आंख, हाथ और पैर की कमी नहीं रोक पाई इन 5 क्रिकेटरों का जादू, जानें हौसले की कहानियां एक आंख गंवाकर कप्तानी करने वाले मंसूर अली खान पटौदी से लेकर पोलियोग्रस्त हाथ से 242 विकेट लेने वाले भागवत चंद्रशेखर और मिर्गी से जूझते हुए टीम संभालने वाले टोनी ग्रेग तक, इन 5 क्रिकेटरों ने शारीरिक चुनौतियों को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया. क्रिकेट ऐसा खेल है जो जरा सी भी हिचकिचाहट माफ नहीं करता. 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आती गेंद बल्लेबाज को सोचने के लिए आधे सेकंड से भी कम वक्त देती है, और खचाखच भरे स्टेडियम में गूंजता शोर बड़े-बड़े खिलाड़ियों के पैर डिगा देता है. यहां सिर्फ हुनर से काम नहीं चलता, लोहे जैसी इच्छाशक्ति चाहिए होती है, क्योंकि एक शानदार करियर और भुला दिए जाने वाले करियर के बीच का फासला अक्सर सेकंड के हिस्सों और बल्ले के कुछ इंच में ही तय हो जाता है. जब किस्मत किसी खिलाड़ी से उसकी शारीरिक क्षमता का कोई हिस्सा छीन लेती है, तो ज्यादातर लोग मान लेते हैं कि करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया. लेकिन क्रिकेट के लंबे इतिहास में कुछ ऐसे जांबाज भी हुए, जिन्होंने इस फैसले को कबूल करने से इनकार कर दिया और अपनी अपंगता को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया. आइए जानते हैं ऐसी ही 5 कहानियां, जो बताती हैं कि आधुनिक स्पोर्ट्स साइंस और फिजियोथेरेपी की सुविधाएं न होने के दौर में भी हौसला हो तो मैदान पर क्या कुछ मुमकिन है. एक आंख से संभाली टीम इंडिया की कमान: मंसूर अली खान पटौदी साल 1961 में इंग्लैंड में हुए एक भयानक कार हादसे में 20 साल के एक क्रिकेटर की दाईं आंख की रोशनी हमेशा के लिए चली गई. डॉक्टरों ने कह दिया था कि अब वह ठीक से देख भी नहीं पाएगा, क्रिकेट खेलना तो बहुत दूर की बात है, क्योंकि तेज गेंदबाजी का सामना करने के लिए गहराई का सही अंदाजा और गेंद की लाइन जल्दी भांपना बेहद जरूरी होता है. यह नौजवान थे मंसूर अली खान पटौदी, जिन्हें दुनिया टाइगर पटौदी के नाम से जानती है. उन्होंने डॉक्टरों के इस फैसले को अपने करियर का अंत मानने से इनकार कर दिया. पटौदी ने महीनों मेहनत करके सिर्फ बाईं आंख के सहारे गेंद की लेंथ भांपना सीखा, यानी एक बल्लेबाज के लिए जरूरी नजर का पूरा हुनर उन्होंने नए सिरे से गढ़ा. इसके बाद जब भी वह मैदान पर उतरते, उन्हें एक की जगह दो गेंदें नजर आती थीं, लेकिन कड़े अभ्यास ने उन्हें असली गेंद पहचानकर सही समय पर हिट करना सिखा दिया. हादसे के कुछ महीनों बाद ही वह भारतीय टीम में लौट आए और महज 21 साल की उम्र में भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे युवा कप्तान बन गए, यानी अभी अपनी नई नजर के साथ तालमेल बिठा ही रहे थे कि उन्हें एक अनुभवी टीम की कमान भी संभालनी पड़ी. उनकी इसी बेखौफ कप्तानी का नतीजा था कि 1968 में भारत ने विदेशी धरती न्यूजीलैंड में अपनी पहली टेस्ट सीरीज जीतकर इतिहास रच दिया, जिसे आज भी उनके करियर के सबसे यादगार पलों में गिना जाता है. पोलियोग्रस्त हाथ, जिससे कांपते थे दुनिया के दिग्गज बल्लेबाज बचपन में पोलियो की चपेट में आने से भागवत चंद्रशेखर का दायां हाथ, यानी उनका गेंदबाजी वाला हाथ ही, कमजोर और लकवाग्रस्त हो गया था. किसी भी आम इंसान के लिए यह बहुत बड़ा झटका होता, खासकर क्रिकेट जैसे खेल में जो शारीरिक नियंत्रण और एक जैसी गेंदबाजी एक्शन पर टिका होता है. लेकिन चंद्रशेखर ने अपनी इसी कमजोरी को दुनिया के सबसे खतरनाक हथियार में बदल डाला. उन्होंने अपने पतले, पोलियोग्रस्त दाएं हाथ से ही लेग स्पिन गेंदबाजी शुरू की, और इस हाथ में आई असामान्य, चाबुक जैसी लचक की वजह से वह गेंद को ऐसी उछाल और रफ्तार दे पाते थे जिसका अंदाजा बल्लेबाजों के लिए लगाना नामुमकिन था. विरोधी बल्लेबाजों को कभी पता ही नहीं चलता था कि अगली गेंद तेज घूमेगी, सीधी निकल जाएगी या पिच से अजीब तरीके से उछलेगी, क्योंकि जिस कमजोरी ने उनके हाथ को कमजोर किया था, उसी ने उसे परंपरागत गेंदबाजी एक्शन की सीमाओं से भी आजाद कर दिया था. चंद्रशेखर ने भारत के लिए 58 टेस्ट मैच खेले और दुनिया भर की पिचों पर बड़ी-बड़ी बल्लेबाजी लाइन अप को छकाते हुए 242 विकेट अपने नाम किए. उनका करियर इस बात का सबूत है कि अगर हौसला बुलंद हो, तो बचपन में मिली शारीरिक कमजोरी भी बड़े होकर एक क्रिकेटर की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है. दो इंच छोटे हाथ से लिख दी महानता की इबारत क्रिकेट में तकनीक और दोनों हाथों के बीच संतुलन सबसे जरूरी माना जाता है, यही वजह है कि इंग्लैंड के दिग्गज बल्लेबाज सर लेन हटन की कहानी और भी चौंकाने वाली लगती है. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एक सैन्य प्रशिक्षण में हटन गंभीर रूप से घायल हो गए थे. हाथ की सर्जरी के बाद उनका बायां हाथ दाएं हाथ से करीब 2 इंच छोटा रह गया, जो एक बल्लेबाज के लिए स्थायी दिक्कत थी क्योंकि पूरी बल्लेबाजी तकनीक दोनों हाथों के बल्ले की मूठ पर तालमेल पर टिकी होती है. एक बल्लेबाज के लिए ऐसी चोट करियर शुरू होने से पहले ही उसे खत्म कर सकती थी. लेकिन हटन ने हार मानने से साफ इनकार कर दिया. उन्होंने अपनी बल्लेबाजी तकनीक बिल्कुल नए सिरे से गढ़ी, छोटे हाथ की भरपाई के लिए ग्रिप में फेरबदल किया और दोबारा प्रतिस्पर्धी क्रिकेट में उतर पड़े. उन्होंने इंग्लैंड के लिए 79 टेस्ट मैच खेले और 19 सेंचुरी की मदद से 6,971 रन बनाए, ऐसे आंकड़े जो उन्हें खेल के इतिहास के सबसे बेहतरीन ओपनरों में शुमार करते हैं. उनकी यह कहानी बताती है कि मैदान पर कद हाथों की लंबाई से नहीं, इरादों की ऊंचाई और नए सिरे से हुनर सीखने की तैयारी से नापा जाता है. पैर की तीन उंगलियां नहीं, फिर भी रिकॉर्ड्स का अंबार महज 13 साल की उम्र में एक दर्दनाक फोर्कलिफ्ट हादसे ने न्यूजीलैंड के मार्टिन गप्टिल के बाएं पैर की तीन उंगलियां छीन ली थीं. उस वक्त शायद ही किसी को उम्मीद रही होगी कि यह लड़का दोबारा ठीक से दौड़ भी पाएगा, पेशेवर क्रिकेट खेलना तो दूर की बात थी, क्योंकि इस खेल में दौड़कर रन लेने और क्रीज पर तेज फुटवर्क की जरूरत होती है. लेकिन गप्टिल के पैर में भले ही उंगलियां कम थीं, उनके इरादों में कोई कमी नहीं थी. उन्होंने खोए संतुलन और दौड़ने की ताकत की भरपाई के लिए खास डिजाइन किए गए जूते पहनने शुरू किए और पूरे जोश के साथ मैदान पर वापसी की. वह न सिर्फ न्यूजीलैंड के सबसे विस्फोटक ओपनर बने, बल्कि दुनिया के बेहतरीन फील्डरों में भी शुमार हुए, जिनकी बाउंड्री लाइन और बैकवर्ड पॉइंट पर फुर्ती की तारीफ अक्सर होती थी. वनडे क्रिकेट में 237 रनों की ऐतिहासिक पारी खेल चुके गप्टिल ने सालों तक अलग-अलग फॉर्मेट में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में न्यूजीलैंड का प्रतिनिधित्व किया. आज भी दुनिया भर की टी20 लीग में उनकी फुटवर्क और दौड़ भाग देखकर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता कि इस खिलाड़ी के एक पैर में तीन उंगलियां नहीं हैं. दिमागी बीमारी के दौरों के बीच संभाली इंग्लैंड की कप्तानी शारीरिक चोट से लड़ना एक बात है, लेकिन सीधे दिमाग पर हमला करने वाली बीमारी से जूझना कहीं ज्यादा डरावना होता है, क्योंकि यह बिना किसी चेतावनी के हमला करती है और सिर्फ तकनीक सुधारने से इस पर काबू नहीं पाया जा सकता. इंग्लैंड के पूर्व कप्तान टोनी ग्रेग मिर्गी यानी एपिलेप्सी की बीमारी से पीड़ित थे. उन्हें अक्सर गंभीर दौरे पड़ते थे, जिसमें उनका शरीर पूरी तरह बेकाबू हो जाता था, ऐसी स्थिति जो सुरक्षा कारणों से किसी भी खिलाड़ी को समय से पहले संन्यास लेने पर मजबूर कर सकती थी. इस दिमागी बीमारी के साये में भी टोनी ग्रेग ने हार नहीं मानी. वह लगातार मैदान पर उतरते रहे, बल्ले से रन बनाते रहे और गेंद से विकेट भी झटकते रहे, हर मैच को जैसा आया वैसे खेलते हुए, अपनी बीमारी को कभी अपने करियर पर हावी नहीं होने दिया. उन्होंने इंग्लैंड के लिए 58 टेस्ट मैच खेले और टीम की कप्तानी भी संभाली, यानी अपनी सेहत से जूझने के साथ-साथ मैदान पर फैसले लेने की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी उठाई. टेस्ट क्रिकेट में उनके नाम 8 शानदार शतक और 141 विकेट दर्ज हैं, जो उस दौर के हिसाब से बेहद शानदार ऑलराउंड रिकॉर्ड है. बाद के वर्षों में वह दुनिया के सबसे लोकप्रिय कमेंटेटरों में शुमार हुए और संन्यास के बाद भी अपनी समझ के जरिए खेल से जुड़े रहे. सवाल-जवाब 1. मंसूर अली खान पटौदी को अपनी आंख की रोशनी कब और कैसे गंवानी पड़ी? साल 1961 में इंग्लैंड में हुए एक कार हादसे में उनकी दाईं आंख की रोशनी हमेशा के लिए चली गई थी. 2. मंसूर अली खान पटौदी किस उम्र में भारतीय टीम के कप्तान बने थे? वह महज 21 साल की उम्र में भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे युवा कप्तान बने थे. 3. पटौदी की कप्तानी में भारत ने कौन सी ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की? 1968 में भारत ने न्यूजीलैंड में अपनी पहली विदेशी टेस्ट सीरीज जीती थी. 4. भागवत चंद्रशेखर को बचपन में कौन सी बीमारी हुई थी और उसका असर क्या था? उन्हें बचपन में पोलियो हुआ था, जिससे उनका दायां हाथ कमजोर और लकवाग्रस्त हो गया था. 5. भागवत चंद्रशेखर ने भारत के लिए कितने टेस्ट खेले और कितने विकेट लिए? उन्होंने 58 टेस्ट मैच खेले और 242 विकेट अपने नाम किए. 6. सर लेन हटन के हाथ में क्या दिक्कत थी? द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सैन्य प्रशिक्षण में लगी चोट के बाद उनका बायां हाथ दाएं हाथ से करीब 2 इंच छोटा रह गया था. 7. मार्टिन गप्टिल के पैर की उंगलियां कैसे गईं? 13 साल की उम्र में एक फोर्कलिफ्ट हादसे में उनके बाएं पैर की तीन उंगलियां चली गई थीं. 8. टोनी ग्रेग किस बीमारी से पीड़ित थे और उनका करियर रिकॉर्ड क्या रहा? वह मिर्गी यानी एपिलेप्सी से पीड़ित थे, फिर भी उन्होंने इंग्लैंड के लिए 58 टेस्ट खेले, टीम की कप्तानी की और 8 शतक व 141 विकेट अपने नाम किए. प्रेरणा और सबक इन पांच कहानियों से मिलने वाले सबक सिर्फ क्रिकेट के मैदान तक सीमित नहीं हैं. • जो खोया उसे नहीं, जो बचा है उसे तराशें: मंसूर अली खान पटौदी ने खोई हुई आंख की रोशनी वापस पाने की कोशिश नहीं की, बल्कि बची हुई एक आंख को ही इतना तराशा कि वह गेंद की लेंथ भांप सकें. यानी हालात बदलने का इंतजार करने की बजाय नए हालात में खुद को ढालना ज्यादा असरदार साबित होता है. • कमजोरी को ही अपनी पहचान बना लें: भागवत चंद्रशेखर का पोलियोग्रस्त हाथ सामान्य से ज्यादा लचीला हो गया था, और उन्होंने इसे छुपाने की बजाय अपनी पूरी गेंदबाजी इसी हाथ के इर्द-गिर्द बना ली, जिससे एक मेडिकल दिक्कत ही उनका सबसे बड़ा हथियार बन गई. • तरीका काम न करे तो तरीका बदल दें: हाथ की चोट के बाद सर लेन हटन ने पुरानी तकनीक पर अड़े रहने की बजाय अपनी ग्रिप और बल्लेबाजी का तरीका ही बदल डाला, यह दिखाता है कि नतीजा मायने रखता है, तरीका नहीं. • सही साधन अपनाकर आगे बढ़ते रहें: तीन उंगलियां गंवाने के बाद मार्टिन गप्टिल ने खास डिजाइन किए गए जूतों की मदद से दौड़ना और फील्डिंग करना जारी रखा, यानी सही व्यावहारिक समाधान किसी स्थायी शारीरिक कमी को भी पीछे छोड़ सकता है. • अनदेखी लड़ाई के बावजूद मैदान पर डटे रहें: टोनी ग्रेग मिर्गी की बीमारी से जूझते हुए भी इंग्लैंड की कप्तानी करते रहे, रन बनाते रहे और विकेट लेते रहे, जो बताता है कि अनिश्चित हालात में भी लगातार मैदान में उतरना अपने आप में एक बड़ी हिम्मत है. https://trendkia.com/cricket/ankha-hatha-aura-paira-ki-kami-nahin-roka-pai-ina-5-kriketaron-ka-jadu-janen-hausale-ki-kahaniyan-6723 TrendKia — Har trend, sabse pehle.