सऊदी अरब ने हूती हमलों को रोकने के लिए चीन से लगाई गुहार, बीजिंग ने ईरान से की शांति की अपील लाल सागर और बाब-अल-मंदेब में हूतियों की बढ़ती सैन्य गतिविधियों के बीच सऊदी अरब ने अमेरिका के बजाय चीन से हस्तक्षेप की मांग की है, जिसके बाद बीजिंग ने तेहरान से विद्रोहियों पर प्रभाव डालने को कहा। पश्चिम एशिया के समुद्री मार्गों पर टकराव गहराने के बीच कूटनीतिक हलचलों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच जारी सैन्य संघर्ष के दौरान सऊदी अरब ने संकट के समाधान के लिए पारंपरिक सहयोगी अमेरिका के बजाय चीन का दरवाजा खटखटाया है। इस गुहार के बाद चीन ने पर्दे के पीछे से ईरान से संपर्क साधा है और आग्रह किया है कि वह यमन के हूती लड़ाकों पर अपने असर का इस्तेमाल करे, ताकि लाल सागर और बाब-अल-मंदेब के रणनीतिक जलमार्गों पर बढ़ते टकराव को थामा जा सके। सार्वजनिक मंचों पर चीन सिर्फ संयम बरतने और शांतिपूर्ण बातचीत की वकालत कर रहा है, परंतु कूटनीतिक स्तर पर उसने तेहरान को स्पष्ट संदेश भेजा है। सऊदी फाइटर जेट गिराने का दावा और बढ़ता सैन्य तनाव हूती विद्रोहियों ने बीते एक सप्ताह के भीतर लाल सागर के तटीय इलाकों और बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट के आसपास तेजी से अपनी सैन्य उपस्थिति और पकड़ मजबूत की है। इस बढ़त ने सऊदी अरब के समुद्री जहाजों की सुरक्षा के साथ-साथ उसके तेल निर्यात तंत्र के लिए भारी चिंता पैदा कर दी है। दोनों पक्ष एक-दूसरे के ठिकानों पर लगातार हमले कर रहे हैं। इसी दौरान हूतियों ने सऊदी अरब के एक एफ-15 लड़ाकू विमान को मार गिराने का दावा भी किया है। इस घटनाक्रम के बाद रियाद ने अपनी समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए कूटनीतिक समाधान तलाशने शुरू किए और सीधे बीजिंग से मदद मांगी। अमेरिका और हूतियों की गुप्त बैठक के बाद बदला समीकरण सऊदी अरब का वॉशिंगटन से हटकर बीजिंग की ओर रुख करने का फैसला एक खास पृष्ठभूमि में हुआ है। अमेरिका ने हाल ही में हूती विद्रोहियों के साथ एक गोपनीय बैठक की थी। इस बैठक के बाद यह बात सामने आई कि दोनों पक्षों के बीच एक समझौता बन गया है। इस समझौते की शर्तों के अनुसार, हूती विद्रोही लाल सागर के जलमार्ग में अमेरिकी जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे, जबकि इसके बदले में अमेरिकी सेना यमन की सीमा के भीतर हूती ठिकानों पर कोई नया सैन्य हमला नहीं करेगी। अपने सबसे बड़े सुरक्षा साझेदार की इस गुप्त सहमति के बाद सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा चिंताओं को लेकर चीन के साथ आगे बढ़ने का निर्णय लिया। ईरान की दो टूक शर्त: तनाव की जड़ युद्ध में बीजिंग द्वारा किए गए निजी अनुरोध पर ईरान का रुख भी बेहद स्पष्ट और रणनीतिक रहा। तेहरान ने चीन को जवाब देते हुए कहा कि पूरे क्षेत्र में अमन और स्थिरता केवल तभी बहाल हो सकती है, जब अमेरिका और इज़राइल के साथ चल रहा युद्ध पूरी तरह समाप्त हो। जब बीजिंग ने हूतियों की गतिविधियों पर अंकुश लगाने की बात कही, तो ईरान ने पूरे समुद्री संकट का सीधा संबंध अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ चल रहे बड़े क्षेत्रीय संघर्ष से जोड़ दिया। चीनी विदेश मंत्रालय ने भी आधिकारिक तौर पर कहा है कि वह इस तनाव को यमन और लाल सागर तक फैलते हुए नहीं देखना चाहता और सभी मुल्कों की संप्रभुता के सम्मान के साथ वार्ता से हल निकालने का समर्थन करता है। बीजिंग की ओर से ईरान को किसी खुली आर्थिक कार्रवाई या पाबंदी की चेतावनी नहीं दी गई है। दोहरे समुद्री ब्लॉकेड से चीन की ऊर्जा सुरक्षा पर मंडराता खतरा पश्चिम एशिया के दो सबसे अहम समुद्री चोकपॉइंट एक साथ भारी दबाव और रुकावट का सामना कर रहे हैं। एक तरफ ईरान और अमेरिका के आपसी टकराव के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य की आवाजाही पहले से ही बाधित है, तो दूसरी तरफ हूतियों की गतिविधियों ने लाल सागर और बाब-अल-मंदेब के रास्ते से गुजरने वाले जहाजों को खतरे में डाल दिया है। अगर ये दोनों प्रमुख समुद्री मार्ग लंबे समय तक बंद या प्रभावित रहते हैं, तो पूरी दुनिया में कच्चे तेल और जरूरी सामानों की आवाजाही पर बहुत बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते चीन भारी मात्रा में ऊर्जा आयात करता है, इसलिए खाड़ी से तेल की निर्बाध आपूर्ति उसके घरेलू उद्योगों के लिए जीवन रेखा जैसी है। तेहरान से कच्चा तेल और जीसीसी से 300 अरब डॉलर का कारोबार इस पूरे मामले में बीजिंग के सामने अपने कारोबारी और रणनीतिक हितों को संतुलित करने की विकट चुनौती है। वर्ष 2025 में ईरान ने समुद्री मार्ग से जितना कच्चा तेल निर्यात किया था, उसका 80 फीसदी से अधिक हिस्सा अकेले चीन ने खरीदा था। इसके उलट, खाड़ी सहयोग परिषद यानी जीसीसी के सदस्य देशों के साथ चीन का सालाना द्विपक्षीय व्यापार लगभग 300 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। ऐसे में बीजिंग के लिए यह तय करना बेहद संवेदनशील हो गया है कि वह अपने सबसे बड़े ऊर्जा आपूर्तिकर्ता ईरान के साथ रणनीतिक रिश्ते को बनाए रखे या फिर खाड़ी मुल्कों की समुद्री हिफाजत और व्यापारिक हितों को प्राथमिकता दे। 2023 की ऐतिहासिक मध्यस्थता के बाद चीन की नई परीक्षा मध्य पूर्व में जटिल विवाद सुलझाने का चीन के पास एक सफल कूटनीतिक रिकॉर्ड भी रहा है। वर्ष 2023 में चीन ने ही ऐतिहासिक पहल करते हुए सऊदी अरब और ईरान के बीच सात साल से टूटे औपचारिक राजनयिक संबंधों को फिर से बहाल कराया था। अब बीजिंग के सामने लाल सागर और यमन के संकट को थामने की उससे भी बड़ी परीक्षा है। जानकारों के सामने यह बड़ा सवाल है कि क्या चीन केवल तेहरान से कूटनीतिक अनुरोध तक ही सीमित रहेगा, या फिर जरूरत पड़ने पर अपने भारी आर्थिक दबदबे और तेल खरीद के प्रभाव का इस्तेमाल करके ईरान पर ठोस दबाव भी बनाएगा। इसका आप पर असर लाल सागर और खाड़ी के समुद्री रास्तों पर बढ़ता तनाव वैश्विक व्यापार और कच्चे तेल की कीमतों को सीधे प्रभावित कर सकता है। • ईंधन की कीमतें: यदि लाल सागर और होर्मुज दोनों मार्ग बाधित रहते हैं तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ सकते हैं। इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर पड़ेगा। • आयात-निर्यात और ढुलाई खर्च: जहाजों को सुरक्षित रास्तों से जाने के लिए लंबा चक्कर लगाना पड़ेगा जिससे माल ढुलाई का खर्च बढ़ जाएगा। इससे इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। • वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला: एशिया और यूरोप के बीच होने वाले व्यापार में देरी का सामना करना पड़ सकता है। उद्योगों को कच्चा माल मिलने में समय लगने से कई मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट्स प्रभावित हो सकते हैं। • खाड़ी में भारतीय कामगार: खाड़ी देशों में लाखों भारतीय कार्यरत हैं और वहां तनाव बढ़ने से सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ सकती हैं। हालांकि वर्तमान स्थिति मुख्य रूप से समुद्री व्यापार मार्गों और सैन्य टकराव तक केंद्रित है। ऐसा क्यों हुआ सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच दशकों पुराना संघर्ष लाल सागर के रणनीतिक जलमार्गों तक फैल चुका है, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। • हूतियों की बढ़ती सैन्य बढ़त: विद्रोहियों ने लाल सागर के तटीय क्षेत्रों और बाब-अल-मंदेब में अपनी पकड़ मजबूत कर सऊदी लड़ाकू विमान को मार गिराने का दावा किया, जिससे सऊदी ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर सीधा खतरा पैदा हुआ। • अमेरिका और हूतियों की गुप्त सहमति: अमेरिका ने विद्रोहियों के साथ गोपनीय बैठक कर केवल अपने जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित की और बदले में बमबारी रोकने का वादा किया, जिससे सऊदी अरब खुद को अकेला महसूस करने लगा। • चीन पर सऊदी अरब का भरोसा: ऊर्जा का सबसे बड़ा खरीदार होने और 2023 में सऊदी-ईरान समझौता कराने के पिछले अनुभव के कारण रियाद ने इस बार वॉशिंगटन के बजाय बीजिंग से मध्यस्थता की गुहार लगाई। • ईरान का व्यापक क्षेत्रीय रुख: हूतियों को समर्थन देने वाले ईरान ने इस संकट के समाधान को अमेरिका और इज़राइल के साथ चल रहे व्यापक युद्ध की समाप्ति से जोड़ दिया है। सवाल-जवाब 1. सऊदी अरब ने हूतियों के खिलाफ चीन से मदद क्यों मांगी? हूतियों की सैन्य बढ़त और सऊदी जेट गिराने के दावे के बाद, अमेरिका द्वारा हूतियों से गुप्त समझौता करने के चलते सऊदी अरब ने चीन से हस्तक्षेप की मांग की। 2. चीन ने ईरान से क्या अपील की है? चीन ने निजी तौर पर ईरान से कहा है कि वह हूती विद्रोहियों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करे ताकि लाल सागर और बाब-अल-मंदेब में तनाव कम किया जा सके। 3. चीन की अपील पर ईरान का क्या जवाब था? ईरान ने कहा कि क्षेत्र में शांति तभी संभव है जब अमेरिका और इज़राइल के साथ चल रहा युद्ध पूरी तरह समाप्त हो। 4. अमेरिका और हूतियों के बीच क्या समझौता हुआ था? समझौते के तहत हूती लाल सागर में अमेरिकी जहाजों पर हमला नहीं करेंगे और बदले में अमेरिकी सेना यमन में हूतियों के ठिकानों पर हमला नहीं करेगी। 5. लाल सागर का संकट चीन के लिए क्यों अहम है? चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी के तेल पर बहुत ज्यादा निर्भर है और 2025 में उसने ईरान के समुद्री तेल निर्यात का 80 फीसदी से अधिक हिस्सा खरीदा था। 6. चीन का खाड़ी देशों के साथ कितना व्यापार है? चीन का खाड़ी सहयोग परिषद यानी जीसीसी देशों के साथ सालाना व्यापार करीब 300 अरब डॉलर है। https://trendkia.com/china/saudi-arabia-ne-houthi-hamalon-ko-rokane-ke-lie-china-se-lagai-guhara-beijing-ne-iran-se-ki-shanti-ki-apila-33835 TrendKia — Har trend, sabse pehle.