अवैध कमाई का सिर्फ एक फीसदी हिस्सा ही हो पाता है रिकवर, लंदन में जस्टिस सूर्यकांत की दो टूक लंदन में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में जस्टिस सूर्यकांत ने मनी लॉन्ड्रिंग और डिजिटल अरेस्ट जैसे आर्थिक अपराधों पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने बताया कि अवैध रूप से कमाए गए हर 100 रुपये में से एक रुपया भी वापस लाना बेहद मुश्किल है। दुनिया भर में हर साल इतने बड़े पैमाने पर काले धन को सफेद किया जाता है कि धरती पर मौजूद करीब आठ अरब लोगों में से प्रत्येक नागरिक के लिए एक नया लैपटॉप खरीदा जा सकता है। इस विशालकाय वित्तीय अपराध की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस असीम अवैध दौलत का एक बहुत ही मामूली हिस्सा ही वापस सरकारी खजाने तक पहुंच पाता है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत ने लंदन में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में इस गंभीर विषय पर खुलकर बात की। उन्होंने स्पष्ट किया कि गैर-कानूनी तरीकों से जुटाई गई हर 100 रुपये की पूंजी में से बमुश्किल एक रुपया ही रिकवर हो पाता है। इस पूरी चर्चा का केंद्र यह सवाल था कि आखिर बाकी बचा हुआ बेहिसाब पैसा कहां गायब हो जाता है और अपराधियों के चंगुल से उसे वापस देश में लाना इतना पेचीदा क्यों बना हुआ है। लंदन के इंटरनेशनल सिम्पोजियम में रखी बात जस्टिस सूर्यकांत लंदन में संपन्न हुए आर्थिक अपराध पर 43वें इंटरनेशनल सिम्पोजियम के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे। इस प्रतिष्ठित मंच पर उन्होंने अपने विचार रखते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलते वित्तीय अपराधों के अलग-अलग पहलुओं पर रोशनी डाली। उनके इस संबोधन का मुख्य फोकस मनी लॉन्ड्रिंग के बढ़ते दायरे, छिपाई गई अवैध संपत्ति की रिकवरी में आने वाली अड़चनों और वर्तमान समय में तेजी से पांव पसार रहे डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर फ्रॉड के मामलों पर था। दुनिया भर के कानूनी विशेषज्ञों और दिग्गजों के बीच उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक तकनीक और वैश्वीकरण के इस दौर में आर्थिक अपराधों का दायरा अब किसी एक राष्ट्र की सीमा तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसने पूरी वैश्विक व्यवस्था को अपनी चपेट में ले लिया है। लैपटॉप खरीदने जितनी भारी रकम होती है लॉन्डर मनी लॉन्ड्रिंग के वैश्विक आंकड़ों और अनुमानों का हवाला देते हुए जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यदि ये अनुमान सटीक बैठते हैं, तो एक साल के भीतर दुनिया भर में जितनी अवैध रकम को वैध रूप में बदला जाता है, उससे इस ग्रह के हर एक इंसान के लिए एक साधारण लैपटॉप का इंतजाम किया जा सकता है और उसके बाद भी काफी धन शेष बच जाएगा। उनके इस बयान का मूल उद्देश्य मनी लॉन्ड्रिंग के उस विराट आकार को दुनिया के सामने लाना था, जो किसी एक देश या किसी एक जांच एजेंसी के दायरे से बहुत आगे निकल चुका है। इस तरह के बड़े पैमाने पर होने वाले वित्तीय घालमेल का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली की स्थिरता पर पड़ता है, जिससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित होती हैं। हर 100 रुपये में से एक रुपये से भी कम की रिकवरी मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी एक बेहद डरावनी सच्चाई का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि आपराधिक गतिविधियों के जरिए जुटाई गई संपत्ति के उस अार भंडार में से सबसे उदार और अनुकूल अनुमानों को भी यदि सच मान लिया जाए, तो भी हर 100 रुपये में एक रुपये से भी कम राशि कभी रिकवर हो पाती है। इसका सीधा मतलब यह है कि अवैध धन को केवल ट्रैक कर लेना या उसकी पहचान कर लेना ही इकलौती चुनौती नहीं है, बल्कि उस संपत्ति को सुरक्षित वापस हासिल करना उससे भी कहीं बड़ी और जटिल समस्या है। गैर-कानूनी तरीके से कमाई गई यह दौलत अक्सर सीमाओं को लांघकर अलग-अलग देशों, गुप्त बैंक खातों और जटिल कॉर्पोरेट ढांचों के जरिए दूसरी जगहों पर सुरक्षित ठिकानों तक पहुंचा दी जाती है। अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से जुड़ी पेचीदगियां जस्टिस सूर्यकांत ने अन्य देशों के साथ आपसी कानूनी सहयोग के महत्व को रेखांकित करते हुए इसे बेहद जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि विभिन्न राष्ट्रों के बीच आपसी कानूनी सहायता संधियां, भले ही उनकी कार्यप्रणाली और प्रक्रियाएं कितनी भी अपूर्ण क्यों न हों, सामान्य प्रत्यर्पण प्रक्रियाओं की तुलना में अवैध रूप से अर्जित धन को वापस लाने का ज्यादा भरोसेमंद माध्यम साबित होती हैं। उन्होंने इस महत्वपूर्ण बिंदु पर जोर दिया कि गैर-कानूनी तरीके से हासिल की गई संपत्ति कभी भी उस स्थान पर नहीं टिकती जहां से उसे चुराया या हथियाया गया होता है। अपराधी इस संपत्ति को तुरंत ऐसे देशों में ट्रांसफर कर देते हैं जहां के कानूनी शिकंजे से बचना आसान होता है, जिससे रिकवरी की प्रक्रिया और अधिक कठिन हो जाती है। आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए भारत द्वारा उठाए गए कदमों का जिक्र करते हुए उन्होंने देश के मजबूत होते कानूनी ढांचे की सराहना की। उन्होंने इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड 2016 का उदाहरण देते हुए समझाया कि यह कानून पारंपरिक आपराधिक कार्रवाइयों के साथ-साथ सामानांतर रूप से चलता है। उनके अनुसार, भारतीय न्याय प्रणाली ने आपराधिक मुकदमों के निपटारे में लगने वाले लंबे समय के बावजूद सिविल रिकवरी की पूरी अनुमति दी है। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आपराधिक मुकदमे की लंबी प्रक्रिया चलने के दौरान भी अवैध संपत्ति को वापस पाने का कानूनी रास्ता पूरी तरह बंद न हो जाए। डिजिटल अरेस्ट जैसे नए साइबर फ्रॉड का खतरा अपने संबोधन में जस्टिस सूर्यकांत ने वर्तमान समय में तेजी से सिर उठा रहे डिजिटल अरेस्ट स्कैम का भी विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इस तरह के मामलों में शातिर ठग वीडियो कॉल के जरिए खुद को पुलिस, न्यायपालिका या किसी अन्य बड़े सरकारी विभाग का अधिकारी बताकर आम नागरिकों को गंभीर कानूनी कार्रवाई का डर दिखाते हैं और उनकी जीवनभर की कमाई को ठग लेते हैं। इस गंभीर समस्या के समाधान के संदर्भ में उन्होंने बताया कि अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को इस नए अपराध के दायरे का गहराई से आकलन करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही इस तरह के आपराधिक कृत्यों को एक अलग और विशिष्ट अपराध की श्रेणी में रखने तथा नुकसान की मात्रा के आधार पर सख्त सजा तय करने पर भी विचार किया जा रहा है। संसद के कानून का इंतजार नहीं करती न्यायपालिका भारतीय न्यायपालिका की कार्यशैली पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जब भी समाज में नए तरह के आर्थिक और साइबर अपराध सामने आते हैं, तो भारतीय अदालतें संसद की ओर से नए कानून बनाए जाने का लंबा इंतजार करने के बजाय खुद भी बेहद सक्रिय और निर्णायक भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कहा कि डिजिटल अरेस्ट जैसे आधुनिक घोटालों के खिलाफ न्यायपालिका का त्वरित रुख इस बड़े पैटर्न को दर्शाता है कि अपराध के नए और उन्नत तरीकों से निपटने के लिए देश की संस्थाओं को बिना किसी देरी के प्रतिक्रिया देनी होगी। अंत में उन्होंने आर्थिक अपराधों से मुकाबले के भारत के आधुनिक दृष्टिकोण को कई दशकों के दौरान विकसित हुए एक बहुस्तरीय ढांचे के रूप में परिभाषित किया, जिसमें देश के कानून, विभिन्न संस्थाएं और आधुनिक न्यायिक सिद्धांत सभी की अपनी-अपनी महत्वपूर्ण भूमिका तय की गई है। इसका आप पर असर आर्थिक अपराधों और मनी लॉन्ड्रिंग के बढ़ते मामलों का सीधा असर देश की आर्थिक सेहत और आम नागरिकों की वित्तीय सुरक्षा पर पड़ता है। • भारत में: डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर फ्रॉड से बचने के लिए नागरिकों को अत्यधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है, क्योंकि सरकारी एजेंसियां कभी भी वीडियो कॉल के जरिए पूछताछ या गिरफ्तारी नहीं करती हैं। • वित्तीय प्रणाली पर: काले धन की बेहद कम रिकवरी दर यह दर्शाती है कि वित्तीय नियामकों और जांच एजेंसियों को सीमा पार से होने वाले लेनदेन पर शिकंजा कसने के लिए अपनी कार्यप्रणाली को और अधिक पारदर्शी और त्वरित बनाना होगा। सवाल-जवाब 1. जस्टिस सूर्यकांत ने किस कार्यक्रम में मनी लॉन्ड्रिंग पर बात की? उन्होंने लंदन में आयोजित आर्थिक अपराध पर 43वें इंटरनेशनल सिम्पोजियम के समापन समारोह में यह संबोधन दिया। 2. गैर-कानूनी तरीके से कमाए गए धन में से कितना हिस्सा रिकवर हो पाता है? सबसे उदार अनुमानों के मुताबिक भी हर 100 रुपये में से एक रुपये से भी कम रकम रिकवर हो पाती है। 3. मनी लॉन्ड्रिंग की वैश्विक मात्रा की तुलना किससे की गई है? दुनिया भर में एक साल में लॉन्डर होने वाली रकम से धरती के हर इंसान के लिए एक साधारण लैपटॉप खरीदा जा सकता है। 4. डिजिटल अरेस्ट स्कैम में ठग क्या तरीका अपनाते हैं? ठग वीडियो कॉल के जरिए खुद को पुलिस या सरकारी अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं और उनकी कमाई ठग लेते हैं। 5. भारत में आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए किस कोड का उदाहरण दिया गया? संबोधन में इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड 2016 का उदाहरण दिया गया जो आपराधिक कार्रवाई के साथ सिविल रिकवरी की अनुमति देता है। https://trendkia.com/crime/only-one-rupee-recovered-out-of-every-100-in-illegitimate-wealth-says-justice-surya-kant-in-london-25275 TrendKia — Har trend, sabse pehle.