# ओवल में नंबर 10 और 11 के दो भारतीय बल्लेबाजों ने जब जड़े थे शतक, आठ दशकों तक कायम रहा कीर्तिमान

> साल 1946 में चंदू सरवटे और शूट बनर्जी ने 10वें विकेट के लिए 249 रन जोड़कर इतिहास रचा था, जिसकी बराबरी 2025 में तनुश कोटियन और तुषार देशपांडे ने की।

**Type:** article · **Category:** क्रिकेट · **Published:** 2026-09-19 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/cricket/the-oval-men-nnbara-10-aura-11-ke-do-bharatiya-ballebajon-ne-jaba-jare-the-shataka-atha-dashakon-taka-kayama-raha-kirtimana-34796 · **Language:** Hindi
**Tags:** भारतीय क्रिकेट, चंदू सरवटे, शूट बनर्जी, द ओवल, रणजी ट्रॉफी, तनुश कोटियन, तुषार देशपांडे, क्रिकेट रिकॉर्ड

क्रिकेट के खेल में अनिश्चितताओं का दौर कभी भी मैच का रुख पलट सकता है, लेकिन कुछ मुकाबले ऐसे होते हैं जो खेल की परिभाषा ही हमेशा के लिए बदल देते हैं। लंदन के द ओवल मैदान पर साल 1946 में खेला गया एक प्रथम श्रेणी मुकाबला कुछ ऐसे ही अनोखे इतिहास का गवाह बना था। सरे के खिलाफ खेल रही भारतीय टीम एक समय गहरे संकट में फंसी थी और उसकी हार तय मानी जा रही थी, लेकिन अंतिम जोड़ी ने पिच पर उतरकर ऐसा करिश्मा कर दिखाया जिसकी मिसाल आठ दशकों तक पूरे विश्व क्रिकेट में नहीं मिली।

## जब 205 रनों पर सिमटने की कगार पर था भारत
इस ऐतिहासिक मुकाबले में सरे के गेंदबाजों के सामने भारतीय बल्लेबाजी क्रम पूरी तरह लड़खड़ा चुका था। महज 205 रनों के स्कोर पर भारत के 9 प्रमुख बल्लेबाज पवेलियन लौट चुके थे। मैदान पर मौजूद दर्शकों के साथ-साथ विपक्षी टीम भी इसे केवल एक औपचारिकता मान रही थी और ऐसा लग रहा था कि भारतीय पारी अगले कुछ ही मिनटों में ढेर हो जाएगी। किसी को भी यह गुंजाइश नजर नहीं आ रही थी कि पुछल्ले बल्लेबाज टीम को इस भंवर से निकाल पाएंगे।

## दो पुछल्ले गेंदबाजों की बेखौफ जवाबी पारी
ऐसी विकट स्थिति में मैदान पर दो विशुद्ध गेंदबाजों का आगमन हुआ। 10वें नंबर पर लेग स्पिनर चंदू सरवटे बल्लेबाजी करने उतरे, जबकि 11वें नंबर पर उनका साथ देने मीडियम पेसर शूट बनर्जी पहुंचे। टीम प्रबंधन की तरफ से उन्हें सिर्फ क्रीज पर टिके रहने और कुछ अतिरिक्त ओवर निकालने की सामान्य जिम्मेदारी दी गई थी। हालांकि, पिच पर कदम रखते ही दोनों खिलाड़ियों ने रक्षात्मक रवैया अपनाने के बजाय सरे के आक्रमण पर आक्रामक प्रहार शुरू कर दिए।

## 249 रनों की रिकॉर्ड तोड़ साझेदारी और दोहरे शतक
दोनों खिलाड़ियों ने विपक्षी गेंदबाजों के हर दांव को नाकाम करते हुए शानदार शॉट्स लगाए। चंदू सरवटे ने बेहतरीन तकनीक और धैर्य का परिचय देते हुए 124 रन बनाए। वहीं दूसरे छोर से शूट बनर्जी ने भी तूफानी अंदाज में बल्लेबाजी करते हुए 121 रनों की जबरदस्त पारी खेली। इन दोनों ने मिलकर 10वें विकेट के लिए 249 रनों की अटूट साझेदारी खड़ी कर दी। प्रथम श्रेणी क्रिकेट के इतिहास में यह पहला अवसर था जब किसी पारी में 10वें और 11वें नंबर के दोनों बल्लेबाजों ने शतक जड़े हों। इस अभूतपूर्व प्रदर्शन के दम पर भारत ने मैच में शानदार वापसी की और अंततः इस मुकाबले को 9 विकेट से जीत लिया।

## आठ दशक बाद रणजी ट्रॉफी में हुई इस रिकॉर्ड की बराबरी
यह विश्व रिकॉर्ड इतना दुर्लभ माना जाता था कि इसके आसपास पहुंचना भी लगभग नामुमकिन दिखता था। करीब 80 सालों तक यह रिकॉर्ड अटूट रहा। आखिरकार साल 2025 में भारतीय घरेलू क्रिकेट के प्रतिष्ठित टूर्नामेंट रणजी ट्रॉफी के दौरान मुंबई के दो खिलाड़ियों तनुश कोटियन और तुषार देशपांडे की जोड़ी ने इस जादुई आंकड़े की बराबरी की। आधुनिक युग में कई कीर्तिमान बनते और मिटते हैं, लेकिन 1946 में शूट बनर्जी और चंदू सरवटे की लिखी यह अमर गाथा आज भी खेल भावना और कभी हार न मानने के जज्बे का सबसे बड़ा प्रतीक है।

## इसका आप पर असर
यह ऐतिहासिक घटना खेल प्रेमियों और खिलाड़ियों को यह संदेश देती है कि निचले क्रम के बल्लेबाजों का योगदान मैच का रुख तय कर सकता है।

- **क्रिकेट प्रशंसकों के लिए:** यह रिकॉर्ड खेल में पुछल्ले बल्लेबाजों की अहमियत को रेखांकित करता है। इससे दर्शकों का हर गेंद पर रोमांच और अंतिम विकेट तक मैच देखने का भरोसा बढ़ता है।
- **खिलाड़ियों और कोचों के लिए:** आधुनिक टीमों में टेल-एंडर्स की बल्लेबाजी तकनीक पर खास जोर दिया जाने लगा है। इससे 10वें और 11वें नंबर के गेंदबाजों को भी नियमित नेट अभ्यास में बल्लेबाजी सुधारने की प्रेरणा मिलती है।
- **घरेलू क्रिकेट के स्तर पर:** 2025 में रणजी ट्रॉफी के जरिए इस रिकॉर्ड की बराबरी ने भारतीय घरेलू ढांचे की गहराई को साबित किया है। इससे युवाओं को किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति में मुकाबला पलटने का जज्बा मिलता है।
- **रिकॉर्ड और आंकड़ों के लिहाज से:** 80 साल बाद भी ऐसे दुर्लभ आंकड़े खेल इतिहास में खास जगह रखते हैं। यह साबित करता है कि बुनियादी अनुशासन और साहस से असंभव माने जाने वाले मील के पत्थर भी दोबारा छुए जा सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
यह ऐतिहासिक रिकॉर्ड इसलिए बना क्योंकि भारतीय टीम एक अत्यंत विषम परिस्थिति में थी, जहां पुछल्ले बल्लेबाजों के पास खोने के लिए कुछ नहीं था। बिना दबाव के की गई बेखौफ बल्लेबाजी ने विपक्षी टीम की रणनीति को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।

- **शीर्ष क्रम का पतन:** भारत के 9 विकेट महज 205 रनों पर गिर चुके थे। इस शुरुआती विफलता ने निचले क्रम पर सारा दारोमदार डाल दिया था।
- **विपक्षी टीम की ढिलाई:** सरे की टीम और दर्शक मैच को केवल औपचारिकता मानकर जीत तय समझ चुके थे। इस मानसिक ढिलाई का फायदा भारतीय बल्लेबाजों ने आक्रामक रुख अपनाकर उठाया।
- **निडर और सकारात्मक दृष्टिकोण:** चंदू सरवटे और शूट बनर्जी ने केवल गेंद रोकने के बजाय खुलकर अपने शॉट्स खेले। इस बेखौफ खेल ने सरे के गेंदबाजों को रक्षात्मक होने पर मजबूर कर दिया।

## सवाल-जवाब

### 1. 1946 में यह ऐतिहासिक मुकाबला किन टीमों के बीच खेला गया था?
यह मुकाबला 1946 में भारत और सरे के बीच लंदन के द ओवल मैदान पर खेला गया था।

### 2. भारत की तरफ से 10वें और 11वें नंबर पर किन खिलाड़ियों ने शतक बनाए थे?
लेग स्पिनर चंदू सरवटे ने 124 रन और मीडियम पेसर शूट बनर्जी ने 121 रनों की शानदार शतकीय पारियां खेली थीं।

### 3. चंदू सरवटे और शूट बनर्जी के बीच कितने रनों की साझेदारी हुई थी?
दोनों खिलाड़ियों ने 10वें विकेट के लिए रिकॉर्ड तोड़ 249 रनों की अटूट साझेदारी की थी।

### 4. इस साझेदारी के बाद मैच का नतीजा क्या रहा?
इस जादुई साझेदारी के दम पर भारतीय टीम ने शानदार वापसी की और मुकाबला 9 विकेट से अपने नाम किया।

### 5. इस 80 साल पुराने रिकॉर्ड की बराबरी कब और किन खिलाड़ियों ने की?
साल 2025 में रणजी ट्रॉफी के दौरान मुंबई के तनुश कोटियन और तुषार देशपांडे की जोड़ी ने इस रिकॉर्ड की बराबरी की।

## प्रेरणा और सबक
1946 का यह मुकाबला सिखाता है कि जब तक आखिरी अवसर मौजूद है, तब तक उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।

- **परिस्थितियों के आगे घुटने न टेकें:** जब टीम 205 पर 9 विकेट गंवा चुकी थी, तब भी दोनों खिलाड़ियों ने हिम्मत नहीं हारी। जीवन में सबसे कठिन दौर में भी अपनी क्षमता पर भरोसा रखना जीत दिलाता है।
- **अपनी भूमिका से आगे बढ़कर योगदान दें:** विशुद्ध गेंदबाज होने के बावजूद दोनों ने शतकीय पारियां खेलीं। जब अवसर आए तो अपनी तय सीमा से बाहर निकलकर जिम्मेदारी उठानी चाहिए।
- **दबाव को अवसर में बदलें:** मैच हाथ से निकलता देख उन्होंने घबराने के बजाय निडर बल्लेबाजी चुनी। मुश्किल घड़ी में साहस और सकारात्मक सोच सबसे बड़े हथियार साबित होते हैं।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._