# यशस्वी जायसवाल के साथ रिश्ते और सफर पर बोले बचपन के कोच ज्वाला सिंह, कहा मुझे कोई गिला नहीं

> भारतीय टीम के सलामी बल्लेबाज यशस्वी जायसवाल के बचपन के कोच ज्वाला सिंह ने उनके साथ अपने रिश्ते, शुरुआती संघर्ष और टेस्ट क्रिकेट की मौजूदा स्थिति पर खुलकर बात की है।

**Type:** article · **Category:** क्रिकेट · **Published:** 2026-09-19 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/cricket/yashasvi-jaiswal-ke-satha-rishte-aura-saphara-para-bole-bachapana-ke-kocha-jwala-singh-kaha-mujhe-koi-gila-nahin-34233 · **Language:** Hindi
**Tags:** यशस्वी जायसवाल, ज्वाला सिंह, भारतीय क्रिकेट, टेस्ट क्रिकेट, रणजी ट्रॉफी, दलीप ट्रॉफी

भारतीय राष्ट्रीय क्रिकेट टीम के आक्रामक सलामी बल्लेबाज यशस्वी जायसवाल और उनके बचपन के मेंटॉर ज्वाला सिंह के रिश्तों को लेकर खेल गलियारों में लगातार चर्चाएं चल रही हैं। हाल के समय में ज्वाला सिंह ने विभिन्न साक्षात्कारों में अपने और यशस्वी के आपसी संबंधों की सच्चाई सामने रखी है। उन्होंने नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में आयोजित एक विशेष संवाद सत्र के दौरान अपने शिष्य को लेकर बेहद आत्मीय और भावुक विचार व्यक्त किए, जिससे दोनों के बीच किसी भी तरह के मनमुटाव की अटकलों पर विराम लग गया है।

## अलग होने के फैसले पर कोच का नजरिया
ज्वाला सिंह ने स्पष्ट किया कि उन्हें अपने पूर्व शिष्य से किसी भी बात का कोई मलाल या नाराजगी नहीं है। उन्होंने जीवन के स्वाभाविक पड़ाव का उल्लेख करते हुए साझा किया कि एक निश्चित उम्र में पहुंचने के बाद बच्चे अपनी स्वतंत्रता चाहते हैं और अलग जिंदगी बसाना पसंद करते हैं, और यशस्वी ने भी ठीक वैसा ही कदम उठाया है। उनके अनुसार इसे किसी विवाद या कड़वाहट के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह उम्र के साथ आने वाला एक सामान्य व्यक्तिगत फैसला है।

## नौ साल की साझा तपस्या और पिता जैसा रिश्ता
यशस्वी की वर्तमान उपलब्धियों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रदर्शन को देखकर ज्वाला सिंह का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। उन्होंने अपनी पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताया कि जब भी यशस्वी क्रीज पर रन जुटाते हैं, तो उन्हें ऐसा महसूस होता है जैसे वे स्वयं मैदान पर बल्लेबाजी कर रहे हों। अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वे खुद गोरखपुर से एक पेशेवर क्रिकेटर बनने का ख्वाब लेकर मुंबई की मायानगरी आए थे, जहां उनका सफर बेहद मुश्किलों भरा रहा था। यशस्वी ने उसी तरह की कठिन चुनौतियों का सामना किया और अंततः उस सपने को साकार कर दिखाया जो कभी उनका अपना था।

ज्वाला सिंह ने इस गहरे जुड़ाव का ब्योरा देते हुए बताया कि यशस्वी पूरे 9 साल तक उनके अपने घर में एक सदस्य की तरह रहे। खेल के मैदान पर वे उनके सख्त मार्गदर्शक और कोच की भूमिका निभाते थे, जबकि घर की चौखट के भीतर वे एक पिता की तरह उनकी देखभाल करते थे। यशस्वी उनके लिए केवल एक साधारण शिष्य नहीं थे, बल्कि पारिवारिक सदस्य थे जिनके खान-पान के प्रबंध से लेकर सोने-जागने की दिनचर्या तक की पूरी निगरानी स्वयं ज्वाला सिंह ही तय करते थे।

## टेस्ट प्रारूप की उपेक्षा और चयन प्रक्रिया पर चिंता
अपने शिष्य के व्यक्तिगत सफर के अलावा ज्वाला सिंह ने आधुनिक क्रिकेट में पारंपरिक खेल के गिरते स्तर पर भी गंभीर चिंता जाहिर की। उन्होंने विशेष रूप से रेड बॉल क्रिकेट की घटती अहमियत का मुद्दा उठाया और कहा कि आज के युवा खिलाड़ी पूरी तरह टी20 प्रारूप पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जिससे खेल का वास्तविक स्वरूप यानी टेस्ट क्रिकेट अपनी पहचान और लोकप्रियता खो रहा है।

उन्होंने टीम के मौजूदा कार्यक्रम और चयन नीति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि मौजूदा दौर में भारतीय टीम पर्याप्त संख्या में टेस्ट मुकाबलों में हिस्सा नहीं ले रही है। इसके साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय दल में चयन के आधार पर सवाल उठाते हुए जोर दिया कि टीम इंडिया का चुनाव घरेलू प्रतियोगिताओं के प्रदर्शन को केंद्र में रखकर किया जाना चाहिए। ज्वाला सिंह के अनुसार रणजी ट्रॉफी और दलीप ट्रॉफी जैसे प्रतिष्ठित घरेलू टूर्नामेंटों में पसीना बहाने वाले और निरंतर रन या विकेट निकालने वाले खिलाड़ियों को राष्ट्रीय चयन में सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

## इसका आप पर असर
क्रिकेट प्रेमियों और खेल में भविष्य तलाश रहे युवाओं के लिए यह बयान खेल संस्कृति और मेंटॉरशिप की अहमियत उजागर करता है।

- **क्रिकेट प्रशंसकों के लिए:** यशस्वी जायसवाल और उनके गुरु के बीच विवाद की अटकलें पूरी तरह खारिज हो गई हैं। इससे युवा बल्लेबाज पर किसी अनावश्यक विवाद का मानसिक दबाव नहीं रहेगा।
- **उभरते खिलाड़ियों के लिए:** शुरुआती करियर में एक अनुशासित संरक्षक और पारिवारिक सहयोग की आवश्यकता को रेखांकित करता है। युवाओं को यह सीख मिलती है कि सफलता के बाद भी मूल संघर्ष को नहीं भूलना चाहिए।
- **घरेलू क्रिकेटरों के लिए:** रणजी और दलीप ट्रॉफी जैसे टूर्नामेंटों के महत्व को फिर से मुख्यधारा की चर्चा में लाया गया है। यदि चयनकर्ता इस सलाह पर ध्यान देते हैं तो पारंपरिक फॉर्मेट के प्रदर्शनकारियों को अवसर मिलेंगे।
- **अभिभावकों के लिए:** यह स्पष्ट संदेश देता है कि बच्चों को आत्मनिर्भर बनने के लिए एक उम्र के बाद व्यक्तिगत स्वतंत्रता देना स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसे संबंधों में कड़वाहट के रूप में देखने से बचना चाहिए।

## ऐसा क्यों हुआ
यह बयान हाल के दिनों में यशस्वी जायसवाल और उनके कोच के आपसी रिश्तों को लेकर मीडिया में चल रही चर्चाओं और अटकलों के बाद सामने आया है।

- **संबंधों पर उठते सवाल:** मुख्यधारा के मीडिया साक्षात्कारों में दोनों के बीच की दूरी को लेकर सवाल पूछे जा रहे थे। ज्वाला सिंह ने नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम के जरिए इन सभी बातों पर अपनी स्थिति पूरी तरह साफ की।
- **स्वतंत्रता की स्वाभाविक चाह:** कोच ने स्वयं स्पष्ट किया कि यशस्वी अब एक वयस्क पेशेवर हैं और नौ साल साथ रहने के बाद उनका अलग रहना उम्र का एक सामान्य बदलाव है। इसी कारण उन्होंने किसी शिकायत से इनकार किया।
- **पारंपरिक क्रिकेट की चिंता:** फ्रेंचाइजी लीग और टी20 की बढ़ती चमक के बीच टेस्ट क्रिकेट की उपेक्षा पर कोचों में चिंता बढ़ रही है। ज्वाला सिंह ने इसी चिंता के तहत राष्ट्रीय चयन प्रणाली में रणजी और दलीप ट्रॉफी को प्राथमिकता देने की मांग उठाई।

## सवाल-जवाब

### 1. ज्वाला सिंह ने यशस्वी जायसवाल के अलग रहने पर क्या कहा?
ज्वाला सिंह ने कहा कि उन्हें यशस्वी से कोई शिकायत नहीं है, क्योंकि एक उम्र के बाद बच्चों का अलग रहना स्वाभाविक है।

### 2. यशस्वी जायसवाल कितने समय तक ज्वाला सिंह के घर रहे थे?
यशस्वी जायसवाल करीब 9 साल तक ज्वाला सिंह के घर पर एक पारिवारिक सदस्य की तरह रहे।

### 3. ज्वाला सिंह मूल रूप से कहां से मुंबई आए थे?
ज्वाला सिंह क्रिकेटर बनने का ख्वाब लेकर गोरखपुर से मुंबई पहुंचे थे।

### 4. कोच के अनुसार यशस्वी की सफलता उनके लिए क्या मायने रखती है?
ज्वाला सिंह को यशस्वी पर गर्व है और जब वह रन बनाते हैं तो कोच को लगता है कि वे खुद रन बना रहे हैं।

### 5. टेस्ट क्रिकेट को लेकर ज्वाला सिंह की क्या मुख्य चिंता है?
उन्होंने कहा कि खिलाड़ी टी20 पर अधिक ध्यान दे रहे हैं जिससे असली टेस्ट क्रिकेट की लोकप्रियता घट रही है और भारत कम टेस्ट मैच खेल रहा है।

### 6. ज्वाला सिंह के अनुसार भारतीय टीम का चयन किस आधार पर होना चाहिए?
उनका मानना है कि चयन रणजी ट्रॉफी और दलीप ट्रॉफी जैसी घरेलू रेड बॉल प्रतियोगिताओं में प्रदर्शन के आधार पर होना चाहिए।

## प्रेरणा और सबक
गोरखपुर से मुंबई आकर संघर्ष करने और शून्य से शिखर तक पहुंचने का यह सफर अनुशासन और समर्पण की मिसाल पेश करता है।

- **बड़ा सपना देखने का साहस:** छोटे शहर से निकलकर मायानगरी में क्रिकेट का ख्वाब देखना कठिन होता है, लेकिन अटूट लगन से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।
- **कड़े अनुशासन का पालन:** नौ वर्षों तक सोने से लेकर खान-पान के सख्त नियमों का पालन करना साबित करता है कि महानता रातोंरात नहीं मिलती।
- **अभिभावक और गुरु का समर्पण:** एक छात्र को अपने घर में रखकर पिता तुल्य देखरेख करना यह सिखाता है कि निस्वार्थ मार्गदर्शन प्रतिभा को तराशने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है।
- **जीवन के बदलावों को स्वीकारना:** जब शिष्य बड़ा होकर अपनी राह चुने, तो बिना किसी कड़वाहट के उसकी प्रगति पर गर्व करना एक सच्चे मार्गदर्शक की परिपक्वता दिखाता है।

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