शादी का झांसा देकर युवाओं को ठगने वाले गिरोह का पर्दाफाश, आगरा से चल रहा था फर्जी दफ्तर दिल्ली पुलिस की साइबर सेल ने आगरा में फर्जी मैचमेकिंग कॉल सेंटर चलाकर देशभर के कुंवारों से शादी के नाम पर पैसे ऐंठने वाले गिरोह को पकड़ा है, जिसमें मास्टरमाइंड वकील समेत 10 लोग गिरफ्तार हुए हैं। शादी के इच्छुक कुंवारों की भावनाओं और सामाजिक दबाव का फायदा उठाकर ऑनलाइन ठगी करने वाले एक संगठित सिंडिकेट का भंडाफोड़ हुआ है। वैवाहिक रिश्तों की तलाश में जुटे युवकों को फर्जी प्रोफाइल, इंटरनेट से डाउनलोड की गई तस्वीरों और बनावटी पारिवारिक बातचीत के जाल में फंसाकर पैसे ऐंठने वाले इस नेटवर्क की पोल दिल्ली पुलिस की जांच में खुली है। इस पूरे फर्जीवाड़े की सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि दफ्तर के कानूनी कागजात से लेकर बैंक खाते और वेबसाइट तक सब कुछ वास्तविक दिखते थे, लेकिन जिस दुल्हन के रिश्ते का दावा किया जाता था, उसका असल जिंदगी में कोई वजूद ही नहीं था। कानूनी आवरण में चल रहा था पूरा नेटवर्क इस पूरे खेल की योजना इतनी बारीकी से तैयार की गई थी कि सामान्य तौर पर किसी को शक की कोई गुंजाइश न दिखे। यह सिंडिकेट उत्तर प्रदेश के आगरा में स्थित एक सुनियोजित कॉल सेंटर से संचालित हो रहा था, जिसका कामकाज ‘शादी पार्टनर’ नाम के मंच से संभाला जाता था। गिरोह ने भरोसा जीतने के लिए अपनी फर्म को सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) और श्रम विभाग के तहत विधिवत पंजीकृत करा रखा था। इतना ही नहीं, कॉलिंग में इस्तेमाल होने वाले सभी सिम कार्ड और वित्तीय लेनदेन के लिए खुले बैंक खाते इसी फर्म के नाम पर वैध दस्तावेजों के आधार पर लिए गए थे। पीड़ितों के सामने यह पूरा ढांचा एक स्थापित मैचमेकिंग कंपनी जैसा नजर आता था, जिससे वे बिना किसी हिचकिचाहट के फीस जमा करते चले जाते थे। पुलिस तफ्तीश में सामने आया कि इस पूरे षड्यंत्र का मुख्य कर्ताधर्ता 29 वर्षीय वकील अमित कुमार था। कानूनी दांव-पेंचों की समझ होने के कारण उसने पूरे संचालन को बाहर से एक वैध व्यापार जैसा रूप दे रखा था। वहीं, आधिकारिक दस्तावेजों में इस फर्म की मालकिन के तौर पर जय शक्या नाम की महिला को दर्ज किया गया था। इस संगठित ढांचे के जरिए देशभर के अविवाहित पुरुषों को जाल में फंसाने का काम रोजाना चल रहा था। सोशल मीडिया से डेटा जुटाने और फंसाने का तरीका गिरोह के काम करने का तरीका बेहद शातिराना था। सिंडिकेट से जुड़े सदस्य सबसे पहले विभिन्न सोशल मीडिया मंचों, सार्वजनिक पोर्टलों और लोकप्रिय वैवाहिक वेबसाइटों से उन पुरुषों के मोबाइल नंबर और व्यक्तिगत जानकारी निकालते थे, जो अपने लिए जीवनसाथी तलाश रहे थे। डेटा जुटाने के बाद वे युवक की प्रोफाइल देखकर उसकी आर्थिक पृष्ठभूमि और खर्च करने की क्षमता का त्वरित मूल्यांकन करते थे। इसके बाद फोन कॉल या सोशल मीडिया संदेशों के माध्यम से सीधे संपर्क साधा जाता था। बातचीत की शुरुआत करते ही पीड़ितों को आकर्षित करने के लिए इंटरनेट से खोजी गई सुंदर युवतियों की तस्वीरें भेजी जाती थीं। साथ ही ‘शादी पार्टनर’ पोर्टल पर उसी युवती के नाम से बनाई गई फर्जी प्रोफाइल के स्क्रीनशॉट भी साझा किए जाते थे। इन डिजिटल साक्ष्यों को देखकर पीड़ित युवक यह मान बैठते थे कि रिश्ता पूरी तरह प्रामाणिक है और संबंधित युवती सचमुच उसी वैवाहिक मंच पर पंजीकृत है। तैयार की गई स्क्रिप्ट और बनावटी पारिवारिक कॉल्स एक बार जब कोई युवक भेजे गए प्रोफाइल में दिलचस्पी दिखाता, तो कॉल सेंटर में काम करने वाली महिला कर्मी सक्रिय हो जाती थीं। वे उस संबंधित युवती यानी भावी दुल्हन बनकर युवक से मोबाइल पर बात करना शुरू करती थीं। यह बातचीत केवल एक या दो औपचारिक कॉल तक सीमित नहीं रहती थी, बल्कि कई दिनों तक लगातार फोन पर चर्चा होती थी ताकि लड़के का भावनात्मक जुड़ाव और भरोसा गहरा हो सके। जब युवक पूरी तरह इस संपर्क पर विश्वास करने लगता, तो गिरोह के अन्य सदस्य युवती के माता-पिता या रिश्तेदार बनकर फोन पर बातचीत में शामिल हो जाते थे। इन बनावटी वार्ताओं से युवक को यह पक्का यकीन हो जाता था कि दोनों परिवारों के बीच रिश्ता तय होने की कगार पर है। इस मुकाम पर पहुंचकर गिरोह के सदस्य अलग-अलग प्रशासनिक मदों के नाम पर पैसों की मांग शुरू करते थे। कभी प्रोफाइल एक्टिवेशन चार्ज, कभी सीधे संपर्क का विवरण अनलॉक करने की फीस, तो कभी सुरक्षा जमा राशि और आधिकारिक पंजीकरण शुल्क का हवाला दिया जाता था। इन सेवाओं के लिए विभिन्न पैकेज बनाए गए थे, जिनकी दरें 2,500 रुपये से लेकर 15,000 रुपये तक तय की गई थीं। कम रकम ठगने की सोची-समझी रणनीति इस गिरोह की कार्यप्रणाली की सबसे रणनीतिक बात इनकी वसूली की सीमा थी। पुलिस के मुताबिक, यह सिंडिकेट बड़े पैमाने पर भारी रकम मांगने से जानबूझकर बचता था। आमतौर पर वे किसी भी पीड़ित से 15,000 रुपये से अधिक की मांग नहीं करते थे। गिरोह का साफ सिद्धांत था कि किसी एक व्यक्ति से बड़ा आर्थिक नुकसान करने के बजाय कई राज्यों के अनगिनत लोगों से छोटी-छोटी रकमें ली जाएं। इस रणनीति के पीछे कानूनी कार्रवाई से बचने की मंशा थी। सिंडिकेट के संचालकों को पता था कि यदि किसी युवक से लाखों रुपये ठगे गए तो वह तुरंत पुलिस के उच्च अधिकारियों या अदालतों का रुख करेगा। इसके विपरीत, कुछ हजार रुपये गंवाने पर ज्यादातर लोग बदनामी के डर, सामाजिक झिझक या कानूनी पचड़े से बचने के लिए औपचारिक शिकायत दर्ज कराने से कतराते हैं। इसी मनोवैज्ञानिक संकोच की आड़ में यह गिरोह अपनी ठगी की श्रृंखला को बिना किसी बड़े अवरोध के लंबा खींचता रहा। मांगलिक दोष और सगाई का बहाना बनाकर किनारा जब पीड़ित युवक अपनी निर्धारित फीस चुका देता और वास्तविक रूप से मिलने या शादी की तारीख पक्की करने का दबाव बनाता, तो गिरोह अचानक अपनी योजना का अंतिम चरण लागू कर देता था। बिना किसी पूर्व चेतावनी के बातचीत को अचानक तोड़ दिया जाता था। युवक को संपर्क विच्छेद का कोई न कोई मनगढ़ंत कारण थमा दिया जाता था। आमतौर पर बहाना बनाया जाता था कि ज्योतिषी ने कुंडली मिलान में लड़की को मांगलिक बताया है और दोनों का विवाह संभव नहीं है। कई मामलों में यह कह दिया जाता था कि लड़की के परिवार वाले अब इस रिश्ते के लिए सहमत नहीं हैं, या फिर लड़की की सगाई अचानक किसी दूसरे परिवार में तय हो गई है। यह सुनते ही पीड़ित स्तब्ध रह जाता था। न तो उसे जमा की गई फीस वापस मिलती थी और न ही उस युवती का कोई सुराग हाथ लगता था, जिसके साथ उसने भविष्य के सपने संजोए थे। दिल्ली में दर्ज शिकायत से खुला अंतरराज्यीय जाल इस सिंडिकेट का शिकार पूरे देश के युवा हो रहे थे, लेकिन इसका पर्दाफाश राष्ट्रीय राजधानी के एक युवक की सजगता से हुआ। दिल्ली के रहने वाले इस पीड़ित ने 15,000 रुपये गंवाने के बाद पाया कि फोन पर बात करने वाली युवती और तस्वीरों में दिखाई गई लड़की में कोई तालमेल नहीं है। उसे आभास हुआ कि फोटो किसी अज्ञात महिला की है, जबकि आवाज और पहचान पूरी तरह अलग थी। संदेह पुख्ता होने पर उसने दिल्ली पुलिस की सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट साइबर सेल में आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई। साइबर टीम ने जब वित्तीय लेनदेन की पड़ताल की, तो पाया कि पीड़ित की ओर से भेजा गया पैसा सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के एक विशिष्ट खाते में ट्रांसफर हुआ था। यह बैंक खाता सीधे तौर पर ‘एम/एस शादी पार्टनर डॉट कॉम’ के नाम से संचालित हो रहा था। तकनीकी जांच को आगे बढ़ाने पर पुलिस के सामने यह तथ्य आया कि देश के अलग-अलग राज्यों से छह अन्य लोगों ने भी इसी खाते में पैसे भेजने के संबंध में साइबर धोखाधड़ी की शिकायतें दर्ज करा रखी थीं। इससे साफ हो गया कि यह किसी एक व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला नहीं, बल्कि एक व्यापक अंतरराज्यीय ठगी गिरोह का सुनियोजित तंत्र है। आगरा के अपार्टमेंट में छापा और 10 गिरफ्तारियां बैंक रिकॉर्ड और डिजिटल फुटप्रिंट्स के आधार पर तकनीकी निगरानी स्थापित करते हुए दिल्ली पुलिस की सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट साइबर टीम ने 4 सितंबर को उत्तर प्रदेश के आगरा में दस्तक दी। पुलिस बल ने आगरा के सिकंदरा थाना क्षेत्र में स्थित रामाजी धाम अपार्टमेंट के एक ठिकाने पर अचानक छापेमारी की। मौके से व्यावसायिक कॉल सेंटर का संचालन पकड़ा गया, जहां से जय शक्या और आठ महिला टेली-कॉलर्स को हिरासत में लेकर गिरफ्तार कर लिया गया। ये सभी महिलाएं ही फर्जी दुल्हन और उनके रिश्तेदारों की आवाज में कॉल संचालित कर रही थीं। पूछताछ और तकनीकी सबूतों के आधार पर पुलिस ने आगे बढ़ते हुए पूरे गिरोह के मास्टरमाइंड अमित कुमार को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया। इस प्रकार इस छापेमारी और अनुवर्ती कार्रवाई में कुल 10 लोगों को कानून के शिकंजे में लिया गया। पुलिस ने मौके से अपराध में प्रयुक्त इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, सिम कार्ड और संबंधित दस्तावेज भी जब्त किए। डिजिटल भ्रम और पुलिस की अहम हिदायतें सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट के डीसीपी रोहित राजबीर ने इस कार्रवाई की पुष्टि करते हुए स्पष्ट किया कि यह एक संगठित अखिल भारतीय नेटवर्क था, जिसकी जद में कई राज्यों के नौजवान आ चुके थे। गिरोह इंटरनेट से चुराई गई सुंदर तस्वीरों, नकली डिजिटल प्रोफाइल्स और पहले से रिहर्सल किए गए फोन कॉल्स के जरिए ऐसा माहौल बनाता था कि सामान्य युवक यह भेद नहीं कर पाते थे कि वे किसी वास्तविक वैवाहिक सेवा से जुड़े हैं या किसी संगठित ठग गिरोह के चंगुल में फंसे हैं। डीसीपी ने आम नागरिकों और शादी के इच्छुक युवाओं को सलाह दी है कि ऑनलाइन वैवाहिक पोर्टलों का उपयोग करते समय अत्यधिक सतर्कता बरतें। किसी भी प्लेटफॉर्म या अनजान संपर्क को किसी भी प्रकार का भुगतान करने से पहले प्रोफाइल का स्वतंत्र रूप से सत्यापन करें। केवल फोन कॉल या तस्वीरों के भरोसे वित्तीय लेनदेन न करें। उन्होंने आग्रह किया कि विवाह जैसे संवेदनशील विषय में आगे बढ़ने से पहले सीधे परिवारों से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात करें, प्रामाणिक वीडियो कॉल के जरिए आमने-सामने संवाद स्थापित करें और किसी भी प्रकार की संदिग्ध गतिविधि या लगातार पैसों की मांग दिखने पर तुरंत नजदीकी पुलिस थाने या साइबर हेल्पलाइन को सूचित करें। इसका आप पर असर ऑनलाइन वैवाहिक मंचों पर शादी की तलाश कर रहे युवाओं और उनके परिवारों को डिजिटल पहचान के सत्यापन और वित्तीय भुगतानों को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी। • राष्ट्रीय स्तर पर: इंटरनेट पर जीवनसाथी खोज रहे अविवाहित युवाओं को अनजान कॉलर्स या अपंजीकृत वैवाहिक वेबसाइटों पर किसी भी तरह की पंजीकरण अथवा प्रोफाइल एक्टिवेशन फीस देने से पहले अत्यधिक सतर्क रहना होगा। साइबर धोखाधड़ी से बचने के लिए किसी भी प्रोफाइल की सत्यता केवल फोन कॉल्स या तस्वीरों से तय करने के बजाय वास्तविक मुलाकात और स्वतंत्र जांच के बाद ही आगे बढ़ें। • आगरा और दिल्ली में: दिल्ली पुलिस की इस कार्रवाई से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चल रहे संदिग्ध कॉल सेंटरों के खिलाफ निगरानी और तेज होगी। स्थानीय निवासियों को ऐसी किसी भी फर्जी एजेंसी की सूचना तुरंत पुलिस की साइबर अपराध शाखा को देनी चाहिए ताकि समय रहते ठगी के नेटवर्क पर रोक लग सके। • उपभोक्ता सुरक्षा: एमएसएमई या अन्य सरकारी विभागों में पंजीकृत दिखने वाले कारोबारी नाम भी हमेशा शत-प्रतिशत प्रामाणिक हों यह जरूरी नहीं है। कोई भी उपभोक्ता जब ऑनलाइन सेवाओं के लिए भुगतान करे तो यह जांच ले कि सेवा प्रदाता का भौतिक पता और प्रत्यक्ष सेवाएं वास्तव में उपलब्ध हैं या केवल कागजों पर दिखाई गई हैं। • आर्थिक सतर्कता: फर्जी एजेंसियां अक्सर छोटी रकम मांगकर कानूनी कार्रवाई से बचने की कोशिश करती हैं, इसलिए 2,500 से 15,000 रुपये जैसी मांगों पर भी बिना सत्यापन के भुगतान न करें। यदि किसी भी नागरिक के साथ ऐसी कोई ठगी हुई है तो रकम छोटी होने के बावजूद तुरंत राष्ट्रीय साइबर पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएं। ऐसा क्यों हुआ यह संगठित अपराध वैवाहिक दबाव झेल रहे कुंवारे युवाओं की मनोवैज्ञानिक स्थिति और कानूनी खामियों की आड़ में एक पेशेवर व्यापारिक ढांचे का दुरुपयोग करके अंजाम दिया गया। • व्यापारिक पंजीकरण का आवरण: गिरोह के मुख्य सूत्रधार अमित कुमार ने एमएसएमई और श्रम विभाग में फर्म को पंजीकृत कराया ताकि बैंक खाते और कॉलिंग सिम वैध दिखें। इस आधिकारिक आवरण ने पीड़ितों के मन में कंपनी के प्रामाणिक होने का झूठा विश्वास पैदा किया। • सांस्कृतिक व सामाजिक संकोच का लाभ: शादी तय न होने से परेशान युवाओं की भावनाओं का फायदा उठाकर उन्हें इंटरनेट से ली गई सुंदर तस्वीरों और बनावटी पारिवारिक कॉल्स के जरिए आकर्षित किया गया। सामाजिक संकोच के चलते कई युवा छोटी रकम गंवाने के बाद कानूनी प्रक्रिया में जाने से हिचकिचाते रहे। • कम रकम वसूलने की सोची-समझी रणनीति: सिंडिकेट ने प्रति पीड़ित अधिकतम 15,000 रुपये तक की सीमा तय रखी ताकि नुकसान झेलने वाला व्यक्ति मामले को बड़ा अपराध न मानकर पुलिस तक न पहुंचे। इस सोची-समझी नीति ने गिरोह को लंबे समय तक बिना किसी बड़े अवरोध के सक्रिय रहने दिया। सवाल-जवाब 1. दिल्ली पुलिस ने किस शहर में चल रहे फर्जी मैट्रिमोनियल कॉल सेंटर का भंडाफोड़ किया? दिल्ली पुलिस की साइबर सेल ने उत्तर प्रदेश के आगरा में सिकंदरा स्थित रामाजी धाम अपार्टमेंट में चल रहे फर्जी कॉल सेंटर का भंडाफोड़ किया। 2. इस फर्जी मैचमेकिंग सिंडिकेट का मुख्य मास्टरमाइंड कौन था? पुलिस जांच के अनुसार इस पूरे रैकेट का मुख्य मास्टरमाइंड 29 वर्षीय वकील अमित कुमार था, जबकि कागजों पर फर्म जय शक्या के नाम थी। 3. आगरा में हुई छापेमारी में कुल कितने लोगों को गिरफ्तार किया गया? छापेमारी के दौरान जय शक्या और आठ महिला टेली-कॉलर्स समेत बाद में मास्टरमाइंड अमित कुमार को मिलाकर कुल 10 लोगों को गिरफ्तार किया गया। 4. यह गिरोह पीड़ितों से किन मदों के नाम पर और कितनी रकम ऐंठता था? गिरोह रजिस्ट्रेशन फीस, प्रोफाइल एक्टिवेशन और कॉन्टैक्ट अनलॉक के नाम पर 2,500 रुपये से लेकर 15,000 रुपये तक के पैकेज वसूलता था। 5. पैसे ऐंठने के बाद गिरोह रिश्ते को तोड़ने के लिए क्या बहाना बनाता था? पैसे लेने के बाद वे लड़की के मांगलिक होने, परिवार के राजी न होने या कहीं और सगाई तय हो जाने का बहाना बनाकर बातचीत बंद कर देते थे। 6. इस पूरे फर्जीवाड़े का खुलासा दिल्ली में कैसे हुआ? दिल्ली के एक युवक ने 15,000 रुपये गंवाने और बातचीत वाली महिला तथा तस्वीरों में अंतर भांपने के बाद सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के खाते के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। https://trendkia.com/crime/agra-se-chala-raha-tha-pharji-mairija-sindiketa-shadi-ka-jhansa-dekara-yuvaon-ko-thagane-vale-raiketa-ka-pardaphasha-38274 TrendKia — Har trend, sabse pehle.