गोरेगांव की खौफनाक घटना: दस साल की बच्ची पर मासूम की हत्या का आरोप, बाल मनोविज्ञान और परवरिश पर उठे गंभीर सवाल मुंबई के गोरेगांव ईस्ट में 18 महीने के मासूम की छठी मंजिल से गिरने से मौत के बाद बच्चों में बढ़ते आक्रामक व्यवहार और बाल मनोविज्ञान पर सवाल खड़े हो गए हैं। मुंबई के गोरेगांव ईस्ट इलाके में हुई एक दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। यहाँ एक अठारह महीने के मासूम बच्चे की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई है, जिससे हर कोई स्तब्ध है। शुरुआती जानकारी के अनुसार, उसी इमारत में रहने वाली मात्र दस साल की एक बच्ची पर आरोप है कि उसने कथित तौर पर उस छोटे से बच्चे को छठी मंजिल से नीचे गिरा दिया। इस सनसनीखेज मामले के सामने आने के बाद पुलिस प्रशासन तुरंत हरकत में आया और मौके पर पहुँचकर सीसीटीवी फुटेज की बारीकी से जाँच-पड़ताल की जा रही है। हालांकि, इस खौफनाक घटना के पीछे की असली वजह अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाई है, लेकिन इस हादसे ने देश भर में एक गहरा और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर इतनी कम उम्र के बच्चों के मन में इस तरह की हिंसा और बेरहमी कहाँ से पनपती है। बचपन में हिंसा और आक्रामकता के पीछे के मनोवैज्ञानिक कारण इस दुखद घटना के बाद बाल मनोविज्ञान और बच्चों के व्यवहार को लेकर बड़े स्तर पर चर्चा शुरू हो गई है। जानकारों का मानना है कि बच्चों के आक्रामक व्यवहार के पीछे कोई एक वजह नहीं होती है, बल्कि इसके कई अलग-अलग मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण हो सकते हैं। कभी-कभी गुस्सा, मन में लगातार चल रही कोई गहरी परेशानी, आसपास का माहौल या भावनाओं को नियंत्रित न कर पाना बच्चों को खतरनाक कदम उठाने पर मजबूर कर सकता है। हालांकि, केवल किसी एक घटना के आधार पर यह तय कर लेना जल्दबाजी होगी कि कोई बच्चा ऐसा क्यों करता है या इसके पीछे सीधे तौर पर उसके माता-पिता की परवरिश में ही कोई बड़ी कमी रही है। बाल विकास के जानकारों का कहना है कि बच्चों के मन की स्थिति को समझने के लिए उनके पूरे परिवेश और मानसिक स्वास्थ्य का गहराई से अध्ययन करना बहुत जरूरी होता है। बच्चों का गुस्सा और जिद कब बनती है चिंता का विषय चाइल्ड माइंड इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों के अनुसार, यह समझना बेहद जरूरी है कि बच्चों का अक्सर जिद करना, बात-बात पर गुस्सा दिखाना या कभी-कभी खेल-खेल में दूसरे बच्चे को हल्का सा धक्का दे देना हमेशा ही किसी बड़ी और गंभीर समस्या का संकेत नहीं होता है। बहुत छोटी उम्र के बच्चे अपनी भावनाओं को ठीक से समझना और उन्हें संभालना सीख रहे होते हैं। कई बार वे अपनी छोटी-मोटी बातें मनवाने के लिए रोते हैं, जोर-जोर से चिल्लाते हैं या नाराज होकर बैठ जाते हैं। यह बच्चों के विकास की प्रक्रिया का एक सामान्य हिस्सा हो सकता है। लेकिन यह चिंता का विषय तब बन जाता है जब कोई बच्चा बार-बार जानबूझकर दूसरों को शारीरिक चोट पहुँचाने लगे, गुस्से में आकर खुद पर उसका बिल्कुल भी काबू न रहे या उसका आक्रामक व्यवहार किसी दूसरे की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा बनने लगे। ऐसे हालात में बच्चे को केवल डाँटने या फौरन सजा देने के बजाय यह प्यार से समझने की कोशिश करनी चाहिए कि वह आखिर ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है। हो सकता है कि बच्चा अंदर से किसी बात को लेकर बहुत अधिक परेशान हो या फिर अपनी बात को दूसरों तक सही तरीके से पहुँचाने में असमर्थ महसूस कर रहा हो। मूड में बदलाव और लगातार रहने वाला चिड़चिड़ापन बच्चों के व्यवहार में अचानक आने वाले बदलावों के पीछे कई तरह की भावनात्मक परेशानियाँ जुड़ी हो सकती हैं। कभी-कभी बच्चे का लंबे समय तक लगातार चिड़चिड़े स्वभाव में रहना इस बात का संकेत होता है कि वह भीतर से किसी मानसिक तनाव से जूझ रहा है। कुछ खास मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के दौरान बच्चों की नींद के पैटर्न, उनकी दैनिक ऊर्जा, सामान्य मूड और उनके कुल मिलाकर व्यवहार में काफी बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, डिप्रेशन यानी अवसाद से पीड़ित कुछ बच्चे हर वक्त उदास दिखने के बजाय बेहद चिड़चिड़े और गुस्से वाले नजर आ सकते हैं। इसका यह कतई मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि हर समय गुस्सा करना या छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ जाना किसी बड़ी मानसिक बीमारी का पुख्ता सबूत है। हाँ, अगर किसी बच्चे के व्यवहार में इस तरह के बदलाव काफी लंबे समय से लगातार नजर आ रहे हैं और उसका सीधा नकारात्मक असर उसकी स्कूल की पढ़ाई, उसकी रात की नींद या उसके दोस्तों के साथ रिश्तों पर पड़ रहा है, तो समय रहते किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना ही सबसे सही कदम साबित होता है। डर, बेचैनी और मानसिक स्वास्थ्य का जटिल दायरा कुछ बहुत ही गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के मामलों में बच्चों को कभी-कभी ऐसी अजीब आवाजें सुनाई दे सकती हैं जिन्हें आसपास के दूसरे लोग बिल्कुल नहीं सुन पाते हैं। इसके अलावा कुछ बच्चों के मन में अत्यधिक डर या बिना किसी ठोस वजह के गहरा शक पैदा हो सकता है। ऐसी असाधारण स्थितियों में बच्चा बुरी तरह से परेशान हो सकता है और उसका सामान्य व्यवहार पूरी तरह से बदल सकता है। परंतु इसका यह अर्थ कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि किसी भी प्रकार का हिंसक व्यवहार करने वाला हर बच्चा अनिवार्य रूप से ऐसी किसी गंभीर समस्या की चपेट में है। केवल सतही गुस्से या किसी एक अकेली दुर्घटना के आधार पर किसी भी मानसिक बीमारी का पक्का अंदाजा लगाना गलत है। इस सबकी बिल्कुल सटीक वजह का पता लगाने के लिए किसी विशेषज्ञ डॉक्टर द्वारा बच्चे की पूरी मेडिकल और मनोवैज्ञानिक जाँच कराया जाना बेहद आवश्यक होता है। संचार की कमी और संवादहीनता से बढ़ता फ्रस्ट्रेशन कई बार ऐसा देखा जाता है कि बच्चे के कोमल मन में बहुत सारी बातें एक साथ चल रही होती हैं, लेकिन वह किसी को यह बता नहीं पाता है कि उसे असल में किस बात पर बुरा लगा है या वह अपनी जिंदगी से वास्तव में क्या चाहता है। ऐसी संवादहीनता की स्थिति में बच्चे की अंदरूनी परेशानी और अधिक बढ़ने लगती है। खीझ के मारे वह फूट-फूट कर रोने लगता है, तेज आवाज में चिल्लाता है या गुस्से में आकर आसपास रखी चीजों को यहाँ-वहाँ फेंकने लगता है। कुछ खास बच्चों को अपनी बात दूसरों को समझाने या फिर दूसरों की कही गई बात को ठीक से समझने में थोड़ी ज्यादा अतिरिक्त मदद की आवश्यकता होती है। ऑटिज्म स्पेक्ट्रम से जुड़े कुछ मामलों में भी बच्चों के लिए आम बातचीत करना और सामाजिक परिस्थितियों को समझना काफी मुश्किल हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इस तरह की चुनौती का सामना करने वाले बच्चे स्वभाव से हिंसक होते हैं। असली जरूरत इस बात की है कि उनकी छिपी हुई परेशानी को संवेदनशीलता के साथ समझा जाए और उन्हें अपनी बात कहने के बहुत ही आसान व सरल तरीके सिखाए जाएँ। आवेगशीलता, बिना सोचे समझे काम करना और एडीएचडी कुछ बच्चे बहुत अधिक गुस्से या अत्यधिक उत्साह के आवेश में आकर तुरंत प्रतिक्रिया दे बैठते हैं। वे उस वक्त बिल्कुल भी नहीं सोच पाते हैं कि उनके इस क्षणिक कदम से किसी दूसरे इंसान को गंभीर चोट पहुँच सकती है या फिर बाद में इसके कितने बुरे परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। एडीएचडी से पीड़ित कुछ बच्चों को अपना ध्यान एक जगह केंद्रित करने में और अपने उग्र आवेगों पर पूरी तरह काबू रखने में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। ऐसे विशेष बच्चों को धीरे-धीरे अभ्यास के जरिए यह सिखाया जा सकता है कि गुस्सा आने की स्थिति में तुरंत कोई भी खतरनाक कदम उठाने के बजाय वे कुछ पल के लिए रुकें, ठंडे दिमाग से सोचें और उसके बाद ही अपनी कोई प्रतिक्रिया दें। हालाँकि, एडीएचडी की समस्या होने मात्र से यह साबित नहीं हो जाता कि वह बच्चा आगे चलकर निश्चित रूप से हिंसक ही बनेगा, क्योंकि प्रत्येक बच्चे का स्वभाव और व्यवहार का तरीका पूरी तरह से अलग और अनूठा होता है। शारीरिक बीमारियाँ, सिर की चोट और तनाव का गहरा असर बच्चों के स्वभाव और आचरण में अचानक आने वाले बदलावों की मुख्य वजह कई बार कोई शारीरिक बीमारी भी हो सकती है। सिर में गंभीर चोट लगना या दिमाग से जुड़ी कुछ खास चिकित्सीय बीमारियाँ सीधे तौर पर मानव व्यवहार को बहुत ज्यादा प्रभावित करती हैं। यदि किसी बच्चे का व्यवहार बहुत कम समय में एकदम से बदल जाए और उसके साथ-साथ उसे भ्रम होने लगे, बेहोशी छाए या अन्य कोई शारीरिक लक्षण साफ दिखाई दें, तो बिना किसी देरी के तुरंत डॉक्टर से संपर्क किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, घर के पारिवारिक माहौल में चल रहा तनाव, स्कूल के भीतर किसी अन्य छात्र द्वारा परेशान किया जाना यानी बुलिंग या फिर जीवन का कोई बेहद डरावना और कड़वा अनुभव भी बच्चे के कोमल मन पर बहुत गहरा और बुरा असर डाल सकता है। हर एक बच्चा ऐसी कठिन परिस्थितियों से अपने ही तरीके से निपटता है। यही कारण है कि जब कभी भी बच्चे के व्यवहार में कोई असामान्य बदलाव दिखाई दे, तो माता-पिता को उससे बेहद शांत मन से बातचीत करनी चाहिए और हालात की गंभीरता को देखते हुए किसी पेशेवर विशेषज्ञ की मदद लेने से बिल्कुल भी पीछे नहीं हटना चाहिए। इसका आप पर असर बच्चों में बढ़ते गुस्से और आक्रामक व्यवहार से जुड़ी इस घटना का असर देश भर के अभिभावकों और स्कूलों पर सीधा पड़ता है। • भारत में: माता-पिता को अपने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और बदलते व्यवहार पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। स्कूलों और परिवारों को मिलकर बच्चों के बीच संवाद और सकारात्मक परवरिश के माहौल को बढ़ावा देना चाहिए। • मुंबई में: स्थानीय अभिभावकों और आवासीय सोसाइटियों में सुरक्षा और बच्चों की गतिविधियों की निगरानी को लेकर चिंता बढ़ गई है। लोग बच्चों के मानसिक तनाव को समय रहते पहचानने के लिए काउंसलिंग और बाल विशेषज्ञों की मदद ले रहे हैं। ऐसा क्यों हुआ बच्चों में अत्यधिक आक्रामकता और हिंसा के पीछे कई तरह के गहरे मनोवैज्ञानिक, पर्यावरणीय और चिकित्सीय कारण हो सकते हैं, जिनका खुलासा बाल विशेषज्ञ करते हैं। • संवाद की कमी: कई बार बच्चे अपनी भावनाएं या परेशानी शब्दों में नहीं कह पाते, जिससे उनका फ्रस्ट्रेशन गुस्से या हिंसक हरकतों के रूप में बाहर निकलता है। • मानसिक और भावनात्मक परेशानी: डिप्रेशन, मूड डिसऑर्डर, अत्यधिक डर या एडीएचडी जैसी स्थितियां बच्चों के आवेग और व्यवहार को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती हैं। • वातावरण और तनाव: परिवार में चल रहा तनाव, स्कूल में बुलिंग या कोई डरावना अनुभव बच्चों के कोमल मन पर बुरा असर डाल सकता है। सवाल-जवाब 1. गोरेगांव ईस्ट की घटना में क्या हुआ था? गोरेगांव ईस्ट की एक इमारत में 18 महीने के मासूम बच्चे की छठी मंजिल से नीचे गिरने से मौत हो गई, जिसमें उसी इमारत की 10 साल की बच्ची पर धक्का देने का आरोप है। 2. बच्चों के आक्रामक व्यवहार के पीछे मुख्य कारण क्या हो सकते हैं? बाल मनोविज्ञान के अनुसार इसके पीछे मूड डिसऑर्डर, संवाद की कमी, एडीएचडी, मानसिक तनाव या शारीरिक परेशानियां हो सकती हैं। 3. क्या बच्चों का जिद करना हमेशा गंभीर समस्या का संकेत होता है? नहीं, बच्चों का जिद करना या कभी-कभी गुस्सा दिखाना हमेशा गंभीर समस्या नहीं होता क्योंकि वे अपनी भावनाएं संभालना सीख रहे होते हैं। 4. बच्चों के व्यवहार में किस बदलाव पर डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए? यदि बच्चे का व्यवहार लंबे समय से बदल गया है और उसका असर पढ़ाई या नींद पर पड़ रहा है, या वह दूसरों को चोट पहुँचाता है, तो विशेषज्ञ से मिलना चाहिए। https://trendkia.com/crime/goregaon-tragedy-raises-alarms-why-did-a-10-year-old-allegedly-harm-a-toddler-49179 TrendKia — Har trend, sabse pehle.