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  "type": "article",
  "title": "कर्नाटक में सुप्रीम कोर्ट के फर्जी आदेश पर उम्रकैद का दोषी रिहा, पूर्व जेल अधीक्षक डीआईजी एम. सोमशेखर गिरफ्तार",
  "summary": "कर्नाटक कारागार विभाग के डीआईजी एम. सोमशेखर को बेंगलुरु सेंट्रल जेल में तैनाती के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जाली आदेश पर उम्रकैद के मुजरिम को छोड़ने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है।",
  "content": "कर्नाटक के कारागार एवं सुधार सेवा विभाग में एक सनसनीखेज खुलासे के बाद वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को सलाखों के पीछे भेज दिया गया है। जिन अधिकारियों के कंधों पर जेल प्रशासन चलाने और गंभीर मुजरिमों पर नजर रखने का दायित्व था, उन्हीं में से एक वरिष्ठ अधिकारी पर उम्रकैद के सजायाफ्ता कैदी को अवैध रूप से बाहर निकालने की साजिश में शामिल होने का आरोप लगा है। इस सिलसिले में कलबुर्गी में तैनात कारागार उप महानिरीक्षक (डीआईजी) एम. सोमशेखर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। यह पूरा मामला बेंगलुरु की सेंट्रल जेल में उनके मुख्य अधीक्षक रहने के दौरान अंजाम दी गई एक बड़ी प्रशासनिक हेराफेरी से जुड़ा हुआ है।\n\nजाली अदालती दस्तावेज और 11 दिन में रिहाई\nइस पूरे मामले की जड़ें साल 2018 के एक चौंकाने वाले घटनाक्रम से जुड़ी हुई हैं। बेंगलुरु सेंट्रल जेल में बंद कैदी शंकर अराध्या को चिकपेट पुलिस थाने में दर्ज अपहरण और फिरौती के लिए की गई हत्या के एक जघन्य मामले में अदालत ने दोषी पाया था। जुलाई 2004 में अदालत ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। कानून के मुताबिक उसे अपनी पूरी सजा जेल की चारदीवारी के भीतर काटनी थी, लेकिन 13 नवंबर 2018 को वह अप्रत्याशित रूप से जेल से बाहर आ गया।\n\nपुलिस जांच में सामने आया कि शंकर की अवैध रिहाई के लिए देश की शीर्ष अदालत का एक कथित आदेश जेल प्रशासन के समक्ष पेश किया गया था। इस दस्तावेज पर 2 नवंबर 2018 की तारीख दर्ज थी। आश्चर्यजनक रूप से इस आदेश के सामने आने के महज 11 दिन बाद ही शंकर को जेल से छोड़ दिया गया। विस्तृत जांच के बाद यह बात साफ हुई कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कोई आदेश कभी पारित ही नहीं किया था, बल्कि वह पूरी तरह जाली और गढ़ा हुआ दस्तावेज था। जांच के अनुसार, जेल के सजायाफ्ता कैदी अनुभाग (कन्विक्ट प्रिजनर सेक्शन) में सेकंड डिवीजन असिस्टेंट के रूप में पदस्थ श्रीकांत एस. ने यह फर्जी आदेश तैयार किया था।\n\nचार साल तक दबी रही विभाग की अंदरूनी शिकायत\nशंकर अराध्या को जेल से रिहा किए जाने के बाद इस पूरे फर्जीवाड़े की भनक विभाग के भीतर कुछ लोगों को लग चुकी थी। जेल विभाग के अंदर से ही एक लिखित शिकायत दर्ज कराई गई थी, जिसमें साफ तौर पर कहा गया था कि शंकर को फर्जी अदालती दस्तावेजों के सहारे गैरकानूनी ढंग से रिहा किया गया है। लेकिन रसूख और प्रशासनिक लीपापोती के चलते यह गंभीर शिकायत लगभग चार साल तक फाइलों में धूल फांकती रही और इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।\n\nमामले में नया मोड़ तब आया जब आलोक कुमार ने कारागार एवं सुधार सेवा के महानिदेशक (डीजीपी) का पदभार संभाला। उन्होंने लंबित पड़ी इस पुरानी शिकायत का संज्ञान लिया और आंतरिक जांच के आदेश दिए। विभागीय जांच में आरोपों की पुष्टि होने के बाद, बेंगलुरु सेंट्रल जेल के प्रभारी अधीक्षक ने 20 मई 2026 को परप्पना अग्रहारा पुलिस थाने में औपचारिक प्राथमिकी दर्ज कराई। इस कदम के साथ ही करीब आठ साल पुराने इस मामले की फाइलें दोबारा खुल गईं और पुलिस ने कानूनी शिकंजा कसना शुरू कर दिया।\n\nआरोपियों की धरपकड़ और मैसूरु तक तलाश\nप्राथमिकी दर्ज होने के बाद पुलिस ने फरार कैदी शंकर अराध्या की तलाश तेज कर दी। जांच में पता चला कि नवंबर 2018 में जेल से निकलने के बाद वह कुछ समय तक बेंगलुरु में ही छिपा रहा और बाद में अपनी पहचान छिपाकर मैसूरु में रहने लगा था। पुलिस टीम ने आखिरकार जुलाई 2026 में शंकर को धर दबोचा। इसके साथ ही फर्जी सुप्रीम कोर्ट आदेश तैयार करने वाले तत्कालीन कर्मचारी श्रीकांत एस. को भी गिरफ्तार कर लिया गया। मामले में संलिप्तता पाए जाने पर शंकर की पत्नी को भी हिरासत में लेकर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।\n\nजांच आगे बढ़ने पर तत्कालीन मुख्य अधीक्षक एम. सोमशेखर की भूमिका पूरी तरह संदेह के घेरे में आ गई। साल 2018 में जेल के कैदी अनुभाग में कार्यरत कर्मचारियों ने पुलिस पूछताछ में खुलासा किया कि शंकर की रिहाई सीधे सोमशेखर के आदेश और निर्देश पर की गई थी। इसके बाद पुलिस ने कलबुर्गी में तैनात डीआईजी एम. सोमशेखर को 4 अक्टूबर को गिरफ्तार कर लिया। अदालत ने उन्हें 9 अक्टूबर तक पुलिस हिरासत में भेज दिया है, जहां उनसे इस पूरे षड्यंत्र को लेकर गहन पूछताछ की जा रही है।\n\nपहले भी नियमों को ताक पर रखकर दी गई थी रियायतें\nजांच अधिकारियों को पड़ताल के दौरान ऐसे कई साक्ष्य मिले हैं जो दर्शाते हैं कि शंकर अराध्या पर जेल प्रशासन पहले से ही असामान्य मेहरबानी दिखा रहा था। रिकॉर्ड के अनुसार, शंकर पूर्व में पैरोल मिलने पर फरार हो चुका था। जेल नियमों के तहत पैरोल की शर्तों का उल्लंघन करने वाले कैदी को दोबारा ऐसी छूट मिलना बेहद कठिन होता है। इसके बावजूद, जेल कर्मचारियों द्वारा उसकी पात्रता को लेकर दर्ज की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को नजरअंदाज करते हुए साल 2018 में ही उसे 15-15 दिन की पैरोल तीन बार मंजूर की गई थी।\n\nइसके अलावा पुलिस की रडार पर एक संदिग्ध फोन नंबर भी है। दस्तावेजों के मुताबिक, शंकर की जानकारी सत्यापित करने के नाम पर सोमशेखर ने चंद्रा लेआउट पुलिस थाने के नाम पर दर्ज एक फोन नंबर पर संपर्क करने की बात कही थी। हालांकि, पुलिस की तकनीकी जांच में खुलासा हुआ कि वह नंबर चंद्रा लेआउट थाने का था ही नहीं। जांच एजेंसियां अब यह पड़ताल कर रही हैं कि फर्जी आदेश जेल प्रशासन तक किस माध्यम से पहुंचा, उसके सत्यापन की अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया को जानबूझकर क्यों छोड़ा गया और इस पूरे षड्यंत्र में अन्य किन लोगों की मिलीभगत थी।\n\nइसका आप पर असर\nयह घटना दर्शाती है कि जेल प्रशासन में फर्जीवाड़े के जरिए गंभीर अपराधियों की रिहाई आम नागरिकों की सुरक्षा और न्यायिक व्यवस्था के लिए कितना बड़ा खतरा बन सकती है।\n\n• भारत में: देश की अदालतों द्वारा पारित रिहाई आदेशों के भौतिक सत्यापन के नियमों को और अधिक कड़ा किए जाने की संभावना है। इससे जेलों और अदालतों के बीच डिजिटल सत्यापन प्रणाली को अनिवार्य बनाया जा सकता है ताकि किसी भी फर्जी आदेश पर रोक लग सके।\n• कर्नाटक में: राज्य सरकार जेलों में सालों से बंद कैदियों की पुरानी फाइलों और पैरोल रिकॉर्ड्स की व्यापक स्तर पर समीक्षा कर सकती है। बेंगलुरु और कलबुर्गी सहित राज्य की सभी प्रमुख जेलों में प्रशासनिक जवाबदेही तय करने के लिए निगरानी तंत्र सख्त होगा।\n• कानूनी प्रक्रिया पर असर: जाली अदालती आदेशों के जरिए जेल से बाहर आने वाले अन्य संदिग्ध कैदियों की पहचान के लिए विशेष ऑडिट शुरू हो सकता है। यह मामला जेल अधिकारियों की मिलीभगत पर सख्त कानूनी मिसाल कायम करेगा।\n• जन सुरक्षा: हत्या और अपहरण जैसे संगीन अपराधों के दोषियों के अवैध रूप से खुले में घूमने पर रोक लगाने के लिए पुलिस विभागों के बीच समन्वय बढ़ाया जाएगा। आम जनता को यह भरोसा मिलेगा कि पुरानी दबी फाइलों की भी निष्पक्ष जांच संभव है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह घटना जेल के अंदरूनी कर्मचारियों और शीर्ष अधिकारी की कथित मिलीभगत और सत्यापन की अनिवार्य प्रक्रिया को दरकिनार किए जाने के कारण संभव हुई।\n\n• प्रत्यक्ष कारण: चिकपेट मामले में आजीवन कारावास काट रहे शंकर अराध्या को रिहा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का एक जाली आदेश तैयार कर जेल रिकॉर्ड में शामिल कराया गया। तत्कालीन जेल अधीक्षक एम. सोमशेखर ने अदालती आदेश की सत्यता जांचे बिना कैदी की तत्काल रिहाई को मंजूरी दे दी।\n• आंतरिक मिलीभगत: जेल के कैदी अनुभाग में कार्यरत क्लर्क श्रीकांत एस. ने कथित तौर पर इस फर्जी आदेश को तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा संदिग्ध फोन नंबरों के जरिए फर्जी पुलिस सत्यापन दर्शाकर कागजी औपचारिकताएं पूरी कर ली गईं।\n• प्रशासनिक लापरवाही और शिकायत का दबना: रिहाई के बाद विभाग के ही एक व्यक्ति द्वारा दी गई शिकायत को लगभग चार साल तक ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। जब तक नए डीजीपी आलोक कुमार ने पदभार नहीं संभाला, तब तक इस गंभीर हेराफेरी की कोई स्वतंत्र जांच शुरू नहीं की गई थी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. डीआईजी एम. सोमशेखर को किस मामले में गिरफ्तार किया गया है?\nउन्हें 2018 में बेंगलुरु सेंट्रल जेल का मुख्य अधीक्षक रहते हुए सुप्रीम कोर्ट के फर्जी आदेश पर एक उम्रकैद के मुजरिम को अवैध रूप से रिहा करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।\n\n2. जेल से गैरकानूनी ढंग से रिहा किया गया कैदी कौन था?\nकैदी का नाम शंकर अराध्या था, जिसे 2004 में चिकपेट में एक नाबालिग बच्चे के अपहरण और हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।\n\n3. यह मामला इतने वर्षों बाद दोबारा कैसे खुला?\nजेल विभाग में चार साल से लंबित शिकायत पर डीजीपी आलोक कुमार के पद संभालने के बाद जांच शुरू हुई और मई 2026 में परप्पना अग्रहारा थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई।\n\n4. फर्जी अदालती आदेश किसने तैयार किया था?\nजांच के अनुसार जेल के कैदी अनुभाग में सेकंड डिवीजन असिस्टेंट के पद पर कार्यरत श्रीकांत एस. ने यह जाली दस्तावेज तैयार किया था।\n\n5. कैदी शंकर अराध्या को रिहाई के बाद कहां से पकड़ा गया?\nजेल से छूटने के बाद शंकर बेंगलुरु और फिर मैसूरु में छिपकर रह रहा था, जहां से उसे जुलाई 2026 में गिरफ्तार किया गया।\n\n6. डीआईजी सोमशेखर की हिरासत कब तक के लिए बढ़ाई गई है?\nसोमशेखर को 4 अक्टूबर को गिरफ्तार किए जाने के बाद अदालत ने 9 अक्टूबर तक पुलिस हिरासत में भेजा है।",
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  "category": "अपराध",
  "publishedAt": "2026-10-06",
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