# क्रिप्टोकरेंसी पर रिजर्व बैंक का सतर्क रुख, गवर्नर संजय मल्होत्रा ने संप्रभुता और पूंजी प्रवाह की चिंताओं पर दिया जोर

> आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने स्पष्ट किया है कि भारत क्रिप्टो से जुड़ी तकनीकों का समर्थन करता है, लेकिन मौद्रिक नीति और पूंजी नियंत्रण को लेकर क्रिप्टोकरेंसी पर पूरी सतर्कता बरत रहा है।

**Type:** article · **Category:** क्रिप्टो · **Published:** 2026-10-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/crypto/kriptokarensi-para-rbi-ka-satarka-rukha-gavarnara-sanjay-malhotra-ne-snprabhuta-aura-punji-pravaha-ki-chintaon-para-diya-jora-42364 · **Language:** Hindi
**Tags:** आरबीआई, क्रिप्टोकरेंसी, संजय मल्होत्रा, डिजिटल मुद्रा, सीबीडीसी, मौद्रिक नीति, बॉण्ड यील्ड

भारत में डिजिटल संपत्तियों और क्रिप्टोकरेंसी की तरफ निवेशकों का आकर्षण तेजी से बढ़ रहा है, जिसे देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी वित्तीय नीतियों और जोखिम प्रबंधन को लेकर स्थिति साफ की है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शनिवार को स्पष्ट किया कि केंद्रीय बैंक क्रिप्टोकरेंसी को लेकर बेहद सचेत और सतर्क दृष्टिकोण अपनाए हुए है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि केंद्रीय बैंक उन बुनियादी तकनीकों का स्वागत करता है जो क्रिप्टो संपत्तियों की बुनियाद हैं, जैसे डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी और टोकन व्यवस्था। भारत नवाचार के पक्ष में खड़ा है, परंतु राष्ट्रीय संप्रभुता, मौद्रिक नीतियों के संचालन और सीमाओं के पार पूंजी के अनियंत्रित प्रवाह से जुड़े जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

## बुनियादी तकनीक का स्वागत पर निजी डिजिटल कॉइन पर सावधानी
केंद्रीय बैंक ने साफ किया है कि तकनीक का विरोध करने के बजाय उसके सही इस्तेमाल पर ध्यान दिया जा रहा है। डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी एक विकेंद्रीकृत डिजिटल प्रणाली है, जहां किसी भी वित्तीय लेन-देन या सूचना का रिकॉर्ड किसी एक केंद्रीय सर्वर पर रखने के बजाय नेटवर्क के कई कंप्यूटरों में साझा रूप से दर्ज किया जाता है। दूसरी तरफ, टोकन व्यवस्था एक ऐसी सुरक्षा प्रक्रिया है जिसके जरिए किसी वास्तविक संपत्ति या डेबिट और क्रेडिट कार्ड जैसी बेहद संवेदनशील जानकारियों को एक विशिष्ट डिजिटल कोड में बदल दिया जाता है। संजय मल्होत्रा ने कहा कि केंद्रीय बैंक का दृष्टिकोण इन अंतर्निहित प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने का रहा है, और इनमें से कुछ का इस्तेमाल केंद्रीय बैंक के भीतर तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत बाहरी स्तर पर भी किया जा रहा है।

## मौद्रिक नीति और पूंजी नियंत्रण से जुड़े गंभीर खतरे
क्रिप्टोकरेंसी को सीधे तौर पर अपनाने में आने वाली अड़चनों को समझाते हुए गवर्नर ने बताया कि सबसे बड़ा सवाल पैसे के एक समान मूल्य यानी मुद्रा की एकरूपता का है। अगर अनियंत्रित निजी डिजिटल मुद्राएं बड़े पैमाने पर चलन में आ जाती हैं, तो केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति को लागू करने की क्षमता कमजोर पड़ सकती है। यह स्थिति उन उभरते हुए देशों के लिए और भी ज्यादा संवेदनशील बन जाती है जहां अर्थव्यवस्था की स्थिरता बनाए रखने के लिए पूंजी प्रवाह पर नियम और पाबंदियां लागू की गई हैं। जब पूंजी बिना किसी औपचारिक बैंकिंग माध्यम के देश से बाहर जाने लगेगी, तो घरेलू वित्तीय तंत्र पर इसका प्रतिकूल असर पड़ना तय है।

## घरेलू भुगतान तेज, सीमा पार लेन-देन के लिए सीबीडीसी पर नजर
डिजिटल पेमेंट के मोर्चे पर गवर्नर ने साफ किया कि देश के भीतर लेन-देन की व्यवस्था पहले से ही काफी सुगम और सस्ती हो चुकी है। भारत समेत कई प्रमुख देशों में घरेलू भुगतान प्रणालियां बेहद तेज गति से काम कर रही हैं, इसलिए घरेलू स्तर पर किसी समानांतर करेंसी की आवश्यकता नहीं है। असली चुनौती सीमा पार भुगतान की है, जहां अभी भी समय और लागत दोनों अधिक लगते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा यानी सीबीडीसी तथा अन्य तकनीकी माध्यमों पर विचार किया जा सकता है, जो कानूनी दायरे में रहकर अंतरराष्ट्रीय लेन-देन को सरल बना सकते हैं।

## वैश्विक ऋण का दबाव, बॉण्ड प्रतिफल और महंगाई का संतुलन
वैश्विक स्तर पर सार्वजनिक ऋण के बढ़ते आकार और बॉण्ड यील्ड में आ रहे उछाल पर चर्चा करते हुए आरबीआई गवर्नर ने स्पष्ट किया कि प्रतिफल में फेरबदल पूरी तरह मांग और आपूर्ति के गणित पर टिका है। सरकारों और निजी कंपनियों के खर्च में भारी इजाफा हुआ है, जिसमें एआई जैसी आधुनिक तकनीकों के विस्तार पर होने वाला बड़ा निवेश भी शामिल है। सीमित पूंजी के बीच खर्च बढ़ने के कारण सरकारों के साथ-साथ निजी कॉर्पोरेट्स ने भी बाजार से बड़े पैमाने पर उधारी लेनी शुरू कर दी है, जिससे ऋण बढ़ रहा है और बॉण्ड यील्ड में तेजी आ रही है। घरेलू स्तर पर रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति मुख्य रूप से आर्थिक विकास और महंगाई को नियंत्रित रखने पर केंद्रित है, लेकिन वैश्विक ब्याज दरों का असर भारत की वास्तविक ब्याज दरों पर भी पड़ता है। महंगाई बढ़ने पर ब्याज दरों पर दबाव आता है और इसका सीधा असर कर्ज की लागत पर पड़ता है, जिससे संतुलन साधना एक निरंतर चुनौती बना रहता है।

## इसका आप पर असर
आरबीआई द्वारा क्रिप्टोकरेंसी पर सतर्क रुख बनाए रखने और तकनीक को विनियमित दायरे में अपनाने से आम निवेशकों और कर्जदारों पर सीधा असर पड़ता है।

- **क्रिप्टो निवेशकों के लिए:** निजी क्रिप्टोकरेंसी पर केंद्रीय बैंक का कड़ा रुख बरकरार है, जिससे किसी भी तरह की कानूनी मान्यता या नीतिगत ढील की उम्मीद फिलहाल नहीं है। निवेशकों को यह समझना होगा कि अनियंत्रित क्रिप्टो में पूंजी लगाने पर विनियामक और वित्तीय जोखिम पूरी तरह उनका अपना रहेगा।
- **सुरक्षित डिजिटल भुगतानों पर:** टोकन व्यवस्था को बैंक द्वारा बढ़ावा दिए जाने से आपके कार्ड और ऑनलाइन भुगतान पहले से कहीं अधिक सुरक्षित हो रहे हैं। इससे संवेदनशील वित्तीय डेटा की चोरी या क्लोनिंग के खतरे न्यूनतम हो जाते हैं।
- **विदेशों में पैसे भेजने पर:** सीमा पार भुगतान के लिए सीबीडीसी जैसे विकल्पों पर काम चल रहा है, जिससे भविष्य में विदेश लेन-देन सस्ता हो सकता है। इससे विदेश में पढ़ने वाले छात्रों और प्रवासियों को पैसे भेजने में लगने वाला शुल्क और समय कम होगा।
- **कर्ज और ब्याज दरों पर:** वैश्विक दरों और महंगाई के दबाव से घरेलू ब्याज दरों पर सीधा असर पड़ता है। इसका मतलब है कि घर, वाहन या व्यक्तिगत ऋण की मासिक किस्तें तुरंत सस्ती होने के आसार सीमित हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
क्रिप्टोकरेंसी पर केंद्रीय बैंक की इस सतर्कता के पीछे मौद्रिक संप्रभुता की रक्षा, पूंजी पलायन का डर और वैश्विक आर्थिक दबाव मुख्य कारण हैं।

- **मौद्रिक नियंत्रण की सुरक्षा:** अनियंत्रित निजी डिजिटल करेंसी किसी देश के केंद्रीय बैंक की ब्याज दरें और मुद्रा आपूर्ति नियंत्रित करने की शक्ति को कमजोर कर सकती है। इसी वजह से संप्रभु मुद्रा की एकरूपता बनाए रखना प्राथमिक चिंता है।
- **पूंजी नियंत्रण की व्यवस्था:** भारत जैसे उभरते बाजारों में वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए सीमा पार पूंजी के प्रवाह पर कड़े नियम लागू रहते हैं। निजी क्रिप्टो इन नियमों को दरकिनार कर अवैध पूंजी पलायन का जरिया बन सकती है।
- **तकनीक बनाम मुद्रा का अंतर:** रिजर्व बैंक डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर और टोकनाइजेशन जैसी सुरक्षित तकनीकों का तो समर्थन करता है, लेकिन सट्टेबाजी वाली निजी मुद्राओं को अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम मानता है।
- **वैश्विक कर्ज और खर्च में उछाल:** सरकारों और कॉर्पोरेट्स के बढ़ते खर्च तथा एआई निवेश के चलते उधारी बढ़ी है, जिससे बॉण्ड यील्ड में तेजी आई है और मुद्रा प्रबंधन जटिल हुआ है।

## सवाल-जवाब

### 1. क्या आरबीआई क्रिप्टोकरेंसी को भारत में मंजूरी देने की योजना बना रहा है?
नहीं, आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने साफ किया है कि मौद्रिक नीति, संप्रभुता और पूंजी प्रवाह से जुड़ी चिंताओं के कारण भारत क्रिप्टोकरेंसी पर काफी सतर्क रुख अपना रहा है।

### 2. आरबीआई किन तकनीकों को बढ़ावा दे रहा है?
आरबीआई क्रिप्टो से जुड़ी बुनियादी तकनीकों जैसे डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी और टोकन व्यवस्था को अपने कामकाज और सार्वजनिक-निजी भागीदारी में बढ़ावा दे रहा है।

### 3. टोकन व्यवस्था का क्या अर्थ है?
टोकन व्यवस्था एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी वास्तविक संपत्ति या डेबिट/क्रेडिट कार्ड के संवेदनशील डेटा को सुरक्षित डिजिटल कोड या टोकन में बदला जाता है।

### 4. घरेलू और सीमा पार भुगतान को लेकर गवर्नर ने क्या कहा?
उन्होंने कहा कि भारत में घरेलू भुगतान पहले से ही तेज और सस्ता है, जबकि सीमा पार भुगतान की चुनौती को सुलझाने के लिए सीबीडीसी जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।

### 5. बॉण्ड यील्ड और सार्वजनिक ऋण क्यों बढ़ रहे हैं?
एआई और अन्य मदों में सरकारी व निजी खर्च बढ़ने से उधारी की मांग बढ़ी है, जिससे सीमित पूंजी के बीच बॉण्ड यील्ड और कर्ज में बढ़ोतरी हो रही है।

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