया जाता है। खेती और किसानी से जुड़े इलाकों में साग-सब्जियां इकट्ठा करने के साथ-साथ नदी और नालों के आसपास मछली पकड़ने जैसे कामों में भी इन पारंपरिक उपकरणों की बहुत मांग रहती है। बाजार जाने की जरूरत नहीं पड़ती, घर पर ही पहुंचते हैं ग्राहक चमरू मांझी द्वारा तैयार की जाने वाली इन वस्तुओं की बिक्री का तरीका भी बेहद अनूठा और अलग है। वे खुद कभी सामान लेकर किसी दुकान या बाजार में बेचने नहीं जाते हैं, बल्कि ग्राहक स्वयं चलकर उनके दरवाजे पर पहुंच जाते हैं। दिलीप के मुताबिक, उनके द्वारा बनाई जाने वाली एक गरना लगभग तीन सौ रुपये में बेची जाती है, जिससे इस पारंपरिक कला की उपयोगिता और महत्व का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि, इन वस्तुओं की कुल कितनी बिक्री होती है और इससे कुल कितनी आमदनी अर्जित होती है, इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा या जानकारी सामने नहीं आई है। आधुनिकता के इस दौर में भी ग्रामीण विरासत को सहेजने का सराहनीय प्रयास पिछले करीब पांच दशकों से पारंपरिक वस्तुओं का निर्माण कर रहे चमरू मांझी की यह जीवन यात्रा केवल एक बुजुर्ग कारीगर की साधारण कहानी भर नहीं है, बल्कि यह उस समृद्ध ग्रामीण विरासत की एक जीवंत झलक है, जो सदियों से लोगों के दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा रही है। उनके पिता से सीखी हुई यह कला आज भी उनके कुशल हाथों में पूरी तरह जीवित है। आज के इस आधुनिकता और मशीनीकरण के दौर में ऐसे समर्पित कारीगर हमारे पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय संस्कृति को सहेजने तथा बचाने का अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। आज इस बात की सख्त जरूरत है कि इस तरह के अनूठे हुनर को उचित पहचान और प्रोत्साहन मिले, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां भी इस कला को सीखें और इसे आगे बढ़ाने का काम जारी रखें। इसका आप पर असर यह खबर मुख्य रूप से पारंपरिक कला से जुड़ी होने के कारण आम जीवन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव डालती है। • छत्तीसगढ़ में: सरगुजा और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के स्थानीय कारीगरों को अपनी पारंपरिक कला और हस्तशिल्प को संरक्षित करने की प्रेरणा मिलती है। स्थानीय स्तर पर बांस से बने उत्पादों की मांग बढ़ने से ग्रामीण आजीविका के नए रास्ते खुलते हैं। • बाजार के संदर्भ में: बिचौलियों के बिना सीधे घर से सामान बिकने से कारीगरों को उनकी मेहनत का पूरा और उचित मूल्य मिल पाता है। • दैनिक उपयोग में: मुर्गी पालन और सब्जी संरक्षण के लिए पारंपरिक उपकरणों का उपयोग पर्यावरण के अनुकूल और किफायती विकल्प साबित होता है। • सांस्कृतिक महत्व में: आधुनिकता के दौर में लुप्त हो रही स्वदेशी कला और संस्कृति को जीवित रखने में ऐसे स्थानीय हुनरमंदों की भूमिका अहम होती है। ऐसा क्यों हुआ यह कहानी पारंपरिक ज्ञान और पुस्तैनी हुनर के प्रति समर्पण के कारण सामने आई है, जिसमें आधुनिक युग में भी प्राचीन कलाओं का अस्तित्व बना हुआ है। • पारिवारिक परंपरा: चमरू मांझी ने बचपन में अपने पिता को बांस के सामान बनाते हुए देखकर यह कला सीखी थी, जो पांच दशकों से चली आ रही है। • स्थानीय मांग: ग्रामीण इलाकों में खेती, मुर्गी पालन और मछली पकड़ने के लिए इन पारंपरिक वस्तुओं की निरंतर आवश्यकता बनी रहती है। • विश्वसनीयता और गुणवत्ता: उनके द्वारा बनाए गए सामान की मजबूती और उपयोगिता के कारण ग्राहक खुद उनके घर तक पहुंचते हैं। सवाल-जवाब 1. चमरू मांझी की उम्र कितनी है? चमरू मांझी की उम्र तकरीबन 70 साल है। 2. वे कितने वर्षों से पारंपरिक वस्तुएं बना रहे हैं? वे करीब 50 साल से पारंपरिक वस्तुएं बनाने का काम कर रहे हैं। 3. चमरू मांझी कहां के रहने वाले हैं? वे छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के कतकालो गांव के रहने वाले हैं। 4. वे बांस से मुख्य रूप से क्या बनाते हैं? वे मुर्गी पालन के लिए गरना और सब्जियां या मछलियां रखने के लिए पुटी बनाते हैं। 5. वे सामान बेचने कहां जाते हैं? वे सामान बेचने बाजार नहीं जाते, बल्कि ग्राहक खुद उनके घर पहुंचते हैं। 6. एक गरना कितने रुपये में बिकता है? उनके बेटे दिलीप के अनुसार एक गरना करीब 300 रुपये में बेचा जाता है। 7. उन्होंने यह हुनर किससे सीखा था? उन्होंने यह हुनर बचपन में अपने पिता को देखकर सीखा था। 8. सामग्री कहां से लाई जाती है? वे इन वस्तुओं को बनाने के लिए जंगल से सामग्री लाते हैं। प्रेरणा और सबक चमरू मांझी की पांच दशकों की यह लंबी यात्रा कई प्रेरणादायक सबक देती है। • पुस्तैनी हुनर का सम्मान: परिवार से सीखे गए पारंपरिक कौशल को उम्र के इस पड़ाव पर भी पूरी लगन के साथ जीवित रखा जा सकता है। • कड़ी मेहनत और निरंतरता: पचास वर्षों तक एक ही काम में जुटे रहने से न केवल पहचान बनती है बल्कि आत्मनिर्भरता भी हासिल होती है। • गुणवत्ता पर भरोसा: यदि आपका काम और उत्पाद उपयोगी है, तो आपको बाजार तक जाने की जरूरत नहीं पड़ती, ग्राहक खुद आपके पास आते हैं। • स्थानीय संसाधनों का उपयोग: जंगल से सामग्री लाकर उपयोगी वस्तुएं बनाना पर्यावरण के अनुकूल और स्वदेशी आत्मनिर्भरता का बेहतरीन उदाहरण है। https://trendkia.com/chhattisgarh/surguja-ke-sattara-varshiya-chamru-manjhi-ka-kamala-pachasa-varshon-se-bansa-ki-kalakari-se-snvara-rahe-hain-jivana-48733 TrendKia — Har trend, sabse pehle.