अस्थिर बैटिंग क्रम और पीआर की होड़ के बीच संजू सैमसन के भविष्य पर गहराया असमंजस लगातार बदलते बल्लेबाजी क्रम और एक नाकामी पर उठते तीखे सवालों के बीच संजू सैमसन के टीम में स्थान और चयन प्राथमिकताओं को लेकर गंभीर बहस छिड़ गई है। भारतीय राष्ट्रीय क्रिकेट टीम के सेटअप में संजू सैमसन की स्थिति लंबे समय से एक नाजुक मोड़ पर खड़ी नजर आती रही है। जब भी किसी मुकाबले में उनका बल्ला खामोश रहता है, वैसे ही चारों तरफ से उनके अंतरराष्ट्रीय सफर पर पूर्णविराम लगाने की मांग उठने लगती है। आम क्रिकेट समर्थकों और डिजिटल मंचों पर सक्रिय प्रशंसकों की प्रतिक्रियाओं को यदि एक पल के लिए अलग भी रख दिया जाए, तो पूर्व खिलाड़ियों और खेल विश्लेषकों का संजू के कौशल पर अचानक सवाल उठाना अधिक चौंकाने वाला लगता है। खेल जगत की मौजूदा व्यवस्था में ऐसा प्रतीत होने लगा है कि प्रतिभा और मैदान के प्रदर्शन के साथ-साथ खुद को लगातार सुर्खियों में बनाए रखने की रणनीति भी टीम में बने रहने का एक बड़ा आधार बन चुकी है। शोर-शराबे से दूर रहने का मिजाज और बदलती प्राथमिकताएं संजू सैमसन का व्यक्तित्व हमेशा से बेहद शांत और संयमित रहा है, जहां वे चमक-दमक या कृत्रिम चर्चाओं से खुद को दूर रखना पसंद करते हैं। ऑनलाइन मंचों पर उनकी भागीदारी भी बहुत सीमित और नपी-तुली रहती है। हालांकि, खेल विश्लेषकों के बीच यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या किसी खिलाड़ी का शांत स्वभाव उसके लगातार मौके पाने के अधिकार को कमजोर कर सकता है। जैसे ही किसी मुकाबले में संजू रन बनाने से चूकते हैं, वैसे ही उन्हें अंतिम एकादश से बाहर करके वैभव सूर्यवंशी जैसे उभरते हुए युवा खिलाड़ियों को लाने की वकालत शुरू हो जाती है। नए और होनहार खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परखना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन ऐसा किसी स्थापित खिलाड़ी को बिना पर्याप्त अवसर दिए किनारे करके नहीं किया जाना चाहिए। टी20 प्रारूप की अनिश्चितताओं को देखते हुए यह समझना जरूरी है कि वैभव का खेलने का अपना अंदाज है और संजू की अपनी तकनीक व शैली है। सबसे छोटे प्रारूप में इस बात की कोई तय गारंटी नहीं दी जा सकती कि वैभव और अभिषेक शर्मा की सलामी जोड़ी हर मुकाबले में टीम के लिए 100 रनों की शतकीय साझेदारी खड़ी करने में कामयाब रहेगी। रन बनाने की होड़ में अभिषेक शर्मा को जो निरंतर समर्थन मिल रहा है, उसके पीछे मुख्य कोच गौतम गंभीर का मजबूत भरोसा नजर आता है, जिसकी सराहना होनी चाहिए। बैटिंग क्रम में लगातार उलटफेर और समर्थन का दोहरा मापदंड न्यूजीलैंड के हालिया दौरे पर संजू सैमसन ने अर्धशतक जड़कर दौरे का बेहद शानदार आगाज किया था। दूसरी तरफ, अभिषेक शर्मा शुरुआती मुकाबलों में अच्छी शुरुआत को बड़े स्कोर में बदलने से पहले आउट हो गए थे, मगर बाद के एक मैच में लगाए गए शतक ने उनकी पिछली सभी विफलताओं पर पर्दा डाल दिया। उस दौरान कभी यह बात नहीं उठी कि अभिषेक को हटाकर वैभव और संजू की जोड़ी से पारी की शुरुआत कराई जानी चाहिए। जब संजू अर्धशतकीय पारी खेलकर मुकाबला जिताते हैं, तो उनकी उपलब्धि को लेकर सामान्य चर्चा भी मुश्किल से देखने को मिलती है। इसके विपरीत, जब अभिषेक ऐसा ही प्रदर्शन करते हैं, तो युवराज सिंह जैसे दिग्गज खिलाड़ी खुले मंचों पर उनकी जमकर तारीफ करते हुए सकारात्मक माहौल तैयार करते हैं। दूसरी ओर, संजू के पक्ष में ऐसी मुखर आवाज उठाने वाला कोई नजर नहीं आता। इस पूरे माहौल पर संजू भले ही सार्वजनिक रूप से कुछ न कहें, लेकिन लगातार बनने वाला मानसिक दबाव खिलाड़ी के खेल को गहरे रूप से प्रभावित करता है। स्थाई भूमिका का अभाव और टीम में बार-बार समझौते अभिषेक शर्मा को पारी की शुरुआत से हटाकर तीसरे नंबर पर भेजने को लेकर कभी भी कोई विमर्श नहीं होता। ऐसे में यह सवाल बार-बार सामने आता है कि हर रणनीतिक फेरबदल की गाज केवल संजू सैमसन पर ही क्यों गिरती है। कभी उन्हें बतौर सलामी बल्लेबाज उतारा जाता है, तो कभी अचानक तीसरे नंबर की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है, और कभी निचले मध्यक्रम में ढकेल दिया जाता है। संजू को राष्ट्रीय टीम में कभी भी ऐसी सुरक्षित और तय जगह नहीं मिल पाई, जहां खड़े होकर वे बिना किसी भय के अपनी तकनीक और खेल को पूरी तरह स्थापित कर पाते। उन्होंने टीम प्रबंधन के हर निर्देश का चुपचाप पालन किया और जहां भी बल्लेबाजी करने को कहा गया, वे बिना किसी हिचकिचाहट के मैदान पर उतरे। इसके बावजूद, सिर्फ एक खराब सीरीज के आधार पर उनके पूरे करियर को समाप्त मान लेने की बातें यह साफ दर्शाती हैं कि टीम में खिलाड़ियों के बने रहने में रणनीतिक समर्थन और प्रचार का कितना भारी असर रहता है। प्रदर्शन में निरंतरता का अभाव और आत्मविश्वास का संकट आंकड़ों के नजरिए से देखें तो संजू सैमसन के व्यक्तिगत प्रदर्शन में निरंतरता की कमी अवश्य दिखाई दी है, लेकिन यह सवाल अधिक विचारणीय है कि यह अस्थिरता पैदा किन परिस्थितियों में हुई। जवाबदेही टीम प्रबंधन से लेकर उन मुखर विशेषज्ञों की भी बनती है, जो एक नाकामी के तुरंत बाद उन्हें बाहर करने का शोर मचाने लगते हैं। ये विश्लेषक अक्सर इस पहलू की अनदेखी कर देते हैं कि संजू को टीम के भीतर वह भरोसा और सुरक्षा कभी नहीं मिली, जिसके वे स्वाभाविक रूप से हकदार थे। कोई भी बल्लेबाज अपने खेल का शीर्ष स्तर उस मानसिक स्थिति में नहीं दिखा सकता, जहां उसे हर पल यह अंदेशा सता रहा हो कि अगले मैच में उसे बाहर बैठना पड़ सकता है या उसका बल्लेबाजी क्रम फिर से बदल दिया जाएगा। इसी वजह से यह सवाल आज भी भारतीय क्रिकेट के गलियारों में गूंज रहा है कि हर बार संजू को ही आसान निशाना क्यों बनाया जाता है। इसका आप पर असर भारतीय टीम में बल्लेबाजी चयन और बैटिंग क्रम के बार-बार बदलने से प्रशंसकों और क्रिकेट व्यवस्था पर सीधा प्रभाव पड़ता है। • क्रिकेट प्रशंसकों के लिए: टीम में किसी खिलाड़ी की भूमिका तय न होने से मैच के दौरान रणनीति को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है। प्रशंसकों को संजू के बल्लेबाजी क्रम को लेकर हर मैच में अलग-अलग प्रयोग देखने को मिलते हैं। • टीम चयन व्यवस्था पर: खिलाड़ियों के प्रदर्शन के मूल्यांकन में निरंतरता की जगह एक-दो पारियों को आधार बनाने से चयन प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं। इससे यह संदेश जाता है कि टीम में बने रहने के लिए केवल खेल ही नहीं, बल्कि अनुकूल माहौल भी मायने रखता है। • खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर: लगातार बाहर होने या क्रम बदले जाने के डर से किसी भी खिलाड़ी की स्वाभाविक आक्रामकता सीमित हो जाती है। यह अस्थिरता खिलाड़ी के क्रीज पर उतरने के आत्मविश्वास को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। • टी20 रणनीति के संदर्भ में: सलामी जोड़ी और मध्यक्रम में लगातार बदलाव से बड़े टूर्नामेंटों से पहले टीम संयोजन कमजोर पड़ सकता है। टीम को स्थिर एकादश तैयार करने के लिए स्पष्ट भूमिकाएं तय करने की जरूरत पड़ती है। ऐसा क्यों हुआ संजू सैमसन के अंतरराष्ट्रीय करियर में लगातार अस्थिरता और उन पर बनने वाले दबाव के पीछे रणनीतिक व संगठनात्मक कारण जुड़े हैं। • निश्चित बैटिंग क्रम का अभाव: टीम प्रबंधन द्वारा संजू को कभी ओपनर, कभी तीसरे नंबर तो कभी मध्यक्रम में आजमाने से वे खुद को स्थापित नहीं कर पाए हैं। लगातार भूमिका बदलने से किसी भी बल्लेबाज के लिए एक लय में ढलना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। • समर्थन और चर्चा में असमानता: अभिषेक शर्मा जैसे युवा खिलाड़ियों को जहां मुख्य कोच गौतम गंभीर का भरोसा और पूर्व दिग्गजों का सक्रिय समर्थन मिलता है, वहीं संजू के पक्ष में ऐसी मुखर आवाजें नहीं उठती हैं। इस दोहरे रवैये से एक खराब पारी के बाद संजू पर सवाल अधिक तेजी से खड़े होते हैं। • प्रतिस्पर्धा और नए विकल्प: घरेलू और टी20 स्तर पर वैभव सूर्यवंशी जैसे उभरते बल्लेबाजों की चर्चा तेज होने से शीर्ष क्रम में दबाव बढ़ जाता है। एक मैच की नाकामी के तुरंत बाद नए विकल्पों को लाने की मांग जोर पकड़ने लगती है। सवाल-जवाब 1. संजू सैमसन के टीम में स्थान को लेकर बार-बार सवाल क्यों उठते हैं? संजू सैमसन के प्रदर्शन में निरंतरता की कमी और एक खराब मैच के बाद उन पर बनने वाले अत्यधिक दबाव के कारण उनके स्थान पर सवाल उठाए जाते हैं। 2. न्यूजीलैंड दौरे पर संजू सैमसन और अभिषेक शर्मा का प्रदर्शन कैसा रहा था? संजू ने दौरे की शुरुआत अर्धशतक लगाकर की थी, जबकि अभिषेक शर्मा शुरुआती मैचों में जल्दी आउट होने के बाद एक मैच में शतक लगाने में सफल रहे थे। 3. टीम में संजू सैमसन के बल्लेबाजी क्रम की मुख्य समस्या क्या रही है? उन्हें कभी ओपनिंग, कभी तीसरे नंबर तो कभी मिडिल ऑर्डर में उतारा गया, जिससे उन्हें किसी एक तय स्थान पर खुद को स्थापित करने का मौका नहीं मिला। 4. संजू सैमसन के स्थान पर किस युवा खिलाड़ी को शामिल करने की चर्चा की जाती है? संजू का एक मैच खराब जाने पर उन्हें टीम से बाहर करके युवा खिलाड़ी वैभव सूर्यवंशी को मौका देने की बातें उठने लगती हैं। 5. अभिषेक शर्मा को टीम में किसका मजबूत समर्थन हासिल है? अभिषेक शर्मा को मुख्य कोच गौतम गंभीर का भरोसा प्राप्त है और युवराज सिंह जैसे दिग्गज भी सोशल मीडिया पर उनकी खुलकर तारीफ करते हैं। https://trendkia.com/cricket/sanju-samson-para-mndaraya-assam-njasa-56782 TrendKia — Har trend, sabse pehle.