सरगुजा में धान के घाटे से उबरे किसान शिव बालक, डबरी में मछली पालन और सब्जियों से खोली कमाई की नई राह पारंपरिक धान की खेती में कम लाभ मिलने पर छत्तीसगढ़ के सरगुजा निवासी किसान शिव बालक ने डबरी बनवाकर मछली पालन और सब्जी उत्पादन शुरू किया, जिससे शुरुआती दौर में ही 25 हजार रुपये तक की कमाई हुई। पारंपरिक धान की फसल से मनमुताबिक मुनाफा न मिलने पर छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के किसान शिव बालक ने अपनी खेती का तरीका बदला और अतिरिक्त कमाई का मजबूत जरिया तलाश लिया। उन्होंने खेत में बनी डबरी के जरिए जलीय कृषि और सब्जियों की पैदावार का एकीकृत मॉडल अपनाया, जिससे पहले ही प्रयास में संतोषजनक वित्तीय लाभ देखने को मिला है। यह अभिनव कदम अब उनके पूरे परिवार के लिए नियमित आजीविका का मुख्य आधार साबित हो रहा है। ग्रामीण रोजगार योजना की मदद से तैयार हुआ जल ढांचा शिव बालक के अनुसार उनके खेत में मौजूद डबरी का निर्माण ग्रामीण रोजगार योजना के अंतर्गत कराया गया था। जल संरक्षण के इस छोटे तालाब के तैयार होते ही उन्होंने इसमें मत्स्य पालन की शुरुआत कर दी। पहले जब वे केवल धान की खेती पर निर्भर थे, तब लागत निकालने के बाद अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता था। डबरी बनने के बाद हालात बदले और अब उन्हें हर मौसम में बेहतर आमदनी हासिल होने की ठोस उम्मीद बन गई है। शुरुआती चक्र में 2 क्विंटल उत्पादन और 25 हजार तक का मुनाफा मछली पालन के पहले ही दौर में शिव बालक ने लगभग 2 क्विंटल मछलियों की बिक्री की, जिससे उन्हें 20 से 25 हजार रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हुई। इस शुरुआती कामयाबी से उनका हौसला काफी बढ़ा है। मौजूदा सत्र में वे मछलियों की खुराक और बेहतर दाना प्रबंधन पर विशेष ध्यान दे रहे हैं, ताकि उत्पादन दर में तेजी आए। उन्हें भरोसा है कि बेहतर देखभाल के दम पर आने वाले दिनों में मछलियों का वजन बढ़ेगा और बिक्री से होने वाली कमाई में और अधिक इजाफा दर्ज होगा। चार प्रमुख प्रजातियों का संतुलित मिश्रित पालन डबरी की गहराई और उसमें मौजूद पानी का अधिकतम दोहन करने के लिए शिव बालक ने एकल किस्म के बजाय मिश्रित मत्स्य पालन की तकनीक अपनाई है। उनके जल भंडार में रोहू, कतला, मृगल और ग्रास कार्प जैसी मांग वाली मछलियां एक साथ पाली जा रही हैं। जल स्तर की विभिन्न परतों में पलने वाली इन अलग-अलग प्रजातियों के संयोजन से डबरी के स्थान और प्राकृतिक भोजन का शत-प्रतिशत सदुपयोग सुनिश्चित होता है, जिससे किसी भी तरह की बर्बादी नहीं होती। गर्मी के महीनों में सिंचाई और सब्जी उत्पादन से दोहरा लाभ इस जल संरचना की उपयोगिता केवल जलीय जीवों के संवर्धन तक सीमित नहीं रहती। खरीफ सीजन में धान की कटाई पूरी होने के बाद, शिव बालक भीषण गर्मी के दिनों में इसी डबरी के संचित जल से सब्जियों की सिंचाई करते हैं। जल का यह चक्रीय प्रबंधन पानी की बर्बादी रोकता है और सूखे के महीनों में परिवार को ताजा सब्जियों की बिक्री से अतिरिक्त नकदी उपलब्ध कराता है। घाटे वाली परंपरागत खेती के मुकाबले यह बहुआयामी मॉडल उनके लिए आजीविका का स्थायी और भरोसेमंद समाधान बन चुका है। इसका आप पर असर यह पहल दर्शाती है कि जल संचयन के छोटे ढांचे और फसल विविधीकरण से छोटे किसानों की आर्थिक सुरक्षा तुरंत सुदृढ़ हो सकती है। • भारत में: किसान सरकारी रोजगार व जल संचयन योजनाओं से अपने खेतों में छोटे तालाब बनवाकर पारंपरिक फसलों पर अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं। इससे सूखा प्रभावित महीनों में भी नकदी का प्रवाह बना रहता है। • सरगुजा में: स्थानीय काश्तकार अपनी डबरी में रोहू, कतला और ग्रास कार्प का मिश्रित पालन कर शुरुआती चक्र में ही 20 से 25 हजार रुपये की अतिरिक्त आय जोड़ सकते हैं। साथ ही बचे हुए पानी से गर्मियों में सब्जी उगाकर जमीन को सालों भर उपजाऊ रख सकते हैं। • कृषि लागत पर प्रभाव: डबरी के पानी से सिंचाई करने से भूजल दोहन और महंगे पंपिंग खर्चों में सीधे बचत होती है। किसान कम लागत में बहुफसली चक्र अपनाकर जोखिम घटा सकते हैं। • आजीविका सुरक्षा: एक ही संसाधन से मछली और सब्जी दोनों मिलने पर मौसमी घाटे या सूखे के समय किसान परिवार को आर्थिक संकट का सामना नहीं करना पड़ता। ऐसा क्यों हुआ पारंपरिक धान की खेती में लगातार कम हो रहे लाभ मार्जिन और बढ़ते इनपुट खर्चों के चलते किसान ने बहुआयामी आजीविका मॉडल की ओर रुख किया। ग्रामीण रोजगार योजना के जरिए मिली सरकारी मदद ने इस परिवर्तन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराया। • सीमित धान मुनाफा: धान की एकल फसल पर निर्भरता के कारण मजदूरी और बीज-खाद की लागत निकालने के बाद किसान के पास पर्याप्त बचत नहीं बचती थी। इस आर्थिक दबाव ने वैकल्पिक आय स्रोतों की तलाश को प्रेरित किया। • सरकारी जल योजना का लाभ: ग्रामीण रोजगार योजना के तहत खेत में डबरी की खुदाई कराई गई, जिससे बिना भारी निजी निवेश के एक टिकाऊ जल भंडारण तैयार हो गया। यह ढांचा जलीय कृषि के लिए मुख्य आधार बना। • मिश्रित प्रजाति चयन: डबरी के सतही, मध्य और तली वाले पानी का संतुलित उपयोग करने के लिए कतला, रोहू, मृगल और ग्रास कार्प का चयन किया गया। इससे कम जगह में उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ गई। • जल पुनर्चक्रण की रणनीति: गर्मी में सिंचाई के अभाव को दूर करने के लिए डबरी के पानी को सब्जियों के खेतों में मोड़ा गया, जिससे एक ही जल संसाधन से दोहरी आय संभव हुई। सवाल-जवाब 1. किसान शिव बालक ने धान के अलावा क्या नया काम शुरू किया? उन्होंने अपने खेत की डबरी में मछली पालन और गर्मी के मौसम में सब्जियों की खेती शुरू की है। 2. डबरी का निर्माण किस योजना के तहत हुआ था? डबरी का निर्माण ग्रामीण रोजगार योजना के माध्यम से कराया गया था। 3. मछली पालन से शुरुआती दौर में कितनी कमाई हुई? उन्होंने करीब 2 क्विंटल मछली बेचकर 20 से 25 हजार रुपये की कमाई की। 4. डबरी में कौन-कौन सी किस्मों की मछलियां पाली जा रही हैं? डबरी में कतला, रोहू, मृगल और ग्रास कार्प जैसी किस्मों का मिश्रित पालन किया जा रहा है। 5. डबरी के पानी का दूसरा उपयोग क्या है? धान की कटाई के बाद गर्मी के मौसम में इस पानी का उपयोग सब्जियों की सिंचाई के लिए किया जाता है। प्रेरणा और सबक शिव बालक की सफलता यह साबित करती है कि सरकारी योजनाओं का सूझबूझ से उपयोग करके सीमित जमीन पर भी लाभदायक उद्यम खड़ा किया जा सकता है। • संसाधनों का बहुउद्देशीय उपयोग: एक ही जल स्रोत को मछली पालन और बाद में सब्जी सिंचाई के लिए प्रयोग करके लागत और समय दोनों की बचत की जा सकती है। • कदम दर कदम विस्तार: पहले 2 क्विंटल उत्पादन से 20-25 हजार की कमाई कर उस पूंजी और अनुभव से मछली के पोषण को और उन्नत किया गया। • पारंपरिक सोच से बाहर निकलना: केवल मुख्य फसल के भरोसे रहने के बजाय स्थानीय मांग वाली रोहू, कतला और मौसमी सब्जियों का उत्पादन शुरू कर जोखिम को खत्म किया जा सकता है। https://trendkia.com/chhattisgarh/surguja-men-dhana-ke-ghate-se-ubare-kisana-shiv-balak-dabari-men-machhali-palana-aura-sabjiyon-se-kholi-kamai-ki-nai-raha-43638 TrendKia — Har trend, sabse pehle.