# सरगुजा में पारंपरिक मिलेट्स की वापसी, किसान ललित मांझी ने 20 डिसमिल खेत में फिर उगाई मड़िया

> छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में आधुनिक संकर फसलों के दौर के बीच किसान ललित मांझी ने पारंपरिक अनाज मड़िया की खेती फिर से शुरू कर पुरखों की कृषि विरासत को सहेजा है।

**Type:** article · **Category:** छत्तीसगढ़ · **Published:** 2026-10-19 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/chhattisgarh/surguja-men-parnparika-miletsa-ki-vapasi-kisana-lalit-manjhi-ne-20-disamila-kheta-men-phira-ugai-madiya-49453 · **Language:** Hindi
**Tags:** सरगुजा, मड़िया की खेती, रागी, पारंपरिक कृषि, ललित मांझी, मोटा अनाज, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में जहां आधुनिक कृषि पद्धतियों और संकर बीजों के बढ़ते चलन ने कई पुरानी फसलों को खेतों से दूर कर दिया है, वहीं कुछ काश्तकार अपनी पुरानी विरासत को बचाने में जुटे हैं। इसी कड़ी में सरगुजा जिले के किसान ललित मांझी ने मड़िया, जिसे स्थानीय बोलचाल में रागी भी कहा जाता है, की पारंपरिक खेती की ओर दोबारा कदम बढ़ाया है। एक दौर था जब स्थानीय आदिवासी परिवारों के दैनिक खानपान में यह मोटा अनाज अनिवार्य रूप से शामिल रहता था। समय के साथ भोजन की आदतें बदलीं और खेतों में संकर किस्मों का दखल बढ़ा, जिससे मड़िया की खेती का दायरा लगातार घटता चला गया। इसके बावजूद ललित मांझी ने अपनी 20 डिसमिल जमीन पर इस फसल को तैयार कर यह संदेश दिया है कि कम खर्च में पोषक और पारंपरिक खेती आज भी संभव है।

## आदिवासी संस्कृति और पारंपरिक थाली का मुख्य आधार
क्षेत्र के ग्रामीण परिवेश में मड़िया केवल एक फसल नहीं, बल्कि सदियों पुरानी जीवनशैली और खानपान की मजबूत कड़ी रही है। ललित मांझी बताते हैं कि उनके परिवार के बुजुर्ग नियमित तौर पर मड़िया का सेवन करते थे और उसी बल पर अपनी शारीरिक ऊर्जा बनाए रखते थे। पुराने जमाने में किसान बाजार से राशन खरीदने के बजाय अपने खेतों में उपजे देशी अनाजों पर ही सालभर के भोजन की व्यवस्था टिकाए रखते थे। मड़िया के मोटे दानों को सुखाकर और पीसकर आटा तैयार किया जाता था, जिसकी रोटियां घर-घर में बनाई जाती थीं। इसके अलावा इसे अन्य स्थानीय खाद्य सामग्रियों के साथ मिलाकर भी पकाया जाता था। हालांकि, जैसे-जैसे लोगों की खानपान की प्राथमिकताएं बदलीं, वैसे-वैसे खेतों से यह पारंपरिक दाना गायब होता चला गया।

## राशन व्यवस्था और संकर बीजों के प्रभाव से सिमटी खेती
पारंपरिक अनाजों के रकबे में आई गिरावट की पड़ताल करते हुए ललित मांझी एक बड़ा कारण सार्वजनिक वितरण प्रणाली के विस्तार को मानते हैं। पहले परिवारों को अपने भरण-पोषण के लिए दिन-रात खेतों में पसीना बहाकर अलग-अलग किस्मों के मोटे अनाज और धान उगाने पड़ते थे। अब सरकारी सोसाइटी से रियायती दर पर मिलने वाले चावल की सुलभ उपलब्धता के चलते कई ग्रामीण परिवारों की निर्भरता अपने खेतों में पारंपरिक अनाज उगाने पर काफी कम हो गई है। इसके साथ ही रासायनिक खादों पर निर्भर आधुनिक कृषि तकनीकों और अधिक पैदावार का दावा करने वाले संकर बीजों की तरफ किसानों का आकर्षण बढ़ा। इस दोहरे दबाव ने मड़िया जैसी कठोर और पौष्टिक फसलों को हाशिए पर धकेल दिया, जिससे कभी गांवों की पहचान रही यह खेती बहुत सीमित दायरे में सिमट गई।

## 20 डिसमिल जमीन पर लहलहा रही मड़िया की फसल
अधिकांश किसानों द्वारा पारंपरिक अनाजों से दूरी बना लेने के बावजूद ललित मांझी ने उम्मीद नहीं छोड़ी और अपनी 20 डिसमिल भूमि पर मड़िया की बुवाई की। उन्होंने पूरे पारंपरिक तरीके से खेत की जुताई और तैयारी करने के बाद बीजों का रोपण किया। पौधों के अंकुरण और उनकी बढ़वार के दौरान खेत में जरूरी निराई-गुड़ाई तथा अन्य कृषि कार्य किए गए। अब पौधों में बालियां निकल आई हैं और बालियों के भीतर दाने भरने की प्रक्रिया तेजी से चल रही है। फसल की वर्तमान स्थिति को देखते हुए किसान को पूरी उम्मीद है कि जल्द ही कटाई के बाद उन्हें भरपूर अनाज प्राप्त होगा, जिसका प्राथमिक उपयोग वे अपने परिवार के दैनिक भोजन में करेंगे।

## रोटी से लेकर पारंपरिक पेय हड़िया तक बहुआयामी उपयोग
मड़िया के दानों की बनावट सामान्य अनाजों की तुलना में थोड़ी मोटी होती है। जब इन दानों को चक्की में पीसा जाता है, तो उससे पौष्टिक आटा तैयार होता है, जिससे पारंपरिक रोटियां पकाई जाती हैं। ललित मांझी के अनुसार, भले ही आज की पीढ़ी को इसका स्वाद गेहूं या चावल जितना परिचित न लगे, लेकिन उनके बुजुर्ग इसे शरीर को ताकत और मजबूती देने वाला उत्तम आहार मानते थे। किसान का यह भी मानना है कि इस मोटे अनाज के नियमित खानपान से सेहत दुरुस्त रहती है और बीमारियां दूर रहती हैं, यद्यपि इस तरह के स्वास्थ्य लाभों और बीमारी के इलाज संबंधी दावों के सत्यापन के लिए ठोस वैज्ञानिक प्रमाण आवश्यक हैं। भोजन के अलावा, आदिवासी समुदाय में सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर तैयार किए जाने वाले पारंपरिक पेय हड़िया को बनाने में भी मड़िया का इस्तेमाल प्रमुखता से किया जाता है। इस प्रकार यह अनाज आदिवासी समाज के रीति-रिवाजों और पारंपरिक पेय संस्कृति का भी अभिन्न हिस्सा बना हुआ है।

## कम लागत में बेहतर उत्पादन और जागरूकता की आवश्यकता
आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो मड़िया की खेती में लागत बहुत सीमित आती है, क्योंकि इसे महंगे रासायनिक उर्वरकों या अत्यधिक कीटनाशकों की दरकार नहीं होती। हालांकि, ललित मांझी यह भी स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक खेती का खर्च और मिलने वाला मुनाफा अलग-अलग जमीन की बनावट, बीज की गुणवत्ता, स्थानीय श्रम और अपनाए जाने वाले कृषि तरीकों पर निर्भर करता है। वे मानते हैं कि अगर किसानों को पारंपरिक मोटे अनाजों के बेहतर उत्पादन तरीकों, बाजार की मांग और उचित मूल्य निर्धारण के बारे में सही जानकारी दी जाए, तो अन्य काश्तकार भी इसे अपनाने के लिए प्रेरित होंगे। जब तक स्थानीय बाजारों में ऐसे अनाजों की मांग नहीं बढ़ेगी और किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम नहीं मिलेगा, तब तक इसका दायरा व्यापक स्तर पर बढ़ाना चुनौतीपूर्ण बना रहेगा।

## पुरखों की विरासत सहेजने का व्यक्तिगत संकल्प
ललित मांझी का यह प्रयास केवल अनाज उगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों और कृषि धरोहर को जीवित रखने का एक सचेत प्रयास है। उनका स्पष्ट मानना है कि जिन फसलों के सहारे हमारे पूर्वजों ने पीढ़ियों तक स्वस्थ जीवन जिया, उन्हें आधुनिकता की आंधी में पूरी तरह भुला देना समझदारी नहीं है। स्थानीय कृषि जैव विविधता को बनाए रखने और लोक परंपराओं को सुरक्षित रखने के लिए मड़िया जैसी फसलों का संरक्षण बेहद जरूरी है। इसके लिए आवश्यक है कि शासन और समाज के स्तर पर ऐसे किसानों को उचित प्रोत्साहन मिले, ताकि आने वाली युवा पीढ़ी भी अपने पुरखों के पारंपरिक अनाजों की महत्ता और उनके उपयोग के प्रति जागरूक हो सके।

## इसका आप पर असर
पारंपरिक मोटे अनाजों की दोबारा खेती से किसानों की उत्पादन लागत घटती है और पोषण सुरक्षा मजबूत होती है।

- **छत्तीसगढ़ में:** सरगुजा अंचल के ग्रामीण किसान कम पानी और न्यूनतम लागत में मड़िया उगाकर अपनी घरेलू खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ कर सकते हैं। इससे उन्हें बाजार के महंगे रासायनिक खादों और बीजों पर आश्रित नहीं रहना पड़ेगा।
- **भारत में:** देश भर में मोटे अनाजों और मिलेट्स की बढ़ती मांग के बीच ऐसी पारंपरिक फसलें किसानों को बेहतर बाजार अवसर दिला सकती हैं। उपभोक्ता भी अपनी थाली में ऐसे पौष्टिक स्थानीय अनाजों को शामिल कर संतुलित आहार अपना सकते हैं।
- **कृषि लागत पर प्रभाव:** मड़िया जैसी स्थानीय फसलों को महंगे संकर बीजों और कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं होती है। इससे छोटे और सीमांत किसानों के ऊपर खेती की लागत का आर्थिक बोझ काफी कम हो जाता है।
- **पोषण और खानपान:** मोटे अनाज से बनी रोटियां और पारंपरिक व्यंजन रोजमर्रा के आहार में विविधता लाते हैं। हालांकि, किसी भी अनाज के औषधीय गुणों को अपनाने से पहले चिकित्सीय सलाह और वैज्ञानिक प्रमाणों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

## ऐसा क्यों हुआ
ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए रियायती चावल मिलने और अधिक उपज वाली संकर फसलों के प्रचार से पारंपरिक मड़िया की खेती में भारी गिरावट आई। इसके चलते किसानों ने कम लागत वाली स्थानीय किस्मों को छोड़कर आधुनिक कृषि का रुख कर लिया।

- **सुलभ राशन व्यवस्था:** सरकारी सोसायटियों से मिलने वाले सस्ते चावल ने ग्रामीणों के लिए भोजन की आसान उपलब्धता सुनिश्चित कर दी। इसके परिणामस्वरूप किसानों को सालभर के भोजन के लिए कई तरह के पारंपरिक अनाज उगाने की तत्काल आवश्यकता महसूस नहीं हुई।
- **संकर बीजों का बढ़ता आकर्षण:** आधुनिक कृषि में अधिक पैदावार देने वाले हाइब्रिड बीजों के प्रति किसानों का रुझान बढ़ा। इस होड़ ने सदियों से चली आ रही देशी और कठोर किस्मों को खेतों से बाहर कर दिया।
- **विरासत संरक्षण का प्रयास:** इन बदलावों के बीच ललित मांझी जैसे किसानों ने पूर्वजों की खानपान परंपरा को लुप्त होने से बचाने के लिए 20 डिसमिल खेत में दोबारा मड़िया की बुवाई शुरू की।

## सवाल-जवाब

### 1. मड़िया क्या है और इसे अन्य किस नाम से जाना जाता है?
मड़िया एक पारंपरिक मोटा अनाज है, जिसे स्थानीय बोलचाल की भाषा में रागी भी कहा जाता है।

### 2. सरगुजा के किसान ललित मांझी ने कितने रकबे पर मड़िया की खेती की है?
ललित मांझी ने अपनी 20 डिसमिल जमीन पर मड़िया की पारंपरिक बुवाई की है।

### 3. ग्रामीण क्षेत्रों में मड़िया की खेती का दायरा क्यों कम हुआ?
सोसायटी से सस्ते चावल की उपलब्धता और संकर बीजों के प्रति बढ़ते रुझान के कारण पारंपरिक मड़िया की खेती कम हो गई।

### 4. मड़िया का उपयोग किन खाद्य और पेय पदार्थों में किया जाता है?
मड़िया के आटे से रोटियां बनाई जाती हैं और इसका इस्तेमाल स्थानीय पारंपरिक पेय हड़िया बनाने में भी होता है।

### 5. क्या मड़िया खाने से बीमारियों के इलाज के दावों की पुष्टि हुई है?
स्थानीय मान्यताओं के बावजूद मड़िया से बीमारियां ठीक होने के दावों के सत्यापन के लिए ठोस वैज्ञानिक प्रमाण आवश्यक हैं।

### 6. पारंपरिक फसलों को बढ़ावा देने के लिए किसान क्या जरूरी मानते हैं?
किसानों का मानना है कि उत्पादन विधियों, बाजार की मांग और उचित मूल्य की जानकारी देकर ही ऐसी फसलों को बढ़ावा दिया जा सकता है।

## प्रेरणा और सबक
ललित मांझी की यह पहल दिखाती है कि कैसे एक व्यक्ति अपनी सांस्कृतिक जड़ों और देशी कृषि ज्ञान को आधुनिक दबावों के बीच भी जिंदा रख सकता है।

- **विरासत का सम्मान:** आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपने पूर्वजों की कृषि परंपरा और भोजन संस्कृति को पूरी तरह छोड़ना उचित नहीं है।
- **कम संसाधनों में आत्मनिर्भरता:** सीमित भूमि और न्यूनतम लागत के साथ भी पौष्टिक फसलें उगाकर घरेलू जरूरतों को पूरा किया जा सकता है।
- **पहचान की रक्षा:** जब अधिकांश लोग प्रचलित प्रवृत्तियों के पीछे भाग रहे हों, तब भी अपनी स्थानीय पहचान और जैव विविधता को बचाने के लिए स्वतंत्र कदम उठाया जा सकता है।

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