# फर्जी डॉक्टर बनकर खड़ा किया 200 करोड़ का नेटवर्क, चार राज्यों में ईडी की छापेमारी से मचा हड़कंप

> खुद को डॉक्टर बताकर तीन दशकों तक धोखाधड़ी करने वाले शख्स के खिलाफ ईडी ने शिकंजा कसा है। कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व फंड के नाम पर फर्जी बिलिंग और नकदी वापसी का गोरखधंधा सामने आया है।

**Type:** article · **Category:** अपराध · **Published:** 2026-09-30 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/crime/pharji-doktara-banakara-khara-kiya-200-karora-ka-netavarka-chara-rajyon-men-ed-ki-chhapemari-se-macha-haraknpa-40352 · **Language:** Hindi
**Tags:** ईडी, सीएसआर घोटाला, धर्मेंद्र कुमार चंद्रदेव सिंह, मनी लॉन्ड्रिंग, फर्जी डॉक्टर, जुहू पुलिस, पीएमएलए

तीन दशकों तक फर्जी पहचान के सहारे समाज में रसूख बनाए रखने और चिकित्सा क्षेत्र के नाम पर भारी भरकम वित्तीय साम्राज्य खड़ा करने का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। एक व्यक्ति ने करीब 30 वर्षों तक खुद को चिकित्सक बताकर लोगों और कॉरपोरेट जगत की आंखों में धूल झोंकी। इस पूरे मामले का पर्दाफाश तब हुआ जब प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने उसकी संदिग्ध गतिविधियों को अपने रडार पर लिया। वित्तीय जांच एजेंसी की पड़ताल में सामने आया कि जिस शख्स ने खुद को बड़ा डॉक्टर बताकर अरबों का तंत्र तैयार कर लिया, उसके पास किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से मेडिकल डिग्री तो दूर, 12वीं कक्षा के बाद की नियमित पढ़ाई का भी कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं है। इसी फर्जीवाड़े और बातों के जाल में लोगों को उलझाकर उसने करीब 200 करोड़ रुपये का साम्राज्य खड़ा कर लिया था।

## चैरिटेबल ट्रस्ट और सीएसआर फंड के नाम पर बना जाल
इस पूरे घोटाले की नींव पूरी तरह से एक झूठी साख पर टिकी हुई थी। धर्मेंद्र कुमार चंद्रदेव सिंह नाम के इस शख्स ने खुद को ‘डॉक्टर’ के रूप में समाज में स्थापित किया और लोगों के बीच ऐसा प्रभाव बनाया कि सभी उस पर बिना किसी जांच-परख के भरोसा करने लगे। इस कथित साख का बेजा फायदा उठाते हुए उसने कई धर्मार्थ ट्रस्ट और गैर सरकारी संस्थाएं बना लीं। संस्थाओं के गठन के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों यानी पीएसयू और कई प्रतिष्ठित निजी कंपनियों से संपर्क साधा गया। इन बड़ी कंपनियों के सामने स्वास्थ्य सुधार और जनहित से जुड़े बेहद आकर्षक सीएसआर यानी कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व प्रोजेक्ट्स पेश किए जाते थे, ताकि वहां से भारी मात्रा में अनुदान हासिल किया जा सके।

## फर्जी बिलिंग और नकद वापसी का सुनियोजित खेल
कंपनियों से वेलफेयर प्रोजेक्ट्स के नाम पर करोड़ों का सीएसआर फंड आवंटित होने के बाद असली धांधली शुरू होती थी। आवंटित रकम मिलने के बाद स्वास्थ्य परियोजनाओं को या तो बीच में ही अधूरा छोड़ दिया जाता था या फिर केवल कागजों पर ही उन्हें पूरी तरह संचालित दिखा दिया जाता था। इसके बाद कागजी स्तर पर काम दिखाने के लिए शेल और बोगस कंपनियों का सहारा लेकर बढ़ा-चढ़ाकर फर्जी बिल तैयार किए जाते थे और फंड से रकम बाहर निकाल ली जाती थी। इस सिंडिकेट का सबसे खतरनाक पहलू यह था कि कंपनियों से आए सीएसआर अनुदान का एक बड़ा हिस्सा वापस नकद के रूप में लौटा दिया जाता था। आरोपी इस पूरी प्रक्रिया के एवज में अपना तय कमीशन काटकर अपने पास रख लेता था, जबकि बाकी बची भारी रकम संबंधित कंपनियों को अवैध तरीके से कैश में वापस दे दी जाती थी।

## चार राज्यों के आठ ठिकानों पर एजेंसी की ताबड़तोड़ कार्रवाई
जांच एजेंसी को अंदेशा है कि इस पूरे सिंडिकेट के जरिए कंपनियों के वैध यानी अकाउंटेड पैसे को अवैध नकदी में बदलने का संगठित खेल चलाया जा रहा था। मामले की शुरुआत मुंबई के जुहू पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई एक शुरुआती प्राथमिकी से हुई थी। उसी एफआईआर के आधार पर आगे बढ़ते हुए प्रवर्तन निदेशालय ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट यानी पीएमएलए के तहत मामला दर्ज कर जांच अपने हाथ में ले ली। मामले की तह तक पहुंचने के लिए एजेंसी ने महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात और दिल्ली-एनसीआर में एक साथ आठ विभिन्न ठिकानों पर व्यापक तलाशी अभियान चलाया है। फिलहाल टीम जब्त दस्तावेजों, वित्तीय लेनदेन के बहीखातों और डिजिटल रिकॉर्ड की बारीकी से जांच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि 200 करोड़ रुपये के इस नेटवर्क के पीछे कौन से कॉरपोरेट घराने, बिचौलिए और प्रभावशाली चेहरे सक्रिय थे।

## इसका आप पर असर
इस जांच से कॉर्पोरेट संस्थाओं द्वारा चैरिटेबल ट्रस्टों को दिए जाने वाले सामाजिक फंड के सत्यापन नियम सख्त हो सकते हैं।

- **कंपनियों के लिए:** पीएसयू और निजी कंपनियों में सीएसआर फंड जारी करने से पहले ट्रस्टों की बैकग्राउंड जांच अनिवार्य की जा सकती है। इससे स्वास्थ्य योजनाओं के नाम पर होने वाले फर्जी बिलिंग के खेल पर अंकुश लगेगा।
- **दानदाताओं के लिए:** किसी भी चैरिटेबल ट्रस्ट को अनुदान देने से पहले उसके संचालकों की कानूनी और शैक्षणिक साख जांचना आवश्यक हो गया है। पारदर्शिता न होने पर फंड मनी लॉन्ड्रिंग के दायरे में आ सकता है।
- **स्वास्थ्य लाभार्थियों के लिए:** कागजों पर चलने वाले फर्जी मेडिकल प्रोजेक्ट्स बंद होने से असली जरूरतमंदों तक सही योजनाएं पहुंच सकेंगी। सरकारी व निजी क्षेत्र वास्तविक जमीनी काम करने वाली संस्थाओं को ही धन आवंटित करेंगे।
- **नागरिकों की सतर्कता:** किसी भी कथित डॉक्टर या विशेषज्ञ पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय उनकी औपचारिक योग्यताओं के प्रति सतर्कता बढ़ेगी। संदिग्ध वित्तीय या चिकित्सा गतिविधियों की सूचना तुरंत संबंधित अधिकारियों को दी जानी चाहिए।

## ऐसा क्यों हुआ
यह पूरा मामला एक फर्जी डॉक्टर द्वारा चैरिटेबल ट्रस्ट बनाकर कॉर्पोरेट फंड के जरिए काला धन सफेद करने की साजिश से जुड़ा है। शुरुआती पुलिस शिकायत के बाद संघीय एजेंसी ने मनी लॉन्ड्रिंग के तहत व्यापक कार्रवाई शुरू की।

- **फर्जी साख का निर्माण:** मुख्य आरोपी ने खुद को डॉक्टर बताकर तीन दशकों तक सामाजिक साख बनाई, जिससे किसी ने उसकी शैक्षणिक योग्यता पर संदेह नहीं किया। इसी प्रभाव के दम पर उसने कई धर्मार्थ ट्रस्ट खड़े किए।
- **सीएसआर नियमों की खामियां:** पीएसयू और निजी कंपनियों के सामने आकर्षक स्वास्थ्य योजनाएं रखकर फंड हासिल किया गया, जिसका जमीनी सत्यापन ढीला रहा। कागजों पर पूरे दिखाए गए प्रोजेक्ट्स से शेल कंपनियों के जरिए बिल निकाले गए।
- **अकाउंटेड पैसे को कैश में बदलना:** कंपनियों से मिले चेक या डिजिटल फंड को फर्जी बिलों से निकालकर भारी नकदी वापस की जाती थी और आरोपी अपना कमीशन काटता था। इस प्रक्रिया से कंपनियों का सफेद धन अनअकाउंटेड कैश में बदला जा रहा था।
- **मुंबई पुलिस की एफआईआर:** मुंबई के जुहू पुलिस थाने में धोखाधड़ी का शुरुआती मामला दर्ज हुआ था। इसी एफआईआर के तथ्यों को आधार बनाकर ईडी ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत चार राज्यों में छापेमारी शुरू की।

## सवाल-जवाब

### 1. आरोपी की पहचान किस रूप में हुई है?
आरोपी की पहचान धर्मेंद्र कुमार चंद्रदेव सिंह के रूप में हुई है, जो पिछले 30 वर्षों से खुद को फर्जी तरीके से डॉक्टर बताता रहा।

### 2. आरोपी की वास्तविक शैक्षणिक योग्यता क्या है?
जांच में पता चला कि उसके पास कोई मेडिकल डिग्री नहीं है और 12वीं कक्षा के बाद की पढ़ाई का भी कोई वैध प्रमाण नहीं मिला।

### 3. यह घोटाला कितने रुपये का बताया जा रहा है?
प्रवर्तन निदेशालय के अनुसार आरोपी ने इस पूरे नेटवर्क के माध्यम से करीब 200 करोड़ रुपये का साम्राज्य खड़ा किया था।

### 4. सीएसआर फंड में किस तरह की धोखाधड़ी की जाती थी?
कंपनियों से मिले सीएसआर फंड को फर्जी बिलिंग और शेल कंपनियों के जरिए निकाला जाता था और कमीशन काटकर अधिकांश रकम कैश में लौटा दी जाती थी।

### 5. ईडी ने किन राज्यों में छापेमारी की है?
ईडी ने महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात और दिल्ली-एनसीआर में कुल 8 ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की है।

### 6. इस मामले में जांच की शुरुआत कैसे हुई?
इस मामले की शुरुआत मुंबई के जुहू पुलिस स्टेशन में दर्ज प्राथमिक एफआईआर के आधार पर हुई, जिसे बाद में ईडी ने पीएमएलए के तहत हाथ में लिया।

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