{
  "type": "article",
  "title": "सरगुजा में भादो एकादशी पर कर्मा पर्व की धूम, युवतियों ने रखा निर्जला उपवास",
  "summary": "छत्तीसगढ़ के सरगुजा में प्रकृति और अच्छी फसल की कामना के साथ कर्मा पूजा मनाई गई, जहां युवतियों ने कठिन निर्जला व्रत रखकर कर्म देवता की आराधना की।",
  "content": "छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में पीढ़ियों से चली आ रही लोक परंपराओं को ग्रामीण और आदिवासी समाज आज भी पूरी निष्ठा से संजोए हुए है। भादो मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि यानी एकादशी को मनाए जाने वाले कर्मा पूजा पर्व पर इस बार भी व्यापक उत्साह देखने को मिला। अच्छी पैदावार, गांव में सुख-शांति तथा परिवार की संपन्नता की कामना को लेकर ग्रामीण कर्म देवता की शरण में पहुंचे। इस पावन अवसर पर अविवाहित कन्याओं ने कठोर निर्जला उपवास रखकर अपनी अटूट आस्था प्रकट की।\n\nप्रकृति आराधना और कई समुदायों का साझा पर्व\nस्थानीय परंपराओं के जानकार सिकंदर प्रजापति के अनुसार कर्मा पूजा पूर्वजों के दौर से निरंतर चली आ रही एक समृद्ध विरासत है। यह धार्मिक अनुष्ठान हर साल भादो माह की एकादशी तिथि को ही संपन्न होता है। इस उत्सव में केवल एक वर्ग नहीं, बल्कि मांझी, मजवार, कंवर, कुम्हार और गोंड समाज सहित हिंदू समाज के विभिन्न समुदाय पूरी एकजुटता के साथ भागीदार बनते हैं। कर्मा पर्व का सीधा संबंध प्रकृति, पर्यावरण और कृषि चक्र से जुड़ा हुआ है। ग्रामीण मान्यताओं के तहत धान की भरपूर पैदावार, क्षेत्र में खुशहाली और जन-कल्याण की प्रार्थना के साथ कर्म देव का आह्वान किया जाता है। ग्रामीण इसे पूर्वजों की धरोहर और मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत पर्व मानते हैं। विधिवत पूजन अनुष्ठान पूर्ण होने के उपरांत व्रत खोलने और श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरण का क्रम भी पारंपरिक रीति से पूरा किया जाता है।\n\nदिनभर निर्जला साधना और सांझ की तैयारियां\nइस अनुष्ठान में अविवाहित युवतियों की मुख्य भूमिका रहती है, जो सुबह से ही निर्जला व्रत का संकल्प लेती हैं। पूरे दिन अन्न और जल की एक बूंद भी ग्रहण किए बिना युवतियां उपवास का पालन करती हैं। दिन ढलने के बाद शाम को स्नान कर शुद्धि की जाती है, जिसके बाद पूजा-अर्चना की विधिवत तैयारियां जोर-शोर से शुरू होती हैं।\n\nजंगल से डाली लाने के सख्त नियम\nशाम ढलते ही करीब 7 से 8 बजे के बीच वन क्षेत्र से कर्म वृक्ष की डाली लाने की विशेष प्रक्रिया आरंभ होती है। इस विधान में सख्त नियमों का पालन अनिवार्य माना गया है। कर्म की डाली को किसी कुल्हाड़ी या धारदार हथियार से काटने के बजाय हाथों से आदरपूर्वक तोड़कर लाया जाता है। जंगल से लाते समय इस पावन डाली को किसी भी सूरत में जमीन पर नहीं रखा जाता, बल्कि कंधों पर धारण कर सीधे घर और आंगन तक पहुंचाया जाता है।\n\nदूध से अभिषेक और छत के छप्पर में स्थापना\nघर के प्रांगण में डाली के पहुंचते ही उसका आदर-सत्कार किया जाता है। कर्म देव के प्रतीक रूप इस डाली को एक स्वच्छ थाली में स्थापित कर पवित्र दूध से स्नान कराया जाता है। इसके पश्चात पूजा-अर्चना के विधान संपन्न होते हैं और फिर इसे घर के छप्पर पर सुरक्षित स्थापित कर दिया जाता है। इस तरह पूरे विधि-विधान से कर्मा देव की अगवानी कर ग्रामीण अपनी समृद्ध लोक संस्कृति की रक्षा करते हैं।\n\nइसका आप पर असर\nयह त्योहार ग्रामीण और कृषि समुदाय के सामाजिक जीवन, पारस्परिक सौहार्द और पारंपरिक जीवनशैली को मजबूती प्रदान करता है।\n\n• भारत में: यह पर्व देश की समृद्ध जनजातीय विरासत और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोक संस्कारों की निरंतरता को दर्शाता है। इससे आने वाली पीढ़ियों में लोक संस्कृति और प्रकृति पूजा के प्रति सम्मान बना रहता है।\n• सरगुजा में: स्थानीय समुदायों के बीच आपसी तालमेल और सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा मिलता है। ग्रामीण घरों में भादो मास की एकादशी के दिन अनुष्ठान और प्रसाद वितरण के जरिए सामूहिक एकता सुदृढ़ होती है।\n• कृषि समाज पर असर: खरीफ मौसम में धान की बेहतर उपज की उम्मीद के साथ किसान नई ऊर्जा से अपने कार्य में जुटते हैं। पारंपरिक प्रार्थनाओं से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सकारात्मक वातावरण बनता है।\n• पारंपरिक व्रतियों के लिए: अविवाहित कन्याओं द्वारा रखे जाने वाले इस कठिन व्रत से नैतिक अनुशासन और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता को प्रोत्साहन मिलता है। परिवार के बुजुर्ग नई पीढ़ी को इन नियमों और मान्यताओं से अवगत कराते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nकर्मा पूजा का आयोजन प्रकृति के प्रति कृतज्ञता जताने और धान की सफल पैदावार सुनिश्चित करने की सदियों पुरानी मान्यता पर आधारित है।\n\n• कृषि और प्रकृति से जुड़ाव: धान की फसल की सुरक्षा, गांव में समृद्धि और पर्यावरण के संतुलन की कामना के चलते ग्रामीण सदियों से इस पूजा का आयोजन करते आ रहे हैं। इस पर्व के केंद्र में कर्म वृक्ष और प्रकृति की शक्ति विद्यमान है।\n• भादो एकादशी का मुहूर्त: पूर्वजों द्वारा निर्धारित पंचांग परंपरा के अनुसार यह अनुष्ठान प्रतिवर्ष भादो माह के शुक्ल पक्ष की 11वीं तिथि को ही संपन्न किया जाता है। इस निश्चित तिथि पर ही सभी समुदायों में पूजा का विधान तय है।\n• सामुदायिक एकजुटता की परंपरा: इतिहास से चली आ रही इस व्यवस्था में मांझी, मजवार, कंवर, कुम्हार और गोंड समुदाय मिलकर उत्सव मनाते हैं। कई जातियों की इस साझी भागीदारी ने इस पर्व को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत बनाए रखा है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. कर्मा पूजा किस तिथि को मनाई जाती है?\nयह पावन पर्व हर साल भादो माह की ग्यारहवीं तिथि यानी एकादशी के दिन मनाया जाता है।\n\n2. इस पूजा में कौन से समुदाय भाग लेते हैं?\nइस उत्सव में मांझी, मजवार, कंवर, कुम्हार और गोंड समाज सहित हिंदू समाज के कई समुदाय सम्मिलित होते हैं।\n\n3. युवतियां किस प्रकार का व्रत रखती हैं?\nअविवाहित युवतियां सुबह से शाम तक बिना अन्न और जल ग्रहण किए निर्जला उपवास रखती हैं।\n\n4. कर्म की डाली जंगल से कब और कैसे लाई जाती है?\nशाम 7 से 8 बजे के बीच डाली को बिना काटे, हाथों से तोड़कर लाया जाता है और जमीन पर रखे बिना कंधों पर ढोया जाता है।\n\n5. घर लाकर कर्म डाली की स्थापना कैसे की जाती है?\nडाली को थाली में रखकर दूध से स्नान कराया जाता है और पूजा के बाद घर के छप्पर में स्थापित किया जाता है।",
  "url": "https://trendkia.com/chhattisgarh/surguja-men-bhado-ekadashi-para-karma-parva-ki-dhuma-yuvatiyon-ne-rakha-nirjala-upavasa-36902",
  "category": "छत्तीसगढ़",
  "publishedAt": "2026-09-23",
  "tags": [
    "सरगुजा",
    "कर्मा पूजा",
    "भादो एकादशी",
    "छत्तीसगढ़ संस्कृति",
    "आदिवासी परंपरा",
    "कर्म देवता"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}